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वायुसेना प्रमुख का बयान क्या भारत के लिए चिंता बढ़ाने वाला है?
- Author, संदीप राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के वायुसेना प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने गुरुवार को महत्वपूर्ण डिफ़ेंस सिस्टम की ख़रीद और उसकी डिलीवरी में हो रही देरी पर चिंता ज़ाहिर करते हुए घरेलू रक्षा क्षेत्र पर कुछ गंभीर सवाल खड़े किए.
एक कार्यक्रम में उन्होंने किसी भी डिफ़ेंस प्रोजेक्ट के समय से पूरा न होने का ज़िक्र किया और घरेलू डिफ़ेंस डील पर कुछ अहम बातें कहीं.
भारतीय वायुसेना सैन्य हार्डवेयर की कमी से लंबे समय से जूझ रही है और उसके पास अत्याधुनिक स्टेल्थ विमान नहीं हैं. भारतीय रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में 'पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ' लड़ाकू विमानों के घरेलू उत्पादन को मंज़ूरी दी है. लेकिन अभी इसके बनने और फिर तैनाती में काफ़ी वक्त है.
वायुसेना प्रमुख के बयान का पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल वीआर चौधरी (रिटायर्ड) ने समर्थन किया है.
समाचार चैनल एनडीटीवी से बात करते हुए एयर चीफ़ मार्शल वीआर चौधरी (रिटायर्ड) ने कहा, "जिन लोगों को आप ऑर्डर देते हैं, उनसे ठोस आश्वासन लेने की ज़रूरत है कि वादे के मुताबिक़ तय सीमा के भीतर काम पूरा करेंगे. यदि वे काम पूरा करने में विफल रहते हैं, या अगर उन्होंने हमें कुछ साल पहले बताया होता कि हम समय-सीमा में काम पूरा नहीं कर पाएंगे, तो शायद वैकल्पिक रास्ते खोजे जा सकते थे."
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि रक्षा ख़रीद और डिलीवरी में एक लंबा गैप और तय समय से कई गुना ज़्यादा देरी के कारण हताशा बढ़ रही है और एयर चीफ़ मार्शल का बयान इसी को दर्शाता है.
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पिछले महीने 22 अप्रैल को जम्मू और कश्मीर के पहलगाम में हुए चरमपंथी हमले और सात मई को पाकिस्तान के अंदर भारत के हवाई हमले के बाद दोनों देश आमने-सामने आ गए थे. 10 मई को संघर्ष विराम पर सहमति बनने से पहले चार दिनों तक दोनों ओर से ड्रोन, मिसाइल से हमले और सीमा पर भारी गोलाबारी हुई.
चार दिन की इस सैन्य झड़प के बाद भारत में रक्षा तैयारियों को तेज़ करने पर चर्चा ने ज़ोर पकड़ लिया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि एयर चीफ़ मार्शल के बयान को भारत की तैयारियों में और अधिक फुर्ती लाने की ज़रूरत के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.
एयर चीफ़ मार्शल ने क्या कहा?
गुरुवार को कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज़ (सीआईआई) के सालाना बिज़नेस सम्मेलन में बोलते हुए एयर चीफ़ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने कहा कि 'ऐसा एक भी प्रोजेक्ट नहीं है, जो समय पर पूरा हुआ हो.'
एयर मार्शल ने कहा, "हमें डील पर साइन करते वक़्त ही ये पता होता है कि वो चीज़ें समय पर कभी नहीं आएंगी. समय सीमा एक बड़ा मुद्दा है और मुझे तो ये लगता है कि एक भी परियोजना अपने तयशुदा समय पर पूरी नहीं हुई है. हम ऐसा वादा क्यों करें जो पूरा नहीं हो सकता?"
दिल्ली में हुए इस सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा, "हम सिर्फ 'मेक इन इंडिया' की बात नहीं कर सकते. अब वक़्त है 'डिज़ाइन इन इंडिया' का भी."
भारत सरकार स्वदेशी हथियार विकसित करने की कोशिश में लगी है. लेकिन अभी भी भारत के हथियारों का बड़ा हिस्सा विदेश से आता है. कई बार इनकी ख़रीद के फ़ैसले और डिलीवरी में देरी हो जाती है. एयर चीफ़ मार्शल इसी संदर्भ में बात कर रहे थे.
उन्होंने कहा, "कांट्रैक्ट पर हस्ताक्षर करते हुए, हमें यक़ीन होता है कि यह जल्द अमल में नहीं आने जा रहा लेकिन हम ये सोचकर इस पर हस्ताक्षर करते हैं कि आगे क्या करना है, बाद में देखेंगे. स्वाभाविक रूप से प्रक्रिया पटरी से उतर जाती है."
