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कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने की मीरवाइज़ फ़ारूक़ की पहल कितनी कामयाब होगी
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर से
विस्थापित कश्मीरी पंडितों को घाटी में वापस बसाने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है.
इस बार यह बात कोई और नहीं बल्कि कश्मीर के अलगाववादी नेता और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के चेयरमैन मीरवाइज़ मौलवी उमर फ़ारूक़ कर रहे हैं.
बीते दिनों कश्मीरी पंडितों के एक समूह जम्मू-कश्मीर पीस फोरम (जेकेपीएफ़) ने मीरवाइज़ मौलवी उमर फ़ारूक़ से दिल्ली में मुलाक़ात की.
इस मुलाक़ात के बाद यह तय पाया गया कि मीरवाइज़ की अध्यक्षता में एक अंतरधार्मिक समिति बनेगी, जिसका मक़सद पंडितों को वापस कश्मीर में बसाना होगा.
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साल 1989 में जब कश्मीर में चरमपंथ का दौर शुरू हुआ तो कश्मीरी पंडितों पर हमले हुए. उनकी हत्या की गई. इसके बाद कश्मीर घाटी में रहने वाले हज़ारों पंडित पलायन कर अलग-अलग जगहों पर चले गए.
हालाँकि, कश्मीर में आज भी छह से आठ सौ के करीब पंडित रहते हैं.
इस बीच, केंद्र या जम्मू-कश्मीर में जितनी भी सरकारें आईं, उन्होंने कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने की बात की. मगर ज़मीन पर इसका कोई ख़ास असर नहीं दिखा.
क्या कह रहे हैं मीरवाइज़
दिल्ली की बैठक के बारे में बीबीसी हिंदी से बात करते हुए मीरवाइज़ मौलवी उमर फ़ारूक़ कहा, "कश्मीरी पंडितों का मसला एक मानवीय मुद्दा है. हम सबको मिलकर इसका हल तलाशना है."
उन्होंने कहा, "यह धारणा ग़लत है कि कश्मीर का मुस्लिम बहुसंख्यक समुदाय नहीं चाहता है कि पंडित वापस आएं. ऐसी कोई बात नहीं है. कश्मीर का मुसलमान कहता है कि कश्मीरी पंडित हमारा हिस्सा है. यह कोई सियासी नहीं बल्कि इंसानी मसला है."
मीरवाइज़ का कहना है कि बीते 35 सालों में दोनों समुदायों के बीच एक दूरी पैदा हो गई है. हम चाहते हैं कि उस दूरी को कम किया जाए.
दूरी कम करने के लिए मीरवाइज़ की कुछ सलाह है. वे कहते हैं, "बेहतरीन तरीक़ा यही है कि आपस में मेलजोल हो, मुद्दों पर चर्चा हो. आना-जाना हो और बातचीत हो. एक दूसरे के दुःख दर्द को हम समझें."
"यह भी सच बात है कि जहाँ कश्मीरी पंडितों ने तकलीफ़ें झेली हैं, वहीं कश्मीरी मुसलमान भी इस तकलीफ़ का शिकार होता रहा. दोनों समुदायों के दर्द को क़ुबूल करने की ज़रूरत है."
अपने दिल्ली दौरे के बारे में मीरवाइज़ विस्तार से बताते हैं. वो बताते हैं, "जब मैं दिल्ली में था तो कश्मीरी पंडितों के कई प्रतिनिधिमंडल मुझसे मिलने आए. हमने महसूस किया कि आम लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की ज़रूरत है."
उनके मुताबिक, ''इसके लिए कश्मीरी पंडितों ने अंतरधार्मिक समिति का सुझाव दिया है. यह सुझाव भी सामने आया है कि इस समिति में सभी समुदाय के लोगों को शामिल किया जाए.''
"इसके बाद उन रास्तों की तलाश की जाएगी कि ये लोग कश्मीर कैसे वापस आ सकते हैं. इसके लिए सबसे पहले दिल्ली, जम्मू या दूसरी जगहों पर रहने वाले कश्मीरी पंडितों के नेताओं के साथ संपर्क किया जाएगा."
सर्वधर्म कॉलोनियां बनें
यह पूछने पर कि जो कश्मीरी पंडित वापस आने के लिए तैयार हैं, उनको कहां बसाया जाएगा, मीरवाइज़ का कहना था, "हम सरकार की मदद लेने के लिए भी तैयार हैं. कई बार कहा गया कि विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए अलग कॉलोनियां बनाई जाएं या ट्रांजिट कैंप बनाए जाएं. मेरा मानना है कि अगर कोई कॉलोनी बनाई जाती है तो वह सब के लिए हो. उसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई भी हों.''
उन्होंने कहा, "हम नहीं चाहते हैं वे अलग-थलग होकर रहें. वे नुकीली तार या ताला लगाकर घरों में बैठें. हम चाहते हैं कि वह सब के साथ प्यार और भाईचारे के साथ रहें. एक शुरुआत हो चुकी है."
दिल्ली में मीरवाइज़ की कश्मीरी पंडितों के साथ बैठक को इसलिए भी अहम माना जा रहा है कि उन्होंने बीजेपी के सांसद जगदम्बिका पाल और नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद सईद आग़ा रूहुल्लाह से भी मुलाक़ात की.
इन मुलाक़ातों के बारे में मीरवाइज़ ने बीबीसी हिंदी को बताया कि वे वक़्फ़ बिल पर अपनी बात रखने दिल्ली आए थे. उसी सिलसिले में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के अध्यक्ष और सांसद जगदम्बिका पाल से मुलाक़ात हुई. मीरवाइज़ ने उन्हें बताया कि कश्मीर पर बातचीत के लिए उनके दरवाज़े हमेशा खुले हैं.
वैसे, अतीत में मीरवाइज़ के दिल्ली दौरे विवादों में भी रहे हैं.
कश्मीरी पंडितों ने क्या कहा?
सतीश महलदार मीरवाइज़ से दिल्ली में मिलने वाले जम्मू-कश्मीर पीस फ़ोरम के अध्यक्ष हैं. बीबीसी हिंदी से उन्होंने इस पहल को 'अच्छा क़दम' बताया.
महलदार का कहना था कि जो भी सरकारें बनीं, सब ने कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में वापस बसाने की बात तो की लेकिन कुछ हुआ नहीं.
भारतीय जनता पार्टी का ज़िक्र करते हुए महलदार कहते हैं, "उनके पास दो ही मुद्दे होते थे. एक राम मंदिर और दूसरा कश्मीरी पंडित. भगवान राम तो अपने घर चले गए लेकिन कश्मीरी पंडित वहीं पर हैं, जहाँ पहले थे. कहने का मतलब यह है कि सब कश्मीरी पंडितों को वापस लाने में असफल रहे."
वे कहते हैं, "अब मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने एक क़दम उठाने की बात की है. इससे न सिर्फ़ कश्मीरी पंडितों की वापसी का मसला सुलझ सकता है बल्कि समुदायों का आपसी मसला भी हल हो सकता है."
उनके मुताबिक, "मीरवाइज़ सिर्फ़ कश्मीरी मुसलमानों के धार्मिक नेता नहीं हैं बल्कि कश्मीरी पंडितों के भी हैं. कश्मीरी पंडित कश्मीरी समाज का हिस्सा हैं. हमने मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ से कहा कि आप अंतरधार्मिक समिति बनाएँ और उसके अध्यक्ष बनें."
यह पूछने पर कि जिस पहल को आप और मीरवाइज़ ने शुरू किया है, उसके तहत पंडितों को कश्मीर में कहां बसाया जाएगा, तो सतीश महलदार का जवाब था, "विस्थापन के कारण कई कश्मीरी पंडितों को अपनी जायदाद और ज़मीनें बेचनी पड़ीं. यह भी सच है कि कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में कई पंडितों की ज़मीनें आज भी मौजूद हैं. श्रीनगर के हैदरपोरा, राजबाग या दूसरी जगह पर कॉलोनियों को बनाया जा सकता है, जिसमें सभी समुदाय के लोग रह सकें."
सतीश महलदार का मानना है कि कश्मीरी पंडितों के लिए बनाए गए ट्रांजिट कैंप काम के नहीं हैं.
वो चाहते हैं कि कश्मीरी पंडित, सिख, मुसलमान या ईसाई एक साथ किसी जगह रहें. कश्मीर में 1989 से पहले का जो माहौल था, वे उसी माहौल को फिर से ज़िंदा करने की बात करते हैं.
ट्रांजिट कैंप किनके लिए बने
उस समय की केंद्र सरकार ने साल 2010 में विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए एक पीएम पैकेज की घोषणा की थी. इस पैकेज के तहत उन्हें सरकारी नौकरियाँ देनी शुरू की गई थीं.
इस समय कश्मीर में पीएम पैकेज के तहत 4000 से अधिक विस्थापित पंडित नौकरी कर रहे हैं. इन कर्मचारियों के लिए अनंतनाग, कुलगाम, बड़गाम और बारामुला में ट्रांजिट कैंप बनाए गए हैं.
हालाँकि, कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों का एक हिस्सा अलग ट्रांजिट कैंप बनाने और वहाँ कश्मीरी पंडितों को बसाने का विरोध करता रहा है.
साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाकर इसका विशेष दर्जा ख़त्म किया गया. इसके बाद कई कश्मीरी पंडितों की गोली मारकर हत्या की गई.
इनमें दोनों तरह के कश्मीरी पंडित शामिल थे. एक तो वे थे जो कभी भी कश्मीर से विस्थापित नहीं हुए. दूसरे वे थे जो कश्मीर में पीएम पैकेज के तहत नौकरी कर रहे हैं.
'सरकार ही कुछ कर सकती है'
दूसरी ओर, इस पहल पर पत्रकार और विश्लेषक हारुन रिशी की राय है कि कश्मीरी पंडितों की वापसी को सिर्फ़ सरकार ही मुमकिन बना सकती है.
उनके अनुसार, मीरवाइज़ की पहल को दरकिनार नहीं किया जा सकता है. रिशी के मुताबिक, सबसे बड़ा मसला कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा का है. यह सिर्फ़ सरकार ही मुहैया कर सकती है.
दूसरी ओर, जम्मू -कश्मीर में सत्तारूढ़ दल नेशनल कॉन्फ्रेंस ने मीरवाइज़ के इस क़दम का स्वागत किया है. पार्टी के प्रवक्ता इमरान नबी डार कहते हैं कि अगर मीरवाइज़ इसमें सफल होते हैं तो यह अच्छी बात है.
वहीं, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) इस पहल की सराहना तो करती है लेकिन साथ ही कई सवाल भी उठाती है. पार्टी के प्रवक्ता मोहित भान पूछते हैं कि मीरवाइज़ के पास पंडितों को वापस लाने का ब्लूप्रिंट कहाँ है?
मोहित यह भी कहते हैं कि मीरवाइज़ सिर्फ़ समुदायों को आपस में मिला सकते हैं. असल काम तो सरकार को करना है.
जम्मू -कश्मीर बीजेपी का मानना है कि मीरवाइज़ पहले कश्मीर में आम लोगों को इस बात पर तैयार करें कि वे एक आवाज़ में कश्मीरी पंडितों को वापस आने के लिए कहें. तब जाकर कश्मीरी पंडितों की वापसी मुमकिन हो सकती है.
बीजेपी के प्रवक्ता सुनील सेठी कहते हैं कि सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ पहले भी बयान जारी करते रहे हैं कि कश्मीरी पंडित अपने घरों को वापस लौटें. इसके लिए एक माहौल की ज़रूरत है. इस संबंध में मीरवाइज़ ने कुछ नहीं किया.
उनका कहना है कि मीरवाइज़ और कुछ कश्मीरी पंडितों की बैठक के बाद बयान जारी करना एक राजनीतिक नौटंकी है.
पीएम पैकेज के तहत काम करने वाले कर्मचारी रंजन पंडिता का कहना है, "कश्मीरी पंडितों की वापसी सिर्फ़ सरकार ही मुमकिन बना सकती है. मीरवाइज़ नहीं. सरकार अगर हमें वापस कश्मीर में बसाने की कोशिश करती है तो वही हमारी हर चीज़ का ख़्याल रख सकती है. मीरवाइज़ नहीं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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