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नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ के बाद बीबीसी संवाददाताओं ने क्या-क्या देखा?
- Author, अभिनव गोयल और दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर एंबुलेंसों के सायरन का शोर है, भारी पुलिस बल तैनात हैं और माहौल में तनाव है.
रात क़रीब बारह बजे जब हम स्टेशन पहुंचे तो लगभग एक दर्जन से ज़्यादा एबुलेंस स्टेशन के बाहर खड़ी थीं. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ़) के जवान अपना साजो सामान लिए स्टेशन की तरफ भागते हुए दिखाई दे रहे थे.
यहां कई लोग ऐसे थे जो ट्रेन छूटने का अफसोस कर रहे थे तो कई रेलिंग पर बैठकर अपनी जान बचने पर संतोष ज़ाहिर कर रहे थे.
भारी पुलिस बल की तैनाती के बीच यात्रियों को स्टेशन में जाने से रोका जा रहा था. भगदड़ के चश्मदीद बारी-बारी से मीडिया कैमरों पर बयान दे रहे थे.
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ऊषा देवी जो अपने बेटे के साथ बिहार जा रही थीं, बताती हैं, "हम लोग भतीजे की शादी के लिए बिहार जा रहे थे. जब प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंचे तो भगदड़ मच गई. भगदड़ में बहुत लोग गिर गए. प्लेटफ़ॉर्म पर खाने-पीने का सामान और लोगों के कपड़े पड़े हुए थे."
"मैं भी उस समय बेहोश हो रही थी. बहुत सारे लोग बेहोश होकर गिर रहे थे. भीड़ इतनी थी कि हम ट्रेन ही नहीं पकड़ पाए."
स्टेशन पर काम करने वाले कुली कैमरे पर बात करने से बचते नज़र आते हैं, क्योंकि ये वही लोग हैं जो प्लेटफ़ॉर्म से ज़्यादातर लाशों को एंबुलेंस तक लाए थे.
एक कुली ने बीबीसी को बताया, "सांस (सीपीआर) देकर लोगों को बचाने की कोशिश की गई, लेकिन बचाया नहीं जा सका."
बीती रात यानी 15 फ़रवरी को रात करीब 9 बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के कई प्लेटफ़ॉर्म और सीढ़ियों पर भगदड़ मचने से कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई. चश्मदीदों के मुताबिक़, अधिकतर लोगों की मौत प्लेटफ़ॉर्म नंबर 14 तक जाने वाली सीढ़ियों पर हुई.
कई ऐसे लोग जिन्होंने भगदड़ में बहुत मुश्किल से अपनी जान बचाई, स्टेशन के बाहर मीडिया के कैमरों पर आंखों देखी बता रहे थे. इनमें से कई रेलवे प्रशासन को लेकर गुस्सा थे, तो कई मदद देरी से पहुंचने को लेकर.
अपना सामान लिए ऐसे कई यात्री थे, जो भगदड़ की वजह से ट्रेन नहीं पकड़ पाए. इसमें वे लोग भी शामिल थे जो प्रयागराज में कुंभ नहाने के लिए जा रहे थे. वहीं कुछ ऐसे यात्री भी थे जिन्हें स्टेशन के अंदर नहीं जाने दिया जा रहा था.
चश्मदीदों ने बताया कि भगदड़ ना सिर्फ प्लेटफ़ॉर्म बल्कि सीढ़ियों और फुट ओवर ब्रिज पर भी हुई थी.
स्टेशन पर पहुंचकर जो दृश्य दिखे, उनका अंदाज़ा इस घटना को लेकर मीडिया में आ रहे रेलवे के अधिकारियों के बयानों से लगाना मुश्किल था.
पहले इस हादसे को अफ़वाह बताया गया, फिर भगदड़ जैसी स्थिति, उसके बाद भगदड़ और फिर रात क़रीब साढ़े बारह बजे पंद्रह लोगों की मौत की जानकारी दी गई.
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से मृतकों को क़रीब दो किलोमीटर दूर लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल ले जाया गया, जहां पुलिस के साथ अर्धसैनिक बल तैनात किए गए थे. मीडिया को अस्पताल के अंदर जाने से रोका जा रहा था.
दिल्ली के उपराज्यपाल अस्पताल में घायलों का हाल जानकर बाहर निकलते हुए मीडिया के सवालों से बचते नज़र आए. दिल्ली पुलिस के शीर्ष अधिकारी भी बिना पत्रकारों के सवालों का जवाब दिए निकल गए. पत्रकार उनके पीछे दौड़ लगाते रहे.
हालांकि, दिल्ली की निवर्तमान मुख्यमंत्री आतिशी ने ज़रूर मीडिया से बात की लेकिन उन्होंने भी मृतकों की संख्या के बारे में कोई जानकारी नहीं दी.
अस्पताल के बाहर हर तरफ मीडिया के कैमरे लगे हुए थे. बीच-बीच में अस्पताल से रोते हुए मृतकों के रिश्तेदार बाहर निकल रहे थे, जिन्हें तुरंत मीडिया के कैमरे घेर लेते थे.
