दिल्ली दंगों के मामले में उमर ख़ालिद को फिर नहीं मिली ज़मानत

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- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली की एक निचली अदालत ने जेएनयू के पीएचडी स्कॉलर और स्टूडेंट एक्टिविस्ट उमर ख़ालिद की ज़मानत ख़ारिज कर दी है. ख़ालिद पर 'दिल्ली दंगों में साज़िश रचने' का केस चल रहा है.
एडिशनल सेशन्स जज समीर वाजपेयी ने 13 मई को दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.
ज़मानत रद्द किए जाने के आदेशस की कॉपी फ़िलहाल नहीं आई है. इसमें ज़मानत रद्द किए जाने के कारणों का ज़िक्र होगा.
उमर खालिद पर आतंकवाद विरोधी कानून 'गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधियनियम यानी यूएपीए के तहत आरोप लगाए गए हैं. इससे पहले कड़कडूमा कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी ज़मानत ख़ारिज कर दी थी. फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में ज़मानत की याचिका डाली.
फरवरी में उमर ख़ालिद ने ये कहते हुए सुप्रीम कोर्ट से अपनी ज़मानत याचिका वापस ले ली थी कि वे ट्रायल कोर्ट जाएंगे. दिल्ली की निचली अदालत के मंगलवार के फ़ैसले के साथ ही ये दूसरी बार है जब ट्रायल कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी है.

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छात्र नेता और सामाजिक कार्यकर्ता उमर ख़ालिद सितंबर 2020 से ही जेल में बंद हैं. उन पर आरोप है कि उन्होंने फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुई हिंसा को भड़काया था. उनके ख़िलाफ़ दो एफआईआर दर्ज हैं.
एक मामले में उमर को अप्रैल 2021 में ज़मानत मिल गई थी. दूसरे मामले में उनके ख़िलाफ़ अनलॉफुल एंड ऐक्टिविटिज प्रिवेंशन एक्ट यानी यूएपीए के तहत आरोप लगाए गए हैं. इस मामले में अब तक दो अदालतें उनकी ज़मानत याचिका खारिज कर चुकी हैं. सुप्रीम कोर्ट में उनकी ज़मानत याचिका अप्रैल 2023 से लंबित है.
कानून के कई जानकारों का कहना है कि उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ जो सबूत हैं वो काफी कमजोर हैं. इसलिए उन्हें ज़मानत पर बाहर आ जाना चाहिए. पिछले कुछ महीनों से वकीलों की एक शिकायत यह है कि ख़ालिद की ज़मानत याचिका लिस्टिंग के नियमों का उल्लंघन कर एक पीठ के सामने सूचीबद्ध की गई है.
उनके ख़िलाफ़ केस की सुनवाई 2020 से शुरू नहीं हुई है. यहां तक कि उन पर अभी आरोप भी तय नहीं हुए हैं.
उमर ख़ालिद पर आरोप क्या हैं?

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नागरिकता कानून में संशोधन (सीएए) के ख़िलाफ़ दिसंबर 2019 में व्यापक पैमाने पर आंदोलन हुआ था. इस संशोधन के बाद मुस्लिमों को छोड़कर हिंदू और जैन जैसे समुदाय के लोगों को नागरिकता दिए जाने की बात थी. उमर ख़ालिद इन विरोध-प्रदर्शनों में शामिल रहे. प्रदर्शन करीब तीन महीने तक चले थे.
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे भड़क उठे थे. इसमें 53 लोग मारे गए. इनमें से अधिकांश मुसलमान थे. अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उमर ख़ालिद ने प्रदर्शन के दौरान अन्य लोगों के साथ मिलकर हिंसा की साजिश रची. इसी वजह से दंगे हुए.
उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ दो एफआईआर दर्ज की गईं. एफआईआर नंबर 101/2020 को 24 फरवरी 2020 को उत्तर पूर्व दिल्ली में दर्ज कराया गया. इसमें उमर पर दंगा करने, पत्थरबाजी और बमबाजी करने, दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने, पुलिस पर हमला करने, सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाने आदि के आरोप हैं.
इस मामले में अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया है कि एक गहरी साजिश की वजह से दिल्ली में दंगे हुए. अभियुक्तों पर सीएए के ख़िलाफ़ ग़लत जानकारियां फैलाने और सड़क पर चक्का जाम करने का आरोप भी लगाया गया है.
उसका कहना है कि उमर ख़ालिद की पहचान एक गवाह ने की है कि वो इस साजिश के अभियुक्तों से मिल रहे थे.
वहीं ख़ालिद के वकील का कहना है कि पत्थरबाजी के समय वो वहां मौजूद नहीं थे. उनका आरोप है कि उमर खालिद की गिरफ्तारी विरोध की आवाज़ को दबाने की राजनीतिक साजिश है.
एफआईआर नंबर 59

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दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में ज़मानत मिलने के बाद भी उमर ख़ालिद अभी भी जेल में बंद हैं, क्योंकि उनके ख़िलाफ़ एक दूसरी एफआईआर दर्ज है. एफआईआर संख्या 59/2020 में उमर ख़ालिद और अन्य लोग अभियुक्त बनाए गए हैं.
अन्य धाराओं के अलावा उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ चरमपंथ, साज़िश रचने, यूएपीए के तहत गैर कानूनी गतिविधियों और आईपीसी की धाराओं के तहत दंगा फैलाने के आरोप लगाए गए हैं.
सरकार का कहना है कि 'पिंजरा तोड़' और 'स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया' जैसे संगठनों ने सीएए के ख़िलाफ़ आंदोलन की साजिश रची और गतिरोध पैदा किया. इसमें ''पुलिस और अर्धसैनिक बलों पर हमला, सांप्रदायिक हिंसा, गैर मुस्लिमों पर हमला और सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना'' शामिल है.
सरकार ने उमर ख़ालिद को दंगों का मास्टरमाइंड और दूर से पर्यवेक्षण करने वाला बताया है. इसके लिए सरकार ने अनाम गवाहों के बयान, उन वाट्सऐप ग्रुपों जिनसे उमर खालिद जुड़े थे, उनको किए गए फोन कॉल और विरोध-प्रदर्शन के लिए आयोजित बैठकों में उनकी मौजूदगी को आधार बनाया है.
हालांकि उमर खालिद का पक्ष है कि जब दंगे हुए, वो उस समय दिल्ली में मौजूद नहीं थे.
उनका तर्क है कि उन्होंने कोई भड़काऊ भाषण नहीं दिया और न ही हिंसा भड़काई. उनका कहना है कि अभियोजन पक्ष के सबूत किसी भी अपराध को साबित नहीं करते हैं. उनके वकील ने ये भी कहा है कि उमर ख़ालिद के दिमाग का आकलन उनके पीएचडी थीसिस से किया जा सकता है, जो उन्होंने झारखंड में आदिवासियों के कल्याण पर लिखी थी.
अदालत का क्या तर्क है?

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दिल्ली की कड़कड़डूमा ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट उमर ख़ालिद की जमानत याचिका खारिज कर चुकी हैं. दोनों अदालतों का कहना था कि उमर के ख़िलाफ़ आरोप प्रथम दृष्टया सही थे. अन्य तथ्यों के अलावा न्यायालय ने इन तथ्यों पर भरोसा किया:
- उमर खालिद कई वाट्सऐप ग्रुप का हिस्सा थे, जहां दंगों के अन्य साजिशकर्ता भी थे जिन्होंने चक्का जाम करने को लेकर चर्चा की थी.
- दंगे शुरू होने के बाद अन्य अभियुक्तों ने उमर को कई कॉल किए. इससे उनकी दंगों में संलिप्तता का संकेत मिलता है.
- कई गवाहों, जिनकी पहचान उजागर नहीं की गई है, ने भी ख़ालिद के ख़िलाफ़ आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि ख़ालिद ने 'चक्का जाम' का समर्थन किया, सरकार को उखाड़ फेंकने की अपील की और भड़काऊ भाषण दिया.
- खालिद ने महाराष्ट्र में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा का उल्लेख करते हुए एक भाषण दिया था. एक गवाह के मुताबिक़, उन्होंने लोगों से सड़क पर उतरने को कहा था.
दिल्ली हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि उमर ख़ालिद ने क्रांति की अपील की, जिसके बारे में उनका मानना था कि इसका असर उन लोगों पर पड़ सकता है, जो वहां मौजूद नहीं थे और यह जरूरी नहीं है कि क्रांति रक्तहीन ही हो.
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