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वेनेज़ुएला पर सिर्फ़ तेल के चक्कर में ट्रंप ने की कार्रवाई या है कोई और मंशा?
साल 2026 की शुरुआत होते ही तीन जनवरी को अमेरिका ने वेनेज़ुएला में सैन्य कार्रवाई की और वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी के साथ गिरफ़्तार कर लिया.
अमेरिका ने कहा कि ये कार्रवाई नशीले पदार्थों की तस्करी के ख़िलाफ़ थी, मगर ये क़दम अचानक नहीं उठा बल्कि यह कई महीनों की सैन्य दबाव की रणनीति का नतीजा था.
दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के उत्तरी हिस्से में बसे वेनेज़ुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार है और ये भंडार करीब 300 अरब बैरल का है.
इतना तेल एक देश को दुनिया के अमीर देशों की कतार में पहुंचा सकता है, मगर कथित भ्रष्टाचार और आर्थिक कुप्रबंधन के कारण वहां की 90 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी गरीबी में जी रही है.
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निकोलस मादुरो के शासन पर दमन और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगे थे और करीब 80 लाख लोग देश छोड़ने को मजबूर हुए.
अब मादुरो की गिरफ़्तारी के बाद उप राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज़ को अंतरिम राष्ट्रपति बनाया गया है और अमेरिका ने उनका समर्थन किया है.
हालांकि, अमेरिका ने यह भी कहा है कि अगले चुनाव तक देश की दिशा अमेरिका तय करेगा. साथ ही, ट्रंप का ये कहना है कि ये व्यवस्था सालों तक चल सकती है.
वेनेज़ुएला पर अमेरिका की कार्रवाई के क्या मायने हैं? मादुरो के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाई के पीछे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप असल मंशा क्या है? और वेनेज़ुएला में जो हुआ, उसका दुनिया पर क्या असर पड़ सकता है?
बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा ने विशेषज्ञों के साथ इन्हीं सवालों पर चर्चा की.
कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में दक्षिण अमेरिकी विषयों की एसोसिएट प्रोफ़ेसर अपराजिता कश्यप, वरिष्ठ पत्रकार ज़ुबैर अहमद और द इंडियन एक्सप्रेस के नेशनल बिज़नेस एडिटर अनिल शशि शामिल हुए.
ट्रंप ने वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई की क्या वजह बताई?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेज़ुएला के नेता निकोलस मादुरो के ख़िलाफ़ अमेरिकी कार्रवाई को जायज़ ठहराया है.
मादुरो को 'अंतरराष्ट्रीय अपराधी' बताते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वह लोगों को इंसाफ़ दिलाने की कोशिश कर रहे हैं.
लेकिन इसके साथ ही, उन्होंने ये भी घोषणा की है कि वेनेज़ुएला अब अमेरिका को बड़ी मात्रा में तेल देने के लिए तैयार है. ट्रंप ने कहा कि उस तेल से जो भी पैसा आएगा, उसे कैसे और कहां खर्च किया जाए, ये ट्रंप या अमेरिकी प्रशासन तय करेगा.
इसीलिए ट्रंप के असल मक़सद पर सवाल उठ रहे हैं.
जेएनयू में एसोसिएट प्रोफ़ेसर अपराजिता कश्यप बताती हैं कि वेनेज़ुएला के तेल भंडार पर अमेरिका की नज़र पहले से थी. लेकिन वेनेज़ुएला के पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज़ और उनके बाद राष्ट्रपति बने निकोलस मादुरो अमेरिका से दूरी बनाए रखना चाहते थे.
वह कहती हैं, "अमेरिका को वेनेज़ुएला में हस्तक्षेप करने की वजह चाहिए थी. वजह मिली, मानवाधिकार का उल्लंघन, लोकतंत्र का अभाव और फिर उन्होंने कहा कि वेनेज़ुएला नार्को टेररिज़म फैला रहा है."
"उनकी एक और जो समस्या थी, वो ये कि वेनेज़ुएला में आंतरिक सुरक्षा की कमी है, उस वजह से उसकी एक बड़ी आबादी अमेरिका जा रही है और अमेरिका के पास इतने अप्रवासियों को लेने की क्षमता नहीं है."
इस पूरे मामले में तेल कितना बड़ा फ़ैक्टर?
वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई के पीछे क्या तेल ही एकमात्र फ़ैक्टर है या इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है?
