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मर्दों की तुलना में औरतों का रात में बाहर निकलना कितना आसान? - ब्लॉग
- Author, अनघा पाठक
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
मेरे एक पुरुष दोस्त ने एक रात 11 बजे के बाद कहा, 'चलो एक चक्कर लगाते हैं.'
दोस्त की पत्नी और मैंने, तब यही सोचा कि इसे क्या हो गया है, दिल्ली जैसे शहर में इतनी रात घूमने के लिए निकलना ठीक नहीं है.
मैं उन दोनों के घर के सामने वाली गली में रहती थी लेकिन मेरी कभी हिम्मत रात में अकेले घूमने की नहीं हुई. ख़ासकर अकेले रहते हुए.
तब मैंने सोचा कि मैंने जीवन में कितने अनुभवों को खोया है. एक बार मेरे दोस्तों ने मुंबई में घूमने की योजना बनाई थी.
सर्दियों की एक दोपहर को मेरे दोस्त नासिक से मुंबई के लिए निकल पड़े. काफ़ी घूमे, खाना खाया. मरीन ड्राइव में रात में बैठकर समुद्र की लहरों को देखते रहे.
इतना ही नहीं रात के बाद सुबह में सूर्य को वहीं उगते देखा और उसके बाद लौट कर घर आए और आराम से सो गए.
आज, इतने वर्षों के बाद, जब भी यात्रा का विषय आता है, दोस्त उस यात्रा को लेकर खूब बातें करते हैं. वे याद करते हैं कि यह कितना समृद्ध अनुभव था.
लेकिन उस समूह की हम लड़कियों के पास कहने के लिए कुछ नहीं होता. हम उसमें शामिल नहीं थे. किसी दूसरे शहर की गलियों में पूरी रात लड़कियां कैसे घूमने निकल सकती थीं?
रात को लेकर पुरुषों के अनुभव अलग हैं
जब से कामकाजी जीवन शुरू हुआ तो मेरे पुरुष सहकर्मियों के पास रात को लेकर अपने अपने अनुभव थे. किसी को रात में शहर में भटकना पसंद है, उनके मुताबिक रात की नीरव शांति में वह शहर को अच्छे से देख पाते हैं.
जबकि दूसरे का कहना है कि उन्हें चांद और तारे देखना पसंद है. कुछ लोगों को रात के सन्नाटे में सोचने समझने का मौका भी मिलता है.
पुरुषों के पास रात को लेकर ढेरों अनुभव हैं.
कुछ लोग ब्रेकअप के बाद पूरी रात शहर में घूमते रहे, कुछ लोग गंगा (हम नासिकवासी गोदावरी को गंगा कहते हैं) पर चले गए और जीवन के सबसे कठिन क्षण में पूरी रात बैठे रहे.
रात को लेकर पुरुषों के अनुभव कितने अलग होते हैं. जबकि महिलाएं रात को सिर्फ़ डर से जोड़कर देखती हैं.
तो जिसका ज़िक्र मैं ऊपर कर रही थी, उस दोस्त के घर पर इसी विषय पर बातचीत शुरू हुई. उनकी पत्नी और मैं दोनों अलग-अलग राज्यों, छोटे शहरों से नौकरी के लिए दिल्ली आए हैं.
दिल्ली को लेकर हम दोनों का पहला अनुभव आज भी याद है. नई दिल्ली से मयूर विहार यानी पूर्वी दिल्ली की ओर जाते समय यमुना नदी को पार करने के वक्त सुनसान इलाका मिला था.
मोबाइल फ़ोन के लिए कोई नेटवर्क नहीं था. सड़क के किनारे की घनी झाड़ियां और सड़कों पर पसरा सन्नाटा डराने वाला था.
अगर आप कैब से भी चल रहे हों तो यहां से गुज़रते हुए डर लगता है. जब भी मैं इस रास्ते से गुज़रती हूं तो यही सोचती हूं कि अगर कोई मुझे इस पुल से फेंक दे तो किसी को भी पता नहीं चलेगा.
पुरुष अनुमान भी नहीं लगा सकते कि रात होने के बाद हम लोगों में किन-किन बातों को लेकर डर सताने लगता है.
हमें देर रात तक दफ्तर में काम करने में डर लगता है. मेट्रो में देर रात सफ़र करने में डर लगता है. रात के दस बजे के बाद लिफ्ट के इस्तेमाल करने में डर लगता है.
महिलाएं रात को सिर्फ़ डर से जोड़कर देखती हैं
रात को लेकर मेरी सारी यादें डर की हैं.
मुझे याद है कि एक बार बातचीत में मेरी एक दोस्त ने कहा था कि मैं अगर अनजानी जगह पर किसी अजनबी से मिल रही हूं या बात कर रही हूं तो हमेशा ध्यान में यह होता है कि आस-पास की किन चीज़ों का इस्तेमाल अपनी रक्षा के लिए किया जा सकता है.
महिला के तौर पर हमारे अनुभव तो यही हैं कि रात पर हमारा कोई अधिकार नहीं है.
यही वजह है कि कोलकाता में एक महिला डॉक्टर के बलात्कार और हत्या के बाद 'रिक्लेम द नाइट' आंदोलन सुर्खियों में है.
इस आंदोलन का उद्देश्य यह है कि महिलाओं को रात में भी अधिकार है और उस समय उनकी सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए.
कोलकाता में जब महिला आधी रात को सड़कों पर निकलीं तो देश आज़ादी की वर्षगांठ मना रहा था.
देश की आज़ादी के 77 साल बाद भी अगर महिलाओं को रात में चलने, सुरक्षित रहने की आज़ादी नहीं है तो कौन सा स्वतंत्रता दिवस मनाया जाए?
वैसे महिलाएं रात तो क्या दिन में भी घर से बाहर निकलती हैं तो इसका कोई न कोई कारण होता है. आपने कितनी महिलाओं को बगीचे में या सड़क के किनारे चने खाते हुए भीड़ को आनंद लेते देखा है? हर जगह पुरुष ही नज़र आते हैं.
महिलाओं को बाहर निकलने के लिए वजह चाहिए.
आप काम से बाहर निकल रही हैं?
क्या आप अपने बच्चे को स्कूल से लाने के लिए निकल रही हैं?
क्या आप कोई सामान ख़रीदने निकल रही हैं?
क्या आप अस्पताल जा रही हैं?
ये वो सवाल हैं जो महिलाओं से पूछे जाते हैं.
महिलाओं से ये भी कहा जाता है कि काम ख़त्म करके जल्दी घर पहुंचना. महिलाएं सड़कों पर चलते हुए नर्वस महसूस करती हैं.
वे या तो फ़ोन पर बात कर रही होती हैं या फिर कानों में ईयरफ़ोन लगाकर गर्दन झुकाकर चलती हैं. वे किसी से आंखें तक नहीं मिलातीं.
मुंबई का महिलाओं के लिए व्हाई लोइटर आंदोलन
मुंबई में दस साल पहले महिलाओं के लिए व्हाई लोइटर आंदोलन शुरू करने वालों में से एक नेहा सिंह बताती हैं, "हर तरफ़ डर का वातावरण व्याप्त है."
नेहा सिंह और उनके साथियों ने 2014 में मुंबई में यह आंदोलन शुरू किया था. उनका कहना है कि महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर पुरुषों की तरह समान अधिकार हैं, महिलाओं को रात में बाहर घूमने का पुरुषों की ही तरह समान ही अधिकार है.
पिछले 10 सालों से वह खुद अन्य महिलाओं के साथ मुंबई की सड़कों पर घूम रही हैं.
