पीएम नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी, साल 2025 ने इन पर कैसा असर डाला और आगे की राह क्या होगी?

साल ख़त्म होने को है. भारत की राजनीति के लिहाज़ से यह साल भी कई मायनों में अहम रहा, जिसने एक बार फिर देश को प्रभावित किया है.

साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश में कुंभ के दौरान भगदड़ की घटना हुई. इसमें मारे गए लोगों की संख्या को लेकर लंबे समय तक विवाद चलता रहा. बीबीसी न्यूज़ हिन्दी की विशेष पड़ताल में यह संख्या सरकारी दावों से ज़्यादा पाई गई.

इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ सैन्य संघर्ष पूरे क्षेत्र के लिए चिंता का विषय बना. वहीं, अमेरिका की ओर से भारत पर लगाए गए टैरिफ़ का असर सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय रिश्तों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि घरेलू राजनीति में भी इसकी गूंज सुनाई दी.

इसी साल बिहार चुनाव से पहले मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न यानी एसआईआर को लेकर सियासत तेज़ हुई. कांग्रेस ने इसे लेकर 'वोट चोरी' का आरोप लगाते हुए अभियान चलाया, और बाद में चुनाव आयोग ने देश के बड़े हिस्से में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू कर दी.

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अब नज़र अगले साल होने वाले चुनावों पर है. असम, पश्चिम बंगाल, पुद्दुचेरी, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनके नतीजे राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकते हैं.

ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि 2025 की प्रमुख राजनीतिक घटनाएं आने वाले साल में किस तरह के रंग दिखाती हैं. साथ ही यह सवाल भी अहम है कि 2024 के आम चुनावों में झटके के बाद एनडीए ने इस साल कैसे वापसी की. इंडिया गठबंधन के नाम से बने विपक्षी मोर्चे का भविष्य क्या है, कांग्रेस की रणनीति और पार्टी के नेतृत्व को लेकर क्या संकेत मिलते हैं.

इसके अलावा, क्या भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' या अमेरिका के टैरिफ़ का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर कोई असर पड़ा, और विभिन्न नियुक्तियों के ज़रिए बीजेपी अगली पीढ़ी के नेतृत्व को लेकर क्या संदेश देना चाहती है.

बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने इन्हीं सब मुद्दों पर चर्चा की.

इन सवालों पर चर्चा के लिए द ट्रिब्यून की असोसिएट एडिटर और दिल्ली ब्यूरो चीफ़ अदिति टंडन और सेंटर फ़ॉर द स्टडीज़ ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ के निदेशक संजय कुमार शामिल हुए.

इंडिया गठबंधन का भविष्य

इंडिया गठबंधन के भविष्य को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज़ हैं. द ट्रिब्यून की एसोसिएट एडिटर और दिल्ली ब्यूरो चीफ़ अदिति टंडन का कहना है कि अगले साल राजनीति से जुड़ी सबसे अहम ख़बरों में से एक यह होगी कि इंडिया ब्लॉक का भविष्य क्या रहेगा.

अदिति टंडन के मुताबिक़, अगर असम और पुदुच्चेरी को अलग कर दें, जहां एनडीए की सरकार है और असम में भाजपा सत्ता में है, तो बाक़ी राज्यों में ज़्यादातर अहम सरकारें इंडिया गठबंधन से जुड़ी पार्टियों की हैं. सवाल यह है कि ये सरकारें अपने मौजूदा राजनीतिक आधार को कितनी मज़बूती से बचा पाती हैं और उसे कितना आगे बढ़ा पाती हैं. इसी पर तय होगा कि इंडिया ब्लॉक का भविष्य क्या होगा.

उनका कहना है कि कांग्रेस की मौजूदा स्थिति भी इस पूरे समीकरण में अहम भूमिका निभाती है.

वह कहती हैं, "कांग्रेस के लिए हालात बहुत उत्साहजनक नहीं दिख रहे हैं. पार्टी अपनी आंतरिक चुनौतियों और अंतर्विरोधों की वजह से लगातार सिमटती नज़र आ रही है. एक मज़बूत विपक्ष लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है, लेकिन वह कैसे बनेगा, यह ज़िम्मेदारी विपक्ष की ही है. यह न तो जनता पर निर्भर करता है और न ही भाजपा पर. कांग्रेस नेतृत्व को ही तय करना होगा कि पार्टी और इंडिया गठबंधन का भविष्य क्या होगा. यही तय करेगा कि भारतीय लोकतंत्र किस दिशा में आगे बढ़ेगा."

वहीं राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार का कहना है कि हाल में हुए चुनावों के नतीजे इंडिया गठबंधन के लिए उत्साहजनक नहीं रहे हैं.

उनके मुताबिक, "चुनावी आंकड़े साफ़ बताते हैं कि 2025 का साल चुनावी नज़रिए से इंडिया गठबंधन के लिए अनुकूल नहीं रहा. गठबंधन को एक के बाद एक चुनावों में हार का सामना करना पड़ा."

संजय कुमार कहते हैं कि कुछ राज्यों में उम्मीदें ज़रूर थीं.

उन्होंने कहा, "हरियाणा जैसे राज्य में माना जा रहा था कि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन वहाँ भी नतीजे उम्मीदों के मुताबिक़ नहीं आए. कुल मिलाकर, चुनावी लिहाज़ से 2025 का साल इंडिया गठबंधन के लिए काफ़ी मुश्किल भरा रहा और इसे बड़ा झटका लगा."

बीजेपी और आरएसएस के बीच रिश्ते

बीजेपी और आरएसएस के रिश्तों को लेकर उठ रहे सवालों पर अदिति टंडन का कहना है कि हालात सामान्य हैं. इसका सबसे बड़ा संकेत तब मिला, जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली में कहा कि परिवार में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं. इस बयान के ज़रिए उन्होंने बीजेपी और संघ के बीच मतभेद की चर्चाओं पर विराम लगाने की कोशिश की.

उन्होंने बताया, "हालांकि उसी सम्मेलन में मोहन भागवत ने बीजेपी को यह भी याद दिलाया कि अब वक्त आ गया है और पार्टी को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर देना चाहिए."

अदिति टंडन के मुताबिक़, "अपने तरीके़ से उन्होंने यह संदेश दे दिया कि अब थोड़ा जल्दी कीजिए, क्योंकि काफ़ी समय बीत चुका है. लोग यह महसूस करने लगे थे कि जब पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं होता, तो संगठनात्मक अनुशासन कमजोर पड़ता है."

उनका कहना है कि संघ भले ही सार्वजनिक तौर पर यह कहता हो कि वह इन मामलों में सीधे दखल नहीं देता, लेकिन संघ की कार्यशैली को समझना आसान नहीं है. यह एक जटिल संगठन है.

अदिति टंडन की समझ के मुताबिक़, संघ बीजेपी को नाम सुझाने के बजाय एक व्यापक ढांचा देता है. यानी यह बताया जाता है कि किस तरह की पात्रता वाला व्यक्ति इस पद के लिए उपयुक्त होगा, ताकि उसके साथ काम करने में संघ को भी सहजता रहे.

उनके मुताबिक़, नितिन नबीन की नियुक्ति के बाद यह तस्वीर और साफ़ हो गई. संघ की ओर से बीजेपी को चार अहम बातें बताई गई थीं, जिनका ज़िक्र उन्होंने अपने कॉलम में भी किया है.

पहली शर्त यह थी कि उम्मीदवार की उम्र 50 साल से कम हो.

दूसरी, वह दिल्ली सर्कल से जुड़ा पारंपरिक नेता न हो.

तीसरी, उसे संसदीय लोकतंत्र और संगठनात्मक ढांचे दोनों का पर्याप्त अनुभव हो.

और चौथी शर्त यह थी कि नियुक्ति करते समय जातिगत संतुलन से ऊपर उठकर, यानी कास्ट न्यूट्रैलिटी को ध्यान में रखा जाए.

अदिति टंडन कहती हैं, "राज्यों और अन्य संगठनात्मक पदों पर क्षेत्रीय और जातिगत संतुलन ज़रूरी हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद को जाति-निरपेक्ष बनाए रखने पर ज़ोर दिया गया. इसी संदर्भ में नितिन नबीन का नाम सामने आता है. वह कायस्थ समुदाय से आते हैं, जिसकी बिहार में आबादी एक प्रतिशत से भी कम है. इस तरह वह कास्ट न्यूट्रैलिटी समेत संघ द्वारा तय किए गए सभी मानकों पर पूरी तरह खरे उतरते हैं."

बीजेपी की रणनीति पर राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार का कहना है कि पार्टी ने हाल के वर्षों में नेतृत्व को लेकर एक स्पष्ट संदेश दिया है.

उनके मुताबिक, "अगर आप छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और ओडिशा को देखें, तो इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के तौर पर आपको ज़्यादातर युवा चेहरे नज़र आते हैं. ये सभी अपने-अपने राज्यों में पार्टी के उभरते हुए युवा नेता हैं."

संजय कुमार कहते हैं कि इससे बीजेपी का संदेश साफ़ तौर पर सामने आता है. उनका कहना है , "पार्टी यह दिखाना चाहती है कि अब युवाओं को आगे लाने की ज़रूरत है. इसका मतलब सिर्फ़ चुनाव लड़वाना नहीं है, बल्कि उन्हें बड़ी ज़िम्मेदारियाँ देना भी है. किसी राज्य का मुख्यमंत्री बनना इससे बड़ी ज़िम्मेदारी क्या हो सकती है."

अगले साल होने वाले चुनाव

अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार का कहना है कि 2026 में जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वहाँ इंडिया गठबंधन के सहयोगियों की भूमिका अहम रहने वाली है.

उनके मुताबिक़, "अगर इन राज्यों पर नज़र डालें तो असम में बीजेपी की सरकार है. वहीं पश्चिम बंगाल में पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने काफ़ी ज़ोर लगाया था और तृणमूल कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी थी. ये दो ऐसे राज्य हैं जहाँ बीजेपी की दावेदारी काफ़ी मज़बूत रहने वाली है."

संजय कुमार कहते हैं कि दक्षिण भारत की स्थिति थोड़ी अलग है.

उनका कहना है, "तमिलनाडु में बीजेपी का अब तक कोई बड़ा संगठनात्मक विस्तार नहीं है. वहाँ पार्टी के लिए चुनौती रहेगी. यह ऐसा राज्य है जहाँ चुनाव मुख्य तौर पर क्षेत्रीय दलों के बीच होता है. ऐसे में देखना होगा कि बीजेपी किस तरह के गठबंधन करती है, ताकि किसी पार्टी के साथ मिलकर या तो चुनाव जीत सके या कम से कम मज़बूत चुनौती दे सके."

केरल को लेकर संजय कुमार का कहना है कि वहाँ का राजनीतिक परिदृश्य पारंपरिक तौर पर अलग रहा है.

उन्होंने कहा, "केरल में आमतौर पर एलडीएफ और यूडीएफ के बीच सत्ता का बदलाव होता रहा है. लेकिन हाल में हुए स्थानीय निकाय चुनावों ने कुछ नए संकेत दिए हैं. ख़ासकर तिरुवनंतपुरम में बीजेपी को अच्छी सफलता मिली है. ऐसे में केरल के विधानसभा चुनाव पर सभी की नज़र रहेगी. बीजेपी वहाँ कड़ी मेहनत कर रही है."

वहीं अदिति टंडन का कहना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों से बीजेपी ने तेज़ी से सबक लिया.

उनके मुताबिक, "उस दौर में आरएसएस और बीजेपी के रिश्तों को लेकर भी चर्चाएँ सामने आई थीं और इनमें से कई बातें सही भी थीं. लेकिन बाद में दोनों एक साथ आए और उसका असर दिल्ली और बिहार से पहले महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों में दिखाई दिया."

पश्चिम बंगाल को लेकर अदिति टंडन कहती हैं कि बीजेपी इसे अपने लिए सबसे बड़ा मौक़ा मानती है. "बीजेपी को लगता है कि पश्चिम बंगाल उनके लिए सबसे बेहतर अवसर है."

उनका कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधी चुनौती देने वाला कोई विपक्षी नेता माना जाता है, तो कई राजनीतिक विश्लेषक ममता बनर्जी का नाम लेते हैं.

उन्होंने कहा, "बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस, दोनों ही यह जानते हैं कि यह मुक़ाबला बेहद कड़ा होने वाला है. बीजेपी के पास यहाँ खोने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है, जबकि तृणमूल कांग्रेस के लिए दांव कहीं ज़्यादा बड़े हैं."

भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद क्या पीएम मोदी की छवि पर असर पड़ा?

भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया संघर्ष के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर असर को लेकर उठे सवालों पर द ट्रिब्यून की एसोसिएट एडिटर अदिति टंडन का कहना है कि इस घटना का प्रधानमंत्री की छवि पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा.

उनके मुताबिक, "मुझे नहीं लगता कि प्रधानमंत्री की छवि पर इसका बिल्कुल भी असर हुआ. अगर ऐसा होता, तो ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुए चुनावों में उसका असर साफ़ दिखाई देता. लेकिन हमने देखा कि उन चुनावों में किस तरह बीजेपी और एनडीए गठबंधन के सहयोगी दलों को जीत मिली."

अदिति टंडन का कहना है कि उस समय कूटनीतिक विशेषज्ञों से बातचीत में भी यही राय सामने आ रही थी. "डिप्लोमेटिक एक्सपर्ट्स का मानना था कि संयम बरतने का वक्त है और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के स्तर पर जाकर सीधे इस तरह शामिल होने की ज़रूरत नहीं है. यह दो स्वतंत्र देशों का मामला है, जो अपनी-अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं."

उनका कहना है कि लोकतंत्र में चुनाव किसी भी नेता की छवि का एक अहम पैमाना होते हैं.

उन्होंने कहा, "अगर प्रधानमंत्री की छवि धूमिल हुई होती, तो उसका असर चुनावी नतीजों में ज़रूर दिखता. लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद ऐसा नहीं हुआ. इससे यह माना जा सकता है कि प्रधानमंत्री की छवि पर इस घटना का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा."

अदिति टंडन के मुताबिक, कूटनीतिक मोर्चे पर भी भारत ने एक स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति का संकेत दिया है.

वह कहती हैं, "प्रधानमंत्री ने अब तक जिस तरह अमेरिका के दबावों के बावजूद, टैरिफ जैसे मुद्दों पर अपनी स्थिति बनाए रखी है, उससे यह पहली बार साफ़ तौर पर महसूस हुआ कि भारत एक मज़बूत और स्वतंत्र विदेश नीति को आगे बढ़ाते हुए अमेरिका के साथ अपने संबंध भी संतुलित तरीके से बनाए रखने में सफल रहा है."

कांग्रेस का नेतृत्व

कांग्रेस के नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों पर अदिति टंडन का कहना है कि पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी उलझी हुई नेतृत्व संरचना है.

उनके मुताबिक़, "कांग्रेस पार्टी का सबसे बड़ा चैलेंज उसकी कंफ्यूज्ड लीडरशिप है. बिहार में एसआईआर को चुनावी मुद्दा बनाने का फ़ैसला राहुल गांधी का ही था."

अदिति टंडन कहती हैं कि संसद सत्र के दौरान राहुल गांधी की भूमिका भी लगातार सवालों के घेरे में रही.

उन्होंने कहा, "सत्र के शुरुआती दिनों में राहुल गांधी संसद में आए और प्रदूषण का मुद्दा उठाया. लेकिन उसके बाद वह नज़र नहीं आए और जर्मनी चले गए. ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी लोगों से अपील नहीं करते, लेकिन उनकी राजनीति अस्थिर दिखाई देती है."

अदिति टंडन का मानना है कि प्रियंका गांधी वाड्रा का सार्वजनिक संवाद राहुल गांधी से अलग नज़र आता है.

उन्होंने कहा, "जब प्रियंका गांधी बोलती हैं, तो उनकी बातें ज़्यादा तार्किक और भरोसेमंद लगती हैं. वह शांत नज़र आती हैं और अपनी बात कहने का उनका तरीक़ा अलग है. इसके उलट राहुल गांधी अक्सर गुस्से में दिखाई देते हैं और प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमले करते हुए नज़र आते हैं."

अदिति टंडन के मुताबिक़, प्रियंका गांधी के भाषणों की इसी वजह से काफ़ी सराहना भी हुई है. उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह स्थिति अच्छी नहीं है कि सरकार और विपक्ष के बीच संवाद ही न हो.

उन्होंने कहा, "फिलहाल राहुल गांधी और सरकार के बीच वह संवाद नहीं है, जितना होना चाहिए. लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है कि सरकार भी संवाद के रास्ते तलाशे और कांग्रेस भी ऐसा पुल बनाने की कोशिश करे, क्योंकि ये दोनों ही लोकतंत्र के अहम स्तंभ हैं."

वहीं राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार का कहना है कि एसआईआर को चुनावी मुद्दा बनाना आसान नहीं है. उनके मुताबिक, इसके पीछे दो बड़े कारण हैं.

संजय कुमार कहते हैं कि अगर किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से कट जाता है, तो वह तकनीकी तौर पर मतदाता ही नहीं रहता.

उन्होंने कहा, "ऐसे में उसके लिए चुनाव में भागीदारी का कोई अर्थ नहीं रह जाता. दूसरी तरफ, जिन लोगों के वोट बने रहते हैं, उनके सामने अगर पार्टियां यह कहती हैं कि वोट काटे जा रहे हैं, तो उन पर इसका ज़्यादा असर नहीं पड़ता, क्योंकि उनका वोट सुरक्षित होता है."

उनका कहना है कि जिन लोगों के वोट कट चुके होते हैं, वे मतदान कर ही नहीं पाते, इसलिए यह मुद्दा चुनावी रूप से असरदार नहीं बन पाता.

"यही वजह है कि यह मुद्दा बिहार विधानसभा चुनाव में भी बड़ा मुद्दा नहीं बन सका. यह ज़्यादातर पार्टियों तक ही सीमित रहा."

संजय कुमार का मानना है कि विपक्ष को ज़मीनी और रोज़मर्रा के मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए.

उन्होंने कहा, "अगर विपक्षी पार्टियाँ बेरोज़गारी, रोज़गार और महंगाई जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़ें, तो ये मुद्दे कहीं ज़्यादा प्रभावी हो सकते हैं. विपक्ष को सरकार की कमियों को लेकर लोगों के पास जाना होगा और उन्हें साफ़-साफ़ समझाना होगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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