द इंडियन एक्सप्रेस के नेशनल बिज़नेस एडिटर अनिल शशि कहते हैं कि तेल एक बहुत बड़ा फ़ैक्टर है और ट्रंप का दूसरे देशों के संसाधनों पर टारगेट करने का एक ट्रेंड रहा है.
वह कहते हैं, "ट्रंप ने यूक्रेन में भी सीज़फायर के बदले रेयर अर्थ (मिनरल) के एक समझौते को पुश किया था. वेनेज़ुएला के मामले में एक पुराना रिश्ता भी है."
"अमेरिका और अमेरिकी कंपनियों ने वेनेज़ुएला के तेल को करीब सौ साल पहले खोजा, उसका विकास किया. उसके बाद वेनेज़ुएला में राष्ट्रीयकरण हुआ और बहुत सी अमेरिकी तेल कंपनियों को वहां से जाना पड़ा."
अनिल शशि बताते हैं कि सिर्फ़ एक अमेरिकी कंपनी है, शेवरॉन जो अब भी वेनेज़ुएला में काम कर रही है.
वह कहते हैं कि इस पूरी कार्रवाई में तेल इसलिए भी एक बड़ा फ़ैक्टर है क्योंकि अमेरिका की बहुत सारी रिफ़ाइनरीज़ वेनेज़ुएला के कच्चे तेल को रिफ़ाइन करने के लिए बनी हैं.
अनिल शशि कहते हैं, "कोनोकोफ़िलिप्स और एक्सॉनमोबिल जैसी कंपनियां वेनेज़ुएला का तेल चाहती हैं."
अब भले ही ट्रंप ने कहा है कि वह बड़ी तेल कंपनियों को वेनेज़ुएला में निवेश करने के लिए भेजेंगे, लेकिन इस पर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.
अनिल शशि कहते हैं, "समस्या ये है कि राष्ट्रपति ट्रंप का कार्यकाल अब करीब तीन साल बचा है. अगर आज ड्रिलिंग शुरू करते हैं, तो उसको डेवलप करने में कम से कम तीन साल लगेंगे."
"ऐसे में कई सवाल हैं? जैसे, ट्रंप के जाने के बाद क्या होगा? क्या वेनेज़ुएला सुरक्षा गारंटी देगा? वेनेज़ुएला में सिर्फ़ निकोलस मादुरो को हटाया गया है, बाकी उनका पूरा प्रशासन वही है."
अनिल शशि बताते हैं कि बड़ी कंपनियां ऐसे ही सवाल उठा रही हैं कि अगर वो अभी निवेश करें, तो क्या गारंटी है कि तीन साल बाद भी उनका निवेश सुरक्षित रहेगा.
क्या चीन पर निशाना साधना चाहते हैं ट्रंप?
वरिष्ठ पत्रकार ज़ुबैर अहमद कहते हैं कि वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई की एक वजह चीन को कमज़ोर करना भी है क्योंकि लातिन अमेरिकी देशों में चीन के बड़े आर्थिक हित हैं.
वह बताते हैं कि अब तक वेनेज़ुएला का 80 प्रतिशत तेल चीन जा रहा था, वो चीन की ज़रूरत का सिर्फ़ चार प्रतिशत था.
ज़ुबैर अहमद कहते हैं, "चीन ने लातिन अमेरिका में जिस तरह से बिजनेस खड़ा किया है, उसमें चीन और लातिन अमेरिकी देशों के बीच 500 अरब डॉलर से ज़्यादा का द्विपक्षीय व्यापार है.150 अरब डॉलर का निवेश है. चीन ने इन देशों को करीब 100 अरब डॉलर का कर्ज दिया है."
इसीलिए वेनेज़ुएला पर अमेरिका की कार्रवाई को ज़ुबैर अहमद चीन को मात देने की कोशिश बताते हैं. वह कहते हैं कि लातिन अमेरिकी देशों में चीन का मज़बूत होना अमेरिका को पच नहीं रहा है.
वेनेज़ुएला ख़ुद अपने तेल भंडारों का फ़ायदा क्यों नहीं उठा सका?
कच्चे तेल का सबसे बड़ा भंडार होने के बावजूद वेनेज़ुएला इसका फ़ायदा क्यों नहीं उठा सका? कहां गड़बड़ हुई? और वेनेज़ुएला में तेल का उत्पादन बेहद कम क्यों है?
