You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
श्रीलंका के नए राष्ट्रपति अनुरा जीत के बाद भी अपने ही वादों में क्यों घिर गए हैं?
- Author, अनबरासन एथिराजन
- पदनाम, दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय संपादक
वामपंथी विचारधारा के प्रति झुकाव वाले अनुरा कुमारा दिसानायके को श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव में जीत मिली तो इसे बड़े राजनीतिक बदलाव के रूप में देखा गया था.
लेकिन आर्थिक तंगी से जूझ रहे इस द्विपीय देश के नए शासक को बहुत जल्द ही अहसास हो गया कि उनके लिए चुनावी वादे निभाना आसान नहीं है.
सितंबर 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में दिसानायके की शानदार जीत के बाद उनके गठबंधन नेशनल पीपल्स पावर (एनपीपी) को संसदीय चुनाव में भी बड़ी जीत मिली थी.
नए साल को श्रीलंका के राष्ट्रपति और उनके समर्थक दोनों ही देश के लिए एक अहम मोड़ मानते हैं.
श्रीलंका फ़िलहाल आर्थिक संकट और सालों की ख़राब शासन व्यवस्था से उबरने की कोशिश कर रहा है.
हालांकि, सरकार के पास मतदाताओं से किए गए वादों को पूरा करने की गुंजाइश कम ही है. नई सरकार से जनता की उम्मीदें भी ज़्यादा हैं.
साल 2022 की आर्थिक मंदी के बाद से ही देश का आर्थिक सुधार धीमा रहा है और अब भी श्रीलंका आर्थिक संकट से बाहर नहीं निकल पाया है.
जीत के बाद भी मुश्किलें
श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके के गठबंधन एनपीपी को संसदीय चुनाव में 225 में से 159 सीटों पर जीत मिली थी.
उनकी पार्टी को दो तिहाई बहुमत के साथ प्रमुख आर्थिक और संवैधानिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए बड़ा जनादेश मिला है.
हालांकि जिस वक़्त श्रीलंका के चुनावी नतीजे आ रहे थे, उसी समय नए राष्ट्रपति को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ मुलाक़ात भी करनी पड़ी.
आईएमएफ़ के साथ श्रीलंका की पिछली सरकार ने 2.9 अरब डॉलर का बेलआउट पैकेज तय किया था.
हालांकि श्रीलंका के लिए आईएमएफ़ के साथ किया गया समझौता विवादास्पद भी रहा था.
इसकी वजह से सरकार ने टैक्स में बढ़ोतरी और ऊर्जा सब्सिडी में कटौती जैसे अलोकप्रिय फ़ैसले किए थे. ज़ाहिर है कि इसका असर आम लोगों पर पड़ा था.
अपने चुनावी अभियान के दौरान अनुरा कुमारा दिसानायके और उनके गठबंधन ने श्रीलंका के लोगों से वादा किया था कि वे आईएमएफ़ के साथ हुए समझौते के कुछ हिस्सों पर दोबारा बातचीत करेंगे.
लेकिन चुनाव जीतने के बाद संसद को संबोधित करते हुए श्रीलंका के राष्ट्रपति ने अपने इस वादे से यू-टर्न ले लिया था.
अपने संबोधन में उन्होंने कहा था, "श्रीलंका की अर्थव्यवस्था ऐसी स्थिति में है, जहाँ छोटा झटका भी सहन नहीं कर सकती है. इसीलिए ग़लती की कोई गुंजाइश नहीं है."
श्रीलंकाई राष्ट्रपति ने कहा था, "यह वक़्त इस बात पर चर्चा करने का नहीं है कि आईएमएफ़ के क़र्ज़ की शर्तें अच्छी हैं या बुरी या फिर समझौता हमारे लिए अच्छा है या नहीं. यह प्रक्रिया लगभग दो सालों तक चली और हम इसे दोबारा से शुरू नहीं कर सकते."
श्रीलंका के आर्थिक संकट की वजह से लोग सड़कों पर उतर गए थे और एनपीपी को भारी जनसमर्थन मिला था.
श्रीलंका में आर्थिक संकट की वजह से साल 2022 की गर्मियों में लोगों का आंदोलन शुरू हुआ था. इसने श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को सत्ता से बेदख़ल कर दिया था.
उस वक़्त श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार ख़ाली था और ज़रूरी आयात बिल चुकाना भी मुश्किल हो गया था.
लोगों की नाराज़गी
इससे पहले श्रीलंका ने 46 अरब डॉलर का विदेशी क़र्ज़ नहीं चुका पाने के कारण ख़ुद को दिवालिया घोषित कर दिया था. श्रीलंका के बाहरी क़र्ज़दाता चीन, जापान और भारत हैं. इन देशों ने श्रीलंका को अरबों डॉलर का क़र्ज़ दिया है.
श्रीलंका के हालिया चुनावी नतीजों से यह भी पता चलता है कि देश के कई राजनीतिक दलों के अलावा पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे, रनिल विक्रमसिंघे और दूसरे नेताओं के लिए भी लोगों के मन में ग़ुस्सा था.
ये सभी नेता देश को आर्थिक तंगी से निकालने में बुरी तरह से नक़ाम रहे थे.
