बिहार में शिक्षक भर्ती नियम में बदलाव का असर कैसा होगा?

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- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, पटना से
बिहार सरकार के एक ताज़ा फ़ैसले ने राज्य में बड़ी संख्या में लोगों को ख़फ़ा कर दिया है. यह मामला है सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती का.
नीतीश सरकार ने हाल ही में ये फ़ैसला लिया है कि राज्य के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती के लिए देश के किसी भी राज्य के अभ्यर्थी आवेदन कर सकते हैं.
बीते मंगलवार को यह फ़ैसला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता वाली राज्य कैबिनेट की बैठक में लिया गया.
इससे पहले बिहार के सरकारी स्कूलों में शिक्षक के रूप में केवल बिहार के निवासियों को ही भर्ती करने का प्रावधान था.
कैबिनेट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ राज्य में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया है.
बिहार के शिक्षा मंत्री क्या बोले?

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मंगलवार (27 जून 2023) को नीतीश कुमार कैबिनेट के लिए गए इस फ़ैसले के बाद से बिहार के सरकारी स्कूलों में शिक्षक बनने के लिए इस राज्य का स्थायी निवासी होना अनिवार्य नहीं होगा.
यानी अभ्यर्थियों को डोमिसाइल सर्टिफ़िकेट की ज़रूरत नहीं होगी.
कैबिनेट के फ़ैसले के बाद राज्य के शिक्षा मंत्री प्रोफ़ेसर चंद्रशेखर ने कहा, “देश के विभिन्न राज्यों के मेधावी छात्र इस परीक्षा में भाग ले सकेंगे. यह समस्या विशेष तौर पर दिखती रही है कि साइंस सब्जेक्ट्स जैसे फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स के साथ ही अंग्रेज़ी के सक्षम छात्र नहीं मिल पाते हैं. सीटें ख़ाली रह जाती हैं. साइंस ब्लॉक में रिक्तियाँ रह जाती थीं.”
उन्होंने बिहार में प्रिंसिपल भर्ती का उदाहरण दिया कि 6000 पदों के लिए सिर्फ़ 369 लोग ही आए.
वहीं जब मीडियाकर्मियों ने उनसे राज्य के भीतर बेरोज़गारी और विरोध का हवाला दिया तो उन्होंने कहा, “विरोध अच्छी बातों का भी होता है और बुरी बातों का भी विरोध होता है. क्या कर सकते हैं?”
क्या कह रहे शिक्षक परीक्षा के अभ्यर्थी?

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नीतीश कैबिनेट की ओर से शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया में संशोधन की ख़बरों के बाहर आते ही सूबे में जहां-तहां से विरोध की ख़बरें आने लगीं.
अलग-अलग दलों के नेता सरकार से सवाल पूछने लगे हैं, चाहे वो विरोधी दल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हों या फिर सरकार में शामिल भाकपा (माले) के आला पदाधिकारी.
नीतीश कैबिनेट की ओर से लिए गए इस फ़ैसले और शिक्षा मंत्री के बयान पर बिहार टीइटी शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष अमित विक्रम ने बीबीसी से कहा, “माननीय मंत्री की फ़ैक्चुअल अंडरस्टैंडिग नहीं है. जो मंत्री कह रहे हैं कि सीटें ख़ाली रह जाती हैं, सामान्य तौर पर वो साइंस और मैथ्स की तो हाई स्कूल में ख़ाली रह जाती हैं. जब इन्होंने 2019-20 में एसटीईटी की परीक्षा ली थी तो वो सिर्फ़ बिहार के अभ्यर्थियों के लिए था. तो अब जब वे दूसरे राज्यों के लोगों को भी भर्ती का मौक़ा देने की बात कह रहे तो वो सारी भीड़ प्राथमिक स्तर पर होगी.”
अमित कहते हैं, “शिक्षा मंत्री कह रहे हैं कि सीटें ख़ाली रह जा रही हैं. तो सवाल है कि सीटें ख़ाली क्यों रह जाती हैं? सरकार इतने कम वेतन और जटिल प्रक्रिया से भर्तियां करती है कि योग्य अभ्यर्थी इससे अलग हो जाते हैं. साइंस-मैथ्स के पोस्ट ग्रैजुएट कोचिंग में पढ़ाकर 50-60 हज़ार की कमाई कर लेते हैं, उन्हें आप बिहार में 20-22 हज़ार में खटाना चाहते हैं. सरकार को पे-स्केल बेहतर करना चाहिए था. समान काम के लिए समान वेतन लागू करना था. लेकिन आपने बिहार के युवाओं का हक़ मारने के साथ ही उनकी प्रतिभा पर भी सवाल खड़े कर दिए.”
बीते कई वर्षों से शिक्षक अभ्यर्थियों की भर्ती के सवाल पर आंदोलनरत आलोक बीबीसी से कहते हैं, "सरकारें बदलती रहती हैं, मुख्यमंत्री फिर से वही बन जाते हैं. हम कल भी सड़कों पर थे और आज भी सड़कों पर हैं. हम घर और समाज से ताना सुनने को मजबूर हैं और बीच खेल में नियम बदल रहे हैं.”
आलोक ख़ुद भी एक अभ्यर्थी हैं. वह कहते हैं, “बिहार में पहले ही रोज़गार के मौक़े कम हैं. ना आईटी सेक्टर है और न ही कोई इंडस्ट्री. रोज़गार के कुछ मौके पब्लिक सेक्टर में हैं. लेकिन अब जो एक बहाली आई है उसमें भी बंदरबांट शुरू कर दिया गया. शिक्षा मंत्री कह रहे कि बीपीएससी के माध्यम से भर्ती हो रही है, इसलिए नियम बदले जा रहे हैं, लेकिन ये अफ़सर की भर्ती तो है नहीं. इसमें राज्य के पास विशेषाधिकार है. ये बिहार की प्रतिभा के साथ सरासर अन्याय है. हम इसका पुरज़ोर विरोध करेंगे.”
बीपीएससी के माध्यम से होनी है भर्ती

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बिहार में शिक्षक भर्ती पर विवाद का छिड़ना कोई नई बात नहीं है. नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद और शिक्षकों की भर्ती में जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं.
हालांकि कुछ दिनों पहले ही बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) के ज़रिए एक लाख 70 हज़ार शिक्षकों की भर्ती का नोटिफिकेशन जारी किए जाने को विभिन्न शिक्षक संगठनों और अभ्यर्थियों ने बड़ी राहत करार दिया था.
इस भर्ती के लिए आवेदन की प्रक्रिया 15 जून से शुरू हो गई है. आवेदन की अंतिम तारीख़ 12 जुलाई है.
हालांकि नियोजित शिक्षकों और अन्य शिक्षक अभ्यर्थियों के एक साथ आवेदन करने को लेकर भी कई तरह की बातें हैं.
कई लोग (शिक्षक संघ) इसके ख़िलाफ़ हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा रहे हैं.
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तेजस्वी से सवाल
2020 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में रोज़गार और नौकरी का सवाल बड़ा मुद्दा बना.
तेजस्वी यादव ने नेतृत्व वाले महागठबंधन ने 10 लाख सरकारी नौकरियों का वादा किया, साथ ही बिहार में डोमिसाइल नीति को लागू करने का मुद्दा ज़ोर शोर से उठाया. इन मुद्दों पर उन्हें भारी जनसमर्थन मिला.
उस चुनाव में एनडीए नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव मैदान में था. एनडीए ने पहले तो तेजस्वी यादव के 10 लाख नौकरियों के वादे पर सवाल खड़े किए फिर बाद में बीजेपी ने 19 लाख रोज़गार का वादा कर डाला.
चुनाव के बाद नीतीश कुमार एक बार फिर तेजस्वी यादव के साथ आ गए और तब से महागठबंधन के सदस्य लगातार ये कहते रहे हैं कि 10 लाख सरकारी नौकरी देने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
हालांकि अब नीतीश सरकार के उस वादे को लेकर सवाल करने लगे हैं.
बिहार में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और नियमित सत्र के सवाल पर हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने वाले छात्र नेता विवेक कुमार ने बीबीसी हिंदी से कहा, “चुनावी वादों की बात तो है ही, लेकिन 2020 के फ़रवरी माह में सत्र के दौरान भी डोमिसाइल नीति पर बहस हुई थी. तेजस्वी यादव ने मुहिम चलाई. तमाम पब्लिक प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से लोगों को सपना दिखाया कि सरकार आने पर वे डोमिसाइल नीति लागू करेंगे. युवाओं का समर्थन उन्हें यूँ ही नहीं मिला. चुनाव के दौरान 10 लाख सरकारी नौकरी देने की बातें हुईं, तो क्या वे पूरे भारत के लोगों को रोज़गार देने की बात कह रहे थे?”

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नीतीश कैबिनेट के फ़ैसले पर क्या कह रहे अलग-अलग दल?
बिहार के भीतर चल रही शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया के बीच कैबिनेट के फ़ैसले से संशोधन पर बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने सरकार पर सीधा हमला बोला है.
उन्होंने कहा, “बिहार का केवल शिक्षा विभाग ही नहीं बल्कि पूरी सरकार ही मानसिक रूप से बीमार हो गई है. महागठबंधन के दलों के दबाव में सरकार बिहार के युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है. विगत 4 सालों से बिहार के एसटीइटी और सीटेट पास अभ्यर्थी सड़कों पर धक्का खा रहे हैं और शिक्षा मंत्री की बयानबाज़ी बिहार के प्रतिभा का अपमान और बिहारी अस्मिता पर आघात करने वाला है.”
महागठबंधन में शामिल भाकपा (माले) के राज्य सचिव कुणाल ने कहा, “शिक्षक भर्ती की चल रही प्रक्रिया के बीच अचानक डोमिसाइल नीति को हटाना अप्रत्याशित और अनुचित है. इससे बिहार के छात्रों की हक़मारी होगी. सरकार नई नियमावली पर पुनर्विचार करे. अभ्यर्थियों और शिक्षक संगठनों से बातचीत करे. तर्कसंगत फ़ैसले ले.”

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वहीं कांग्रेस विधायक दल के नेता और कदवा विधायक शकील अहमद ख़ान ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “अभी डोमिसाइल नीति को लेकर कैबिनेट का फ़ैसला आया तो ज़रूर है लेकिन वे अभी इस मामले की गहराई में जाने और पूरे मसले को समझने के बाद ही कुछ कहने की स्थिति में होंगे.”
कैबिनेट की ओर से डोमिसाइल नीति में बदलाव के फ़ैसले पर जद (यू) प्रवक्ता अभिषेक झा बीबीसी हिंदी से कहते हैं, “इस पूरे मसले पर जद (यू) का कहना है कि आयोग की ओर से ली जा रही परीक्षाओं में भारत के हरेक नागरिक को मौक़ा मिलता है. तो इस बात की सम्भावना थी या अंदेशा था कि कोई व्यक्ति कोर्ट में चला जाता और पूरी प्रक्रिया ही रुक जाती.”
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