अनिल शशि बताते हैं कि तेल उत्पादन के मामले में वेनेज़ुएला शुरुआत में बाहर की कंपनियों पर निर्भर रहा, जिसमें लगभग 1960 तक अमेरिकी कंपनियां आगे थीं.
वह कहते हैं, "उसके बाद वेनेज़ुएला में राष्ट्रीयकरण शुरू हुआ. अभी वेनेज़ुएला की एक सरकारी कंपनी है, पीडीवीएसए, वही सारा तेल निकाल रही है. लेकिन उनकी तकनीक ठीक नहीं है."
अनिल शशि बताते हैं कि वेनेज़ुएला में पेट्रोलियम तो है, लेकिन उसका फ़ायदा कुछ लोग ही ले रहे हैं. यही स्थिति ह्यूगो शावेज़ के वक़्त थी, जो निकोलस मादुरो के दौर में भी रही.
वेनेज़ुएला को उसके तेल भंडार का फ़ायदा नहीं मिलने की एक अहम वजह एक्सपर्ट्स अमेरिकी प्रतिबंध को भी बताते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार ज़ुबैर अहमद कहते हैं, "अमेरिका ने 2017 से तेल पर इतने प्रतिबंध लगाए हैं कि उनकी जीडीपी 62 प्रतिशत नीचे चली गई. उनकी करेंसी एकदम कमज़ोर हो गई और महंगाई बहुत बढ़ गई. वेनेज़ुएला को पनपने का मौक़ा ही नहीं दिया गया."
अनिल शशि कहते हैं, "अमेरिकी प्रतिबंध के कारण वेनेज़ुएला से अभी जो तेल निकल रहा है, वो सिर्फ़ चीन जा रहा है."
ट्रंप ने जो किया, उसका दुनिया पर क्या असर पड़ सकता है?
वेनेज़ुएला पर अमेरिका की कार्रवाई की आलोचना भी हो रही है. इसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन कहा जा रहा है.
जैसा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) में कहा गया है कि सभी सदस्य किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ बल का इस्तेमाल करने या धमकी से बचेंगे.
वहीं अमेरिका की कार्रवाई से एक ख़तरनाक मिसाल कायम होने की भी आशंका जताई जा रही है कि रूस भी यूक्रेन में या चीन ताइवान में ऐसा कर सकता है.
ज़ुबैर अहमद कहते हैं, "अमेरिका के इस कदम से यह डर पैदा हो गया है कि दुनिया भर में अराजकता फैल सकती है. इसकी वजह से ज़ाहिर है, चीन की हिम्मत बढ़ेगी कि वह जब चाहे ताइवान पर कब्ज़ा कर ले."
इसके अलावा ज़ुबैर अहमद इस साल अमेरिका की मनमानी, उसकी विदेश नीति में जिस तरह से एक्शन लिया जा रहा है, उसका और विस्तार होने की आशंका जताते हैं.
वह कहते हैं, "मुझे लगता है कि कोलंबिया पर अमेरिका की नज़र है और इस वक़्त दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है, जो अमेरिका का विरोध करेगा."
इस पूरे मामले पर भारत ने क्या कहा?
वेनेज़ुएला पर अमेरिका की कार्रवाई की कई देशों ने आलोचना की है, तो वहीं एक पक्ष ऐसा है, जो इसका समर्थन कर रहा है. लेकिन भारत दोनों में से किसी खेमे में नहीं है.
वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई के अगले दिन भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से इस घटनाक्रम पर पहला बयान आया था.
इसमें कहा गया था, "वेनेज़ुएला में हालिया घटनाक्रम गहरी चिंता का विषय है. हम वहां की बदलती स्थिति पर क़रीबी नज़र रखे हुए हैं."
अपराजिता कश्यप कहती हैं, "वेनेज़ुएला के मामले में भारत बहुत खुल कर कुछ भी नहीं बोल रहा है क्योंकि उसके लिए ख़ुद ही अमेरिका के टैरिफ़ का मुद्दा है. इसलिए भारत बहुत सावधान है."
"क्यूबा और वेनेज़ुएला के बारे में भारत जब भी कुछ बोलता है, तो वह बहुत नपा-तुला बयान होता है. भारत कभी भी नहीं चाहेगा कि वो वेनेज़ुएला या अमेरिका से दुश्मनी मोल ले."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित