You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
जब हमलावरों ने मक्का में मुसलमानों के सबसे पवित्र स्थान पर कब्ज़ा किया
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
20 नवंबर, 1979 का दिन, मोहर्रम की पहली तारीख़ थी, मक्का की सबसे बड़ी मस्जिद में स्थानीय लोगों के अलावा पाकिस्तानी, इंडोनेशियाई, मोरक्क्न और यमनी तीर्थयात्रियों का मजमा लगा हुआ था.
लोगों के इस समूह में विद्रोही भी थे जिन्होंने अपने सिर पर लाल चेक वाला कपड़ा बाँध रखा था.
उनमें से कुछ लोग कई दिनों से मस्जिद के अंदर रहकर उसके दालानों और रास्तों का जायज़ा ले रहे थे.
कुछ लोग उसी दिन कार से अपने बच्चे बीवियों के साथ मक्का पहुंचे थे ताकि सुरक्षा सैनिकों को उनके बारे में किसी तरह का शक न हो. इनमें अधिकतर सऊदी ख़ानाबदोश बद्दू थे.
फ़जर की नमाज़ शुरू हो चुकी थी. इमाम की आवाज़ माइक्रोफ़ोन पर गूँज रही थी. समय था सुबह के 5 बजकर 18 मिनट.
यारोस्लोव त्रोफ़ीमोव अपनी किताब ‘द सीज ऑफ़ मक्का: द फॉरगॉटेन अपराइजिंग इन इस्लाम्स होलियेस्ट श्राइन’ में इस घटना का दिलचस्प वर्णन किया है.
वे लिखते हैं, “जैसे ही इमाम ने नमाज़ के बाद कलमा पढ़ना शुरू किया, गोलियों की आवाज़ सुनाई दी. अवाक लोगों ने एक युवक को हाथ में राइफ़ल लिए तेज़ी से क़ाबा की तरफ़ बढ़ते देखा. तभी दूसरी गोली की आवाज़ सुनाई दी और मस्जिद के बाहर दाना चुग रहे सैकड़ों कबूतर हवा में उड़ने लगे.”
हमलावरों का नेता जोहेमान अल उतेबी
मस्जिद में मौजूद पुलिस बल के पास विदेश से आए तीर्थयात्रियों को क़ाबू में रखने के लिए हथियार के नाम पर मामूली डंडे थे. जैसे ही गेटों पर तैनात दो संतरियों को गोली मारी गई सारे डंडे वाले सिपाही वहाँ से ग़ायब हो गए.
अभी ये हंगामा मचा ही हुआ था कि हमलावरों का नेता जोहेमान अल उतेबी सामने आया.
सऊदी अरब में प्रतिबंधित किताब ‘इवेंट्स एट द श्राइन बिटवीन ट्रूथ एंड लाइज़’ में लिखा है, ''43 वर्षीय बद्दू शख़्स जोहेमान की काली आँखे थी. उसके कंधे तक काले बाल थे जो उसकी काली दाढ़ी में मिल रहे थे. दुबला-पतला होने के बावजूद उसकी शख़्सियत से रोब टपक रहा था. उसने सफ़ेद रंग की परंपरागत सऊदी पोशाक पहन रखी थी जो उसकी पिंडलियों तक आती थी."
"उसने सिर पर कुछ नहीं पहन रखा था लेकिन उसके बालों को अनियंत्रित होने से बचाने के लिए उस पर हरे रंग का बैंड लगा हुआ था. राइफ़ल, पिस्टल और कटार लिए तीन हमलावर उसके साथ चल रहे थे. वो सब तेज़ी से पवित्र क़ाबे और मस्जिद के इमाम की तरफ़ बढ़ते चले जा रहे थे.''
सारे गेट बंद
जब इमाम की नज़र जोहेमान पर पड़ी तो उन्हें ख़्याल आया कि वो और उसके साथी कुछ दिन पहले इस्लाम पर दिए गए उनके भाषण में मौजूद थे.
यारोस्लाव त्रोफ़ीमोव लिखते हैं, ''कुछ सेकेंड बाद ही जोहेमान ने इमाम को धक्का देकर माइक पर कब्ज़ा कर लिया. जब इमाम ने दोबारा माइक छीनने की कोशिश की तो एक हमलावर पूरी ताकत से चीख़ा और अपनी कटार उनके चेहरे पर लगा दी. ये तमाशा देख रहे हज़ारों तीर्थयात्री अपने जूते हाथों में लेकर बाहरी गेटों की तरफ़ भागे. लेकिन जब वो वहाँ पहुंचे तो उन्हें सारे 51 गेट बंद मिले. बदहवासी में उन्होंने ज़ोर ज़ोर से 'अल्ला हो अकबर' चिल्लाना शुरू कर दिया. बंदूकधारियों ने भी उस आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाई और क़ाबे का पूरा परिसर इस आवाज़ से गूँज उठा.''
हमलावरों ने मीनारों पर पोज़ीशन ली
जैसे ही आवाज़ धीमी हुई जोहेमान ने माइक्रोफ़ोन के ज़रिए अपने साथियों को निर्देश देने शुरू कर दिए. उसकी आवाज़ सुनते ही उसके साथी पूरे परिसर में फैल गए और उन्होंने मस्जिद की सातों मीनारों पर मशीनगन फ़िट कर ली.
फँसे हुए तीर्थयात्रियों को हमलावरों की मदद करने के लिए मजबूर किया गया. कुछ लोगों से कहा गया कि वो वहाँ बिछी हुई कालीनों को लपेट कर चेन लगे गेटों से सटाकर खड़ा कर दें.
ताक़तवर लोगों को बंदूक की नोक पर मीनारों पर चढ़कर खाना और हथियार पहुंचाने के लिए कहा गया. बहुत कम समय में इस्लाम के सबसे पवित्र स्थान पर हमलावरों का नियंत्रण हो गया.
इन मीनारों की ऊँचाई 89 मीटर (292 फ़ीट) है जहाँ से पूरे मक्का पर नज़र रखी जा सकती थी.
जोहेमान ने आदेश दिया, ''अगर तुम किसी सरकारी सैनिक को अपने ख़िलाफ़ हाथ उठाते देखो, उसके प्रति कोई दया मत दिखाओ और उसे गोली मारने से मत झिझको.''
बंधकों के बीच बहुत से तीर्थयात्री अरबी नहीं समझते थे और वो स्थानीय लोगों से मामला समझाने का अनुरोध कर रहे थे. जल्द ही हमलावरों ने भारतीय और पाकिस्तानी तीर्थयात्रियों का समूह बनाकर मस्जिद के एक कोने में खड़ा कर दिया और एक उर्दू बोलने वाला शख़्स वहाँ हो रहे एलान का उर्दू में अनुवाद करने लगा.
अफ़्रीकी तीर्थयात्रियों के लिए एक अंग्रेज़ी बोलने वाले अनुवादक का इंतज़ाम किया गया.
सऊदी अरब में अमेरिका के राजदूत जॉन सी वेस्ट ने अमेरिकी विदेश मंत्रालय को तार भेजकर बताया, ''हमलावरों ने मस्जिद की जनसंबोधन व्यवस्था के ज़रिए ऐलान कर दिया है कि मक्का, मदीना और जेद्दा पर उनका नियंत्रण हो गया है.''
क़यामत करीब होने का ऐलान
अगले एक घंटे में हमलावरों ने मस्जिद के लाउडस्पीकर के ज़रिए पूरी दुनिया के एक अरब मुसलमानों तक एक पुरानी भविष्यवाणी पहुंचाई जिसमें कहा गया था कि क़यामत का वक्त आ गया है और महदी आ चुके हैं.
जब बंदूक की गोलियों के बीच ये उदघोषणा समाप्त हुई,पूरे मध्य मक्का में डर का माहौल हो गया. इसे सुनकर मस्जिद के बाहर काम करने वाले लोग भाग खड़े हुए.
सऊदी अरब और उसके बाहर रह रहे मुसलमान इस एलान को सुनकर बहुत दुखी हुए.
बाद में सऊदी अरब के शहज़ादे फ़हद ने लेबनान के 'अल सफ़ीर' अख़बार को दिए इंटरव्यू मे कहा, ''जोहेमान और उसके साथियों ने बाहर खड़े संतरियों को 40 हज़ार रियाल की रिश्वत दी थी ताकि हथियारों और खाने से भरे तीन टोयोटा डाटसन और जीएमसी पिकअप ट्रक मस्जिद के अंदर आ जाएं. इन पिक अप ट्रकों को मस्जिद के तहख़ाने में पार्क किया गया था.''
महदी का आगमन
एक बार मस्जिद पर क़ब्ज़ा हो जाने के बाद जोहेमान ने ये सुनिश्चित किया कि मस्जिद के हर प्रवेश द्वार पर उसके लोगों का नियंत्रण हो.
फिर वहाँ मौजूद लोगों को बताया कि वो महदी यहाँ आ पहुंचे हैं जिनका बहुत दिनों से इंतज़ार था. उसने कहा कि उनका नाम मोहम्मद अब्दुल्लाह अल कुरैशी है.
दरअसल, ऐसी मान्यता है कि क़यामत से पहले अन्याय को मिटाकर 'सच्चे धर्म' को दोबारा स्थापित करने के लिए महदी का धरती पर अवतरण होगा.
यारोस्लाव त्रोफ़ीमोव ने लिखा, ''एक एक कर जोहेमान के सभी बंदूकधारियों ने मोहम्मद अब्दुल्लाह का हाथ चूमा और उसके प्रति निष्ठा की क़सम खाई. इसके बाद वो राइफ़ल से भरे क्रेट परिसर के मध्य में ले आए. उन्होंने उसे अपने साथियों और उन तीर्थयात्रियों को बाँटा जिन्होंने इस विद्रोह का समर्थन करने का फ़ैसला किया था.''
हथियारों के अलावा कुवैत में छपवाए गए ब्रोशर में लोगों में बाँटे गए जिसमें जोहेमान के लिखे लेख थे.
कुछ तीर्थयात्रियों ने अब्दुल्लाह से सवाल कर दिया कि क्या इस विद्रोह के पीछे ईरान का हाथ है?
अब्दुल्लाह ने एक शब्द में इसका जवाब दिया, 'नहीं.'
पुलिस पर गोलियाँ
आठ बजे के आसपास मक्का पुलिस ने पहली बार संकट से निपटने का फ़ैसला किया. हालत की जाँच के लिए एक पुलिस जीप भेजी गई.
जैसे ही जीप गेट के पास पहुंची उस पर गोलियों की बारिश शुरू हो गई. मीनार के ऊपर से चलाई गई गोली से जीप की विंडशील्ड टूट गई और जीप का ड्राइवर घायल होकर जीप से नीचे गिर पड़ा.
थोड़ी देर बाद मस्जिद के दूसरे गेट पर जीपों का एक बड़ा काफ़िला भेजा गया. हमलावरों ने इस काफ़िले पर भी मीनारों से गोली चलाई.
इस हमले में आठ पुलिसवाले घटनास्थल पर ही मारे गए और 36 अन्य घायल हो गए.
पुलिस वालों ने अपने वाहन छोड़कर मस्जिद की बाहरी दीवारों पर कवर लिया. जिस समय हमलावर मस्जिद में घुस रहे थे सऊदी बादशाह ख़ालेद रियाद के अपने महल में आराम कर रहे थे.
शहज़ादे फ़हद भी उस समय देश में नहीं थे और मीलों दूर ट्यूनिस के एक होटल में सो रहे थे.
नेशनल गार्ड के कमांडर शहज़ादे अब्दुल्लाह भी सऊदी अरब में नहीं थे और मोरक्को में छुट्टियाँ बिता रहे थे.
सऊदी अरब का बाहरी दुनिया से संपर्क टूटा
ख़ालेद को इस हमले की सूचना सबसे पहले मक्का और मदीना मस्जिद के इंचार्ज शेख़ नासेर इब्न राशेद ने दी.
दोपहर आते-आते सऊदी अरब में अंतरराष्ट्रीय फ़ोन कॉल का प्रबंधन करने वाली कनाडा की कंपनी को आदेश दिया गया कि वो पूरा संचार ब्लैक आउट अमल में ले आए.
नतीजा ये हुआ कि न तो कोई सऊदी अरब को फ़ोन लगा सकता था और न ही तार ही भेजे जा सकते थे.
गैर सऊदी लोगों के लिए देश की सीमा बंद कर गई थी और सऊदी अरब का बाहरी दुनिया से एक तरह से संपर्क तोड़ दिया गया.
सऊदी अरब के रेडियो और टीवी पर इस घटना की कोई ख़बर प्रसारित नहीं की गई थी.
इस बीच सऊदी सैनिकों और हमलावरों के बीच रह-रह कर गोलीबारी होती रही. अधिकतर हमलावर मस्जिद के भूमिगत हिस्से में चले गए.
अब्दुल्लाह ऊपर ही रहा.
सऊदी सैनिक हथगोले फेंककर सामने आ रहे अवरोधों को साफ़ कर रहे थे.
वारोस्लाव त्रोफ़िमोव लिखते हैं, ''जब भी अब्दुल्लाह को ग्रेनेड के संगमरमर के फ़र्श पर गिरने की आवाज़ सुनाई देती, वो तुरंत दौड़ कर वही ग्रेनेड उठाकर सैनिकों के ऊपर वापस फेंक देता. उसने कई बार इस तरह ग्रेनेड फेंकने वालों के ऊपर उन्हीं के ग्रेनेड्स से हमला किया. लेकिन अंतत: भाग्य ने उसका साथ नहीं दिया. जब वो एक ग्रेनेड को दोबारा फेंकने की कोशिश कर रहा था, वो फट गया और अब्दुल्लाह के चिथड़े उड़ गए. अंतिम समय पर उसकी मदद करने भी कोई नहीं आया और उसे उसी हालत में मरने के लिए छोड़ दिया गया.”
फ़्रांस ने अपने कमांडो भेजे
सऊदी अरब के अनुरोध पर फ़्रांस के जीआईजीएन कमांडो को सऊदी सैनिकों की मदद करने के लिए भेजा गया. उनको आतंकवादियों से निपटने का पुराना अनुभव था.
सन 1976 में उन्होंने जिबूती में बच्चों से भरी स्कूल बस को आतंकवादियों से छुड़ाया था. उन्होंने पहले उन्हें नशीले पदार्थ से भरा खाना दिया और फिर उन पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी. इस आपरेशन में सभी बच्चों को बचा लिया गया था.
सऊदी अनुरोध आने के बाद फ़्रांस के राष्ट्रपति वेलेरी गिस्का दे एस्ताँ ने जीआईजीएन के प्रमुख क्रिस्टियन प्रोतिया को आदेश दिया कि वो सऊदी अरब की हरसंभव मदद करें.
प्रोतिया ने इस ऑपरेशन की ज़िम्मेदारी पॉल बारिल को सौंपी. उन्होंने इसके लिए आँसू गैस की बजाए सीबी केमिकल का इस्तेमाल करने की योजना बनाई. प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने अपने ऊपर इसका प्रयोग किया था और इस प्रक्रिया में खुद अंधे होते-होते बचे थे.
कमांडो ने आम लोगों जैसे कपड़े पहने
बारिल की टीम मिस्टियर-20 विमान में सवार होकर साइप्रस होते हुए रियाद पहुंची.
सऊदी उम्मीद कर रहे थे कि फ़्रांस इस अभियान के लिए एक बड़ा दल भेजेगा लेकिन उन्हें ये देखकर आश्चर्य हुआ कि बारिल की टीम में सिर्फ़ तीन लोग थे.
बाद में पॉल बेरिल ने अपनी आत्मकथा 'वेरी स्पेशल मिशंस' में लिखा, ''गोपनीयता बनाए रखने के लिए मुझे और मेरे साथियों को अपने पासपोर्ट फ़्रेंच दूतावास को सौंपने पड़े. मैं आम लोगों की तरह बेल बॉटम और काउब्वॉय बेल्ट पहने हुए था. हमारे पास अपनी सुरक्षा के लिए हथियार तक नहीं थे. हमारे पास अपने अफ़सरों से बात करने का कोई साधन नहीं था, सिवाय सऊदी टेलीफोन पर निर्भर रहने के. बाहरी दुनिया के लिए हम तीन व्यापारी थे लेकिन हमारे चौड़े कंधे और माँसल शरीर कुछ दूसरी ही कहानी कह रहे थे.''
आधी रात के करीब फ़्रेंच कमांडो टीम ताएफ़ सैनिक हवाई अड्डे पर उतरी. उन्हें ताएफ़ के इंटरकॉन्टिनेंटल होटल में ठहराया गया.
एक टन सीबी केमिकल की माँग
अगले दिन से उन्होंने सऊदी कमांडो को इस मिशन के लिए ट्रेन करना शुरू किया. बारिल उम्मीद कर रहे थे कि वो खुद मक्का जाकर मस्जिद के बाहर ऑपरेशन का नेतृत्व करेंगे.
बारिल अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, ''एक सऊदी अफ़सर ने मुझसे कहा कि अगर आपको मक्का जाना है तो आपको इस्लाम कुबूल करना होगा क्योंकि वहाँ दूसरे धर्म के लोगों को जाने की अनुमति नहीं है. मैं कैथॉलिक धर्म को मानने वाला था और उस समय तक इस्लाम के बारे में कुछ भी नहीं जानता था. लेकिन मैंने ये उत्तर देने में कोई देरी नहीं की कि अगर काम पूरा करना है तो धर्म बदलने में कोई आपत्ति नहीं है.''
होटल पहुंचकर बारिल ने अपने बॉस को उन चीज़ों की लिस्ट भेजी जो उन्हें चाहिए थी. इस लिस्ट में शामिल था और फ़्लैक जैकेट्स, ग्रेनेड्स, स्नाइपर राइफ़ल्स, फ़ील्ड रेडियोज़, नाइट विजन गॉगल्स और एक टन सीबी कैमिकल.
प्रोतिया सीबी की मात्रा सुनकर आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि इतनी सीबी से पूरे शहर को काबू में लाया जा सकता था.
यारोस्लोव त्रोफ़ीमोव लिखते हैं, ''मनाही के बावजूद बारिल और उनके दो साथी न सिर्फ़ मक्का गए बल्कि धावे से पहले उन्होंने मस्जिद में भी कदम रखा. हालाँकि बाद में फ़्रांस ने सफाई दी कि इस ऑपरेशन में उनका रोल सिर्फ़ उपकरण प्रदान करना और सऊदी कमांडो को ताएफ़ में ट्रेनिंग देना था. उनके अनुसार बारिल और उनके सहयोगियों ने मक्का की पवित्र भूमि पर ऑपरेशन के दौरान कदम नहीं रखा.''
बारिल की योजना पर अमल करते हुए पाकिस्तानी और तुर्क मज़दूरों ने मस्जिद की सतह पर छेद करना शुरू कर दिया.
फ़्रांस के उपलब्ध कराए हुए फ़ेस मास्क और केमिकल सूट पहने सऊदी सैनिकों ने सीबी के कैनिस्टर फ़ायर किए. चूँकि वहाँ रेडियो सिस्टम ढंग से काम नहीं कर रहा था इसलिए सैनिकों को आदेश दिया गया कि वो पहला विस्फोट होते ही सीबी लॉन्चर्स के ट्रिगर दबा दें. सीबी ने तुरंत अपना असर दिखाना शुरू कर दिया और हमलावर विद्रोही ज़हरीले सीबी के बादल में घिर गए.
जैसे कि उम्मीद थी सीबी ने विरोधियों की गतिविधियों को शिथिल कर दिया और सऊदी सैनिक अवरोधों और कंटीले तारों को तोड़ते हुए मस्जिद के अंदर घुस गए.
उन्होंने एक-एक करके कमरों की सलाशी लेना शुरू कर दिया जिन लोगों को जीवित पाया गया उन्हें पीछे चल रही 40 सदस्यों की गिरफ़्तारी टीम के हवाले कर दिया गया.
जोहेमान की गिरफ़्तारी
चार दिसंबर को आंतरिक मामलों के मंत्री शहज़ादे नाएफ़ ने बयान जारी करके कहा, ''अल्लाह के फ़ज़ल से आज सुबह डेढ़ बजे मस्जिद को सभी हमलावरों से मुक्त करा लिया गया.''
सऊदी सैनिकों ने विस्फोटक लगाकर कमरों के दरवाज़े तोड़े. रात होते ही कैप्टेन अबू सुल्तान के नेतृत्व में पैराशूट वाले सैनिकों ने 'मॉपिंग अप' आपरेशन शुरू कर दिया.
बाद में कैप्टेन अबू सुल्तान ने एक इंटरव्यू में बताया, ''हमें उग्र आँखों वाला एक शख़्स दिखाई दिया जिसके बाल और दाढ़ी उलझे हुए थे. उसके नज़दीक हथियारों के क्रेट्स, बर्तनों में रखे खजूर और कुछ ब्रोशर पड़े हुए थे. मैंने उसके ऊपर बंदूक तानते हुए उससे पूछा तुम्हारा नाम क्या है ? उसने धीमी आवाज़ में जवाब दिया, 'जोहेमान.'
कैप्टन सुल्तान ने बताया, ''हमारी चिंता ये थी कि कहीं हमारे सैनिक उसको मार न डालें. मैं उसे दो अफ़सरों के साथ घेरकर ऊपर लाया और उसे वहाँ खड़ी एंबुलेंस में बैठा दिया. एंबुलेंस उसे वहाँ से सीधे लेकर मक्का होटल गई.'
उसने ऐसा क्यों किया, ये पूछे जाने पर जोहेमान का जवाब था, 'अल्लाह की ऐसी ही मर्ज़ी थी.'
एक सऊदी सैनिक ने जोहेमान की दाढ़ी पकड़ कर खींची. ये देखकर वहाँ मौजूद एक शहज़ादे ने सैनिक को ऐसा न करने के लिए कहा.
63 लोगों को मौत की सज़ा
इस पूरे हमले में 75 विद्रोही हमलावर मारे गए और 170 हमलावरों को गिरफ़्तार किया गया.
नौ जनवरी, 1980 को इनमें से 63 लोगों का सऊदी कानून के मुताबिक़ मौत की सजा दी गई. सबसे पहले मक्का में जोहेमान का सिर काटा गया.
कुछ मिनटों बाद अब्दुल्लाह के भाई सईद को उसी जगह मृत्युदंड दिया गया. मृत्यु दंड पाने वाले लोगों में 39 सऊदी, 10 मिस्री और 6 यमनी थे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)