वह बताती हैं, “हम यहां, वहां घूमते रहते हैं. बात करते हैं, हंसते हैं, खिलखिलाते हैं. जब थक जाते हैं तो सड़क के किनारे बैठ जाते हैं. कई बार बुरे अनुभव भी होते हैं. पुलिस अक्सर रोकती है."
"वे सोचते हैं कि हम सेक्स वर्कर हैं. फिर हमसे काफी देर तक पूछताछ चलती है, हमें अपना आईडी कार्ड दिखाना पड़ता है और फिर बार-बार वही सवाल पूछा जाता है कि कोई काम नहीं है तो रात को बाहर क्यों घूम रहे हो."
नेहा सिंह और उनके दोस्त ऐसा इसलिए करते हैं ताकि लोगों को, समाज को महिलाओं के सार्वजनिक स्थानों पर घूमने, रात में बाहर रहने की व्यवस्था की आदत हो जाए.
क्या दस साल में कुछ बदला है?
यह सवाल पूछने पर नेहा सिंह बताती हैं, “पुरुषों का व्यवहार, समाज की मानसिकता या व्यवस्था का दृष्टिकोण नहीं बदला है."
"अब तक महिलाओं को यही सिखाया जाता रहा है कि आपकी सुरक्षा आपकी ज़िम्मेदारी है, अगर आपके साथ कुछ भी ग़लत होता है तो यह आपकी ग़लती है. वे सवाल पूछते हैं जैसे कि आप क्या कर रहीं थीं, आपने क्या पहना था, क्या आपने दूसरों को उकसाया था.''
महिला कर्मचारियों के लिए विवादित 'दिशानिर्देश'
कोलकाता की घटना के बाद भी असम के सिलचर अस्पताल ने महिला कर्मचारियों के लिए 'दिशानिर्देश' जारी किए. जिसमें कहा गया था, "उन्हें अंधेरे स्थानों, एकांत स्थानों पर जाने से बचना चाहिए, यदि बहुत आवश्यक न हो तो रात में छात्रावास या अन्य आवास न छोड़ें और यदि उन्हें रात में बाहर जाना है तो अपने वरिष्ठों को सूचित करें, अजनबियों के संपर्क से बचें. बाहर घूमते समय सावधान रहें और संयमित रहें ताकि किसी का ध्यान आप पर ना जाए."
इन सभी निर्देशों का पालन महिला कर्मचारियों को करना होगा, लेकिन इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है कि पुरुष कर्मचारियों को महिला कर्मचारियों के साथ ठीक से व्यवहार करना चाहिए और उन्हें महिला सहकर्मियों को असुरक्षित महसूस नहीं करना चाहिए.
मूलतः इस बात का ध्यान क्यों नहीं रखा जाता कि पुरुष महिलाओं का यौन उत्पीड़न न करें?
इस पर सोशल मीडिया पर हंगामा मचने के बाद इन गाइडलाइंस को वापस ले लिया गया.
दूसरी ओर, महिला अधिकार कार्यकर्ता यौन उत्पीड़न की ख़बरें आने पर मीडिया में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा पर आपत्ति जताते हैं.
हम कहते हैं कि एक महिला के साथ 'बलात्कार' होता है, लेकिन हम यह नहीं कहते कि एक पुरुष ने बलात्कार किया है, किसी ने यह अपराध किया है, यह यूं ही नहीं हो गया.
शायद यह अच्छी बात है कि महिलाओं को अब यह एहसास हो रहा है कि इसमें उनकी ग़लती नहीं है और वे किसी और के अपराध के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाना स्वीकार नहीं करतीं.
नेहा सिंह ने बताया, "पिछले 10 वर्षों में एक बदलाव महसूस किया है. अब महिलाओं को एहसास हुआ है कि उनके साथ हुए यौन अपराधों में उनकी कोई ग़लती नहीं है. यह किसी और के द्वारा किया गया अपराध है. वे ख़ुद को ज़िम्मेदार नहीं मानती हैं. वे समाज और सरकार से पूछ रही हैं कि आपने हमारी सुरक्षा के लिए क्या किया?"
