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प्रीतम सिंह: वो कारोबारी जिनके चलते नेपाली पीएम प्रचंड विवादों में
विष्णु पोखरेल
बीबीसी न्यूज़ नेपाली
नेपाल के कारोबारी प्रीतम सिंह इन दिनों फिर से सुर्ख़ियों में हैं. नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड ने उनसे अपनी नज़दीकी को लेकर एक बयान दिया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि प्रीतम सिंह ने उन्हें प्रधानमंत्री बनवाने में बड़ी मदद की और इसके लिए कई बार भारत के दौरे पर भी गए.
इस बयान के बाद प्रचंड की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ गई हैं और विपक्ष उनसे इस्तीफ़े की मांग कर रहा है. इस विवाद के बीच एक बार फिर से नेपाल में प्रीतम सिंह की चर्चा हो रही है.
चार साल पहले काठमांडू के बाबरमहल से प्रसूति अस्पताल की ओर जाने वाली गली में एक विशाल परिसर में स्थित एक पुरानी शैली में बने घर पर मैं उनसे मिलने गया था.
मकान के मुख्य द्वार पर गोल्डन प्लेट पर लिखा था- सिंह निवास.
प्रीतम सिंह अपने कुछ सहायकों के साथ ऊंचे पेड़ों से घिरे इसी घर में रहते हैं. भारतीय मूल के सिंह की पहचान काठमांडू घाटी में रहने वाले सिख समुदाय के नेता और व्यापारी के तौर पर होती है.
वह नेपाल कैसे आये और यहीं कैसे रह गये, इसकी कहानी बेहद दिलचस्प है.
भारत प्रशासित कश्मीर में जन्मे प्रीतम सिंह 1958 में व्यापार करने के लिए नेपाल आए थे और अब भी सक्रिय हैं. छह दशक तक नेपाल में रहने के बाद सिंह अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कभी भावुक हो जाते हैं तो कभी रोमांचित भी दिखते हैं.
वे कारोबार करने के लिए संयोगवश जम्मू-कश्मीर से नेपाल आए थे. दरअसल 1960 की एक घटना ने उनके जीवन में नया मोड़ ला दिया.
कश्मीर में राजा महेंद्र से मुलाकात
जुलाई 1960 के दूसरे सप्ताह में, प्रीतम सिंह ने भारत प्रशासित कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में राजा महेंद्र से मुलाकात की. हालांकि इस मुलाकात से दो साल पहले वह काठमांडू के नारायणहिती पैलेस में राजा महेंद्र से मिल चुके थे.
लेकिन श्रीनगर की वो मुलाकात उनके लिए ख़ास थी. उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा आमंत्रित किया गया था और राजा महेंद्र के साथ उनकी बैठक हुई थी. उस समय की घटना को याद करते हुए उन्होंने बताया था, ''मैं अपने माता-पिता से मिलने के लिए नेपाल से श्रीनगर गया था.''
उन्हें यह तो पता था कि नेपाल के तत्कालीन राजा महेंद्र कश्मीर आए हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि प्रधानमंत्री ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया है.
उन्होंने 2019 में हुई बीबीसी नेपाली से मुलाकात में बताया था, "मैं दोपहर करीब चार बजे घर से राजभवन गया. राजा महेंद्र और बक्सी साहब वहां बैठे थे."
फिर प्रीतम सिंह को राजा महेंद्र से करीब 15 मिनट तक हुई बातचीत याद आती है. इसका जिक्र करते हुए वे कहते हैं, "राजा महेंद्र ने पूछा 'नेपाल में व्यापार करना कितना आसान है? कोई समस्या तो नहीं है ना?'. ''मैंने कहा, 'सब कुछ ठीक है.''
उनके अनुसार, राजा महेंद्र ने सिंह को अपने मेजर जनरल शेर बहादुर मल्ल से मिलवाया और कहा, "यदि आपको कोई समस्या है, तो मल्ल को बताएं, मैं समाधान करूंगा."
इतिहासकारों ने लिखा है कि राजा महेंद्र ने जून 1960 में जापान, अमेरिका और कनाडा की आधिकारिक यात्रा से लौटते समय कश्मीर की अनौपचारिक यात्रा की थी, लेकिन इतिहासकारों ने इस यात्रा के मक़सद के बारे में स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं लिखा है.
महेंद्र की यात्रा का उद्देश्य बताते हुए प्रीतम सिंह ने कहा, "राजा महेंद्र और रानी रत्ना सहित लगभग 30 से 40 लोगों का एक पर्यटक दल अमरनाथ यात्रा पर गया था. जब वे अमरनाथ यात्रा के लिए निकले, तो हम भी उनके साथ पहलगाम तक चले गए थे."
महेंद्र के साथ उस संक्षिप्त मुलाकात के कुछ दिनों बाद, सिंह नेपाल लौट आए और शिपिंग व्यवसाय में शामिल हो गए.
