वेस्ट बैंक की यहूदी बस्तियां और ग़ज़ा में जारी जंग के बीच फ़लस्तीनियों की फिक्र

    • Author, रेहा कंसारा और मोहंद हाशिम
    • पदनाम, ग्लोबल रिलीजन रिपोर्टर और बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

ईसा अमरो इसराइल के क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक के हेब्रोन में अपने घर के अंदर बैठे हुए हैं. उनका गार्डन घर के बाहर सड़क तक खुला था, मगर अब इसमें बाड़ लगा दी गई है.

घर की खिड़कियां ईंटों से बंद कर दी गई हैं. अब घर के भीतर न तो रोशनी आ सकती है और न गोलियां. ईसा बताते हैं कि ये सब इंतज़ाम उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए किए हैं.

फ़लस्तीनी एक्टिविस्ट ईसा कहते हैं कि 7 अक्टूबर को जब हमास ने इसराइल पर हमला किया था, उस रोज़ उन्हें इसराइली सैनिकों ने उनके आंगन से उठा लिया था. 10 घंटों तक उन्हें हिरासत में रखा गया और पीटा गया. ईसा कहते हैं कि ऐसा करने वालों में कुछ उनके पड़ोस में बसे इसराइली भी थे.

वह कहते हैं, "मैं आपको उनके नाम बता सकता हूं. मैं बता सकता हूं कि कौन कहां रहता है. ज़्यादातर फ़लस्तीनी बाहर नहीं निकल रहे क्योंकि वे डरे हुए हैं."

वीडियो कॉल के दौरान वह कैमरे को दरवाज़े पर बने एक छेद के पास ले जाते हैं. छेद से देखने पर पांच लोग नज़र आते हैं जो रात को लगे कर्फ़्यू के दौरान सामने की सड़क पर गश्त लगा रहे थे. ऐसा लग रहा था कि इन्होंने सेना की वर्दी जैसा कुछ पहना हुआ था.

फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ हिंसा

हमने ईसा के दावों को लेकर इसराइली सेना (आईडीएफ़) से बात की. आईडीएफ़ के प्रवक्ता ने कहा कि उनका मिशन "इलाक़े के सभी लोगों की सुरक्षा बनाए रखना, साथ ही आतंकवाद और ऐसी गतिविधियों को रोकना है, जिनसे इसराइल के नागरिक ख़तरे में पड़ सकते हैं."

उन्होंने यह भी कहा कि वे ईसा के मामले की पड़ताल कर रहे हैं.

ग़ज़ा में युद्ध शुरू होने के बाद से ही वेस्ट बैंक में रहने वाले फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ हिंसा तेज़ी से बढ़ी है. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि यहां बसाए गए इसराइलियों के हमले में आठ फ़लस्तीनियों की मौत हुई है और 84 घायल हुए हैं.

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक़, वेस्ट बैंक और यरूशलम में बसाई गई बस्तियों में क़रीब सात लाख इसराइली रहते हैं. ये बस्तियां अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के हिसाब से 'अवैध' हैं.

यहां बसाए गए लोगों में से कुछ का नाता चरमपंथी, अति-धार्मिक यहूदी आंदोलनों से भी है. उनका मानना है कि वे बाइबल में वर्णित जूडा और सामरिया की उस धरती पर लौट आए हैं, जो इन दिनों वेस्ट बैंक से इसराइल तक फैली हुई है.

कथित तौर पर ईश्वर की ओर से यह ज़मीन उन्हें दिए जाने की भावना रखना उन्हें यहां बसे बाक़ी इसराइली समुदायों से अलग करता है, जो क़ब्ज़ाए गए इलाक़ों में आर्थिक कारणों या इसराइल की सुरक्षा मज़बूत करने के इरादे से बसे हैं.

लेकिन जो एक बात इन सभी को एकजुट करती है, वो ये कि भले ही ये ज़मीन उन्हें भगवान ने दी हो या नहीं, लेकिन इस पर उनका ही हक़ है.

यह बात ज़ाहिर है कि यहूदी और अरब परिवार यरूशलम में घुल मिलकर रहते थे.

लेकिन 1948 के अरब-इसराइल युद्ध के बाद जब इसराइल और जॉर्डन के बीच शहर का बंटवारा हो गया, तब पूर्वी यरुशलम में रहने वाले यहूदी परिवारों ने अपने घर छोड़ दिए और पश्चिमी हिस्से में रहने वाले अरब वहां से चले गए.

सेटलर मूवमेंट की शुरुआत

1967 में छह दिन के युद्ध के बाद सेटलर मूवमेंट (यहूदियों को इस पूरे क्षेत्र में बसाना) शुरू हुआ, जो आज भी चल रहा है. उस युद्ध में इसराइल ने पूर्वी यरूशलम को जॉर्डन और इसके अरब सहयोगियों से छुड़ाकर उस पर क़ब्ज़ा कर लिया था.

