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सीरिया में कलमा लिखे एक झंडे ने कैसे बढ़ा दी है आम लोगों की बेचैनी?
- Author, अमीरा मधाबी और हफ़ीज़ुल्लाह मारूफ़
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
सीरिया की नई अंतरिम सरकार में प्रधानमंत्री मोहम्मद अल-बशीर ने 10 दिसंबर को अपनी पहली बैठक की अध्यक्षता की.
बैठक के बाद सामने आई एक तस्वीर में मोहम्मद अल-बशीर के पीछे दो झंडे देखे गए. इनमें से एक सीरियाई 'क्रांतिकारी झंडा' था, जिसमें हरे-सफ़ेद और काले रंग की पट्टियां थीं. साथ ही बीच में तीन लाल सितारे थे. लेकिन दूसरा झंडा सफ़ेद था, जिस पर काले रंग में मुसलमानों के बुनियादी विश्वास की शपथ लिखी थी, जिसे 'कलमा तैयबा' कहा जाता है.
आधिकारिक बैठक में देखे गए इस सफ़ेद झंडे का इस्तेमाल सीरिया के कई बड़े शहरों पर क़ब्ज़ा करने वाला विद्रोही गुट हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) करता है. ये झंडा तालिबान के झंडे जैसा दिखता है. बल्कि ये वही झंडा है जिसे 2021 में अफ़ग़ानिस्तान पर दोबारा कब्ज़ा करने वाले तालिबान ने फहराया था.
पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकार के पतन के बाद हयात तहरीर अल-शाम और बाकी सशस्त्र गुटों ने आठ दिसंबर को सीरिया पर नियंत्रण कर लिया. यह समूह पिछले नवंबर के अंत में उत्तर-पश्चिमी सीरिया के इदलिब प्रांत में अपने गढ़ से दमिश्क की ओर बढ़ा.
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फिर दमिश्क पर क़ब्ज़ा करने के बाद एचटीएस के नेता अबू मोहम्मद अल-जुलानी, जिन्हें अहमद अल-शरा के नाम से भी जाना जाता है, जो सीरियाई लोगों को भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं सीरिया में उनका भविष्य होगा.
उन्होंने ये आश्वासन दिया है कि सीरिया की सरकार देश के विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व करेगी और यह सरकार किसी भी विपक्षी समूह पर अत्याचार नहीं करेगी.
वह सीरियाई लोगों को इस बात पर भी आश्वस्त करने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें इस्लामी शैली की सरकार या इस्लामी व्यवस्था लागू होने से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है.
हालांकि, अंतरिम पीएम की पहली बैठक में सफ़ेद झंडे की मौजूदगी ने सीरियाई लोगों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि आख़िर ये झंडा मुल्क के राजनीतिक भविष्य के बारे में क्या बताता है?
सीरिया में ग़ुस्सा और डर
सीरिया से बीबीसी अरबी के विशेष संवाददाता फ़रास केलानी ने कहा कि इस घटना यानी आधिकारिक तौर पर सफ़ेद झंडे के इस्तेमाल ने 'कई लोगों को सदमे की स्थिति में छोड़ दिया है.'
केलानी कहते हैं, "इससे पता चलता है कि नई सरकार तालिबान मॉडल पर चल सकती है और शरिया क़ानून के आधार पर सीरिया को एक इस्लामी देश बना सकती है."
कुछ लोगों ने इस क़दम पर निराशा ज़ाहिर करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया.
सीरियाई राजनीतिक कार्यकर्ता और पत्रकार रामी जर्राह ने कहा है कि अंतरिम प्रधानमंत्री मोहम्मद अल-बशीर जब सीरियाई लोगों को संबोधित कर रहे थे तो उनके पीछे 'इस्लामी झंडे का प्रदर्शन अपमान जैसा है.'
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "अंतरिम सरकार के मुखिया सीरियाई लोगों को इस्लामी झंडे के साथ क्यों संबोधित कर रहे हैं? उन्हें हर धार्मिक समूह के सभी सीरियाई नागरिकों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए, यह हम सभी का अपमान है."
