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हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सुक्खू सरकार छह विधायकों के जाने के बाद कितनी सुरक्षित है?- प्रेस रिव्यू
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के छह विधायकों की क्रॉस वोटिंग के बाद संकट में फँसी सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार के लिए फ़िलहाल थोड़ी राहत दिख रही है.
आज के अख़बारों ने हिमाचल प्रदेश के इस राजनीतिक संकट को प्रमुखता से छापा है.
‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने इस राजनीतिक घटनाक्रम की विस्तृत रिपोर्टिंग की है.
हिमाचल प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने कांग्रेस के इन छह विधायकों को विधानसभा के बजट सत्र में पार्टी व्हिप के उल्लंघन करने के मामले में अयोग्य क़रार दिया है.
इन छह विधायकों के अयोग्य घोषित होने के बाद हिमाचल विधानसभा में विधायकों की संख्या 68 से 62 हो गई है. फ़िलहाल कांग्रेस के 34 और बीजेपी के 25 सदस्य हैं. यानी 62 सदस्यों की स्थिति में कांग्रेस के पास सामान्य बहुमत है.
अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के पर्यवेक्षकों और राज्य के कांग्रेस नेताओं की बैठक के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने छह सदस्यीय समन्वय समिति बनाने का फ़ैसला किया है.
समिति को कांग्रेस की राज्य इकाई में मतभेद दूर करने का जिम्मा दिया गया है.
कमिटी में मुख्यमंत्री सुक्खू और पार्टी की राज्य प्रमुख प्रतिभा सिंह दोनों हैं. दोनों ने गुरुवार की शाम संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की.
लेकिन अख़बार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि ये संधि अस्थायी ही लग रही है.
सुक्खू ने कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी की हार की ज़िम्मेदारी ले ली है.
फौरी राहत
अख़बार के मुताबिक़ कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से जुड़े सूत्रों का कहना है कि ये राज्य सरकार और सुक्खू दोनों के लिए फ़िलहाल थोड़ी राहत की बात है.
प्रतिभा सिंह और उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह पार्टी नेतृत्व की ओर से समन्वय समिति बनाने के फ़ैसले से ज़्यादा ख़ुश नहीं हैं और उन्होंने इसे अनमने ढंग से ही स्वीकार किया है.
एआईसीसी के पर्यवेक्षक डीके शिवकुमार ने कहा है कि विक्रमादित्य सिंह ने कैबिनेट से अपना इस्तीफ़ा वापस ले लिया है.
अख़बार के मुताबिक़ कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के ज़्यादातर नेताओं का मानना है कि सुक्खू राज्य में ज्यादातर पार्टी विधायकों का विश्वास खो चुके हैं.
लेकिन सूत्रों का मानना है कि अब भी उन्हें राहुल गांधी का समर्थन हासिल है. उनके मुताबिक़ शुक्रवार को राहुल के विदेश से लौटने के बाद इस मुद्दे पर उनसे चर्चा होगी.
हालांकि गुरुवार को शिमला में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान डीके शिवकुमार ने कहा कि राज्य में कांग्रेस की सरकार ही रहेगी और सुखविंदर सिंह ही हमारे मुख्यमंत्री रहेंगे.
छह सदस्यीय समन्वय समिति बनाने का एलान करते हुए उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने पार्टी के राज्यसभा उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी की हार की ज़िम्मेदारी ले ली है.
सुक्खू और प्रतिभा सिंह के परिवार की राजनीतिक दुश्मनी
‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने सुक्खू सरकार पर मंडरा रहे राजनीतिक संकट के पीछे सुक्खू और प्रतिभा सिंह के परिवार बीच पुराने राजनीतिक दुश्मनी का भी ज़िक्र किया है.
प्रतिभा सिंह के दिवंगत पति वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश के छह बार मुख्यमंत्री रहे हैं.
अख़बार ने लिखा है कि जब पीडब्ल्यूडी मंत्री और वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह ने सुक्खू पर अपने पिता के अपमान का आरोप लगाते हुए कैबिनेट से इस्तीफ़ा दिया तो शायद ही किसी को आश्चर्य हुआ होगा.
अख़बार के मुताबिक़ सीएम सुक्खू और विक्रमादित्य सिंह के बीच राजनीतिक दुश्मनी काफ़ी पुरानी है. एक वक़्त था जब विक्रमादित्य सिंह के पिता वीरभद्र सिंह सार्वजनिक तौर पर सुक्खू को फटकार लगाने से भी बाज नहीं आते थे.
उन्होंने 2017 में राज्य में कांग्रेस की हार के लिए भी सुक्खू को ज़िम्मेदार करार दिया था.
वीरभद्र सिंह का कहना था कि सुक्खू में संगठन क्षमता नहीं है और उन्होंने ऐसे लोगों को ज़िला पदाधिकारी बना दिया, जिनका कोई राजनीतिक वजूद ही नहीं है.
लेकिन सुक्खू ने पलटवार करते हुए वीरभद्र सिंह पर विपक्ष की नीतियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था.
सुक्खू ने कहा था,‘’ वीरभद्र जी पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं के विरोधी हैं. वो पूर्व मुख्यमंत्री रामलाल ठाकुर, केंद्रीय मंत्री सुखराम और वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा और विद्या स्टोक्स का विरोध करते हैं.’’
अख़बार ने राजनीतिक विज्ञानी डॉ. हरीश ठाकुर के हवाले से लिखा है कि वीरभद्र और सुक्खू के बीच अदावत इस कदर थी कि पूर्व मुख्यमंत्री ने उन्हें कभी भी कोई पद नहीं दिया. यहां तक कि उन्हें किसी कमिटी का चेयरमैन तक बनने नहीं दिया.
हिमाचल की राजनीति के जानकारों का कहना है कि वीरभद्र सिंह सुक्खू से इसलिए चिढ़ते थे कि क्योंकि वो उनके प्रतिद्वंद्वी सुखराम के नज़दीकी थी.
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि दोनों के बीच टकराव उनकी अलग-अलग पृष्ठभूमि की वजह से भी है.
वीरभद्र सिंह का ताल्लुक राजपरिवार से था और कई लोगों की राय थी कि वो मुंह में ‘सोने का चम्मच लेकर’ पैदा हुए थे. वहीं सुक्खू के पिता हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम में बस ड्राइवर थे. सुक्खू युवावस्था में छोटा शिमला में दूध बेचने का काम करते थे.
दोनों का राजनीतिक सफर भी अलग-अलग रहा है. वीरभद्र सिंह ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बनाई और सिर्फ़ 28 साल की उम्र में सांसद बन गए .
वहीं सुक्खू ने कांग्रेस में छोटे कार्यकर्ता से काम शुरू किया. अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत मे वो कांग्रेस के स्टूडेंट विंग एनएसयूआई से जुड़े रहे. 1998 में वो राज्य में यूथ कांग्रेस के प्रमुख बने.
वीरभद्र सिंह और उनके उम्र का भी काफ़ी फासला था. जहाँ वीरभद्र हमेशा हाईकमान के साथ खड़े दिखे वहीं सुक्खू ने राजीव शुक्ला, आनंद शर्मा और राहुल गांधी के साथ अपने रिश्तों को मज़बूत करते रहे.
2013 में वीरभद्र सिंह सुक्खू को हिमाचल प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने की कोशिशों से नाराज़ थे. उस समय की हिमाचल कांग्रेस प्रभारी रजनी पाटिल की ओर से बुलाई गई बैठकों में वीरभद्र शामिल नहीं हुए थे.
2012 में नदौन सीट से विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी वीरभद्र सिंह सुक्खू के ख़िलाफ़ अड़े रहे. आखिरकार सुक्खू की जगह कुलदीप सिंह राठौड़ को अध्यक्ष बनाया गया.
2022 में जब कांग्रेस बीजेपी हरा कर सत्ता में आई तब तक हालात काफ़ी बदल चुके थे. वीरभद्र का एक साल पहले निधन हो चुका था.
लेकिन इस बार भी वीरभद्र सिंह की पत्नी और विक्रमादित्य की माँ प्रतिभा सिंह मुख्यमंत्री बनना चाहती थीं. उनका कहना था कि कांग्रेस को वीरभद्र सिंह की विरासत पर जीत मिली है
लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि सुक्खू ज्यादातर विधायकों को अपने पाले में करने में सफल रहे. वहीं कांग्रेस भी ये संदेश देना चाह रही थी कि वो राज परिवार के किसी व्यक्ति के बजाय बजाय आम आदमी को मुख्यमंत्री बनाना चाहती है.
लेकिन वीरभद्र सिंह के निधन के बाद भी हिमाचल कांग्रेस में अंदरूनी झगड़े रुके नहीं हैं. विक्रमादित्य सिंह अक्सर सुक्खू के विरोध में आवाज़ उठाते रहे हैं. पिछले महीने भी प्रतिभा सिंह ने चेतावनी दी थी कि पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और कई विधायक ख़ुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं.
सुक्खू पर उन्होंने आरोप लगाया था कि वो वीरभद्र सिंह के वफ़ादारों को एक-एक कर किनारे करते जा रहे हैं. दो बागी विधायकों राजिंदर राणा और सुधीर शर्मा ने भी सीएम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी.
क्या ‘ऑपरेशन कमल’ और ज़ोर पकड़ेगा
अंग्रेजी अख़बार ‘ ट्रिब्यून’ ने भी लिखा है कि हिमाचल में सुक्खू सरकार पर मंडरा रहे संकट के बादल तो फ़िलहाल तो टलते दिख रहे हैं लेकिन ये हालात कब तक रहेंगे कहा नहीं जा सकता.
अख़बार लिखता है कि राज्यसभा में कांग्रेस के उम्मीदवार की शर्मनाक हार के बाद सुक्खू सरकार पर जो संकट आया, उसे पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक फ़िलहाल दूर करने में जुटे हैं.
लेकिन राज्य में कांग्रेस में गुटबाजी की वजह से जिन छह विधायकों को अयोग्य घोषित किया गया, उसने राजनीतिक हालात और पेचीदा हो गए हैं.
अख़बार लिखता है कि विधानसभा के स्पीकर कुलदीप पठानिया ने कांग्रेस के सभी छह विधायकों के वकीलों की दलीलों को सुनने के बाद उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया. हिमाचल के राजनीतिक इतिहास में इस तरह का ये पहला मामला है.
अख़बार लिखता है कि कांग्रेस के छह विधायकों की अयोग्यता ने पार्टी के अंदर असंतोष और बढ़ेगा . कहा जा रहा है कि इससे ये विधायक बीजेपी की ओर जा सकते हैं और उसके ‘ऑपरेशन कमल’ को और मज़बूती मिल सकती है.
कांग्रेस के छह विधायकों को अयोग्य घोषित किए जाने के बीच राज्य में विधायक के दो बार बैठकें कर चुके हैं. बीजेपी में अब और उत्साह दिख रहा है. बीजेपी के पास 25 विधायक हैं लेकिन राज्यसभा चुनाव में अपने कैंडिडेट हर्ष महाजन को जिताने के बाद वो और ताक़तवर दिख रहे हैं.
प्रतिभा सिंह और उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह बग़ावत पर उतर आए थे लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय पर्यवेक्षक डीके शिवकुमार, भूपेश बघेल और भूपिंदर सिंह हुड्डा ने फ़िलहाल किसी तरह उन्हें समझा-बूझा कर शांत किया है.
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