सीरिया: असद के जाने से राहें हुईं आसान लेकिन अब नई मुसीबतें सामने

    • Author, जेरेमी बोवेन
    • पदनाम, अंतरराष्ट्रीय संपादक,बीबीसी न्यूज़

एक साल पहले, जिस युद्ध को राष्ट्रपति बशर अल-असद जीता हुआ मान रहे थे, वह अचानक पूरी तरह पलट गया था.

तुर्की से सटे सीरिया के इदलिब प्रांत से एक विद्रोही ताकत उभरी और दमिश्क की ओर तेजी से बढ़ चली थी.

इसका नेतृत्व अबू मोहम्मद अल-जोलानी नाम के एक व्यक्ति के हाथ में था, और उनके साथ उसका हथियारबंद गुट. नाम था हयात तहरीर अल-शाम यानी एचटीएस.

जोलानी उनका असली नाम नहीं है, बल्कि एक उपनाम है, जो उनके परिवार की जड़ों की ओर इशारा करता है. ये जड़ें गोलान हाइट्स में हैं, जो सीरिया का दक्षिणी पहाड़ी इलाका है और जिसे 1967 में कब्जे के बाद इसराइल ने अपने में मिला लिया था. उनका असली नाम अहमद अल-शरा है.

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एक साल बाद आज वही शख़्स सीरिया का अंतरिम राष्ट्रपति है. और अब बशर अल-असद (सीरिया के पूर्व शासक) रूस में निर्वासन की ज़िंदगी बिता रहे हैं.

सीरिया अब भी खंडहर बना हुआ है. पिछले दस दिनों में जिन भी शहरों और गांवों में मैं गया हूं, वहां लोग युद्ध से उजड़ी, खंडहर हो चुकी इमारतों में रहने को मजबूर हैं.

लेकिन नए सीरिया की तमाम समस्याओं के बावजूद, लोग असद परिवार के दमनकारी और बेरहम शासन की तुलना में हल्का महसूस कर रहे हैं.

अहमद अल-शरा को देश के अंदर की तुलना में विदेशों में चीजें आसान लगी हैं.

उन्होंने सऊदी अरब और पश्चिमी देशों को यह समझाने में सफलता हासिल कर ली है कि वे सीरिया के लिए एक स्थिर भविष्य का सबसे अच्छा मौका हैं.

मई में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस ने अल-शरा और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच एक संक्षिप्त मुलाकात की व्यवस्था की थी.

इसके बाद ट्रंप ने उन्हें "एक युवा, आकर्षक और मजबूत आदमी" कहा था.

लेकिन अपने देश में सीरियाई लोग उनकी कमज़ोरियों और सीरिया के सामने मौजूद समस्याओं को विदेशी लोगों से कहीं बेहतर समझते हैं.

उत्तर-पूर्वी इलाके में उनकी सत्ता नहीं चलती, जहां कुर्दों का नियंत्रण है और न ही दक्षिण के कुछ हिस्सों में, जहां सीरियाई द्रूज़, जो एक और अल्पसंख्यक समुदाय हैं. ये लोग अपने इसराइली समर्थकों के साथ एक अलग राज्य की मांग कर रहे हैं.

सीरिया के तटीय इलाकों में रहने वाला अलावी समुदाय इस बात से डरता है कि मार्च में जिन जनसंहारों का उसने सामना किया था, वे दोबारा न हों.

गौरतलब है सीरिया के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद इसी समुदाय से आते हैं.

एक साल पहले, दमिश्क के नए शासक भी, सीरिया के अधिकांश सशस्त्र विद्रोहियों की तरह, सुन्नी इस्लामवादी थे.

उनके नेता अहमद अल-शरा का अल-क़ायदा के लिए इराक में लड़ने का लंबा इतिहास रहा है, जहां उन्हें अमेरिकियों ने जेल में भी रखा था. इसके बाद वे उस संगठन के वरिष्ठ कमांडर बने जो आगे चलकर इस्लामिक स्टेट बना.

बाद में, जब उन्होंने सीरिया में अपना प्रभाव मजबूत किया, तो इस्लामिक स्टेट और अल-क़ायदा दोनों से नाता तोड़ लिया और उनके ख़िलाफ़ लड़ाई भी की.