नेहा सिंह के मुताबिक़ यह सवाल महिलाएं पूछ तो रही हैं लेकिन डर बना हुआ है. वह कहती हैं, "एक तरफ़ आप कहते हैं कि 2024 में महिलाओं को समानता और आज़ादी मिल गई है, वहीं दूसरी तरफ़ हर दिन महिलाएं डर के साये में जी रही हैं."
"कोलकाता मामले के बाद लोग पूछ रहे हैं कि वह सेमिनार रूम में अकेली क्यों सोई थी? यह किस तरह की आज़ादी और समानता है?"
काम के लिए, नौकरी के लिए, मौज-मस्ती के लिए, चांद-तारे देखने के लिए, खाने के लिए, किसी भी कारण से, मेरे सहित सभी महिलाएँ रात में घूमने की आज़ादी चाहती हैं और इसके लिए वे सुरक्षा की गारंटी चाहती हैं.
महिला का स्थान घर में है?
महिला का स्थान घर में है, उसने अभी भी यह मानसिकता नहीं बदली है कि उसे बाहर नहीं जाना चाहिए. आज भी कहा जाता है कि महिलाएं घर में ही सुरक्षित रह सकती हैं.
“लेकिन वास्तविक स्थिति क्या है?” नेहा कहती हैं, “यौन उत्पीड़न के अधिकांश मामले घर में होते हैं. ऐसा करने वाले रिश्तेदार, शिक्षक या फिर परिचित होते हैं. लेकिन आप यह कैसे कह सकते हैं कि घर के बाहर सब कुछ असुरक्षित है.”
जब नेहा और उसकी साथी महिलाएं रात में घूमती हैं, तो जो पुरुष उनका पीछा करते हैं, उन पर टिप्पणी करते हैं, वे सामान्य घरों से होते हैं, उनमें से सभी आपराधिक प्रवृत्ति के नहीं होते हैं. लेकिन फिर भी रात में महिलाओं को बाहर देखकर उन्हें परेशान करते हैं.
नेहा बताती हैं, “हम उन लोगों को रोकते हैं जो हमें परेशान करते हैं और उनसे बात करते हैं. उनसे कहते हैं कि जैसे अभी आप बाहर हो, वैसे ही हम भी बाहर हैं. हमें बात करने के बाद आपको पता चलता है कि इन लोगों ने कभी महिलाओं को रात में बाहर निकलते नहीं देखा है, इसलिए वे नहीं जानते कि ऐसी महिलाओं से कैसे पेश आना है, इसलिए वे सीटी बजाते हैं, शोर मचाते हैं, हमारे आसपास इकट्ठा होते हैं."
लेकिन हर महिला के पास परेशान करने वाले व्यक्ति से संवाद करने का साहस और समय नहीं होगा. इतना ही नहीं इस बात की गारंटी भी नहीं होगी कि संवाद करने पर वह नुक़सान नहीं पहुंचाएगा.
नेहा का कहना है कि हर बार जब यौन उत्पीड़न की ऐसी घटनाएं होती रहेंगी तब महिलाएं सड़कों पर उतरेंगी, इससे काम नहीं चलेगा.
अगर रात में सार्वजनिक स्थानों पर चलने और सुरक्षित रहने के अधिकार को सामान्य बनाना है, तो इस समय इन स्थानों पर महिलाओं की निरंतर मौजूदगी को सामान्य बनाना होगा. तभी सरकार, समाज और सिस्टम में बदलाव देखने को मिलेगा.
ऐसा नहीं होने पर महिलाओं के रात के साफ़ आसमान में चाँद देखने, ठंडी हवा महसूस करने या आधी रात को ख़ाली सड़कों पर फुटबॉल खेलने के सपने, हमेशा सपने ही रह जायेंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित