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भारत से बिजली खरीदने वाला नेपाल चीन से ये समझौता क्यों करना चाहता है, क्या है तिब्बत कनेक्शन
- Author, प्रदीप बश्याल
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी नेपाली
नेपाल चीन के साथ एक बिजली समझौते पर दस्तखत करने की तैयारी कर रहा है.
नेपाली अधिकारियों का कहना है कि पांच साल पहले सीमा पार ट्रासंमिशन लाइन को लेकर बनी सहमति उनकी प्राथमिकता में नहीं है.
इस बार जिस समझौते पर दस्तखत होना है, उसके ड्राफ्ट में 220 किलोवॉट की केरुंग-चिलिम ट्रांसमिशन लाइन शामिल है.
साल 2018 में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की चीन यात्रा के दौरान स्टेट ग्रीड कॉरपोरेशन ऑफ चाइना और नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के बीच एक समझौता हुआ था.
इसमें 400 किलोवॉट के रटमेटे-केरुंग ट्रांसमिशन लाइन का निर्माण शामिल था. इस परियोजना पर अभी तक काम शुरू नहीं हुआ है.
नेपाल के प्रधानमंत्री की चीन यात्रा
नेपाली ऊर्जा मंत्रालय के प्रवक्ता मधु भेटवाल ने बीबीसी को बताया, "इस क्षमता की बिजली को तिब्बत भेजने के लिए अभी कोई परियोजना नहीं है. आज की प्राथमिकता एक और केरुंग-चिलिम ट्रांसमिशन सिस्टम बनाना है, रटमेटे-केरुंग परियोजना के निर्माण को बाद में देखा जाएगा."
उन्होंने कहा कि भविष्य में चालू होने वाली परियोजना को ध्यान में रखते हुए, वर्तमान प्रस्ताव में लैपचे-किमाथंका ट्रांसमिशन लाइन का अध्ययन शुरू करने को भी शामिल किया गया है.
नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के प्रवक्ता सुरेश बहादुर भट्टाराई कहते हैं, "ऐसे समय में जब नेपाल चीन के साथ एक समझौते पर दस्तखत करने वाला है, इसमें सैद्धांतिक रूप से यह साफ हो जाएगा कि नेपाल किस तरह का बिजली समझौता चीन से करने वाला है."
वो कहते हैं कि "इस समझौते के तकनीकी पहलुओं पर हम तभी बात करेंगे जब यह साफ हो जाएगा कि हम केवल निर्यात करेंगे या आयात करेंगे या दोनों करेंगे और किस मात्रा में करेंगे."
प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि उनकी चीन यात्रा के दौरान ऊर्जा के क्षेत्र में दूरगामी और महत्वपूर्ण समझौता होगा.
क्या है नेपाल की तैयारी?
इस समझौते की तैयारी कर रहे नेपाल के ऊर्जा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने जो प्रस्ताव तैयार किया है, उसमें क्रॉस बार्डर ट्रांसमिशन लाइन, नेपाल और चीन के सीमाई इलाके में विद्युतीकरण, सबस्टेशनों और काठमांडू घाटी में ट्रांसमिशन लाइन को मजबूत बनाना शामिल है.
भेटवाल ने बताया कि विदेश मंत्रालय प्रस्ताव की अभी समीक्षा कर रहा है. इसलिए अभी यह साफ नहीं है कि इनमें से कौन सा बिंदु समझौते में शामिल होगा.
उन्होंने कहा कि समझौते में मोनोपोल या ट्रांसमिशन सिस्टम के विस्तार और काठमांडू घाटी के रिंग रोड क्षेत्र में सबस्टेशन जोड़ने का मुद्दा भी शामिल है.
नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के प्रवक्ता भट्टाराई का मानना है कि मुख्य मुद्दा घरेलू खपत और विदेशी व्यापार, दोनों के लिए बिजली प्रणाली की विश्वसनीयता विकसित करना है.
उनका कहना है कि अगर नया समझौता उस पर केंद्रित है तो, यह बहुत उपयोगी होगा.
इसी तरह यह भी कहा जा रहा है कि नेपाल देश के प्रमुख स्थानों पर चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने में सहायता का प्रस्ताव चीन को देने को तैयार है.
भेटवाल कहते हैं अभी निजी क्षेत्र इसमें रुचि नहीं ले रहा है. इसकी स्थापना के लिए सरकारी एजेंसियों से सहयोग मांगा गया है.
नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के मुताबिक़, नेपाल ने अब तक दो हजार 684 मेगावॉट बिजली उत्पादन की क्षमता विकसित की है. इसके अलावा 27 हजार 780 मेगावॉट की बिजली परियोजनाओं पर काम चल रहा है. इसमें कई एजेंसियां शामिल हैं.
यह भी कहा जा रहा है कि चीन नेपाल के लिए सीमा पार ऊर्जा व्यापार का एक अवसर भी होगा. नेपाल ने भारत और बांग्लादेश से इस तरह के समझौते पहले ही कर रखे हैं.
क्या है भारत की नीति?
अधिकारियों के मुताबिक भारत की यह अघोषित निति है कि वह उन परियोजनाओं से बिजली नहीं खरीदेगा, जिसमें चीन का या चीनी कंपनियों ने निवेश किया है.
भेटवाल कहते हैं, "भारत ने अपने दस्तावेज में चीन का नाम लिए बिना कहा है कि वह उन देशों से बिजली नहीं खरीदेगा, जिनका भारत के साथ ऊर्जा सहयोग का समझौता नहीं है. मुझे नहीं पता कि इस तरह का कोई समझौता उसका चीन के साथ है या नहीं."
कई चीनी कंपनियां नेपाल की छोटी-बड़ी परियोजनाओं में शामिल हैं. अधिकारियों और विशेषज्ञों की राय है कि नेपाल के लिए सीमा पार व्यापार के विकल्प के रूप में चीन के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाना अब जरूरी है.
हिमालय के ऊपरी इलाके के सीमाई क्षेत्रों में बिजली ग्रिड अभी तक नहीं पहुंच पाई है, नेपाल सरकार चीन से तिब्बत से बिजली लेकर उन क्षेत्रों के विद्युतीकरण का अनुरोध करने की योजना बना रही है.
भेटवाल कहते हैं, "चीन में बुनियादी ढांचा पहले से ही मौजूद है. वहीं, नेपाल ने अगले दो साल में पूरी तरह से विद्युतीकरण की योजना बनाई है, ऐसे में इसमें चीन का योगदान महत्वपूर्ण हो सकता है."
कैसा है तिब्बत का बिजली बाजार
नेपाली अधिकारियों का कहना है कि तिब्बत में बिजली की मांग अधिक है और हाल के सालों में इस इलाके में बिजली की खपत भी काफी बढ़ी है.
भेटवाल बताते हैं कि तिब्बत में सौर ऊर्जा की बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं, पनबिजली भी ऊर्जा का एक विश्वसनीय स्रोत बन सकती है.
यह भी कहा जा रहा है कि चीन सर्दियों में तिब्बत के लिए नेपाल से बिजली खरीदने में रुचि पिछले काफी समय से दिखा रहा है.
हालांकि नेपाल मॉनसून के दौरान अपनी जरूरत से ज्यादा बिजली पैदा करता है, लेकिन सर्दियों में उसे भारत से बिजली खरीदनी पड़ती है.
हालांकि, यह भी कहा जा रहा है कि कुछ बड़ी जलाशय परियोजनाएं शुरू होने जाने के बाद से भविष्य में नेपाल गर्मी के मौसम में बिजली बेच सकता है. इस दिशा में काम शुरू करने की बात भी कही गई है.
नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के प्रवक्ता सुरेश बहादुर भट्टाराई ने कहा, "इन हालात में अगर ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है कि नेपाल सस्ते दाम पर बिजली खरीद सके और ऊंचे दाम पर बेच सके, तो यह नेपाल के लिए फायदेमंद साबित होगा."
वो कहते है कि यह यह दीर्घकालिक योजनाओं और उनके तौर-तरीकों पर काम करने का समय है. इसके बाद ही नेपाल इलेक्ट्रीसिटी अथॉरिटी और प्रतिक्रिया दे पाएगा.
ऊर्जा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि दोनों पक्षों की बातचीत के बाद ही परियोजनाओं को अंतिम रूप दिया जाएगा. इसके बाद ही वित्तीय सहायता और परियोजनाओं के आकार पर स्थिति साफ हो पाएगी.
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