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मुस्तफ़ाबाद सीट पर ओवैसी की पार्टी ने कैसे बिगाड़े आम आदमी पार्टी के समीकरण?
दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम लगभग आ चुके हैं और क़रीब 27 साल बाद भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी की सत्ता में वापसी हो रही है.
जिन अहम सीटों पर लोगों की निगाह थी उनमें से मुस्तफ़ाबाद सीट भी एक है.
मुसलमानों की अच्छी ख़ासी तादाद वाली इस सीट पर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने दिल्ली दंगों के अभियुक्त ताहिर हुसैन को उतारा था. जिसके बाद चर्चा चल रही थी कि क्या उनकी उम्मीदवारी आम आदमी पार्टी की संभावनाओं पर विपरीत असर डालेगी.
चुनाव परिणाम आने के बाद ये आकलन काफ़ी हद तक सही भी साबित हुआ.
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ताहिर हुसैन को कितने वोट मिले?
मुस्तफ़ाबाद से बीजेपी के उम्मीदवार मोहन सिंह बिष्ट ने आम आदमी पार्टी के आदिल अहमद ख़ान को 17,578 वोट से हरा दिया.
दिलचस्प बात ये है कि इस सीट पर ताहिर हुसैन 33,474 वोट हासिल करके तीसरे नंबर पर रहे.
कांग्रेस के अली मेंहदी को सिर्फ़ 11,763 वोट मिले और वो चौथे नंबर पर रहे.
वोट प्रतिशत की बात करें तो बीजेपी के मोहन सिंह बिष्ट को 42.36 प्रतिशत वोट मिले.
जबकि आप के आदिल अहमद ख़ान को 33.62 प्रतिशत वोट मिले
वहीं एआईएमआईएम के ताहिर हुसैन को 16.64 प्रतिशत वोट मिले.
यानी भले ही वो चुनाव नहीं जीत पाए लेकिन उन्होंने ठीक ठाक वोट हासिल किए.
वरिष्ठ पत्रकार विनीत वाही कहते हैं, "दिल्ली के चुनाव नतीजे स्पष्ट तौर पर बताते हैं कि वोटों के बंटवारे का नुक़सान आम आदमी पार्टी को हुआ है. इसकी वजह से मुस्तफ़ाबाद जैसी सीट पर आप हारी है. यह ऐसी सीट है जहां बड़ी संख्या में मुस्लिम वोटर हैं, लेकिन ताहिर हुसैन के आने से वोटों का जो बंटवारा हुआ उसकी वजह से जीत बीजेपी की हुई है."
परोल पर आकर किया था चुनाव प्रचार
दिल्ली दंगों के अभियुक्त ताहिर हुसैन ने कस्टडी परोल पर आकर मुस्तफ़ाबाद में ज़ोर शोर से चुनाव प्रचार किया.
इस दौरान हथियारों से लैस दिल्ली पुलिस के जवान उनके आस-पास ही रहते थे.
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के असदुद्दीन ओवैसी ने भी ताहिर हुसैन का प्रचार करते हुए घूम- घूमकर उनके लिए वोट मांगा था.
वो मतदाताओं से लगातार कहते रहे, "पांच साल जेल में बंद शख़्स ताहिर हुसैन का अदालत इंसाफ़ करेगी. आपको अपने वोट से ताहिर हुसैन को इंसाफ़ दिलाना है…ताहिर हुसैन नहीं जीतेगा तो कोई आपकी हिफ़ाज़त नहीं कर पाएगा."
चुनाव प्रचार के लिए दाख़िल ज़मानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ताहिर हुसैन को छह दिन की कस्टडी परोल दी थी.
वो मुस्तफ़ाबाद के वोटरों से कहते थे, "मेरे पास पोस्टर, बैनर के लिए पैसे नहीं हैं. मेरा ध्यान अब आपको रखना है. पतंग का निशान भूलना नहीं है."
क्या हुसैन ने बदले समीकरण
उत्तर पूर्वी दिल्ली की मुस्तफ़ाबाद विधानसभा सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी. पहले यह करावल नगर विधानसभा सीट का हिस्सा थी.
साल 2020 में यहां से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार हाजी यूनुस ने जीत दर्ज की थी. इस बार पार्टी ने आदिल अहमद ख़ान को चुनावी मैदान में उतारा था.