एयर चीफ़ मार्शल के इस बयान को 83 हल्के लड़ाकू विमान तेजस एमके 1ए की डिलीवरी में देरी के संदर्भ में देखा जा रहा है जिसके लिए हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से साल 2021 में क़रार हुआ था.
एचएएल से ही भारतीय वायुसेना ने 70 एचटीटी-40 बेसिक ट्रेनर विमान की ख़रीद पर भी समझौता किया था, जिनकी तैनाती इसी साल सितंबर में तय है.
एयर चीफ़ मार्शल ने कहा, "जहां तक एयर पॉवर का सवाल है, हमारा फ़ोकस इस बात पर है कि हमारे पास क्षमता और सामर्थ्य हो. हम सिर्फ भारत में उत्पादन के बारे में बात नहीं कर सकते, हमें भारत में ही डिज़ाइनिंग और डेवलपमेंट का काम शुरू करने ज़रूरत है."
उन्होंने रक्षा बलों और उद्योग के बीच भरोसा और खुले संवाद की ज़रूरत पर बल देते हुए कहा, "जहां तक मेक इन इंडिया प्रोग्राम की बात है, आईएएफ़ अपनी पूरी कोशिश लगा रही है."
उन्होंने कहा कि पहले आईएएफ़ बाहरी चुनौतियों पर अधिक ध्यान दे रही थी लेकिन मौजूदा हालात ने उसे यह बात महसूस कराई है कि आत्मनिर्भरता ही एकमात्र समाधान है.
उन्होंने कहा, "अब हमें भविष्य के लिए तैयार होने के लक्ष्य से तैयारी करने की ज़रूरत है. यही चिंता है. हो सकता है कि अगले 10 सालों में भारतीय उद्योग और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और अधिक उत्पादन करें लेकिन आज जिस चीज़ की ज़रूरत है, वह आज की ज़रूरत है."
उनका कहना कि अभी तैयार हो रही चीज़ों के लिए थोड़ी तेज़ी वाले 'मेक इन इंडिया' प्रोग्राम की ज़रूरत है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
रक्षा मामलों के जानकार राहुल बेदी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि 'रक्षा मंत्रालय में जो सिस्टम चल रहा है, उससे सैन्य बलों में भी हताशा है क्योंकि समय की कोई पाबंदी नहीं है.'
राहुल बेदी कहते हैं, "किसी भी रक्षा समझौते की प्रक्रिया में ये स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कॉन्ट्रैक्ट शुरू होने के बाद प्रोजेक्ट को 36 से 40 महीने में पूरा हो जाना चाहिए. इस दौरान 12 चरण से होकर गुज़रना पड़ता है और हर चरण में कोई न कोई रुकावट और देरी होती है. इसीलिए इन प्रोजेक्ट्स में औसतन सात से दस साल लग जाते हैं."
वह ताज़ा 'एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट' (एएमसीए) का उदाहरण देते हैं जिसको भले अभी मंज़ूरी दी गई हो लेकिन इसका पहला प्रोटोटाइप 2035 में आएगा और इसके उत्पादन में तीन साल और लगेंगे. यानी इसे वायुसेना में शामिल होने में लगभग 13 साल लग जाएंगे, वह भी तब जब सब कुछ ठीक से चले.
राहुल बेदी कहते हैं, "ए़फ़जीएफ़ए यानी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान को विकसित करने की बातचीत भारत ने साल 2007-08 में रूस के साथ शुरू की थी. 11 साल तक इस पर बातचीत होती रही और इस पर लगभग 24 करोड़ अमेरिकी डॉलर भी ख़र्च हुए लेकिन 2018 में इसे असफल मानकर छोड़ दिया गया. लेकिन रूस इस पर काम करता रहा और आज रूस का एफ़जीएफ़ए सुखोई-57 के रूप में हमारे सामने है. अगर हम इसमें बने रहते तो हमारे पास एक स्टेल्थ फ़ाइटर जेट होता."
उन्होंने बताया कि 'भारतीय वायुसेना में लड़ाकू विमानों के क़रीब 42 स्क्वाड्रन मंज़ूर हैं लेकिन अभी उसके पास 30 स्क्वाड्रन हैं. इनमें दो से तीन स्क्वाड्रन अगले एक से दो साल में रिटायर होने वाली हैं. इसका मतलब है कि वायुसेना के पास क़रीब 28 स्क्वाड्रन रह जाएंगी.'
भारतीय वायुसेना ने 2018-19 में 114 लड़ाकू विमानों का प्रस्ताव दिया था जिस पर आज तक कोई प्रगति नहीं हुई है. राहुल बेदी कहते हैं कि एयर चीफ़ मार्शल का दर्द इससे समझा जा सकता है.
राहुल बेदी का कहना हैं, "ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद जो कुछ हुआ उसमें भारतीय वायुसेना की अहम भूमिका रही है. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ये दावा किया गया कि भारत के कुछ एयरक्राफ़्ट गिरे हैं जबकि भारत की तरफ़ से इस पर कुछ स्पष्ट नहीं कहा गया. निश्चित रूप से भारतीय वायुसेना अपनी तैयारी का आकलन कर रही है."
वह कहते हैं कि डिफ़ेंस ख़रीद में देरी का एक और उदाहरण रफ़ाल है जिसके कॉन्ट्रैक्ट पर बात शुरू हुई 2007-08 में और उसे हरी झंडी मिली 2016 में जब पीएम मोदी फ़्रांस के दौरे पर गए. फिर इसकी डिलीवरी 2018 से शुरू हुई.
वो कहते हैं, "तेजस के रूप में लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ़्ट (एलसीए) जो आज हमारे सामने है, इस पर बातचीत 1981 में शुरू हुई थी. कैग की रिपोर्ट में बताया गया कि इसके 45 प्रतिशत हार्डवेयर इम्पोर्टेड हैं. दिलचस्प है कि किसी एयरक्राफ़्ट का सबसे क्रिटिकल पार्ट है इंजन. जो हाल ही में स्टेल्थ फ़ाइटर जेट को मंज़ूरी मिली है उसका इंजन हम नहीं बना रहे. हम अपना इंजन विकसित ही नहीं कर पाए. किसी भी चीज़ का हम इंजन नहीं बना पाए."
"हेलीकॉप्टर के इंजन की तकनीक फ़्रांस से ली है और उसके लाइसेंस से निर्माण हो रहा है. अर्जुन टैंक का इंजन जर्मन है, तेजस का इंजन अमेरिका से आता है. छोटे से छोटा इंजन भी इम्पोर्टेड है. स्वदेशी फ़ाइटर जेट विकसित करने में यह भी एक बड़ी बाधा है."
राहुल बेदी के अनुसार, "एयर चीफ़ मार्शल के बयान का मतलब ये भी है कि अगर घरेलू स्तर पर कोई उपकरण नहीं बन पाता है तो उसकी बाहर से ख़रीद की जाए ताकि आज की ज़रूरत को पूरा किया जा सके."
भारतीय सेना की ताक़त
ग्लोबल फ़ायर पॉवर के मुताबिक़, 2025 सैन्य स्ट्रेंथ रैंकिंग में भारत और पाकिस्तान के बीच आठ पायदान का फ़ासला है.
साल 2025 में वैश्विक सैन्य ताक़त के मामले में 145 देशों में भारत की रैंकिंग चौथी जबकि पाकिस्तान की रैंकिंग 12 है.
भारतीय सेना के पास क़रीब 22 लाख आर्मी जवान, 4,201 टैंक, क़रीब डेढ़ लाख बख़्तरबंद वाहन, 100 सेल्फ़ प्रोपेल्ड आर्टिलरी और 3,975 खींचकर ले जाने वाली आर्टिलरी है. इसके अलावा मल्टी बैरल रॉकेट आर्टिलरी की संख्या 264 है.
भारतीय एयरफ़ोर्स के पास 3 लाख 10 हज़ार वायु सैनिक और कुल 2,229 विमान हैं, जिनमें 513 लड़ाकू विमान और 270 ट्रांसपोर्ट विमान हैं. कुल विमानों में 130 हमला करने वाले, 351 ट्रेनर और छह टैंकर फ़्लीट के विमान हैं.
भारतीय सेना के तीनों अंगों के पास कुल हेलीकॉप्टरों की संख्या 899 है जिनमें 80 अटैक हेलीकॉप्टर हैं.
भारतीय नेवी के पास 1.42 लाख नौसैनिक, कुल 293 पोत हैं, जिनमें दो विमानवाहक पोत, 13 डिस्ट्रॉयर, 14 फ़्रिगेट्स, 18 सबमरीन और 18 कॉर्वेट्स युद्धपोत हैं.
लॉजिस्टिक्स के तौर पर भारतीय सेना के पास 311 एयरपोर्ट्स, 56 बंदरगाह और 63 लाख किलोमीटर की सड़क और 65 हज़ार किलोमीटर की रेलवे कवरेज है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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