अपने देवरानी शीलम का शव देखने के बाद शोभा जब अस्पताल से बाहर आई हैं तो बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया कि कैसे अस्तपाल के अंदर एक बेड पर कई लाशों को रखा गया है.
अस्पताल से बाहर निकल रहे अन्य लोगों ने भी इसी तरह के बयान दिए. बीबीसी हिंदी ने अस्पताल के अंदर का भी दौरा किया. जहां रेलवे ने अपना एक काउंटर बनाया हुआ था. वहां बैठे लोगों ने रेलवे के पहचान पत्र गले में पहने हुए थे. ये लोग मृतकों के परिवार वालों से लगातार संपर्क में थे.
भारी सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बीच, मृतकों के परिवारवालों और घायलों के अलावा किसी को अंदर आने की इजाज़त नहीं दी जा रही थी.
रात में करीब दो बजे जब हम मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की मॉर्चरी की तरफ बढ़ रहे थे, इसी दौरान हमारी मुलाकात किराड़ी के रहने वाले बिपिन झा से हुई.
यहां एक पुलिसकर्मी बिपिन झा की पत्नी ममता झा का पंचनामा लिख रहा था. अपने आंसुओं को बार-बार पोंछते हुए झा कहते हैं, "सब कुछ ख़त्म हो गया."
कुछ घंटे पहले तक बिपिन बिहार से आ रही अपनी पत्नी ममता झा को स्टेशन से घर ले जाने को लेकर उत्साहित थे. अब उन्हें अफ़सोस था कि उनकी पत्नी ने उनके सामने ही दम तोड़ दिया और वो उसे बचाने के लिए कुछ ना कर सके.
किसी तरह आंसुओं को थामते हुए वो कहते हैं, "मेरी पत्नी बिहार से आ रही थीं. मैं उन्हें लेने के लिए रेलवे स्टेशन गया था. उन्हें रिसीव करने के बाद हम प्लेटफ़ॉर्म से सीढ़ियां चढ़कर फुटओवर ब्रिज पर आ गए लेकिन जब अजमेरी गेट की तरफ बढ़ने लगे तो वहां भगदड़ मच गई और मेरी पत्नी भीड़ में दब गई."
वह कहते हैं, "ये सब मेरी आंखों के सामने हुआ और मैं अपनी पत्नी को बचा नहीं पाया. ये अफसोस सारी जिंदगी मेरे साथ रहेगा. मेरे तीन बच्चे हैं, मैं उन्हें क्या जवाब दूंगा."
उन्हीं के साथ हम मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की मॉर्चरी पहुंचे, यहां भगदड़ में मारे गए लोगों के शवों को रखा गया था.
मॉर्चरी के अंदर और बाहर शवों को ले जाने के लिए दस एबुलेंस खड़ी थीं. मॉर्चरी के बाहर हमारी मुलाकात भगदड़ में मारी गईं शीलम देवी के पति उमेश गिरी से हुई. वह भगदड़ में खुद भी घायल हो गए थे.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "हम महाकुंभ जा रहे थे…ऊपर चढ़ने के बाद भीड़ काफी अनियंत्रित हो गई. बहुत ज़्यादा भीड़ होने की वजह से ये घटना घटी. मेरे सामने पहले से कई लोगों की बॉडी गिरी हुई थी. जो गिरा वो उठ नहीं पाया, लोग एक दूसरे के ऊपर चढ़ते चले गए."
उन्होंने बताया, "उस समय लोगों (बॉडी) को सीढ़ी के सामने ही लगा रखा था. उस समय वहां पर न कोई मीडिया थी और न कोई प्रशासन था."
मदद को लेकर उमेश कहते हैं, "मदद तो कुछ नहीं मिली. बाद में बहुत देर हो गई थी. मैंने कई पुलिस वाले, आरपीएफ़ वालों को कहा लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था."
ऐसी ही बात गिरिधारी ने भी कही. वह अपनी मामी के साथ पटना से दिल्ली आए थे और उन्हें हरियाणा के पानीपत जाना था. उनकी मामी की मौत इस हादसे में हो गई.
मॉर्चरी के गेट पर सिर झुकाकर बैठे गिरिधारी कहते हैं, "हम बस से पानीपत जाने की सोच रहे थे, अगर बस से जाते तो हमारी मामी की जान बच जाती."
ऐसी ही आपबीती अन्य लोगों की भी थी. कुछ मृतकों को राम मनोहर लोहिया अस्पताल की मॉर्चरी भी भेजा गया. वहीं लेडी हॉर्डिंग अस्पताल में बीबीसी हिंदी ने तीन लाशों को देखा जिनकी भगदड़ में मौत हुई थी.
लेडी हार्डिंग अस्पताल की मॉर्चरी में दर्जन भर पुलिसकर्मी मृतकों के परिजनों को घेरे हुए लिखा-पढ़ी कर रहे थे.
सात साल की रिया की भी इस हादसे में मौत हो गई. उनके चाचा विपिन अपने आंसुओं को रोकते हुए कहते हैं, "किसी बच्ची की ऐसी मौत नहीं होनी चाहिए. अभी उसके सामने पूरी ज़िंदगी पड़ी थी."
रिया के पिता कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थे.
अपने को गंवाने वाले लोगों की कहानी एक जैसी ही है. सुबह क़रीब साढ़े पांच बजे सीमा जब अपने पति के साथ अस्पताल से बाहर निकलती हैं तो मीडिया के कैमरे उन्हें घेर लेते हैं.
सीमा की बेटी इस हादसे में घायल हो गईं जबकि उनकी ननद पिंकी की मौत हो गई.
सीमा ख़ुद भी घायल थीं. वो कहती हैं, "हम प्रयागराज के लिए जा रहे थे. जहां हम थे वहां भगदड़ नहीं मची थी. जब हम लोग प्लेटफ़ॉर्म के लिए सीढ़ी से उतर रहे थे, तो धक्का-मुक्की होने लगी. पीछे से धक्का लगा और हम नीचे गिर गए. ऊपर खड़े सभी लोग हमारे ऊपर गिर गए. मेरी बेटी, हमारी देवरानी, मेरी छोटी बेटी, हम सब दब गए थे. हम लोगों की सिर्फ गर्दन बाहर थी. एक इंच भी हिलने की जगह नहीं थी. इस भगदड़ में सीढ़ी पर ही मेरी ननद पिंकी की मौत हो गई."
स्टेशन और अस्पताल के बाहर कई चश्मदीदों ने बीबीसी को बताया कि प्रयागराज स्पेशल ट्रेन का प्लेटफ़ॉर्म बदलने की वजह से अचानक लोग स्पेशल ट्रेन की तरफ़ दौड़े और इससे अफ़रा-तफ़री मच गई.
हालांकि, उत्तर रेलवे ने अपने बयान में ट्रेन का प्लेटफ़ॉर्म बदलने की बात नहीं की है बल्कि उन्होंने यात्रियों के सीढ़ियों से फिसलकर गिरने को घटना की वजह बताया.
उत्तर रेलवे के प्रवक्ता हिमांशु शेखर उपाध्याय ने एक बयान में कहा, "जिस समय यह दुखद घटना घटित हुई , उस समय नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म नंबर 14 पर पटना की तरफ़ जाने वाली मगध एक्सप्रेस और प्लेटफ़ॉर्म नंबर 15 जम्मू की तरफ़ जाने वाली उत्तर संपर्क क्रांति खड़ी थी. इस दौरान फुटओवर ब्रिज से 14 और 15 नंबर प्लेटफ़ॉर्म की तरफ़ आने वाली सीढ़ियों पर यात्रियों के फिसलकर गिरने से उनके पीछे के कई यात्री इसकी चपेट में आ गए, जिसके कारण यह दुखद घटना घटित हुई. इस हादसे की उच्च सदस्यीय कमेटी द्वारा जांच की जा रही है."
वहीं डीसीपी रेलवे केपीएस मल्होत्रा ने पत्रकारों को बताया, "कुछ ट्रेन डिले हो गईं थीं और कुछ लोगों ने प्रयागराज जाने के लिए अतिरिक्त टिकट ख़रीदे थे जिसकी वजह से भीड़ अधिक इकट्ठा हो गई थी. भीड़ का अंदाज़ा हमने लगाया था. ये सब दस मिनट के भीतर हुआ. अधिक लोग पहुंचे, दो ट्रेन लेट हो गईं. रेलवे इस घटना की पूरी जांच करेगा तभी कारण पता चल सकेगा."
हालांकि उन्होंने ट्रेन का प्लेटफ़ॉर्म बदले जाने की पुष्टि ना करते हुए कहा, "रेलवे की स्पेशल ट्रेन की घोषणा ज़रूर हुई थी लेकिन ट्रेन का प्लेटफ़ॉर्म बदलने की जानकारी अभी हमारे सामने नहीं आई है."
जब उनसे पूछा गया कि शाम से ही भीड़ बढ़ रही थी, ऐसे में एहतियात क्यों नहीं बरता गया तो उन्होंने कहा, "शाम छह बजे के आसपास हालात सामान्य थे. एक जगह पर अधिक लोगों की वजह से भगदड़ मची. अफ़वाह भी भगदड़ का कारण हो सकती है, ये जांच के बाद ही पता चलेगा."
सुबह होते-होते नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से भगदड़ के निशान मिट चुके थे. भारी पुलिस बल और एंबुलेंसों की मौजूदगी को छोड़ दिया जाए तो यहां सबकुछ सामान्य दिखाई दे रहा था. आम दिनों की तरह यात्री स्टेशन पर आ रहे थे, इनमें से अधिकतर प्रयागराज कुंभ जा रहे थे. यहां आने वाले अधिकतर यात्रियों को ये तक नहीं पता था कि बीती रात हुई भगदड़ में 18 लोगों की मौत हो गई है.
स्टेशन के सभी प्लेटफ़ॉर्मों को साफ कर दिया गया था. जो जूते-चप्पल, बैग और सामान छूट गया था उसे यहां से हटाया जा चुका था. प्रयागराज जाने वाले लोगों के आने का सिलसिला जारी था, हालंकि इसमें कुछ कमी ज़रूर दिखाई दे रही थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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