अकाल और चावल की वह खेप
इस मुलाकात के लगभग दो साल बाद एक दिन उन्हें अंचलाधिकारी कार्यालय से फोन आया. सिंह कहते हैं, ''वहां एक अंचलाधिकारी थे, मैं उनका नाम भूल गया, उन्होंने मुझसे कहा, 'राजा का आदेश है, भारत से तुरंत 10,000 टन चावल लाना है. आप इसे कैसे लाएंगे?"
उस समय महज़ पांच-सात ट्रकों से अपना कारोबार चलाने वाले प्रीतम सिंह के लिए कुछ ही दिनों में इतना चावल लाना बहुत मुश्किल था.
हालांकि, उन्होंने अंचलाधिकारी से कहा, "यदि आप मुझे कुछ सुविधाएँ प्रदान कर सकते हैं, तो मैं उन्हें ला सकता हूँ."
अंचलाधिकारी ने उन्हें सुविधा प्रदान करने का आश्वासन दिया. इसके बाद सिंह ने तीन मांगें कीं - ट्रक नंबर प्लेटों का आसान पंजीकरण, कर छूट और माल की आसान लोडिंग और अनलोडिंग.
उन्होंने भारतीय ट्रकों से शिपिंग के लिए ऐसी शर्तें बनाई थीं. नेपाल सरकार ने न केवल उनकी तीनों शर्तें मान लीं, बल्कि उन्हें भारतीय ट्रकों में अस्थायी नंबर प्लेट लगाने का काम भी सौंप दिया.
वह याद करते हैं, "उस समय, मुझे अकेले 500 से 650 नंबर बांटने की इज़ाजत थी. इसलिए मैंने उन सभी को नंबर दिए और चावल भेज दिया. सरकार ने सोचा कि इसमें दो से तीन महीने लगेंगे, लेकिन मैं 15 से 20 दिनों के भीतर ही सारा चावल ले आया."
सिंह के मुताबिक वह चावल नेपाल के पहाड़ी इलाकों में अकाल के बाद सहायता के तौर पर नेपाल को मुहैया कराया गया था. चावल की खेप को सफलतापूर्वक ले आने के बाद, सिंह को राजा महेंद्र ने नारायणहिती महल में बुलाया.
प्रीतम सिंह इस मुलाकात का जिक्र करते हुए कहते हैं, "उस समय मुझे 1000 रुपये इनाम के तौर पर बक्सा, एक प्रमाणपत्र और धन्यवाद पत्र भी मिला था. लेकिन प्रमाणपत्र पर राजा के हस्ताक्षर नहीं हैं. इस पर तत्कालीन खाद्य मंत्री के हस्ताक्षर हैं."
राजा की आज्ञा से बेटे को नागरिकता
उस समय राजा महेंद्र ने पूछा कि क्या उन्हें किसी और चीज़ की ज़रूरत है.
प्रीतम सिंह बताते हैं, "उस समय मेरा बेटा चार साल का था. मैंने उनसे नागरिकता पाने के लिए कहा. यह राजा का आदेश था और बाद में मुझे उसके आधार पर अपने बेटे की नागरिकता मिल गई."
राजा महेंद्र से वह उनकी तीसरी मुलाकात थी. इसके कुछ साल बाद सिंह को महेंद्र की सबसे बड़ी बेटी शांति राज्यलक्ष्मी के घर से आमंत्रित किया गया. जब वह वहां पहुंचे तो राजा महेंद्र भी वहां मौजूद थे.
राजा ने सिंह से कहा, "बेटी और दामाद ने अमरनाथ की यात्रा की इच्छा की है, तुम्हें उन्हें भ्रमण कराना चाहिए."
कुछ ही दिनों में प्रीतम सिंह, शांति और उनके पति दीपक जंग बहादुर सिंह और कुछ अन्य लोगों के साथ अमरनाथ यात्रा के लिए गए.
दीपक और शांति की शादी 1965 में हुई थी. सिंह को अमरनाथ की उस यात्रा की तारीख याद नहीं है, लेकिन उन्हें लगता है कि यह शादी के एक या दो साल बाद की बात है.
नेपाली शाही परिवार के उन सदस्यों ने अमरनाथ यात्रा के दौरान सिंह के साथ लगभग एक महीने तक यात्रा की. वे एक गाइड बने और अमरनाथ सहित कश्मीर के सभी पर्यटन और धार्मिक क्षेत्रों का दौरा किया.
वह प्रसन्न होकर बताते हैं, ''वे लगभग 10 दिनों तक हमारे घर में भी रहे.'' उनका कहना है कि तब से लेकर अब तक अधिराजकुमारी शांति की परिवार से निकटता कायम है. सिंह ने कहा, "वे अब नहीं हैं, लेकिन अब भी मैं उनके बच्चों से मिलता रहता हूं. उनके बच्चे भी मेरे बारे में पूछते रहते हैं."
साल 2001 में राजदरबार नरसंहार में राजा वीरेंद्र के परिवार सहित अधिराजकुमारी शांति की भी मृत्यु हो गई थी.
पहली मुलाकात
राजा महेंद्र से प्रीतम सिंह की पहली मुलाकात की कहानी भी दिलचस्प है. जम्मू में जन्मे प्रीतम सिंह ने स्कूल ख़त्म करने के बाद एक पाइलट बनने का सपना देखा.
यही सपना उन्हें लखनऊ ले आया. वहां उन्होंने पायलट के रूप में प्रशिक्षण लिया. ट्रेनिंग के दौरान उनका दुलत नाम का एक अच्छा दोस्त था.
वह मित्र बाद में नेपाली विमान उड़ाने लगा और कैप्टन बन गया. राजा महेंद्र के दौरे पर विमान उड़ाने के कारण उनका राजा के साथ घनिष्ठ संबंध था.
उसी मित्र के माध्यम से, जब सिंह 1958 में नेपाल आये, तो उनकी महल में पहली बार राजा महेंद्र से मुलाकात हुई.
सिंह याद करते हैं, ''उस बैठक में राजा महेंद्र ने हमसे पूछा कि हम क्या करेंगे. हमारा परंपरागत रूप से जम्मू-कश्मीर में परिवहन व्यवसाय है, यह जानने के बाद उन्होंने कहा, 'नेपाल आइए और व्यापार कीजिए, हमें कुछ मदद की ज़रूरत है.'"
राजा महेंद्र के अनुरोध के साथ-साथ अपनी रुचि के कारण, उन्होंने नेपाल को व्यापार करने का स्थान बनाने के बारे में सोचा और कुछ ही महीनों में वे तीन ट्रक लेकर नेपाल आ गये. उन्हें याद है कि वह कई दिन की यात्रा के बाद पटना होते हुए काठमांडू पहुंचे थे.
वे उस समय के नेपाल को याद करते हुए कहते हैं, ''सड़क कहीं भी अच्छी नहीं थी, तराई में तो सिर्फ़ छोटी गाड़ियों के लिए ही रास्ता था. कांति राजपथ से ट्रक लाना और भी मुश्किल था. हम एक के बाद एक ट्रक लेकर आए. जीपों के लिए बनी सड़क पर बहुत परेशानी होती है.”
ट्रक को काठमांडू घाटी में लाने के बाद, वह हनुमानढोका गए और तीनों ट्रकों का पंजीकरण किया. उन्हें उस समय पंजीकृत ट्रकों के नंबर अभी भी याद हैं - 238, 239 और 240.
ट्रांसपोर्ट व्यवसाय से जुड़े होने के कारण अन्य ड्राइवरों के साथ उन्हें भी ड्राइविंग लाइसेंस मिल गया. उन्होंने अपनी दाढ़ी बनाते हुए कहा, "मेरा लाइसेंस नंबर 5200 है."
इन दिनों क्या-क्या है कारोबार
प्रीतम सिंह लंबे समय तक शिपिंग व्यवसाय से जुड़े रहे लेकिन अब उनका परिवार यह व्यवसाय छोड़ चुका है. लगभग 14 साल पहले अपने बेटे और इसके छह महीने बाद पत्नी की मृत्यु के बाद, वह धीरे-धीरे शिपिंग व्यवसाय से दूर हो गए.
उन्होंने दो अन्य साझेदारों के साथ मिलकर कुछ दशक पहले मॉडर्न इंडियन स्कूल की शुरुआत की थी. अब भी वह इसकी देखरेख करते हैं. वह स्कूल के लिए आवश्यक बसों की व्यवस्था भी देखते हैं. उनका कहना है कि परिवहन व्यवसाय में उनका दीर्घकालिक अनुभव स्कूल प्रबंधन में भी काम आता है.
उनकी तीन बेटियां अपने परिवार के साथ विदेश में हैं. उनका सबसे बड़ा पोता नेपाल में है. वह ललितपुर में रहता है और अपना स्कूल चलाता है.
कश्मीर पर राय
प्रीतम सिंह कश्मीर जाते रहते हैं. वे वहां की अपनी कुछ ज़मीन बेचना चाहते हैं, लेकिन अभी तक नहीं बेच पाए हैं.
हालांकि वे कश्मीर को मिले विशेषाधिकारों को रद्द करने के भारत सरकार के फ़ैसले के समर्थक हैं. सिंह को लगता है कि इस फ़ैसले से कश्मीर के आम नागरिकों को फायदा हुआ है.
2019 में डेढ़ घंटे की लंबी बातचीत के बाद सिंह लिविंग रूम से उठकर सीढ़ियों पर पहुंचे और दोनों हाथ हिलाते हुए कहा, "आपने मुझे 60 साल पहले की यादों में पहुंचा दिया. उस समय की बातें मेरी आंखों के सामने घूमने लगीं."
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