जो लोग उनसे मिलने इदलिब गए थे, उनका कहना था कि उन्होंने अपने विचारों में काफी व्यवहारिक बदलाव किया है. वो धार्मिक संप्रदायों की विविधता वाले सीरिया पर शासन करने के लिए ज्यादा मुफ़ीद हैं.

सुन्नी यहां बहुसंख्यक हैं, लेकिन कुर्दों और द्रूज़ समुदाय के अलावा ईसाई भी हैं. जिनमें से कई आज भी शरा के जिहादी अतीत को भूल नहीं पाए हैं.

जिहादी अतीत से आगे बढ़ चुके शख़्स की छवि

पिछले साल दिसंबर के पहले सप्ताह में यह विश्वास करना मुश्किल था कि एचटीएस का सैन्य अभियान इतनी तेजी से आगे बढ़ रहा है.

उन्हें सीरिया का उत्तरी पावरहाउस कहे जाने वाले अलेप्पो पर कब्जा करने में केवल तीन दिन लगे.

अगर इसकी तुलना 2012 से 2016 के बीच के उन यंत्रणा भरे वर्षों से करें, जब सरकारी सेना और विद्रोही गुट शहर पर नियंत्रण के लिए लड़ते रहे थे, तो फर्क साफ दिखता है.

उस संघर्ष का अंत असद की जीत के साथ हुआ था. उस समय रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपनी वायुसेना और तोपखाने तैनात कर शासन के क्रूर तरीकों को निर्णायक सैन्य ताकत दी थी.

जब मैं उस समय पूर्वी अलेप्पो के उन इलाकों में गया, जो कुछ हफ्ते पहले ही विद्रोहियों से छीनकर सरकार के कब्जे में लाए गए थे. इसके बड़े हिस्से रूसी बमबारी से पूरी तरह तबाह हो चुके थे.

कई सड़कों पर इतना मलबा था कि वह पहली मंजिल की बालकनियों तक पहुंच गया था.

लेकिन 2024 के अंत तक पूरे देश में सरकारी सेना बिखरती चली गई. जबरन भर्ती किए गए सैनिक और शासन के कट्टर समर्थक दोनों ही अब एक ऐसे भ्रष्ट और क्रूर शासन के लिए लड़ने-मरने को तैयार नहीं थे, जो बदले में उन्हें सिर्फ गरीबी और उत्पीड़न दे रहा था.

असद के परिवार समेत रूस भागने के कुछ ही दिन बाद, मैंने सीरिया के नए विजयी नेता का राष्ट्रपति भवन में इंटरव्यू किया.

ये इमारत शहर की एक ऊंची चट्टान पर बनी हुई है. यहीं असद परिवार सारे शहर पर नज़र रखता था.

तब तक जोलानी अपने पुराने नाम के साथ-साथ अपनी लड़ाकू वर्दी भी छोड़ चुके थे.

अल शरा उस ठंडे महल के हॉल में एक सलीकेदार जैकेट, अच्छी तरह प्रेस की हुई पैंट और चमकदार काले जूते पहनकर बैठे थे.

उन्होंने मुझसे कहा कि देश युद्ध से पूरी तरह थक चुका है और वह न तो अपने पड़ोसियों के लिए खतरा है और न ही पश्चिम के लिए.

उन्होंने जोर देकर कहा कि वे सभी सीरियाई लोगों के लिए शासन करेंगे. यह संदेश वही था, जिसे कई सीरियाई लोग और विदेशी सरकारें सुनना चाहती थीं.

हालांकि इसराइल ने उनकी इस बात को खारिज कर दिया. वहीं जिहादी कट्टरपंथियों ने अल शरा को गद्दार करार दिया और उन पर अपने धर्म और अपने अतीत को बेच देने का आरोप लगाया.

मैं युद्ध की रिपोर्टिंग के लिए जल्दबाज़ी में सामान पैक करके आया था और मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि असद शासन इतनी जल्दी ढह जाएगा.