कांग्रेस ने पूर्व विधायक हसन मेहदी के बेटे अली मेहदी को और भारतीय जनता पार्टी ने करावल नगर के विधायक मोहन सिंह बिष्ट को इस सीट से टिकट दिया.
2020 के सांप्रदायिक दंगों का केंद्र रहे मुस्तफ़ाबाद में क़रीब दो लाख 60 हज़ार वोटर हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़ मुस्तफ़ाबाद में क़रीब 40 प्रतिशत मुसलमान और क़रीब 60 प्रतिशत हिंदू आबादी है.
ताहिर हुसैन की एंट्री ने इस मुक़ाबले को त्रिकोणीय बना दिया था. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने ताहिर हुसैन और एआईएमआईएम पर वोट काटने और बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाने के आरोप लगाए.
चुनाव प्रचार के दौरान बीबीसी संवाददाता अभिनव से बात करते हुए ताहिर हुसैन ने वोट काटने के सवाल पर कहा था, "जब भी कोई व्यक्ति दलित, मुसलमान, वंचित, और पिछड़ों के हक़ की बात उठाता है, तो उस पर वोट कटवा के आरोप लगाए जाते हैं."
वो कहते हैं, "अगर हमारी पार्टी वोट कटवा है तो कांग्रेस और आप ने आपस में समझौता क्यों नहीं किया? अगर दोनों पार्टियां गठबंधन में यहां चुनाव लड़ रही होतीं, तो आप कह सकते थे कि मैं वोट काट रहा हूं. इस बार जनता को समझ आ गया है कि कैसे दोनों पार्टियां (कांग्रेस और आप) गुमराह करने का काम कर रही हैं."
ताहिर को प्रचार के दौरान काफ़ी समर्थन मिला था
ताहिर हुसैन ने उन्हीं इलाकों में प्रचार किया जो जो मुस्लिम बहुल हैं.
इस दौरान उन्हें देखने के लिए भीड़ का हुजूम था.
इस दौरान कई वोटरों ने उनके साथ सहानुभूति जताई और उन्हें अच्छा शख़्स बताया और कहा कि दंगों के दौरान उन्होंने स्थानीय मुसलमानों का बहुत साथ दिया.
वहीं कई वोटरों ने माना कि उनको वोट देने से फ़ायदा बीजेपी को मिलेगा.
कौन हैं ताहिर हुसैन?
दिल्ली के उत्तर पूर्वी हिस्से में 23 फ़रवरी से 26 फ़रवरी, 2020 के बीच दंगे हुए थे. इन दंगों में 53 लोगों की जान गई थी.
दिल्ली पुलिस के मुताबिक़ मरने वालों में 40 मुसलमान और 13 हिंदू थे. उस वक़्त ताहिर हुसैन आम आदमी पार्टी के पार्षद थे, लेकिन दंगों में नाम आने के बाद पार्टी ने उन्हें सस्पेंड कर दिया था.
उन पर आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या समेत कई मामले दर्ज हैं. अंकित शर्मा की लाश 26 फ़रवरी को ताहिर हुसैन के घर के पास के एक नाले से मिली थी.
चुनावी हलफ़नामे के मुताबिक़ ताहिर के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस की 10 और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की एक एफ़आईआर दर्ज है.
बीबीसी से बातचीत में ताहिर ख़ुद को निर्दोष बताते हुए कहा था, "मुझे न्यायालय पर पूरा भरोसा है. वहां से मुझे न्याय मिलेगा."
हलफ़नामे के मुताबिक़ उनके पास क़रीब 42 लाख रुपये और उनकी पत्नी के पास क़रीब 43 लाख रुपये की चल संपत्ति है. वहीं अचल संपत्ति की बात करें तो उनके पास 8.85 करोड़ और उनकी पत्नी के पास 9 करोड़ से अधिक की संपत्ति है.
ताहिर के परिवार में पत्नी के अलावा दो बच्चे हैं. बेटे का नाम मोहम्मद शादाब हुसैन है. उन्होंने भी अपने पिता के लिए चुनाव प्रचार किया. उनकी बेटी का नाम राफ़िया ज़ारा हुसैन है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित