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नागोर्नो-काराबाख़ की वीरानी, बयां कर रही है अर्मीनिया की करारी हार की कहानी
- Author, जोएल गुंटर
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, नागोर्नो-काराबाख़
नागोर्नो-काराबाख़ के उंचे पहाड़ी इलाके में अर्मीनिया की एक सैन्य पोस्ट का ये नज़ारा. यहां पहुंचते ही पहली नजर जाती है जहां तहां बिखरे बर्तनों पर.
इनके साथ हैं छिटपुट बिखरीं खाने की प्लेटें, आधी जली हुई सिगरेट और आधा खाया हुआ ब्रेड रोल. ये बयां कर रहे हैं यहां हुए भयावह संघर्ष का मंजर.
इसके पास अर्मीनिया की एक और छोटी सी सीमा चौकी है. यहां घास के बीच एक सेना की एक लॉग-बुक दिखी. इसमें आखिरी एंट्री जो दर्ज थी, उसमें लिखा है- ‘सबकुछ नियंत्रण में है.’
इन सीमा चौकियों पर जो अवशेष मिले, वो इस बात की गवाही देते हैं, अमीर्निया ने कितनी जल्द इलाके पर से अपना नियंत्रण खोया. दो हफ्ते पहले कितनी तेजी से अजरबैजान की सेना ने बिजली सी तेज गति से चलाए गए सैन्य ऑपरेशन में कैसे पूरे इलाके पर कब्जा जमाया.
तीन दशक पहले नागर्नो काराबाख़ का जो इलाका एक खूनी संघर्ष के बाद अजरबैजान के नियंत्रण से बाहर हो गया था, उसे 24 घंटे में ही अजरबैजान की सेना ने वापस अपने कब्जे में ले लिया.
इस सैन्य ऑपरेशन में अजरबैजान के दो सौ सैनिक मारे गए, जबकि 500 के करीब जवान घायल हुए.
लेकिन इस बात से परदा नहीं उठा कि आखिर 24 घंटे के ऑपरेशन में इतने ज्यादा अजरबैजानी सैनिक कैसे और किन हालातों में मारे गए. अजरबैजानी सेना ने मंगलवार को बेहद नियंत्रित तरीके से इलाके का जो मीडिया टूर आयोजित किया, उसमें भी इस बात का खुलासा नहीं हुआ.
इस दौरान जिस अजरबैजानी सैनिक को सेना के प्रवक्ता के रूप में सामने किया गया था, उसने अपना नाम और रैंक तक बताने से इंकार किया. उसने सिर्फ ये कहा कि अजरबैजान ने अपनी आर्टिलरी और पैदल सेना के सटीक इस्तेमाल से पूरे फ्रंटलाइन को अपने कब्जे में ले लिया.
खंडहर बने घर, शहर और पूरी राजधानी
सेना के उस कथित प्रवक्ता ने ये भी बताया कि हमारे खिलाफ जो आर्मीनियाई सैनिक लड़ रहे थे, रेगुलर सैनिक नहीं थे. उनके पास एक बख्तरबंद गाड़ी और दो टैंक थे.
ये लोग अजबैजानी सैनिकों पर ऊंचाई वाले इलाकों से गोलीबारी करने के लिए स्नाईपर्स का इस्तेमाल कर रहे थे.
इस क्षेत्र की राजधानी खानकेंदी का दौरा करने के लिए यूएन और रेड क्रॉस की टीमों को अनुमति मिल चुकी है. लेकिन बीबीसी औऱ दूसरे अंतराष्ट्रीय मीडिया एजेंसियों को खानकेंदी शहर में जाने की अनुमति नहीं दी गई.
अजरबैजानी अधिकारियों ने इसके पीछे सुरक्षा कारणों का हवाला दिया.
खानकेंदी पर अजरबैजान के कब्जे के बाद से यहां की कुछ तस्वीरें जरूर सामने आई है, जिसमें ये किसी भूतहा शहर की तरह दिखता है. यहां गली-मुहल्ले और मकान वीरान हैं, क्योंकि तमाम बाशिंदे पहले ही यहां से जा चुके हैं.
नागोर्नो-काराबाख़ में रहने वाले करीब 1 लाख 20 हजार अर्मीनियाई मूल के लोग पिछले दो हफ्ते में यहां से जा चुके हैं. यूं समझिए शहर इलाके की पूरी आबादी नागोर्नो-काराबाख़ छोड़ चुकी है.
यहां से अर्मीनिया जाने का जो एक मात्र रास्ता है, वो लैचिन कॉरिडोर है.
इस पूरे रास्ते में तमाम कारें और घर के कई सामान बिखरे पड़े हैं. यहां से बच निकलने के लिए लोगों की मीलो लंबी कतार लगी थी. इस दौरान कुछ कारों के इंधन खत्म हो गए और लोगों ने अपना सामान यहीं छोड़ दिया.
काराबाख़ में रहने वाले अर्मीनियाई लोगों को बंदूक का डर दिखाकर या जबरन भगाया गया, इस बात की पुष्टि करने वाली कोई रिपोर्ट नहीं है.
सैन्य ऑपरेशन को लेकर अजरबैजानी राष्ट्रपति के विदेशी मामलों के सलाहकार हिकमत हाजियेव कहते हैं, ‘’ये एक छोटा ऑपरेशन था. आतंकी गतिविधियों के खिलाफ. इसमें सिर्फ विरोधियों के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया.’’
हाजियेव ने यभी कहा कि ऑपरेशन के दौरान पैदल सेना के अलावा टैंक जैसे आम हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया गया.
अजरबैजान ने अपनी तरफ से ये भी साफ किया कि ‘उनका मकसद था नागोर्नो-काराबाख़ पर शांतिपूर्वक नियंत्रण. लेकिन जो काराबाखी अर्मेनियन नागरिक शहर छोड़कर गए, ये उनका अपना चुनवा था.’
लेकिन आर्मीनिया का आरोप इसके ठीक उलट है. प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यन ने अजरबैजान पर अर्मीनियाई लोगों के जातीय संहार का आरोप लगाया है. यूरोपियन यूनियन ने भी अजरबैजान के सैन्य ऑपरेशन की आलोचना की है.
सैन्य ऑपरेशन के 10 महीने पहले से ही अजरबैजान ने नागर्नो-काराबाख़ की नाकेबंदी शुरू कर दी थी. इसकी वजह से लोगों को भोजन, दवाइयां और ईंधन जैसी बुनियादी चीजों के लिए तरसना पड़ा.
कुछ लोग इस बात पर भी हैरानी जताते हैं, कि काराबाख में रहने वाले अर्मेनियाई लोग अजरबैजान जैसे मुल्क से वापस कैसे जुड़ सकते हैं, जिसकी तानाशाही सत्ता के साथ खूनी संघर्ष का लंबा इतिहास है।
इस संघर्ष को करीब से समझने वाले एक विशेषज्ञ थॉमस डी वाल कहते हैं, ‘’नस्ली संहार के लिए सीधी हिंसा कोई जरूरी नहीं, बल्कि इसका डर दिखाना भी काफी होता है.’’
थॉमस आगे कहते हैं, ‘’नागोर्नो काराबाख़ के संघर्ष में सैकड़ो अर्मेनियाई सैनिक मारे गए, अजरबैजानी सेना के डर से तकरीबन सारे स्थानीय लोग अपना घर और शहर छोड़कर भाग गए. क्योंकि यहां रुककर ये देखने में कि उनके साथ क्या होगा, उनकी जान का खतरा था.’’
नफ़रत और हिंसा की सौ साल पुरानी विरासत
पलायन के पीछे थॉमस डी वॉल अर्मेनिया और अजरबैजान के बीच पिछले 100 बरस से बढ़ी नफरत और अविश्वास को भी रेखांकित करते हैं. इसी की वजह से दोनों तरफ के लोग विरोधी सेना के पहुंचते ही लोग घर बार छोड़कर भाग जाते हैं.
ये सिलसिला 1990 के दशक से ही चल रहा है. अजरबैजान के स्कूलों में आज बच्चों को पढ़ाया जाता है कि अर्मेनियाई सैनिकों ने 1993 में कितना बड़ा नस्ली संहार किया था.
अभी 3 साल पहले ही की बात है. 2020 में जो 44 दिन का युद्ध चला उसमें 7 हजार से ज्यादा सैनिक और 170 आम नागरिकों की जान गई. इसमें हजारों लोग जख्मी भी हुए. वो संघर्ष रूस की दखल के बाद खत्म हुआ. उस शांति समझौते के तहत अर्मीनिया ने 7 जिले अजरबैजान को लौटा दिया. लेकिन एक अहम हिस्से पर अर्मीनिया का कब्जा बरकरार रहा.
उस युद्ध के बाद अजरबैजान में जो जश्न का माहौल था, वैसा के सैन्य ऑपरेशन के बाद नहीं दिखा. पिछले हफ्तों में हुए सैन्य झड़प को लेकर अगर कुछ गहमागहमी थी तो वो सिर्फ स्थानीय रेडियो स्टेशनों पर थी. इसके जरिए मारे गए सैनिकों का ऐलान किया जा रहा था.
काराबाख़ के बाकी इलाकों पर अजरबैजान के दोबारा नियंत्रण के बाद यहां के कई पूर्व नागरिकों ने राहत की सांस ली. इनमें से एक हैं ज़उर मामादोव. 38 साल के ज़ऊर पेशे से टेलिकॉम इंजीनियर हैं. इन्हें काराबाख़ मे अपना घर 1993 में छोड़ना पड़ा था, जब अर्मेनियाई सैनिकों ने शहर पर हमला कर सारे अजरबैजानी नागरिकों को मार भगाया था.
ज़उर मामादोव कहते हैं, ‘2020 के युद्ध के बाद वो वापस अपने बचपन वाले घर में लौट पाए थे. उस घर को अर्मेनियाई सैनिकों ने 27 साल से अपना ठिकाना बना रखा था.’
मामादोव जैसे कई अजरबैजानी लोगों को लगता है कि नागोर्नो-काराबाख के बाकी हिस्सो पर अजरबैजान के कब्जे के बाद वो दोबारा वहां बस सकते हैं. पहले से कहीं ज्यादा बड़े घर में. वो कहते हैं, ‘’इस दिन के लिए हमने 30 साल इंतजार किया. अब वो आ चुका है.’’
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