पत्रकार निदाल अल-अम्मारी ने एक्स पर लिखा, "हमने बाथ पार्टी से बहुत कुछ सीखा है और अब हम अराजकता के दूसरे युग में प्रवेश नहीं करना चाहते हैं."
लेकिन कई सीरियाई नागरिक ऐसे भी हैं, जिन्हें इस झंडे को फहराने में 'कोई नुक़सान' नहीं दिखता. उन लोगों का मानना है कि इस झंडे का मतलब ये नहीं है कि सीरियाई सरकार अफ़ग़ानिस्तान में अपनाए गए तालिबानी मॉडल पर चलेगी.
तालिबानी झंडा और उससे जुड़ी चिंताएं
अफ़ग़ानिस्तान में सत्तारूढ़ तालिबान चरमपंथी सुन्नी और जिहादी विचारधारा को मानता है. साल 1996 से तालिबान औपचारिक रूप से और आधिकारिक तौर पर कलमा तैयबा के साथ एक सफ़ेद झंडे का इस्तेमाल करता आया है.
सीरिया में विद्रोही गुट एचटीएस ने भी कुछ समय से इसी झंडे का इस्तेमाल किया है और इसे इदलिब में सरकारी इमारतों पर फहराते देखा जा सकता है. इदलिब एचटीएस के नियंत्रण में ही रहा है.
हालांकि, एचटीएस और तालिबान का झंडा एक ही है. तालिबान सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि दोनों समूहों ने इस झंडे को अपना लिया है और किसी ने भी दूसरे की नकल नहीं की है.
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार सीरिया में विद्रोही गुट हयात तहरीर अल-शाम की राजनीतिक और सैन्य सफलताओं का जश्न मना रही है और तालिबान के अधिकारियों ने उम्मीद जताई है कि अब सीरिया में 'इस्लामी सरकार' स्थापित होगी.
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान और उनके कुछ सहयोगियों के समर्थकों ने सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद को सत्ता से हटाने का जश्न मनाने के लिए कई रैलियां निकालीं और मिठाइयां बांटी गईं.
तालिबान और एचटीएस के बीच 'वैचारिक संबंध' ही शायद वो कारण है जिसकी वजह से अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सीरिया के विद्रोही समूह का समर्थन करता दिखाई देता है.
अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति कार्यालय में काम करने वाले तालिबान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा, "काबुल और दमिश्क की कहानी एक ही है, दोनों देशों में सरकारें उखाड़ फेंकी गईं और दोनों देशों में विद्रोहियों ने क़ब्ज़ा कर लिया. साथ ही दोनों देशों के सत्ताधारी नेता देश छोड़कर भाग गए."
पिछले सप्ताह सीएनएन के साथ एक साक्षात्कार के दौरान अल-जुलानी के पीछे भी वही झंडा देखा गया था.
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि लोगों को इस्लामिक व्यवस्था से डरना नहीं चाहिए. उन्होंने आश्वासन दिया कि सीरियाई समाज के सभी विविध समूहों को अगली सरकार में प्रतिनिधित्व दिया जाएगा.
सीरिया में लड़ रहे इस्लामिक समूहों के विशेषज्ञ ताहम अल तमीमी ने बीबीसी को बताया कि झंडे के इस्तेमाल से पता चलता है कि एचटीएस सीरिया में इस्लामी व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करना चाहता है.
उन्होंने कहा, "ये झंडा (एचटीएस) उसकी लंबे समय से चली आ रही स्थिति के अनुरूप है, जो खुद को सीरिया में रहने वाले सुन्नियों का प्रतिनिधि बताता है."
हालांकि, तमीमी बताते हैं, "एचटीएस के लिए तालिबान जैसे शासन मॉडल को लागू करना बहुत मुश्किल होगा क्योंकि (सीरियाई) समाज बड़े पैमाने पर लड़कियों को उच्च शिक्षा से वंचित करने या सत्तावादी सरकार स्थापित करने जैसे प्रतिबंधों को स्वीकार नहीं करता है, ऐसी पाबंदियां चुनाव प्रक्रिया में बाधा बनती हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.