हेमंत सोरेन और के. कविता पर आए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के निचली अदालतों के लिए क्या मायने हैं?

सुप्रीम कोर्ट

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए

सुप्रीम कोर्ट की दो बेंचों ने हाल के दिनों में ऐसे आदेश जारी किए हैं जो निचली अदालतों के लिए एक संदेश की तरह हैं. संदेश ये कि ख़ास तौर से ज़मानत देने के मामलों में अदालतों को अपने नज़रिए में बदलाव लाना चाहिए.

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) की नेता के. कविता के ज़मानत के मामले में जिस तरह से जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथ की पीठ ने आदेश दिया, उसकी सराहना हो रही है. साथ ही बेंच ने इस मामले में कड़ी टिप्पणियों को भी संज्ञान में लिया.

ऐसा ही आदेश जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनाया है. ये फ़ैसला कोर्ट ने 11 महीनों से जेल में बंद गुजरात के एक शख्स को हाल ही में ज़मानत देते वक्त सुनाया. इसकी भी सराहना हो रही है.

किसी मामले की सुनवाई कैसे हो और इसे किस तरह से देखा जाए, ख़ास तौर से प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई जिस मामले में जुड़े हों, उनको लेकर क़ानून के पेशे में अलग-अलग राय है.

ये राय सकारात्मक से लेकर आलोचना तक जाती है, लेकिन एक बात और भी मानी जा रही है कि लोकतांत्रिक बदलाव न्यायपालिका के नज़रिए में भी बदलाव लाएंगे, फिर चाहे वो कम और न के बराबर ही क्यों न हों.

मद्रास हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस डी हरिपरन्थमन बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "देश में होने वाले लोकतांत्रिक परिवर्तनों के लिए न्यायपालिका अपवाद नहीं है."

हेमंत सोरेन

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इमेज कैप्शन, हेमंत सोरेन को ईडी फरवरी 2024 में कोर्ट लेकर जाते हुए

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से निचली अदालतों को दिए गए इस संदेश का मतलब क्या है? क्या ये संदेश है कि निचली अदालतों को हमेशा सत्ता के पक्ष में नहीं दिखना चाहिए या ये व्यापक तौर पर चली आ रही समस्या की तरफ एक संकेत है?

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्तासंजय हेगड़े बीबीसी हिन्दी से कहते हैं, "आप इस बात पर गौर कीजिए कि बेंच में कौन-कौन हैं. बेंच में भविष्य के दो चीफ़ जस्टिस हैं."

"जस्टिस गवई भारत के अगले चीफ़ जस्टिस बनने वाले हैं और पांच साल बाद जस्टिस विश्वनाथन चीफ़ जस्टिस हो सकते हैं. ऐसे में भविष्य के दो चीफ़ जस्टिस का लंबे समय के लिए नज़रिया कुछ ऐसा है. इसलिए निचली अदालतों को इस संदेश को सही तरीके से समझना चाहिए."

सोरेन और कविता का मामला

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जस्टिस गवई और जस्टिस विश्वनाथन की पीठ ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में झारखंड हाई कोर्ट से मिली ज़मानत को बरकरार रखा. वहीं, दिल्ली हाई कोर्ट का फै़सला पलटते हुए कथित शराब नीति घोटाला मामले में कोर्ट ने के. कविता को ज़मानत दे दी.

सोरेन छह महीने और कविता पांच महीने से जेल में बंद थे. झारखंड हाईकोर्ट ने सोरेन को ज़मानत देते हुए कहा था कि मनी लॉन्ड्रिंग मामले में वो दोषी नहीं हैं, सुप्रीम कोर्ट ने इसे 'तर्कसंगत' पाया.

जब एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने दलील दी कि ईडी के पास सबूत हैं. इसके जवाब में जस्टिस गवई ने कहा, "इसकी बजाय, भानु प्रताप से ज़ब्त किए गए सभी रिकॉर्ड में प्रतिवादी (सोरेन) को दोषी ठहराने वाला कुछ भी नहीं है."

इस दौरान जस्टिस गवई ने चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा था, "ज़मानत देने का मामला आते ही ट्रायल कोर्ट सुरक्षित तरीक़ा देखने लगते हैं."

के. कविता के मामले में जस्टिस गवई ने कहा, "अभियोजक को निष्पक्ष होना चाहिए. एक व्यक्ति जो खुद को दोषी मानता है, उसे गवाह बना दिया जाता है! कल आप किसी को भी ला सकते हैं? आप अभियुक्त चुन नहीं सकते. ये कैसी निष्पक्षता है? आपने विवेक का इस्तेमाल किया है?"

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वहीं जस्टिस विश्वनाथन ने कहा, "अगर किसी दूसरे पर आरोप लगाने के लिए केवल सह-अभियुक्त के बयान का भरोसा किया जा सकता है तो स्वतंत्र सबूतों के अभाव में 'अप्रूवर' के बयान की भी पुष्टि ज़रूरी है."

इसके एक दिन बाद यानी 28 अगस्त को जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने एक मामले में एक ऐसे शख़्स को जमानत दी जिस पर धोखाधड़ी और ठगी का आरोप था.

ये अभियुक्त मई 2023 से जेल में था, लेकिन उस पर आरोप तय नहीं हुए था. उस पर किए गए 14 मामलों में से 9 में या तो उसे बरी कर दिया गया था या मामलों को रद्द कर दिया गया था. गुजरात हाई कोर्ट ने उसकी कई ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी थीं.

जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा, "इसमें कोई विवाद नहीं है कि ये मामला मजिस्ट्रेट की सुनवाई योग्य है. गुजरात हाई कोर्ट को ज़मानत दे देनी चाहिए थी."

एक अन्य केस में अभय एस. ओका और जॉर्ज मसीह ने कहा था, "ज़मानत एक नियम है और जेल एक अपवाद, यहां तक कि गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए एक्ट) में भी."

हाई कोर्ट और निचली अदालत जमानत क्यों नहीं दे रहे?

प्रीवेन्शन ऑफ़ मनी लॉड्रिंग (पीएमएलए) और यूएपीए के मामलों को देखने वाले सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी हिन्दी से कहा, "इन मामलों में, आमतौर पर माना जाता है कि ज़मानत सबसे आख़िर में दी जाती है."

"ऐसे मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ज़मानत देने से मना नहीं करना चाहिए. ऐसा लगता है कि पिछले चुनाव से पहले तक कोर्ट ये सोचते थे कि अगर मामला ईडी या सीबीआई का है, तो अभियुक्त को हिरासत में रखना चाहिए."

उन्होंने कहा, "लगभग हर दिन सुप्रीम कोर्ट की हर बेंच के सामने ज़मानत के मामले पेश होते हैं, जो ये दिखाते हैं कि हाईकोर्ट से ज़मानत नहीं मिल रही है. मुझे लगता है कि बेंच हाई कोर्ट को संदेश देना चाहती है."

लाल लाइन

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आख़िर ऐसा क्या हुआ?

विधि सेंटर फ़ॉर लीगल पॉलिसी के सह संस्थापक और वकील आलोक प्रसन्ना कुमार ने बीबीसी से बात करते हुए इसके तीन कारण बताए.

उन्होंने कहा, "पिछले दशक में हमने देखा है कि जब जजों के सामने हाई प्रोफ़ाइल मामले आते हैं तो वो घबरा जाते हैं. हर कोई मानता है कि अगर आप ज़मानत से मना करते हैं तो 'आपको ईमानदार माना जाता है', लेकिन कई अन्य मामलों में बिना सोचे ज़मानत दे दी जाती है."

"दूसरा कारण ये है कि हम ट्रायल कोर्ट के जजों का आकलन करने के मामले में औपनिवेशिक दौर की मानसिकता रखते हैं. हम ये देखते हैं कि कितने मामलों का निपटारा किया गया या फिर कितनों को ज़मानत दी गई. दुर्भाग्य से प्रदर्शन को आंकने के उचित मापदड नहीं है. ये लगातार चलने वाले आकलन, जजों पर भी दबाव डालते हैंं."

"तीसरा कारण, सुप्रीम कोर्ट में कॉलेजियम के कामकाज से जुड़ा है."

आलोक प्रसन्ना कुमार कहते हैं, "कॉलेजियम केवल नाम मात्र का रह गया है, क्योंकि केंद्र सुझाए गए नामों को मंजूरी नहीं देता या मंज़ूरी देता है तो उसमें सालों लग जाते हैं. तब तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले लेते हैं. आज स्थिति ये है कि केंद्र, कॉलेजियम से नाम भेजने के लिए कहता है. हर कोई जानता है अगर आप सरकार के क़रीबी हैं तो आपकी नियुक्ति हो सकती है."

संजय हेगड़े इस बात को समझाते हुए कहते हैं, "हां, ये ज़िम्मेदारी से भागने का एक तरीका है. निचली अदालत को लगता है कि उनके पास कोई संवैधानिक संरक्षण नहीं है. सत्ता पक्ष उन्हें हटाए नहीं, बस एक नोटिफ़िकेशन काफी है."

वो कहते हैं, "किसी ने मुझसे एक बार कहा था कि जब आपको कोई आदेश दिया जाता है, आप वो पसंद नहीं करते. लेकिन अगर आप पहले से किसी आदेश की उम्मीद कर रहे हों तो आप समझ जाते हैं. इसलिए बहुत से लोग पहले से ये समझते हैं कि ऐसा किया तो ऐसा हो सकता है. तो ऐसा क्यों करें?"

दूसरे शब्दों में कहें तो कोई भी जोख़िम नहीं उठाना चाहता.

के कविता

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असल क़ानूनी मुद्दा

गुजरात हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद याग्निक बीबीसी हिन्दी से कहते हैं, "जब भी भारी बहुमत की सरकार होती है, सत्ता के संतुलन बिगड़ता है और लोकतंत्र के दो अन्य स्तंभ अलग-अलग तरीके़ से काम करते हैं, जैसा इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कार्यकाल के दौरान हुआ था."

"डॉ. बीआर आंबेडकर ने भी संविधान सभा में सत्ता के संतुलन को लेकर चर्चा की थी. आप देखेंगे कि बहुमत की सरकार जब पिछले दशकों में नहीं थी तो सुप्रीम कोर्ट काफी शक्तिशाली था, लेकिन पिछले दशक में यह आमने-सामने की स्थिति में नहीं था."

लेकिन आनंद याग्निक एक क़ानूनी बाधा की तरफ भी इशारा करते हैं जिस वजह से निचली अदालत पीएमएलए मामलों में ज़मानत देने में सावधानी बरतती हैं. जस्टिस ए.एम. खानविलकर वाली तीन जजों की एक बेंच ने निर्दोष साबित करने की ज़िम्मेदारी अभियुक्त पर डाली थी.

याग्निक कहते हैं, "जब ज़िम्मेदारी दूसरे पक्ष पर डाल दी जाती है तो पीएमएलए और यूएपीए जैसे क़ानूनों के ग़लत इस्तेमाल की संभावना होती है. सीबीआई जैसी दूसरी जांच एंजेसियों से ईडी अधिक शक्तिशाली हो गई है. सिर्फ़ इतना ही नहीं ईडी और सीबीआई दोनों किसी को कैसे गिरफ़्तार कर सकते हैं (जैसा कि के. कविता के मामले में हुआ). ये अनुच्छेद 20 और 21 का उल्लंघन है."

जस्टिस डी हरिपरन्थमन कहते हैं, "वटाली जजमेंट (जस्टिस खानविलकर का दिया फ़ैसला) जब तक पांच सदस्यीय या सात सदस्यीय जजों की बेंच नहीं बदलती, तब तक निचली अदालत के लिए किसी को ज़मानत देना जोखिम भरा है."

इस बारे में समीक्षा याचिका जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने पेश हुई थी जिन्होंने इसे संक्षेप में सुना. उनके रिटायरमेंट के बाद, समीक्षा याचिका पर सुनवाई नहीं हुई है.

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