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शमीक भट्टाचार्य को मिली पश्चिम बंगाल बीजेपी की कमान, जानिए कैसे बाक़ी पर पड़े भारी
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
लंबे अरसे से बीजेपी के समर्पित कार्यकर्ता रहे शमीक भट्टाचार्य का नाम आख़िरी पलों में प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए सामने आया था.
इससे पहले अध्यक्ष चयन को लेकर तमाम नेताओं के नाम पर कयास लगाए जा रहे थे लेकिन उनमें शमीक का नाम नहीं था.
बुधवार को दिल्ली से पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के फोन ने पल भर में तमाम समीकरण बदल दिए. वैसे उससे पहले सोमवार को दिल्ली दौरे में भी उनको संभवतः इसका संकेत दे दिया गया था.
पार्टी अध्यक्ष पद की दौड़ में अचानक शीर्ष पर पहुँचना और निर्विरोध चुना जाना शायद ख़ुद शमीक के लिए भी यह किसी आश्चर्य से कम नहीं रहा होगा.
लंबे समय तक राज्य में पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रहे, राज्यसभा सांसद शमीक भट्टाचार्य के लिए इस कुर्सी तक पहुँचना भले आसान रहा हो लेकिन आगे की राह बहुत आसान नहीं है.
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साल 2006 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े
पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं. उससे पहले पार्टी की आंतरिक गुटबाज़ी से पार पाना बड़ी चुनौती है.
शमीक के पास इसके लिए अधिकतम आठ-नौ महीने का ही समय है.
पश्चिम बंगाल से बाहर शमीक का नाम भले ज़्यादा लोग नहीं जानते हों लेकिन उनका राजनीतिक करियर काफ़ी लंबा है और वह एक सामान्य कार्यकर्ता से इस पद तक पहुँचे हैं.
शमीक साल 1974 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े थे.
उसके बाद उनको दक्षिण हावड़ा मंडल का बीजेपी युवा मोर्चा का महासचिव बनाया गया. वह लगातार 11 साल तक इस पद पर रहे. उसके बाद लगातार तीन कार्यकाल तक प्रदेश बीजेपी के महासचिव भी रहे.
इसके साथ ही पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति और प्रदेश बीजेपी की कोर कमिटी के सदस्य भी रहे.
शमीक ने बीजेपी के टिकट पर साल 2006 में पहली बार श्यामपुर सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा था. लेकिन हार गए थे.
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में शमीक बशीरहाट लोकसभा सीट से चुनाव हार गए थे. लेकिन उसी साल बशीरहाट दक्षिण विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में वह विजयी रहे थे.
इसके बाद शमीक साल 2019 में दमदम संसदीय सीट पर तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय से हार गए.
साल 2021 के विधानसभा चुनाव में भी उनको हार का सामना करना पड़ा. फिर साल 2024 में पार्टी ने उनको राज्यसभा में भेजा था.
तथागत रॉय के अध्यक्ष रहने के दौरान पार्टी में उनका ग्राफ़ तेज़ी से बढ़ा. उसी दौरान उनको महासचिव चुना गया.
राहुल सिन्हा के अध्यक्ष बनने के बाद भी वह इस पद पर बने रहे. उसके बाद दिलीप घोष के अध्यक्ष बनने पर शमीक को पार्टी का मुख्य प्रवक्ता बनाया गया. लेकिन पार्टी में तब उनकी ख़ास अहमियत नहीं थी.
राह नहीं है आसान
बीते महीने ऑपरेशन सिंदूर के सिलसिले में विदेश जाने वाले प्रतिनिधिमंडल में भी उनको शामिल किया गया था.
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस चुनाव से पहले बीजेपी को बाहरी पार्टी बताती रही है. शमीक को इस चुनौती से भी पार पाना है."
बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में 77 सीटें जीती थीं. लेकिन विधायकों के पाला बदलने और उपचुनाव में हार के कारण यह तादाद घटकर 65 रह गई है.
ऐसे में चुनाव से पहले विधायक दल और संगठन के बीच तालमेल को बेहतर बनाना भी उनके लिए एक बड़ी परीक्षा से कम नहीं है.
विश्लेषकों का कहना है कि फ़िलहाल शमीक की सबसे बड़ी चुनौती पार्टी की गुटबाज़ी को दूर करना है.
पूर्व अध्यक्ष दिलीप घोष को हाल के महीनों में पार्टी के किसी कार्यक्रम में नहीं बुलाया जा रहा है. इससे वह ख़ासे नाराज़ बताए जा रहे हैं.
नए और पुराने नेताओं के बीच खींचतान
हालांकि घोष ने इस बारे में सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा है. लेकिन ख़ासकर दीघा में ममता बनर्जी के बुलावे पर जगन्नाथ धाम के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के बाद से ही पार्टी में दिलीप लगातार हाशिए पर रहे हैं.
शमीक का कहना है, "अध्यक्ष तो महज एक पद है. राजनीति टीम का खेल है. अब पार्टी में नया बनाम पुराना विवाद नहीं रहेगा. बंगाल में पार्टी एकजुट होकर लड़ेगी."
पार्टी में दूसरे दलों से आने वाले नेताओं और पुराने नेताओं के बीच लंबे समय से खींचतान रही है.
शमीक के चुनाव से पहले पार्टी में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं. कुछ नेताओं का अनुमान था कि अगले साल के चुनाव से पहले अध्यक्ष नहीं बदला जाएगा और कम से कम चुनाव तक सुकांत मजूमदार ही इस पद पर बने रहेंगे.
एक अन्य गुट शुभेंदु अधिकारी के अध्यक्ष बनने का दावा कर रहा था. लेकिन शुभेंदु की दावेदारी में ख़ास दम नहीं था.
आख़िर इस पद के लिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने शमीक को ही क्यों चुना?
पार्टी के एक नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, "पार्टी में शमीक की छवि एक शहरी और पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय नेता की है. कोलकाता और आसपास के बांग्लाभाषी बहुल इलाक़ों में पार्टी को उनकी इस छवि का फ़ायदा मिल सकता है."
पार्टी के सूत्रों ने बताया कि शुभेंदु अधिकारी के साथ उनके नज़दीकी संबंधों की भी इस पद तक पहुँचाने में अहम भूमिका रही है.
कहा जा रहा है कि बीजेपी पश्चिम बंगाल में अपने विधायक दल के नेता और प्रदेश अध्यक्ष के बीच बेहतर तालमेल के साथ अगले चुनाव में उतरना चाहती है.
कौन होगा राज्य में बीजेपी का चेहरा?
बीजेपी में जहाँ पुराने और दूसरे दलों से आने वाले नेताओं के बीच विभाजन की एक रेखा है, वहीं शमीक के साथ ऐसे नेताओं के बेहतर संबंध रहे हैं.
वो चाहें मुकुल राय रहे हों या फिर शुभेंदु. ऐसे में अध्यक्ष पद पर शमीक को शुभेंदु का समर्थन मिलना कोई हैरत की बात नहीं है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शमीक के प्रदेश अध्यक्ष बनने से यह भी साफ़ हो गया है कि अगले विधानसभा चुनाव में शुभेंदु ही बंगाल में पार्टी का चेहरा होंगे.
हालांकि, शमीक कहते हैं, "फ़िलहाल बंगाल की राजनीति की बागडोर किसी तय चेहरे या व्यक्ति के पास नहीं है. बंगाल के लोगों ने तय कर लिया है कि किसकी लड़ाई किसके साथ है. लोगों ने इस बार तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से हटाने का मन बना लिया है. ऐसे में यह ख़ास मायने नहीं रखता कि कौन चेहरा होगा या कौन किस पद पर है."
अध्यक्ष पद पर चुने जाते ही शमीक चुनावी मुद्रा में आ गए हैं.
उन्होंने अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "अगला चुनाव कई मायनों में अहम होगा. यह बंगाल से निवेश को बाहर जाने से रोकने वाला, रोज़गार पैदा करने और प्रतिभा पलायन को रोकने वाला चुनाव होगा. यह हिंदू बंगालियों के अस्तित्व की रक्षा करने का आख़िरी मौक़ा होगा."
पार्टी के एक गुट का दावा है कि शमीक को अध्यक्ष की कुर्सी सौंपने से अगले चुनाव में पार्टी को कोलकाता फैक्टर का लाभ मिलेगा.
शमीक कोलकाता के ही हैं जबकि इससे पहले अध्यक्ष रहे दिलीप घोष झाड़ग्राम के थे और सुकांत मजूमदार दक्षिण दिनाजपुर के.
इसी तरह विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी भी पूर्व मेदिनीपुर के हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित