पीएम मोदी और बीजेपी से रिश्ते क्यों बनाना चाहते हैं नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड

शरद केसी

बीबीसी न्यूज़ नेपाली

नेपाल में सत्तारूढ़ सीपीएन (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल) माओइस्ट सेंटर के नेता भारत यात्रा पर आने वाले हैं.

नेपाल के माओवादी नेताओं ने इस बात की पुष्टि की है कि ये यात्रा भारत में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के निमंत्रण पर हो रही है.

ऐसी रिपोर्टें भी आई थीं कि पिछले हफ़्ते बीजेपी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने दिल्ली में खुद ही इस बारे में सार्वजनिक रूप से जानकारी दी थी.

इस रिपोर्ट के मुताबिक़ जेपी नड्डा ने नेपाली नेताओं की भारत यात्रा के बारे में ये बयान 12 अलग-अलग देशों के राजदूतों और उच्चायुक्तों के साथ अपनी बातचीत के दौरान दिया था.

माओवादी पार्टी के विदेश मामलों के विभाग के उपप्रमुख राम कार्की ने इस बाबत पूछे जाने पर बताया कि उन्हें कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है लेकिन 'ऐसी अफवाहें उन्होंने भी सुनी' है.

हालांकि सीपीएन माओइस्ट सेंटर की उपाध्यक्ष पम्फा भुसाल ने बीजेपी के निमंत्रण की पुष्टि की है. उन्होंने बताया कि जेपी नड्डा का निमंत्रण बीजेपी के विदेश मामलों के विभाग के प्रमुख की ओर से भेजी गई चिट्ठी के जरिए मिला है.

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तय हो चुके हैं नाम

हालांकि ये यात्रा कब होगी, इसके बारे में अभी तक कोई फ़ैसला नहीं हुआ है. पम्फा भुसाल के मुताबिक़, "ये अगस्त के पहले हफ़्ते में हो सकती है."

माओवादी नेताओं ने ये संकेत दिया है कि पार्टी उपाध्यक्ष पम्फा भुसाल सीपीएन माओइस्ट सेंटर के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर सकती हैं.

लेकिन पम्फा भुसाल का कहना है कि पार्टी में अभी इस मुद्दे पर चर्चा हो रही है कि प्रतिनिधिमंडल में कौन-कौन से नेता शामिल होंगे.

उन्होंने बताया कि प्रतिनिधिमंडल में पांच से छह नेता शामिल हो सकते हैं.

कुछ माओवादी नेताओं के अनुसार, इस यात्रा के लिए जिन लोगों के नाम पर चर्चा हुई है, उनमें चक्रपाणि खनाल, रामेश्वर राय यादव और सत्य पहाड़ी प्रमुख हैं.

एक माओवादी नेता ने बताया, "उनके नाम पर लगभग फ़ैसला हो चुका है. अगर बीजेपी खुद ये कहती है कि और अधिक संख्या में वरिष्ठ नेता भारत आएं या फिर जिन नेताओं के नाम पर फ़ैसला हो चुका है, उनमें कोई भारत जाने से हिचकिचाहट दिखाए तो प्रतिनिधिमंडल में शामिल नाम बदल सकते हैं."

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इस यात्रा का मक़सद और संदेह

भारतीय जनता पार्टी इस समय एक ऐसे प्रोग्राम पर काम कर रही है जिसके तहत पार्टी अपने संगठन का प्रचार कर रही है.

सीपीएन माओइस्ट सेंटर की उपाध्यक्ष पम्फा भुसाल कहती हैं, "ये प्रोग्राम बीजेपी के बारे में लोगों की समझ बढ़ाने के लिए है. ये दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है जिसके पास सबसे अधिक संख्या में सदस्य हैं."

इसी सिलसिले में पार्टी के अध्यक्ष प्रचंड पहले ही बीजेपी मुख्यालय का दौरा कर चुके हैं.

भारत में नेपाल के राजदूत रह चुके दीप कुमार उपाध्याय की राय में इस दौरे को सामान्य यात्रा के रूप में ही देखा जाना चाहिए.

उनका कहना है, "ये दोनों देशों के हित में है कि दोनों देशों की सत्तारूढ़ पार्टियां संबंध स्थापित करना चाहती हैं और उनमें सुधार चाहती है. ये अच्छी बात है."

हाल ही में जब प्रचंड नेपाल के प्रधानमंत्री की हैसियत से भारत गए थे तो उन्होंने उज्जैन की यात्रा भी थी.

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प्रचंड महाकालेश्वर मंदिर गए जहां उन्होंने पूजा अर्चना की. इस पर नेपाल में विवाद भी हुआ. हालांकि भारत से लौटने के बाद वे पशुपतिनाथ के मंदिर भी गए.

प्रधानमंत्री प्रचंड अपनी गतिविधियों को लेकर हाल के दिनों में अपनी पार्टी के भीतर ही आलोचनाओं के निशाने पर रहे हैं.

प्रचंड के आलोचकों में माओवादी नेता लेखनाथ न्यौपाने भी एक हैं.

उन्होंने कहा, "अगर इस दौरे का कोई छुपा हुआ मक़सद नहीं है तो पड़ोसी देसों की सत्तारूढ़ पार्टियों का एक दूसरे को निमंत्रण देना, एक दूसरे के यहां आना-जाना और एक दूसरे के अनुभव साझा करना एक सामान्य और औपचारिक बात है."

लेकिन अगले ही पल वे तंज भरे लहजे में कहते हैं, "शायद ऐसी परिस्थिति इसलिए भी पैदा हुई है क्योंकि हमारी पार्टी की जो विचारधारा है, वो कमज़ोर पड़ रही है."

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क्या प्रचंड बदल रहे हैं?

लेखनाथ न्यौपाने का मानना है कि प्रचंड का महाकालेश्वर जाना और वहां से जल लाकर पशुपतिनाथ मंदिर में अर्पण करना, उस मानसिकता का हिस्सा है जिसमें ये लगता है कि बीजेपी के साथ सहयोग करने से नेपाल में जनमत और चुनावों पर इसका असर पड़ सकता है.

हालांकि वे भी ये कहते हैं, "लेकिन ऐसा करना माओवादी पार्टी की घोषित नीति और सिद्धांतों के प्रतिकूल है. हालांकि ये साफ़ हो गया है कि प्रचंड का महाकालेश्वर और पशुपतिनाथ के दर्शन के लिए जाना केवल सामान्य धार्मिक आस्था का विषय नहीं है बल्कि वे इसका फायदा उठाना चाहते हैं."

दूसरी तरफ़ पूर्व राजदूत दीप कुमार उपाध्याय को लगता है कि प्रधानमंत्री प्रचंड बदल रहे हैं.

वे कहते हैं, "नेपाल में प्रचंड अभी भी इसी विचार के हिमायती हैं कि धर्म आम लोगों के लिए एक अफीम की तरह है. हालांकि वे भारत में महाकालेश्वर मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं. पीतांबरी धोती पहनते हैं, माथे पर चंदन लगाते हैं. मंदिर के रिवाजों के मुताबिक़ हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं और बाद में पशुपतिनाथ मंदिर जाते हैं."

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चीन से नजदीकी का सवाल

उपाध्याय कहते हैं, "मैं खुद ये मानता हूं कि अध्यात्म की जागृति अच्छी बात है चाहे वो धार्मिक हो या न हो. शायद प्रचंड कर रहे हैं, उससे ये संदेश जाता है कि वो अपनी विचारधारा पर कठोर रुख रखने के बजाय एक व्यावहारिक राजनेता है."

दूसरी तरफ़, माओवादी नेताओं का चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से अभी भी संबंध बना हुआ है. वे नियमित रूप से चीन की यात्रा भी करते रहते हैं.

पूर्व राजदूत दीप कुमार उपाध्याय का कहना है कि कभी भारत से करीबी और कभी चीन से नजदीकी, इसे लेकर दिक्कत हो सकती है.

वे कहते हैं, "कूटनीतिक रिश्तों में परिपक्वता और गंभीरता बेहद ज़रूरी चीज़ें हैं. नेपाल के लिए ये ज़रूरी है कि दोनों देशों के साथ एक जैसी दूरी बनाई रखी जाए."

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माओवादियों और हिंदुत्व समर्थकों के बीच क्या रिश्ता है?

सशस्त्र विद्रोह की पृष्ठभूमि से आने वाले कुछ कट्टर माओवादी नेता भी ये मानते हैं कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी भी अपने माओवादी सिद्धांतों से पीछे हट रही है.

सैद्धांतिक रूप से कम्युनिस्ट पार्टी वर्ग के आधार पर अपना राजनीतिक विश्लेषण करती हैं और किसी के साथ उनके रिश्ते इसी बात पर निर्भर करते हैं कि सामने वाला किस वर्ग से ताल्लुक रखता है.

ऐसे में सवाल उठता है कि सीपीएन माओवादी सेंटर जैसी कोई पार्टी क्या हिंदुत्व समर्थक भारतीय जनता पार्टी को ऐसे संगठन के तौर पर देखती है जिसके साथ वो सहयोग का रास्ता चुन सके?

लेखनाथ न्यौपाने कहते हैं, "सिद्धांत और वर्ग विश्लेषण के नजरिए से भारतीय जनता पार्टी के साथ मिल कर काम करने की कोई भी सफ़ाई नहीं दी जा सकती है. हालांकि हमें किसी पड़ोसी देश की सत्तारूढ़ पार्टी के साथ इस तरह भी बर्ताव नहीं करना चाहिए जैसे कि वो कोई अछूत हो. इसके बजाय हमें रिश्तों को इस तरह से आगे ले जाना चाहिए जो व्यावहारिक उद्देश्यों से ज़रूरी हो."

लेकिन लेखक और पूर्व माओवादी नेता ऋषिराज बराल का कहना है कि प्रचंड की पार्टी पहले ही माओवाद के सिद्धांतों को छोड़ चुकी है. इसलिए बीजेपी मुख्यालय जाने के सीपीएन माओइस्ट सेंटर के प्रतिनिधिमंडल के कार्यक्रम में कोई असामान्य बात नहीं है.

वे कहते हैं, "नेपाली नेताओं में इस बात को लेकर समझदारी है कि भारत के सत्ता प्रतिष्ठान, ख़ासकर भारतीय जनता पार्टी को खुश करना फायदेमंद है."

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बीजेपी और नेपाल के राजनीतिक दल

ऋषिराज बराल का कहना है कि "फिलहाल ऐसा लग रहा है कि प्रचंड का इरादा भारत की मदद से प्रधानमंत्री पद पर अपनी पकड़ मजबूत रखने का है और जितनी जल्दी हो सके शांति प्रक्रिया को पूरी कर लिया जाए."

नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा भी अपने कार्यकाल के दौरान जब भारत दौरे पर गए थे तो वे बीजेपी मुख्यालय भी गए थे.

प्रधानमंत्री के रूप में एक राजनीतिक दल के दफ़्तर जाने और भारत के प्रमुख विपक्षी नेता से न मिलने को लेकर उन्हें आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा था. किसी नेपाली प्रधानमंत्री के लिए ये अपनी तरह का पहला मामला था.

भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाने की बीजेपी की कोशिश के लिए कई राजनीतिक दल उसकी आलोचना करते रहे हैं.

ऋषिराज बराल कहते हैं, "बीजेपी से भारत की वामपंथी पार्टियां दूर रहती हैं. वो एक हिंदुत्व समर्थक पार्टी है. इसलिए माओवाद के इतिहास वाली पार्टी को बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार के बुरे बर्ताव, ग़ैरबराबरी और निरंकुश शासन के बारे में भी सोचना चाहिए था. लेकिन ये माओवादी पार्टी तो पहले ही अपने बुनियादी उसूलों को छोड़ चुकी है."

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प्रचंड का हिंदुत्व एजेंडा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अमेरिका यात्रा के दौरान वाशिंगटन में उनका जिस स्तर पर भव्य स्वागत हुआ, उसे लेकर अमेरिका में एक तबके ने भारत में उनकी सरकार के कामकाज की शैली को देखते हुए इस पर सवाल उठाया.

हाल की घटनाओं को देखकर कुछ लोगों की ये राय है कि प्रचंड हिंदुत्व समर्थक मोदी और उनकी पार्टी के साथ सहयोग बढ़ाना चाहते हैं.

इसी तबके का ये ख्याल भी है कि प्रचंड के ऐसा करने से नेपाल में हिंदू राष्ट्र समर्थकों का मनोबल बढ़ेगा.

लेखक ऋषिराज बराल कहते हैं को ये लगता है कि प्रचंड हिंदुत्व के एजेंडे पर आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, "बीजेपी को इस बात का भरोसा दिलाने के बजाय प्रचंड की और कोई दिलचस्पी नहीं है कि वो उस हिंदुत्व की नुमांइदगी करते हैं जिसकी बात बीजेपी करती है और इस मकसद के लिए बीजेपी को नेपाल के किसी और राजनीतिक दल की तरफ़ देखने की कोई ज़रूरत नहीं है."

लेकिन माओवादी नेता लेखनाथ न्यौपाने का कहना है कि हाल की घटनाओं से किसी नतीजे तक पहुंचना मुमकिन नहीं है.

उन्होंने कहा, "ऐसा कहना फिलहाल जल्दबाजी होगा कि इसका सिलसिला शुरू हो चुका है. अगर हम फिर भी ये कहते हैं तो इस नतीजे पर पहुंचने के लिए हमारे पास कोई ठोस आधार नहीं है."

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