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सरफ़राज़ ख़ान: भारतीय क्रिकेट टीम की नई सनसनी, बड़ी भूमिकाओं के लिए हैं कितने तैयार
- Author, विमल कुमार
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
अपने पहले ही टेस्ट में 15 चौके और 4 छक्के लगाकर 130 रन...
अगर सरफ़राज़ ख़ान ने ये कमाल राजकोट टेस्ट की दो पारियों में दो अर्धशतक लगाकर करने के बजाय सिर्फ़ एक ही पारी में शतक लगाकर हासिल किया होता तो शायद उनको भी उतनी ही वाहवाही मिल रही होती, जितनी कि उनके साथी खिलाड़ी यशस्वी जायसवाल को मिल रही है.
मुंबई के 26 साल के इस बल्लेबाज़ को अपनी टेस्ट कैप के लिए जितना इंतज़ार करना पड़ा, उसकी तुलना हाल के सालों में शायद किसी और खिलाड़ी के साथ नहीं की जा सकती है.
बहरहाल, जब राजकोट टेस्ट के पहले दिन सरफराज़ बल्लेबाज़ी करने उतरे तो उनकी चाल के साथ-साथ बल्लेबाज़ी के अंदाज़ को देखते हुए भी कभी ऐसा नहीं लगा कि वो किसी तरह की परेशानी में हैं.
होते भी कैसे?
जिस बेटे ने अपने पिता को पिछले एक दशक में हर साल ऑफ सीज़न में कार से हज़ारों किलोमीटर का सफ़र करते हुए क्रिकेट के ज़रिये भारत-दर्शन करते देखा हो, उसके लिए तो टीम इंडिया के लिए टेस्ट क्रिकेट खेलना पूरे परिवार की तपस्या को पूरा होते देखने जैसा था.
पिता की तपस्या
टीम इंडिया के पूर्व विकेटकीपर बल्लेबाज़ विजय यादव की फ़रीदाबाद में अभिमन्यु क्रिकेट एकेडमी हो, मोहम्मद शमी के घर का मैदान हो, देहरादून की क्रिकेट एकेडमी हो, कानपुर में कुलदीप यादव के कोच की एकेडमी हो, ग़ाज़ियाबाद में टीएनएम क्रिकेट एकेडमी हो, मथुरा की अचीवर्स एकेडमी हो, मेरठ में भुवनेश्वर कुमार के कोच संजय रस्तोगी की क्रिकेट एकेडमी हो, दिल्ली के भरतनगर में गौतम गंभीर के कोच संजय भारद्वाज की क्रिकेट एकेडमी हो, लखनऊ में विश्वजीत सिन्हा की क्रिकेट एकेडमी हो या फिर आगरा, लखनऊ और गोरखपुर जैसे कितने शहरों की दर्जनों एकेडमी हों... सरफ़राज़ को उनके पिता इन सभी जगह ले गए.
सरफ़राज़ ख़ान के पिता नौशाद ख़ान, जो उनके पहले कोच भी हैं, उनके समर्पण की कहानी आप भारत के हर कोने की अलग-अलग क्रिकेट एकेडमी और उनके कोचों से सुन सकते हैं.
हर कोई सिर्फ नौशाद को यही तसल्ली और ढाढ़स देता कि ऊपरवाले के घर में 'देर है पर अंधेर नहीं' और देर-सबेर ही सही, उनका बेटा भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट ज़रूर खेलेगा.
कहते हैं ना- जब ऊपरवाला देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है. ऐसा ही कुछ नौशाद के साथ भी हुआ.
इस महीने उनके छोट बेटे मुशीर ख़ान को साउथ अफ्रीका में अंडर 19 वर्ल्ड कप में हर कोई शतक के बाद शतक लगाते देख रहा था और दूसरी ओर बड़े भाई सरफ़राज़ को भी आख़िरकार मौक़ा मिल ही गया.
गढ़े जा रहे नए विशेषण
भारतीय क्रिकेट में सुनील गावस्कर के अलावा सिर्फ़ दो और बल्लेबाज़ों- दिलावर हुसैन (1964) और श्रेयस अय्यर (2021) ने अपने पहले टेस्ट की दोनों पारियो में अर्धशतक बनाने का कमाल दिखाया था.
अब ऐसा ही करते हुए सरफ़राज़ मुंबई के मशहूर बल्लेबाज़ी घराने के तीसरे सदस्य बन गए.
लेकिन, सरफ़राज़ की बल्लेबाज़ी में वो चिर-परिचित मुंबई का खड़ूस अंदाज़ नहीं, बल्कि छोटे शहरों वाली बेफ़िक्री और ख़ुशमिज़ाज अंदाज़ दिखता है.
