राजस्थान: जबरन धर्म परिवर्तन पर बनेगा क़ानून, लेकिन क्या हैं चुनौतियां

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- Author, अंशुल सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राजस्थान में मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा की सरकार धर्म परिवर्तन को लेकर क़ानून बनाने जा रही है. इसके लिए सोमवार को विधानसभा में बजट सत्र के दौरान विधेयक पेश किया गया.
इस विधेयक के क़ानून बनने पर राजस्थान में जबरन धर्म परिवर्तन पर अधिकतम 10 साल तक की सज़ा का प्रावधान हो जाएगा. अगर कोई स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है तो उसे एक लंबी प्रक्रिया से गुज़रना होगा.
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने धर्मांतरण के ख़िलाफ़ विधेयक पेश किया, जिसका नाम 'राजस्थान विधि विरुद्ध धर्म-संपरिवर्तन प्रतिषेध विधेयक 2025' है.
विधेयक पर कांग्रेस नेता और राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने कहा कि 'सरकार किस मंशा से ये बिल लाई है, देश में पहले से ही कानून है कि कोई भी ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन नहीं करा सकता'.
राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने साल 2008 में भी ऐसी कोशिश की थी लेकिन तब उस बिल को केंद्र की मंजूरी नहीं मिली थी.

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मीडिया से बातचीत में टीकाराम जूली ने कहा, "आज भी कोई लोगों का जबरदस्ती धर्म परिवर्तन नहीं करा सकता है. देश के अंदर क़ानून है. राजस्थान के अंदर भी क़ानून है. ये सरकार किस मंशा से लेकर आई है, यह बिल के टेबल होने के बाद पता चलेगा."
कांग्रेस विधायक और चीफ़ व्हिफ रफ़ीक ख़ान बिल को लेकर बीजेपी सरकार पर कटाक्ष किया है.
शायराना अंदाज़ में उन्होंने कहा, "शु्क्र है कि परिंदों का कोई धर्म नहीं होता, वरना आसमान में भी कुछ न कुछ कत्लेआम हो जाता. बहुत से काम हैं जो सरकार को करने चाहिए. काम के नाम पर ज़ीरो है सरकार और बात सिर्फ़ इधर-उधर की कर रही है."
जबरन धर्म परिवर्तन कराया तो क्या सज़ा होगी?
विधेयक में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा की तरफ़ से बिल के 'उद्देश्यों और कारणों' का ज़िक्र किया है.
इस पैराग्राफ़ में लिखा है, "संविधान प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, पालन करने और उसका प्रचार करने का मौलिक अधिकार देता है. हालांकि धर्म की स्वतंत्रता के व्यक्तिगत अधिकार को धर्मांतरण के सामूहिक अधिकार के रूप में नहीं समझा जा सकता है. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति और धर्मांतरित होने वाले व्यक्ति दोनों का एक समान है."
"हालांकि, हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं- जहां भोले-भाले लोगों को ग़लत बयानबाज़ी, ताक़त, दबाव, लालच या धोखाधड़ी के ज़रिए एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित किया गया है."
विधेयक में लालच या प्रलोभर की परिभाषा भी स्पष्ट की गई है. इसमें नकद, धन, किसी धार्मिक संस्था द्वारा संचालित स्कूल में नौकरी या नि:शुल्क शिक्षा और बेहतर जीवन शैली शामिल है.
अगर कोई शादी सिर्फ़ ग़ैर-क़ानूनी धर्म परिवर्तन के एकमात्र उद्देश्य से की जाती है तो ऐसी शादी को निरस्त या रद्द कर दिया जाएगा.
धर्मांतरण के मामले में कोई भी पीड़ित व्यक्ति, उसके माता-पिता, भाई, बहन या अन्य कोई नज़दीकी रिश्तेदार एफ़आईआर दर्ज करवा सकता है.

विधेयक के मुताबिक़, धर्मांतरण मामले में दोषी पाए जाने पर एक से पांच साल की जेल की सज़ा हो सकती है और कम से कम 15 हज़ार रुपये का जुर्माना हो सकता है. नाबालिग, महिला और अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) से संबंधित व्यक्ति के धर्म परिवर्तन के मामले में दो से दस साल तक की सज़ा और 25 हज़ार रुपए तक जुर्माना भरना पड़ सकता है.
सामूहिक धर्म परिवर्तन के मामले में, तीन से दस साल के बीच जेल होगी और कम से कम 50 हज़ार रुपए का जुर्माना देना होगा.
विधेयक में कोर्ट की तरफ़ से पीड़ित को मुआवजा देने की बात भी कही गई है.
विधेयक के मुताबिक़, "न्यायालय उक्त धर्मांतरण के पीड़ित को आरोपी द्वारा देय उचित मुआवजा भी देगा, जो अधिकतम पांच लाख रुपये तक हो सकता है और जुर्माने के अतिरिक्त होगा."
अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है तो उसे तय घोषणापत्र लिखकर 60 दिन पहले जिलाधिकारी (डीएम) या संबंधित अधिकारी के पास जमा करना होगा. अगर इस प्रक्रिया का उल्लंघन होता है तो तीन साल तक की सज़ा और कम से कम 10 हज़ार रुपए के जुर्माने का प्रावधान है.
इसके बाद धर्मांतरण कराने वाले या धर्म परिवर्तन के लिए समारोह आयोजित करने वाले व्यक्ति को एक निर्धारित फ़ॉर्म के ज़रिए डीएम को सूचना देनी होगी. यह सूचना धर्म परिवर्तन के एक महीने पहले देनी पड़ेगी. अगर इसका उल्लंघन होता है तो पांच साल तक की क़ैद और न्यूनतम 25 हज़ार रुपए के जुर्माना रखा गया है.
धर्म बदलने वाले व्यक्ति को धर्मांतरण के 60 दिनों के भीतर डीएम को तय घोषणापत्र के रूप में सूचना भेजनी होगी.
धर्मांतरण ग़लत बयानी, लालच या जबदस्ती आदि से नहीं हुआ है इसको साबित करने की ज़िम्मेदारी उस व्यक्ति की होगी जिसने कथित रूप से धर्म परिवर्तन कराया है.
क्या हैं क़ानूनी चुनौतियां?
सु्प्रीम कोर्ट के वकील उत्कर्ष सिंह का कहना है कि उत्तर भारत के राज्यों में इस तरह के क़ानून प्रमुख रूप से अंतरधार्मिक शादियों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं.
राजस्थान से जुड़े विधेयक में सेक्शन 8 में धर्म परिवर्तन को अमान्य करार देने संबंधी परिस्थितियों का ज़िक्र किया गया है.
उत्कर्ष सिंह बताते हैं, " अगर धर्म परिवर्तन करना है तो साठ दिन पहले ज़िलाधिकारी को बताना होगा. इन साठ दिनों में डीएम पुलिस के ज़रिए जांच करेंगे. पुलिस इसमें असल मक़सद का पता लगाएगी. लेकिन सवाल उठता है कि आप कैसे असली मक़सद पता लगा पाएंगे? इस तरह से पुलिस को काफ़ी पावर मिल जाती है."
विधेयक के सेक्शन 6 में यह कहा गया है कि अगर कोई शादी सिर्फ़ ग़ैर-क़ानून धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से की जा रही है तो उसे रद्द कर दिया जाएगा.
उत्कर्ष सिंह कहते हैं, "इस बिल के ज़रिए फ़ैमिली कोर्ट को शादी को निरस्त करने की ताक़त दी गई है. सेक्शन 6 में इसके बारे में पढ़ा जा सकता है. अगर कोई हिन्दू मुस्लिम से शादी कर लेता है और उसका धर्म परिवर्तन हो जाता है या फिर कोई मुस्लिम किसी ईसाई से शादी कर लेता है और उसका धर्म परिवर्तन हो जाता है. ऐसी परिस्थियों में जांच के बाद इन शादियों को अमान्य करार दिया जा सकता है."
उत्कर्ष सिंह का कहना है, "बिल के कई प्रावधान संविधान के आर्टिकल 23-25 और आर्टिकल 14 का उल्लंघन करते हैं. अब जब स्वेच्छा से धर्म बदलने का अधिकार है उसकी जांच पब्लिक ऑफ़िसर कैसे कर सकता है? दूसरा यह नागरिकों के व्यक्तिगत आस्था में दखल देता है. सेक्शन 4 में कहा है कि संबंधित व्यक्ति से जुड़ा कोई भी इंसान शिकायत कर सकता है. अब होना ये चाहिए था कि कोई व्यक्ति ख़ुद आकर बोले कि उसे धर्म परिवर्तन के लिए लालच दिया जा रहा है या कोई बोले कि उस पर धर्म परिवर्तन के दवाब बनाया जा रहा है."
एडवोकेट उत्कर्ष सिंह मानते हैं कि जब तक व्यक्ति स्वयं क़ानून से मदद नहीं मांगता तब तक राज्य को उसके व्यक्तिगत आस्था और धर्म में दखल नहीं देना चाहिए.

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इन राज्यों में है धर्मांतरण क़ानून
अब तक भारत के 11 राज्यों में धर्मांतरण विरोधी क़ानून मौजूद है. ये राज्य हैं- ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, झारखंड, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश. राजस्थान में अगर धर्मांतरण विधेयक अगर क़ानून की शक्ल लेता है तो राजस्थान धर्म परिवर्तन विरोधी क़ानून वाला 12वां राज्य बन जाएगा.
भारत में सबसे पहले ओडिशा में जबरन धर्मांतरण को लेकर साल 1967 में क़ानून लागू हुआ था. क़ानून का उल्लंघन करने पर एक साल की जेल और पांच हज़ार रुपए के जुर्माना लग सकता है.
मध्य प्रदेश ने साल 1968 और अरुणाचल प्रदेश ने साल 1978 में इससे जुड़ा क़ानून बनाया. अरुणाचल प्रदेश में 1978 में इसे लागू किया गया था लेकिन इसके बाद की सरकारों ने इसके कार्यान्वयन के लिए ठोस नियम नहीं बनाए.
गुजरात ने साल 2003 में जबरन धर्मांतरण को लेकर गुजरात धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम बनाया था. तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे.
कर्नाटक में धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2021 को साल 2022 में मंजूरी दी गई थी. राज्य में कांग्रेस की सरकार आने के बाद कहा गया था कि इस क़ानून को वापस लिया जाएगा लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ.
नवंबर 2020 में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020 लेकर आई. अगले साल 2021 में इसे विधानसभा में पारित किया गया और यह धर्मांतरण विरोधी क़ानून बन गया.
क़ानून अस्तित्व में आने के बाद साल 2020 से 2024 के बीच उत्तर प्रदेश में 800 से ज़्यादा मामले दर्ज हुए थे और 1600 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया गया था. 124 लोग ऐसे थे जिन्हें जांच के बाद कोई भूमिका नहीं पाए जाने के कारण छोड़ दिया गया था.
इसके अलावा कुछ और मामले थे जो सुर्खियों में रहे थे-
- साल 2017 में एमपी के खंडवा में तीन ईसाइयों को धर्म परिवर्तन के आरोप में गिरफ़्तार किया गया
- 2021 में यूपी एटीएस ने दो मुसलमान धर्मगुरुओं को साज़िश के तहत हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने के आरोप में गिरफ़्तार किया
- फ़रवरी 2023 में यूपी के जौनपुर में 16 ईसाई गिरफ़्तार हुए

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क्या कह रहे हैं जानकार
संगीत रागी राजनीतिक विश्लेषक और दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं.
धर्मांतरण क़ानून के सवाल पर प्रोफ़ेसर संगीत रागी कहते हैं, "धर्मांतरण क़ानून इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि यहां सिर्फ़ आस्था के आधार पर दूसरे धर्म में जाने की बात नहीं है. जबरन धर्म परिवर्तन के बाद देश का राजनैतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विमर्श भी परिवर्तित हो जाता है. यहां तक कि महात्मा गांधी ने भी धर्म परिवर्तन को देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा माना जाता है. नॉर्थ ईस्ट का उदाहरण हमारे सामने है. आज वहां खासी और दूसरी जनजातियों की बड़ी आबादी ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुकी हैं. ये सब पैदा तो ईसाई नहीं हुए थे न."
आलोचकों का कहना है कि इस तरह के क़ानून से चुनिंदा धर्म के लोगों को निशाना बनाया जाता है. इस पर आप क्या कहेंगे?
प्रोफ़ेसर संगीत रागी कहते हैं, "सवाल ये होना ही नहीं चाहिए कि किसी को निशाना बनाया जा रहा है. अगर इस्लाम और ईसाई धर्म हिन्दुओं को बराबर की नज़र से देखते दो उन्हें जबरन धर्म परिवर्तन न कराना पड़ता और न ही इसके लिए क़ानून बनाना पड़ता. ज़्यादातर मामलों में पैसा या दूसरा लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया जाता है. कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन नहीं करता है. अगर कोई अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन कर रहा है तो उसे बिल्कुल करना चाहिए. अगर लालच देकर धर्म परिवर्तन होगा तो क़ानून की ज़रूरत पड़ेगी."
हालांकि, समाजशास्त्री और राजस्थान यूनिवर्सिटी से सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर राजीव गुप्ता धर्मांतरण विधेयक का धर्म की राजनीति से जोड़कर देखते हैं.
प्रोफ़ेसर राजीव गुप्ता कहते हैं, "उत्तराखंड में यूसीसी लाया गया और अलग-अलग राज्यों में धर्मांतरण विरोधी क़ानून लाए गए हैं. मैं इसे बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति से जोड़कर देखता हूं. धर्म का सवाल निजी आस्थाओं का सवाल है. बीजेपी की तरफ़ से तर्क दिया जाता है कि ज़्यादातर मामलों में धर्म परिवर्तन जबरन कराया जाता है. लेकिन सवाल उठता है कि 18 साल से ज़्यादा उम्र के व्यक्ति को क्या आप जबरन धर्म परिवर्तन करवा सकते हैं?"
लेकिन राज्यों की तरफ़ से तर्क दिया जाता है कि जबरन धर्म परिवर्तन के कई मामले सामने आए हैं इसलिए क़ानून बनाया जा रहा है.
प्रोफ़ेसर राजीव गुप्ता कहते हैं, "हमारे यहां सिविल मैरिज एक्ट है. उस सिविल मैरिज एक्ट के अंदर अंतरधार्मिक विवाह हो सकते हैं. फिर इस तरह के क़ानून का अलग से प्रचार-प्रसार क्यों किया जाता है. विवाह संस्था में क्या सिर्फ़ धर्म के आधार पर तनाव होते हैं. कई बार जाति केंद्रित भी तनाव होते हैं. तो केवल धर्म ही क्यों?"
जबरन धर्मांतरण पर मोदी सरकार का रुख़
साल 2021 के फ़रवरी महीने में लोकसभा के सदस्यों ने गृह मंत्रालय से जबरन धर्म परिवर्तन को लेकर कुछ सवाल पूछे. सवाल पूछने वालों में डॉ. मोहम्मद जावेद, एंटो एंथनी, टी एन प्रतापन, कुंबकुडी सुधाकरण और डॉ. ए चाल्लाकुमार शामिल थे.
सवाल था कि क्या केंद्र सरकार यह मानती है कि अंतरधार्मिक विवाह जबरन धर्म परिवर्तन के कारण हो रहे है?
इसके जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किशन रेड्डी ने लोकसभा को बताया, "कानून एवं व्यवस्था और पुलिस संविधान की सातवीं अनुसूची के मुताबिक़ राज्य सरकार के विषय हैं. इसलिए धर्मांतरण से संबंधित प्रतिबंध, इनका पता लगाने, पंजीकरण, जांच और कानूनी कार्रवाई करना राज्य सरकारों या केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन की चिंताएं हैं. जहां भी उल्लंघन के मामले सामने आते हैं, कानूनी एजेंसियों की तरफ से क़ानून के तहत कार्रवाई की जाती है."
इसके बाद सांसदों ने पूछा कि क्या केंद्र सरकार अंतरधार्मिक विवाहों को रोकने के लिए केंद्रीय धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने का इरादा रखती है? सरकार ने स्पष्ट रूप से संसद को बताया कि केंद्र सरकार के ऐसा कोई कानून पारित करवाने का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि कानून एवं व्यवस्था राज्य के विषय हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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