युद्ध के बाद के महीनों में पहली धर्म आधारित बस्ती कफ़ार इत्ज़ियोन स्थापित की गई थी. इसराइल और वेस्ट बैंक की सीमा (जिसे ग्रीन लाइन कहा जाता है) से सिर्फ़ चार किलोमीटर दूर मौजूद इस बस्ती में आज क़रीब 40 हज़ार लोग रहते हैं.

एक साल बाद, धार्मिक ज़ायोनिस्ट रब्बी (पादरी) मोशे लेविंगर और उनके अनुयायी, यहूदी पर्व पासओवर (फसह) मनाने के लिए हेब्रोन में दाख़िल हुए, मगर वहां से कभी नहीं लौटे. शहर के बाहरी हिस्से में उन लोगों ने किरयात अर्बा नाम से बस्ती बसाई है.

मॉन्ट्रियल यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर और लेखक याकोव राब्किन कहते हैं कि कफ़ार इत्ज़ियोन को तो सरकार का समर्थन हासिल था, लेकिन रब्बी लेविंगर और उनके अनुयायी सरकार के ख़िलाफ़ जाकर हेब्रोन में बसे.

इतिहासकार और विशेषज्ञ, सभी का मानना है कि रब्बी लेविंगर का क़दम धार्मिक आधार पर बस्तियां बसाने के आंदोलन के लिए एक अहम मोड़ था.

याकोव राब्किन कहते हैं, "वे (धार्मिक सेटलर) उन कई सारी पहाड़ियों में गए, जिनका बाइबल में ज़िक्र है. उन्होंने वहां पर बसने की कोशिश की क्योंकि वे चाहते थे कि बाइबल में बताई गई पूरी ज़मीन उनकी हो."

300 बस्तियां

इसराइली एनजीओ पीस नाऊ के अनुसार, आज वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम में ऐसी बस्तियों की संख्या 300 पहुंच गई है.

इस संगठन का कहना है कि इनमें 146 रिहायशी बस्तियां हैं और 154 निगरानी के लिए बनाई गई चौकियां. इन्हें अवैध बताने वाले अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों को नज़रअंदाज़ करते हुए इसराइली इन चौकियों को क़ानूनी मानते हैं.

लंदन की क्वीन्स मैरी यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय क़ानून और मानवाधिकार के प्रोफ़ेसर नीव गॉर्डन कहते हैं, "शुरुआत छोटे-छोटे समूहों वाली चौकियों से होती है और बाद में इसराइली सरकार उन्हें मान्यता दे देती है."

"वे कहीं से ट्रेलर पर पहले से बना घर लेकर आते हैं. फिर एक और लाते हैं और धीरे-धीरे और ज़मीन पर क़ब्ज़ा करते हैं. फिर एक और परिवार वहां आकर बस जाता है. फिर अगले दिन सेना आती है और वहां पर चार से पांच सैनिकों को उनकी सुरक्षा के लिए तैनात कर देती है."

अति-दक्षिणपंथी दलों की राजनीति

आज धार्मिक यहूदीवाद इसराइल की राजनीति के ताने-बाने का हिस्सा बन चुका है.

प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की गठबंधन सरकार के ज़रिये अति-दक्षिणपंथी दलों का मुख्यधारा की राजनीति में आना इसी को दर्शाता है.

यहूदियों में अति दक्षिणपंथ का अध्ययन करने वालीं तनाशा रोथ-रॉवलैंड कहती हैं, "वे भड़काऊ बयान देते हैं. उनके ज़रिये इसराइल की सरकार के अंदर बह रही इसराइली चरमपंथी भावना की झलक देखी जा सकती है."

इसी तरह की बस्ती में रहने वाले और धार्मिक ज़ायोनिस्ट पार्टी के नेता बेज़लेल स्मोट्रिच वेस्ट बैंक में और बस्तियां बसाए जाने की मांग करते रहे हैं. उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट में फ़लस्तीनियों को नाज़ी बताते हुए भड़काऊ भाषा इस्तेमाल की थी.

नवंबर में, वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने इसराइली सेना की मौजूदगी बढ़ाने और इसराइली बस्तियों के समीप फ़लस्तीनियों के ऑलिव तोड़ने पर रोक लगाने की मांग की थी.

राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतमार बेन-ग्वीर एक और शख़्स हैं, जो धार्मिक सेटलर मूवमेंट के साथ जुड़े हुए हैं. वह किर्यात अरबा नाम की बस्ती में रहते हैं. इसराइली पुलिस व वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम में सक्रिय बॉर्डर पुलिस उन्हीं के अधीन है.

वह अति-राष्ट्रवादी कच आंदोलन में शामिल थे, जिसे अमेरिकी रब्बी मीर काहाने ने शुरू किया था. इस आंदोलन को अब इसराइल में आतंकवाद रोधी क़ानूनों के तहत प्रतिबंधित कर दिया है. बेन ग्वीर को नस्लवाद फैलाने और आतंकवाद का समर्थन करने का दोषी भी पाया जा चुका है.

सेटलर मूवमेंट पर अमेरिकी प्रभाव

धार्मिक सेटलर मूवमेंट पर अमेरिका का गहरा प्रभाव रहा है और इससे यह ख़ूब फला-फूला है. ज़मीनी स्तर पर भी और राजनीतिक स्तर पर भी.

2021 में सोशल मीडिया पर अपलोड किए गए एक वीडियो में दिख रहा था कि एक अमेरिकी-यहूदी सेटलर, कब्‍ज़े वाले पूर्वी यरूशलम में एक फ़लस्तीनी महिला के घर पर क़ब्ज़ा कर रहा था. यह ख़बर पूरी दुनिया में सुर्ख़ियों में रही थी.

इस वीडियो में दिखता है कि मुना अल-कुर्द नाम की महिला कह रही हैं- 'तुम मेरा घर चुरा रहे हो.'

इसके जवाब में याकोव फाउची ने कहा, "अगर मैं नहीं चुराऊंगा तो कोई और चुरा लेगा."

कुछ ऐसे संगठन भी हैं जो फाउची जैसे अमेरिकी यहूदियों को इसराइल और क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में जाने में मदद करते हैं.

सिर्फ़ प्राइवेट संगठन ही इन बस्तियों को बचाने के लिए चल रहे आंदोलनों की मदद नहीं करते.

माना जाता है कि अमेरिकी यहूदी वकील और इसराइल के लिए अमेरिका के पूर्व राजदूत डेविड फ़्राइडमन बेत अल (ईश्वर का घर) नाम के सेटलमेंट के साथ जुड़े धार्मिक सेटलर्स की मदद करते हैं.

यह बस्ती वहीं पर बनी है, जहां जैकब्स रॉक (याकूब की चट्टान) है. बाइबल के अनुसार, जैकब को यहीं पर वह सपना आया था, जिसमें परमात्मा ने इसराइलियों को ज़मीन देने का वादा किया था.

डोनल्ड ट्रंप के शासन काल में, डेविड फ़्राइडमन अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से यरूशलम ले जाने जैसी नीतियां बनाने में शामिल थे.

उत्तर अमेरिका में यूरोपीय लोगों के आकर बसने के इतिहास का अध्ययन करने वाले इसराइल के मामले में भी वैसा ही कुछ होता देख रहे हैं.

प्रोफ़ेसर नीव गॉर्डन का कहना है कि जो लोग अति धार्मिक सेटलर मूवमेंट का समर्थन करते हैं, वे चाहते हैं कि फ़लस्तीनियों को विस्थापित करके यहां से हटा दिया जाए.

प्रोफ़ेसर याकोव का भी यही मानना है. वह कहते हैं, "इसराइल का इतिहास अमेरिकी इतिहास से मेल खाता है. फ़र्क इतना है कि अमेरिका ने स्थानीय आबादी के ज़्यादातर हिस्से को ख़त्म कर दिया था, जबकि इसराइलियों ने ऐसा नहीं किया. मगर अब वे ऐसा ही कर रहे हैं."

जंग के बीच बसी बस्तियां

पीस नाऊ संगठन ने पाया है कि जंग की शुरुआत से अब तक, वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम में छह नई बस्तियां बनाई गई हैं. ये स्पष्ट नहीं है कि यहां बसने वाले धार्मिक रुझान रखने वाले हैं या फिर किसी बड़ी सुरक्षा संबंधित रणनीति के तहत ये बस्तियां बसाई गई हैं.

प्रोफ़ेसर नीव गॉर्डन का कहना है, "आपदा को अवसर में तब्दील कर दिया गया है.”

एक्टिविस्ट ईसा अमरो का संगठन ‘यूथ अगेंस्ट सेटलमेंट्स’ इस बात के लिए आवाज़ उठाता है कि वेस्ट बैंक से इसराइली बस्तियां हटनी चाहिए.

ईसा कहते हैं कि उनके संगठन का काम रुक गया है. उनका कहना है कि हेब्रोन में जारी हिंसा के कारण अपहरण, जेल और यातनाओं के ख़तरे के कारण ऐसा हुआ है.

उन्होंने कहा, "यहां सुरक्षा मिलने और सुरक्षित होने की कोई भावना नहीं है. देखिए, मैं कैसे रहता हूं. कौन मेरा रक्षा कर रहा है?"

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