इसके दो कारण हैं. एक ये कि सरफ़राज़ मूल रूप से उत्तर-प्रदेश के हैं और जीवन में बहुत संघर्ष से गुज़रते हुए इस जगह पर पहुंचे हैं. दूसरी वजह है कि सचिन तेंदुलकर की बल्लेबाज़ी को देखकर बड़ा होने वाला ये बल्लेबाज़ रोहित शर्मा के विस्फोटक अंदाज़ का भी मुरीद है.
सरफ़राज़ के इस अनूठे अंदाज़ को देखते हुए गावस्कर ने कमेंट्री करने के दौरान एक नया विशेषण गढ़ा.
जिस वक़्त जायसवाल-सरफ़राज़ की जोड़ी इंग्लैंड के गेंदबाज़ों की ऐसी पिटाई कर रही थी कि मानो वे किसी स्कूल या क्लब के गेंदबाज़ों की धुनाई कर रहे हों, उस समय गावस्कर ने कहा, "ये नवी मुंबई स्कूल ऑफ़ बैटिंग का अंदाज़ है."
गावस्कर ने इंग्लिश कमेंटेटर ग्रेम स्वान को समझाते हुए कहा कि जिस तरह से 'पिछले कुछ दशक में अब मुंबई शहर फैलते हुए नवी मुंबई तक पहुंच गया है, ठीक उसी तरह से मशहूर मुंबई घराने की बल्लेबाज़ी में भी नया बदलाव आ चुका है.'
वनडे में भी है भविष्य?
“मुझको इस उम्र में आराम नहीं करना है, अपने सपनों को नाकाम नहीं करना है
मेरा रास्ता बड़ी दूर तलक जाता है, पड़े कोई बस्ती फिर भी शाम नहीं करना है”
सरफ़राज़ के पिता शायरी के बड़े शौक़ीन हैं. अपनी कार में जब वो अपने दोनों बच्चों के लिए ऑफ़ सीज़न में ड्राइवर की भूमिका निभाते तो उन्हें प्रेरित करने के लिए शायरना अंदाज़ में इसी तरह हल्के अंदाज़ में बातें करते.
बहरहाल, सरफ़राज़ ने अपने करियर की शुरुआत धमाकेदार अंदाज़ में की है और उनके खेल में बहुत सारे जानकारों को कई मायनों में 1990 के दशक के मुंबई के ही एक और प्रतिभाशाली बल्लेबाज़ विनोद कांबली की झलक देखने को मिलती है.
कांबली बायें हाथ के बल्लेबाज़ थे लेकिन जिस तरह से तेंदुलकर जैसे समकालीन दिग्गज के सामने भी उन्होंने अपनी एक अलग छवि बनाने में कामयाबी हासिल की थी, उसे कमतर नहीं आंका जा सकता है.
आज सरफ़राज़ के सामने मुंबई के ही और उनके स्कूल के चार साल के जूनियर जायसवाल हैं. उनसे उनकी तुलना होगी.
ज़ाहिर सी बात है कि जायसवाल इस रेस में आगे चल रहे हैं क्योंकि वो तीनों फ़ॉर्मेट में शानदार शुरुआत कर चुके हैं.
सरफ़राज़ शायद भारत के लिए क्रिकेट के सबसे छोटे फ़ॉर्मेट में न खेल पाएं लेकिन संजय मांजरेकर जैसे पूर्व खिलाड़ी का मानना है कि वनडे क्रिकेट में सरफ़राज़ जैसे खिलाड़ी टीम इंडिया के लिए मिडल ऑर्डर में बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं.
कितने मज़बूत हैं सरफ़राज़?
कांबली को शुरुआती कामयाबी के बाद स्टारडम के नशे और फिर उसके बाद लगे झटके से उबारने के लिए उनके क़रीब कोई नहीं था. लेकिन, 26 साल के सरफ़राज़ ने भारत के लिए खेलने से पहले ही क्रिकेट के मैदान पर कई झटके सह लिए हैं और मानसिक रूप से वह ज़्यादा मज़बूत हैं.
“दिल में जो था वही करता चला गया,
मंज़िल समझ कर बैठ गए जिस पर कई लोग
मैं ऐसे रास्तों से गुज़रता चला गया..."
ये भले ही सरफ़राज़ के पिता नौशाद की बेहद पसंदीदा शायरी के अल्फ़ाज़ हैं लेकिन इस खिलाड़ी के लिए उनके क्रिकेट-दर्शन का अभिन्न हिस्सा भी हैं.
उम्मीद की जा सकती है कि अगर इंग्लैंड के ख़िलाफ़ रांची और धर्मशाला में भी सरफ़राज़ का बल्ला चमका तो उन्हें टीम के इंडिया के लिए हवाई जहाज़ से अलग-अलग मुल्कों में लाखों किलोमीटर का सफ़र करना पड़ेगा.
ये उनके पिता के लिए सबसे बड़ी गुरुदक्षिणा होगी, जिन्होंने अपनी कार से अब तक डेढ़ लाख किलोमीटर में से 90 फीसदी हिस्सा सिर्फ सरफ़राज़ की क्रिकेट के लिए तय किया है.
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