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर जयदेव उयांगोडा ने बीबीसी से श्रीलंका के राष्ट्रपति की प्राथमिकताओं पर बात की.
प्रोफ़ेसर जयदेव उयांगोडा के मुताबिक़, "अनुरा कुमारा दिसानायके की प्राथमिकताओं में एक है, लोगों को भारी टैक्स और महंगाई से राहत दिलाना. इसके अलावा उनके लिए क़र्ज़ का प्रबंधन भी एक बड़ी चुनौती है."
श्रीलंका के लोगों की सरकार से क्या उम्मीदें हैं?
अभी तक बड़े पैमाने पर हुए राजनीतिक बदलावों का राजधानी कोलंबो में रहने वाली चार बच्चों की माँ निलुका दिलरुक्शी जैसे लोगों पर कोई असर नहीं पड़ा है.
दिलरुक्शी के पति दिहाड़ी मज़दूर हैं और उनके परिवार का गुज़ारा मुश्किल से ही हो पाता है.
देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू होने से पहले जनवरी 2022 में बीबीसी ने उनसे श्रीलंका में बढ़ती महंगाई के बारे में बात की थी.
उस समय उन्होंने कहा था, "हमारा परिवार दिन में तीन के बजाय केवल दो बार खाना खा पा रहा है. मछली और मांस महंगे होने के कारण हमारी पहुँच से बाहर हैं. हम अपने बच्चों को केवल सब्ज़ियां और चावल ही खिला पा रहे हैं."
दिलरुक्शी कहती हैं, "हम अब भी अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और कुछ भी नहीं बदला है. चावल हमारा प्रमुख भोजन है लेकिन इसकी क़ीमत बढ़ रही है. हमें सरकार से कोई राहत नहीं मिल रही है."
दिलरुक्शी जैसे लोग चाहते हैं कि नई सरकार तुरंत ज़रूरी सामानों की कीमत कम करने के लिए कोई क़दम उठाए.
श्रीलंका आयात पर निर्भर देश है. उसे खाद्य सामग्री और दवाओं के आयात के लिए विदेशी मुद्रा की ज़रूरत होती है.
श्रीलंका ने अभी विदेशी क़र्ज़ों का भुगतान निलंबित कर रखा है.
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि असली चुनौती तीन से चार साल बाद शुरू होगी, जब श्रीलंका को फिर से अपने कर्ज़ की अदायगी शुरू करनी होगी.
इसके अलावा अगर अगले दो-तीन सालों में श्रीलंका के लोगों के जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं आया तो उनकी धारणा राष्ट्रपति दिसानायके और नई सरकार के लिए भी बदल सकती है.
प्रोफ़ेसर जयदेव उयांगोडा के मुताबिक़, "श्रीलंका के लोगों ने राष्ट्रपति दिसानायके को बड़ा जनादेश दिया है. आईएमएफ़ को भी इसका सम्मान करना चाहिए और लोगों की भलाई के लिए कार्यक्रमों के ज़रिए जनता को कुछ राहत देनी चाहिए."
भारत और चीन दोनों के लिए अहम है श्रीलंका
श्रीलंका के नए राष्ट्रपति दिसानायके को भारत और चीन का भी सामना करना होगा जो कि श्रीलंका में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए होड़ कर रहे हैं. हाल के सालों में दोनों ही देशों ने श्रीलंका में भारी निवेश किया है.
प्रोफ़ेसर जयदेव उयांगोडा कहते हैं, "भारत और चीन दोनों श्रीलंका को अपने प्रभाव में लाने की कोशिश करेंगे. मुझे लगता है कि नई सरकार को विदेश नीति बिना किसी के प्रभाव में आए व्यावहारिक रखनी चाहिए.''
सावधानी से लिए गए कूटनीतिक क़दम के तहत, राष्ट्रपति दिसानायके ने बीते दिसंबर में अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना था.
उनकी इस यात्रा के दौरान, भारत ने श्रीलंका के पावर प्लांट्स के लिए लिक्विड नैचुरल गैस सप्लाई करने और भविष्य में दोनों देशों के पावर ग्रिड को जोड़ने का वादा किया था.
श्रीलंका में चीन की बढ़ती मौजूदगी, ख़ासतौर पर चीन के रिसर्च करने वाले जहाजों के देश के बंदरगाहों पर आने से भारत के मन में चिंता है. श्रीलंका के बंदरगाह भारत के दक्षिणी तट के पास हैं.
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात के बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति दिसानायके ने कहा था, "मैनें प्रधानमंत्री मोदी को आश्वासन दिया है कि हम अपनी ज़मीन का इस्तेमाल भारत के हितों के ख़िलाफ़ किसी भी तरीक़े से नहीं होने देंगे."
हालांकि इस बात में कोई शक़ नहीं है कि श्रीलंका के राष्ट्रपति के इस आश्वासन से भारत को खुशी हुई होगी.
लेकिन जब दिसानायके जनवरी के बीच में चीन का दौरा करेंगे तब पता चलेगा कि श्रीलंका का आश्वासन कितना ठोस था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)