खनौरी बॉर्डर पर किसान की मौत के बाद अब आगे क्या?

- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, शंभू बार्डर, पंजाब
केंद्र सरकार और आंदोलनकारी किसानों के बीच अब तक सुलह का कोई रास्ता नहीं निकल पाया है.
बुधवार को एक युवा की गोली लगने से मौत होने के बाद स्थिति और जटिल हो गई है. हालांकि, गोली किसकी तरफ़ से चली, इसकी जांच जारी है.
किसान नेता सरवन सिंह पंढेर ने दावा किया है कि खनौरी पर सुरक्षाबलों की गोली में एक किसान युवक की मौत हो गई है और 15 घायल हुए हैं.
पंढेर के मुताबिक़, घायलों में तीन की हालत गंभीर है. उन्होंने यह भी दावा किया गया कि पुलिस दो आंदोलनकारी किसानों को उठाकर ले गई है.
वहीं, हरियाणा सरकार ने किसान की मौत की बात को अफ़वाह बताया है.
किसान नेताओं ने क्या कहा?

किसान नेता रमनदीप सिंह मान ने बीबीसी से कहा, “देखिए हम बातचीत को तैयार थे, उसका इनाम हमें ये मिला कि हमारे एक युवा किसान को मार दिया गया.”
केंद्रीय कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा ने किसान नेताओं को पांचवे दौर की बातचीत का न्योता दिया था.
दोनों पक्षों में आगे की बात भले ही थम गई हो लेकिन सरवन सिंह पंढेर ने ऐलान किया है कि अगले दो दिनों यानी शुक्रवार तक के लिए 'दिल्ली चलो' अभियान रोक दिया गया है.
इस मामले में जहां एक ओर आगे की बातचीत की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं.
वहीं, दूसरी ओर बुधवार को हरियाणा की ओर मौजूद सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारी किसानों पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए.
सुरक्षाबलों पर किसान आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ रबर की बुलेट्स के इस्तेमाल से जुड़े आरोप भी लग रहे हैं.
बुधवार को मरने वाले युवक की मौत भी सिर पर गोली लगने से हुई. पटियाला ज़िले के सरकारी अस्पताल राजिंदरा हॉस्पिटल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ हरनाम सिंह रेखी ने बुधवार को ही बताया था कि मौत का प्राथमिक कारण सिर के पीछे गोली लगना है.
शंभू बार्डर पर किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल की तबियत ख़राब होने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.
किसानों ने दावा किया कि आंसू गैस की वजह से उनकी हालत ख़राब हुई.
युवा किसान बातचीत के हक़ में नहीं

पिछले आंदोलन (2020-21) के समय भी हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार ने किसानों को रोकने के लिए नाकेबंदी की थी.
उस वक्त किसी को अंदाज़ा नहीं था कि किसानों का आंदोलन 14 महीने तक खिंच जाएगा. बाद में जिन तीन कृषि क़ानूनों का किसान विरोध कर रहे थे उन्हें नरेंद्र मोदी सरकार ने वापस ले लिया था.
युवा प्रदर्शनकारी बातचीत के हक़ में नहीं हैं.
कई युवा किसान नेता सुरक्षाबलों के रवैये को आक्रामक क़रार देते हैं और इसी के आधार पर वो सरकार से बातचीत के हक़ में भी नहीं हैं.
पेशे से ड्राइवर बलराज नाम के एक किसान परिवार के युवक ने कहा, “जब मालूम है कि सरकार बातचीत के नाम पर सिर्फ टालमटोल कर रही है तो ये लोग बार-बार उन्हीं के साथ फिर से बात करने को क्यों तैयार हो जाते हैं?”
लोगों को ये लग रहा है कि सरकार की बार-बार बैठकों के बीच चुनाव का समय आ जाएगा और फिर आचार संहिता की बात कहकर सरकार कोई भी वायदा नहीं करेगी
बुधवार दोपहर बाद जब सुरक्षाबलों की तरफ़ से आंसू गैस के गोले छोड़े गए तो कई युवाओं ने ट्रैक्टरों को उस पुल के बिलकुल पास ले जाकर खड़ा कर दिया जिसके दूसरी ओर पुल पर नाकेबंदी के पीछे हरियाणा पुलिस और सुरक्षाबल के लोग खड़े थे.
किसान नेता चिंतित

दिन-ब-दिन तनावपूर्ण होती स्थिति को लेकर किसान नेताओं के चेहरे पर चिंता की लकीरें हैं क्योंकि वो भी मानते हैं कि बॉर्डर पार करने की कोशिश के दौरान सुरक्षाबलों से अगर उनकी भिडंत होती है तो उनहा की नुकसान ज़्यादा होगा.
सरवन सिंह पंढेर ने अपने एक बयान में कहा भी है, “हम ऐसा कोई क़दम नहीं उठाएंगे जिससे शंभू बार्डर पर भी वहां (खनौरी) वाला हाल हो.”
एक किसान नेता का कहना था कि “हमें थोड़े ही शौक है बैरिकेडिंग तोड़ने का, हमें नुक़सान का भी पता है.”
चंडीगढ़ स्थित पत्रकार संदीप सिंह पुनयाब कहते हैं किसान नेताओं की दिक्क़त है वो सीधे नहीं कह सकते कि नुक़सान होगा इसलिए हम आगे नहीं जाएंगे क्योंकि इससे एक दूसरे एक वर्ग को लग रहा है कि नेता कमज़ोर पड़ रहे हैं.
पुनयाब का मानना है कि किसान नेता फिलहाल दबाव में हैं. यहीं रहकर आंदोलन कितना लंबा चल सकेगा ये कहना मुश्किल है, सरकार उन्हें आगे बढ़ने देने को राज़ी नहीं है, और जिस तरह की तनावपूर्ण स्थिति बनी है उसमें वार्ता कैसे जारी रहेगी.
इन सभी बातों को लेकर बुधवार देर रात तक बैठकों का दौर जारी रहा. गुरुवार को किसान नेताओं ने इन सब बातों पर चर्चा के लिए फिर से बैठकें बुलाई हैं.
अब तक केंद्रीय मंत्रियों के साथ हुई चार दौर की बैठकों में किसान किसी भी तरह का आश्वासन हासिल नहीं कर पाए हैं जिसे लेकर वो समर्थकों के बीच जा सकेंगे.
किसान 23 फ़सलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग कर रहे हैं जबकि केंद्र सरकार उन्हें महज़ पांच और पैदावारों पर एमएसपी देने की बात कह रही है. इसी को लेकर गतिरोध जारी है.
लंबा चला किसान आंदोलन

पिछली बैठक में नरेंद्र मोदी सरकार की तरफ़ से उन्हें तीन दलहन फ़सल, कपास और मक्का पर एमएसपी देने की बात कही गई है.
किसान बार-बार ये याद दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि पिछले आंदोलन के बाद जब कृषि क़ानून वापिस लिए गए थे और एमएसपी पर समिति का गठन हुआ था, उसका आगे क्या हुआ ये आमतौर पर लोगों को मालूम नहीं है.
मगर दो साल पहले किसान आंदोलन में तीस से अधिक संगठन शामिल थे लेकिन इस बार उनमें से 10-12 यूनियन के लोग ही शामिल हैं और सरकार को इस बात का अंदाज़ा है.
ख़ासतौर पर बदले हालात में जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों और किसानों के नेता माने जाने वाले परिवार के जयंत चौधरी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के क़रीब जाते दिख रहे हैं.
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