मेरे औपचारिक कपड़े लंदन में ही रह गए थे. इंटरव्यू के बाद उनके एक सहयोगी ने शिकायत की कि मुझे किसी राष्ट्रीय नेता का इंटरव्यू लेने के लिए सूट पहनना चाहिए था.

उनकी नाराज़गी सिर्फ मेरे पहनावे को लेकर नहीं थी. यह उस लंबे अभियान की एक कड़ी थी, जो सालों पहले इदलिब में शरा द्वारा अपनी ताकत जमा करने के साथ शुरू हुआ था.

इस अभियान का मकसद उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करना था, जो अपने जिहादी अतीत से आगे बढ़ चुका है और पूरे सीरिया का नेतृत्व करने के योग्य है.

एक ऐसा नेता, जिसे दुनिया गंभीरता से ले और सम्मान दे.

सीरिया में कमजोर होता इस्लामिक स्टेट

शरा ने सत्ता ऐसे समय में संभाली, जब इस बात को लेकर गहरी अनिश्चितता थी कि वे आगे क्या करेंगे और उनके दुश्मन उनके साथ क्या कर सकते हैं.

इनमें यह डर भी शामिल था कि इस्लामिक स्टेट के जिहादी चरमपंथी, जो अब भी स्लीपर सेल के रूप में मौजूद हैं, उनकी हत्या की कोशिश कर सकते हैं या दमिश्क में बड़े हमलों के जरिए अराजकता फैला सकते हैं.

पश्चिम में शरा के 'चार्म ऑफ़ेंसिव' को लेकर जिहादी सोशल मीडिया पर गुस्सा जाहिर कर रहे हैं.

जब उन्होंने इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होने पर सहमति दी, तो ऑनलाइन पर मौजूद कई प्रभावशाली आवाज़ों ने उन्हें धर्म त्यागने वाला करार दिया.

एक ऐसा मुसलमान जिसने अपने ही धर्म से मुंह मोड़ लिया हो. चरमपंथी इसे उन्हें मारने का बहाना भी मान सकते हैं.

हक़ीक़त यह है कि सीरिया में इस्लामिक स्टेट कमजोर स्थिति में है. इस साल उसके ज्यादातर हमले उत्तर-पूर्व में कुर्द नेतृत्व वाली सेनाओं के ख़िलाफ़ हुए हैं.

हाल के कुछ हफ़्तों में, असद शासन के पतन की बरसी के करीब आते-आते, स्थिति में बदलाव देखने को मिला है.

चार्ल्स लिस्टर सीरिया पर नज़र रखने वाले जाने-माने विशेषज्ञ हैं.

उनकी ओर से जुटाए गए और सीरिया वीकली न्यूज़लेटर में प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक़, जब सुरक्षा बलों ने इस्लामिक स्टेट के स्लीपर ठिकानों पर छापे मारे तो जिहादियों ने सरकार के नियंत्रण वाले शहरों में तीन सैनिकों और असद शासन से जुड़े दो पूर्व अधिकारियों की हत्या कर दी.

बीबीसी आईएस के सोशल मीडिया चैनल पर लगातार नज़र रख रहा था. इसमें वो सीरिया के सुन्नियों से कह रहे थे कि शरा ने उनके साथ धोखा किया है.

बिना कोई सबूत दिए, उन्होंने यह दावा भी पोस्ट किया है कि शरा अमेरिका और ब्रिटेन के एजेंट रहे हैं और जिहादी प्रोजेक्ट को कमजोर करने के लिए काम करते रहे हैं.

ट्रंप और पश्चिम को अपने पक्ष में करना

पश्चिम की ओर शरा के बढ़ते कदम असाधारण रूप से सफल रहे हैं.

सीरिया की सत्ता संभालने के दो हफ्ते के भीतर ही उन्होंने अमेरिका के वरिष्ठ राजनयिकों के एक प्रतिनिधिमंडल की मेज़बानी की.

इसके तुरंत बाद अमेरिकियों ने उनकी गिरफ़्तारी पर रखी गई एक करोड़ डॉलर की इनामी राशि हटा ली.

इसके बाद से असद के दौर में सीरिया पर लगाए गए प्रतिबंधों को धीरे-धीरे कम किया जाता रहा.

सबसे कठोर प्रतिबंध सीज़र एक्ट को भी निलंबित कर दिया गया है. नए साल में अमेरिकी कांग्रेस इसे पूरी तरह खत्म भी कर सकती है.

नवंबर में एक बड़ा राजनीतिक मोड़ तब आया, जब शरा व्हाइट हाउस जाने वाले पहले सीरियाई राष्ट्रपति बने.

ओवल ऑफिस में डोनाल्ड ट्रंप ने उनका काफी अनौपचारिक अंदाज़ में स्वागत किया.

ट्रंप ने उन पर अपने ब्रांड का कोलोन छिड़का और फिर अपनी तरफ से कुछ बोतलें देते हुए मज़ाक में पूछा कि तुम्हारे पास कितनी हैं.

शरा ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, "एक", और खुशबू के बादलों के बीच पलकें झपकाते रहे.

कैमरों के सामने की इस हंसी-मज़ाक से अलग, सऊदी अरब और पश्चिमी सरकारें शरा को मध्य-पूर्व के केंद्र में बसे इस देश को स्थिर करने के लिए सबसे अच्छा बल्कि एकमात्र विकल्प मानती है.

अगर सीरिया फिर से गृहयुद्ध में फंस गया तो क्षेत्र में फैली हिंसक अस्थिरता को कम करने की कोई उम्मीद नहीं बचेगी.

एक वरिष्ठ पश्चिमी राजनयिक ने मुझे बताया कि गृहयुद्ध की परिस्थितियां अब भी मौजूद हैं.

इसकी वजह है आधी सदी की तानाशाही के गहरे जख्म और 14 साल का वह युद्ध, जो असद के दमनकारी शासन के खिलाफ एक जनविद्रोह के रूप में शुरू हुआ था.

लेकिन बाद में ये तेजी से एक सांप्रदायिक संघर्ष में बदल गया.

अहमद अल-शरा एक सुन्नी मुसलमान हैं और वे सीरिया के सबसे बड़े धार्मिक समुदाय से आते हैं. उनकी सरकार का पूरे देश पर नियंत्रण है.

पिछले एक साल में वे न तो उत्तर-पूर्व के कुर्दों को और न ही दक्षिण के द्रूज़ समुदाय को दमिश्क की सत्ता स्वीकार करने के लिए मना पाए हैं और न ही मजबूर कर पाए हैं. तटीय इलाकों में मौजूद अलावी समुदाय बेचैन और आशंकित है.

अलावी संप्रदाय की उत्पत्ति शिया इस्लाम से हुई और जिसका मुख्य क्षेत्र सीरिया का भूमध्यसागरीय तट है.

शासन की नींव रखने वाले, बशर अल-असद के पिता हाफ़िज़ अल-असद ने अपनी ताकत अलावी अल्पसंख्यकों के बल पर हासिल की थी, जो आबादी का करीब 10 प्रतिशत हैं.

एक ज़माना था जब किसी वर्दीधारी शख़्स की सिर्फ अलावी लहजे की आवाज़ दूसरे सीरियाई नागरिकों को डरा देने के लिए काफ़ी होती थी.

अब अगले 12 महीनों में हिंसा के बड़े और गंभीर फैलाव को रोकना सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है.

न्याय की धीमी रफ़्तार

असद के पतन की बरसी से ठीक पहले, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने न्याय की धीमी रफ़्तार पर गंभीर चिंता जताई.

एक प्रवक्ता ने कहा, "हालांकि अंतरिम प्रशासन ने पिछले उल्लंघनों से निपटने के लिए कुछ उत्साहजनक कदम उठाए हैं लेकिन ये केवल शुरुआत हैं. अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है."

देश में कुछ लोगों ने कई बार सरकारी बलों के साथ मिलकर, कानून अपने हाथ में ले लिया.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के अनुसार पिछले एक साल में सैकड़ों लोग मारे गए हैं. सुरक्षा बलों और उनसे जुड़े समूहों, पूर्व सरकार से जुड़े तत्वों, स्थानीय सशस्त्र समूहों और अज्ञात हथियारबंद लोगों ने उनकी हत्याएं की हैं.

संयुक्त राष्ट्र ने यह भी कहा कि अन्य उल्लंघनों में यौन हिंसा, मनमानी गिरफ्तारियां, घरों को नष्ट करना, जबरन बेदखली और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पाबंदियां शामिल हैं.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के मुताबिक, इस हिंसा से मुख्य रूप से अलावी, द्रूज़, ईसाई और बद्दू समुदाय प्रभावित हुए हैं. यह हिंसा ऑनलाइन और ऑफलाइन पर बढ़ती नफरत भरी भाषा से और भड़काई गई है.

2026 के लिए एक बड़ा खतरा यह है कि अलावी समुदाय के इलाकों में पिछले मार्च जैसी सांप्रदायिक हिंसा फिर से भड़क सकती है.

असद शासन के पतन के बाद पैदा हुए सुरक्षा रहित माहौल में नई सरकार ने सीरिया के तटीय इलाकों में अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए कई गिरफ्तारियां कीं.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की जांच में पाया गया कि "पूर्व सरकार समर्थक लड़ाकों ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अंतरिम सरकार के सैकड़ों सुरक्षाबलों को पकड़ लिया, मार डाला या घायल कर दिया."

इसके जवाब में दमिश्क ने कठोर कदम उठाए.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, इसके बाद हुए जनसंहारों में करीब 1,400 लोग मारे गए, जिनमें अधिकांश आम नागरिक थे.

मारे गए लोगों में ज्यादातर पुरुष थे, लेकिन इनमें लगभग 100 महिलाएं, बुज़ुर्ग, दिव्यांग और बच्चे भी शामिल थे.

शरा सरकार ने संयुक्त राष्ट्र की जांच में सहयोग किया. उसकी कुछ इकाइयों ने अलावी लोगों को बचाने में मदद भी की और जनसंहार के कुछ मुख्य आरोपियों पर मुकदमा चलाया गया है.

संयुक्त राष्ट्र के सीरिया जांच आयोग ने पुष्टि की कि उसे इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि इन हमलों का आदेश सरकार ने दिया था.

लेकिन तब भी और आगे के लिए भी चिंता यही है कि दमिश्क की सरकार उन सशस्त्र सुन्नी गुटों को नियंत्रित नहीं कर पा रही थी, जो कथित तौर पर उसकी सुरक्षा सेनाओं में शामिल हो चुके थे.

जुलाई में, दक्षिणी प्रांत सुवैदा में द्रूज़ और बद्दू समुदायों के बीच गंभीर हिंसा ने शरा प्रशासन की नींव को हिला दिया.

द्रूज़ धर्म की उत्पत्ति करीब एक हजार साल पहले इस्लाम से हुई थी. कुछ लोग इन लोगों को विधर्मी मानते हैं. ये सीरिया की आबादी का लगभग 3 प्रतिशत हैं. जब व्यवस्था बहाल करने के नाम पर सरकारी बल सुवैदा में दाखिल हुए, तो वे द्रूज़ लड़ाकों से ही लड़ने लगे.

इसराइल ने हस्तक्षेप किया. यहां की द्रूज़ आबादी यहूदी राष्ट्र के प्रति बेहद वफादार मानी जाती है. इसराइली हवाई हमलों में दमिश्क स्थित रक्षा मंत्रालय लगभग नष्ट कर दिया गया.

हालात को और भयावह होने से रोकने के लिए अमेरिका को तुरंत हस्तक्षेप कर युद्धविराम कराना पड़ा. इसके बावजूद, दसियों हज़ार लोग बेघर हो गए और अब भी विस्थापित हैं.

इसराइल का सवाल

अब भी यह साफ नहीं है कि शरा और उनकी अंतरिम सरकार एक और उतने ही गंभीर संकट से उबरने के लिए पर्याप्त मज़बूत हैं या नहीं. इ़सराइल आज भी सीरिया के लिए एक बड़ा और ख़तरनाक फै़क्टर बना हुआ है.

असद के पतन के बाद, इसराइल ने पुराने शासन की बची-खुची सैन्य क्षमता को नष्ट करने के लिए बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए. इसराइली सुरक्षा बल (आईडीएफ़) ने कब्ज़े वाले गोलान हाइट्स से आगे बढ़कर सीरिया के और इलाकों पर नियंत्रण कर लिया, जो अभी भी उसके पास हैं.

इसराइल ने सीरिया में फैली अराजकता का फायदा उठाते हुए उस देश को कमजोर करने की कोशिश की, जिसे वह अपने लिए शत्रु मानता है. उसका कहना था कि वह ऐसे हथियार नष्ट कर रहा है, जिनका इस्तेमाल उसके खिलाफ किया जा सकता था.

पिछले लगभग दो महीनों में अमेरिका की ओर से इसराइल और सीरिया के बीच एक सुरक्षा समझौता कराने की कोशिशें ठप पड़ गई हैं.

सीरिया उस समझौते पर लौटना चाहता है, जिसे 1974 में अमेरिकी विदेश मंत्री रहे हेनरी किसिंजर ने तय कराया था. वहीं नेतन्याहू चाहते हैं कि इसराइल जिस ज़मीन पर कब्ज़ा कर चुका है, वहां से हटे नहीं, और उन्होंने मांग की है कि दमिश्क के दक्षिण के एक बड़े इलाके को पूरी तरह असैन्य कर दिया जाए.

पिछले एक महीने में इसराइल ने सीरिया के भीतर ज़मीनी कार्रवाई और तेज़ कर दी है. हिंसा से जुड़े आंकड़े जुटाने वाला सीरिया वीकली बताता है कि इस दौरान ऐसी कार्रवाइयों की संख्या साल के बाकी महीनों के औसत से दोगुने से भी ज़्यादा रही.

हम सीमावर्ती गांव बैत जिन पहुंचे, जहां 28 नवंबर को आईडीएफ ने छापा मारा था. इसराइल का कहना था कि वह उन सुन्नी उग्रवादियों को पकड़ रहा था, जो हमलों की योजना बना रहे थे.

इसका स्थानीय लोगों ने मुकाबला किया, जिसमें छह इसराइली सैनिक घायल हो गए और छापेमारी दल को जल्दबाज़ी में पीछे हटना पड़ा.

वे एक सैन्य वाहन छोड़ गए, जिसे बाद में उन्होंने हवाई हमले में नष्ट कर दिया. सरकारी मीडिया के अनुसार, इसराइली कार्रवाई में कम से कम 13 स्थानीय लोगों की मौत हुई और दर्जनों घायल हुए.

यह घटना दिखाती है कि सीरिया और इसराइल के बीच सुरक्षा समझौता कराना कितना मुश्किल होगा. सीरियाई सरकार ने इसे युद्ध अपराध कहा था.

वॉशिंगटन में ट्रंप इस छापे को लेकर साफ तौर पर चिंतित दिखे. उन्होंने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर लिखा कि वे सीरिया को स्थिर करने के लिए शरा के प्रयासों से "काफी संतुष्ट" हैं.

उन्होंने चेतावनी दी कि "यह बहुत ज़रूरी है कि इसराइल और सीरिया के बीच मजबूत और ईमानदार संवाद बना रहे और ऐसा कुछ न हो जो सीरिया के एक समृद्ध देश बनने की प्रक्रिया में बाधा डाले."

बैत जिन में मेरी मुलाकात खलील अबू दाहेर से हुई, जो अस्पताल से लौट रहे थे. उनके हाथ में प्लास्टर लगा था, क्योंकि गोली लगने के बाद उनकी सर्जरी हुई थी. उन्होंने मुझे अपने घर बुलाया, जो उस जगह के पास ही है जहां गांव के लोगों और इसराइली सैनिकों के बीच गोलीबारी हो रही थी.

खलील ने बताया कि तड़के साढ़े तीन बजे जब इसराइली सैनिक गांव में घुसे, तब वे अपने परिवार के साथ घर में थे. वो सुरक्षित जगह तलाशने लगे.

वो बताते हैं, "मैं अपने बच्चों के साथ घर में था. हम एक कमरे से दूसरे कमरे में भाग रहे थे. उन्होंने मेरी दोनों बेटियों पर गोली चला दी. एक को गोली लगी और दूसरी की मौके पर ही मौत हो गई. जब मैंने उसे उठाया तो मेरे हाथ में भी गोली लग गई."

मरने वाली बच्ची 17 साल की हीबा अबू दाहेर थी, जिसे पेट में गोली लगी थी.

खलील ने बताया कि वे करीब दो घंटे तक हीबा के शव के साथ ही छिपे रहे, उसके बाद उन्हें बचाकर अस्पताल ले जाया गया.

जब मैं वहां गया, तो खलील की नौ साल की बेटी सोफ़े पर कंबल ओढ़े लेटी थी. उसके कूल्हे से गोली निकालने की सर्जरी हुई थी और वह ठीक हो रही थी.

लड़कियों की मां, उम्म मोहम्मद, परिवार की महिलाओं के साथ बैठी थीं और भविष्य को लेकर बेहद चिंतित थीं

उन्होंने मुझसे कहा, "हम चैन चाहते हैं. हम अपने घरों में रहना चाहते हैं. हमें एक क्लिनिक और मेडिकल स्टाफ चाहिए, क्योंकि यहां कुछ भी नहीं है."

"हमें एक डॉक्टर भी चाहिए. बैत जिन में न तो डॉक्टर है और न ही दवा की दुकान. हमें सुरक्षा चाहिए."

'हम डर के साथ सोते हैं और डर के साथ ही जागते हैं'

असद शासन के अंत के एक साल बाद, सीरिया के नए शासकों ने कुछ अहम उपलब्धियां हासिल की हैं.

अर्थव्यवस्था में जान के संकेत दिखने लगे हैं और कारोबार के सौदे हो रहे हैं. जिनमें तेल और गैस संयंत्रों का आधुनिकीकरण और दमिश्क और अलेप्पो के हवाई अड्डों का निजीकरण शामिल है.

लेकिन जो सौदे पाइपलाइन में हैं, वे अभी तक आम सीरिया के लोगों की ज़िंदगी नहीं बदल पाए हैं.

सरकार के पास पुनर्निर्माण के लिए कोई फंड नहीं है. घरों और शहरों को दोबारा बनाना लोगों पर ही छोड़ दिया गया है.

सांप्रदायिक तनाव अब भी बना हुआ है और दोबारा भड़क सकता है. इसराइल के साथ अमेरिकी मध्यस्थता से चल रही बातचीत ठप पड़ी है.

बिन्यामिन नेतन्याहू इस बात पर अड़े हुए हैं कि दमिश्क दक्षिणी सीरिया के एक बड़े हिस्से को असैन्य घोषित करे. इसराइल अपनी सेना को पीछे हटाने के कोई संकेत नहीं दे रहा है.

ये दोनों बातें सीरिया की संप्रभुता का गंभीर उल्लंघन हैं. बैत जिन की छापेमारी ने सीरिया के लिए किसी भी तरह की रियायत देना और कठिन बना दिया है.

सीरिया की सरकार पूरी तरह शरा के इर्द-गिर्द केंद्रित है. उनके साथ विदेश मंत्री असाद अल-शैबानी और कुछ भरोसेमंद सहयोगी हैं.

लेकिन एक जवाबदेह और संस्थागत शासन ढांचा बनाने की कोई गंभीर कोशिश दिखाई नहीं देती.

असद परिवार के बिना सीरिया एक बेहतर जगह है. लेकिन उम्म मोहम्मद ने बेहद सटीक शब्दों में बहुत से सीरियाई लोगों की भावनाएं व्यक्त कर दीं.

वो कहती हैं, ''भविष्य बहुत कठिन है. हमारे पास कुछ भी नहीं है, स्कूल तक नहीं. हमारे बच्चे यहां नर्क जैसी ज़िंदगी जी रहे हैं. उनके लिए कोई सुरक्षा नहीं है. हम कैसे जिएंगे?"

"हमें बस सुरक्षा चाहिए. हम डर के साथ सोते हैं और डर के साथ ही जागते हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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