टीबी के मामलों में आई गिरावट लेकिन क्या 2025 में भारत इससे मुक्त हो पाएगा

    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

क्या भारत इस साल पूरे देश से ट्यूबरक्लोसिस यानी टीबी (तपेदिक) को ख़त्म कर देगा. सरकार का दावा है कि वो ऐसा कर दिखाएगी.

टीबी एक ऐसी संक्रामक बीमारी है, जिससे दुनिया में सबसे ज़्यादा मौतें होती हैं. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़ साल 2023 में दुनिया भर में टीबी से लगभग साढ़े बारह लाख लोग मारे गए.

ये बीमारी एक बैक्टीरिया से होती है, जो व्यक्ति के फेफड़ों को प्रभावित करता है. ये मरीज के खांसने, छींकने या थूकने से फैलता है.

भारत पर इस बीमारी का सबसे ज़्यादा बोझ है. यहां हर तीन मिनट में टीबी से दो लोगों की मौत हो जाती है.

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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2023 में देश में टीबी से 85 हजार लोगों की मौत हो गई थी. पिछले साल सरकार ने संसद में ये आंकड़ा साझा किया था.

वैश्विक तौर पर टीबी को 'ख़त्म' करने का लक्ष्य 2030 रखा गया है लेकिन भारत ने दावा किया कि वो 2025 तक टीबी का उन्मूलन कर लेगा. इसमें 2015 की तुलना में टीबी के नए मामलों में 80 फ़ीसदी की गिरावट, 2015 की तुलना में मौत के मामले में 90 फ़ीसदी कमी और टीबी से प्रभावित घरों की संख्या को ख़त्म करना था.

हालांकि ये संख्या 2015 में टीबी से हुई मौतों से 18 फ़ीसदी कम है. सरकार 2015 को बेसलाइन ईयर मानती है.

इस आधार पर देखें तो 2015 की तुलना में 2023 में टीबी के मामलों में 17.7 फ़ीसदी की कमी आई है.

शायद टीबी के मामलों में आई कमी और टीबी निवारण के बजट में बढ़ोतरी ने सरकार को टीबी उन्मूलन पर नए सिरे से ज़ोर डालने को प्रेरित किया है. यही वजह है कि इसने '2025 तक देश को टीबी मुक्त' करने की प्रतिबद्धता दोहराई है.

सरकार के मुख्य टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के लिए हालिया बजट ख़र्च 2022-23 (910.83 करोड़ रुपये) की तुलना में बढ़कर 2023-24 में 1179.68 करोड़ रुपये हो गया. वहीं, स्वीकृत बजट राशि भी 1666.33 करोड़ रुपये (2022-23) से बढ़कर 1888.82 करोड़ रुपये (2023-24) हो गई है.

सरकार का आशावाद और ज़मीनी हक़ीकत

हालांकि सरकार का ये आशावाद डब्ल्यूएचओ की ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2024 में रिपोर्ट से मेल नहीं खाता है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है संगठन टीबी के मामले और इससे होने वाली मौतों को कम करने के अपने लक्ष्य में भटकाव का सामना कर रहा है.

भारत ने भी कहा है कि वो 2023 के लिए अपने निर्धारित लक्ष्य से चूक गया है.

टीबी उन्मूलन के लिए हालात अब और जटिल बनते दिख रहे हैं. दरअसल अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने देश को डब्ल्यूएचओ से अलग करने का फ़ैसला किया है.

अमेरिका डब्ल्यूएचओ को सबसे ज्यादा फंड देने वाला देश बताया जाता है.

डब्ल्यूएचओ के पूरे बजट की 20 फ़ीसदी फ़ंडिंग अमेरिका करता है. अभी ये साफ़ नहीं हो पाया है कि ट्रंप के इस फैसले डब्ल्यूएचओ की वित्तीय स्थिति पर क्या असर पड़ेगा.

ये भी साफ़ नहीं हो पाया है कि इससे डब्ल्यूएचओ के अलग-अलग कार्यक्रमों और विशेषज्ञों की सेवा लेने की उसकी क्षमता पर क्या असर पड़ेगा.

बीबीसी ने जिन अधिकारियों, विशेषज्ञों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (टीबी उन्मूलन से जुड़े) से बात की उनमें से कइयों ने कहा कि टीबी को इतनी जल्दी ख़त्म करने की संभावना धूमिल ही दिखती है.

बीबीसी ने दिल्ली और ओडिशा के कई टीबी चिकित्सा केंद्रों का दौरा किया और वहां के मरीजों, उनकी देखभाल करने वाले कर्मचारियों, डॉक्टरों और सरकारी अधिकारियों और विशेषज्ञों से बात की.

इन लोगों से बातचीत के बाद पता चला कि सरकार के टीबी उन्मूलन कार्यक्रम में ख़ासी कमियां हैं.

हालांकि केंद्र सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय तपेदिक निवारण कार्यक्रम (एनटीईपी) से जुड़े अधिकारियों से संपर्क करने के बावजूद हमें अभी तक उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला है.

'मैं अपनी बेटी को छोड़ दूंगा'

32 साल के कांचूचरण साहू ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से 60 किलोमीटर दूर एक गांव में रहते हैं.

कंस्ट्रक्शन मजदूर साहू दो साल की जुड़वां बेटियों- ऋद्धि और सिद्धि के पिता हैं. दिसंबर 2023 और जनवरी 2024 के बीच पता चला कि ऋद्धि और सिद्धि को टीबी है.

सरकारी टीबी निवारण कार्यक्रम के दौरान ऋद्धि का इलाज लगभग पूरा होने को है जबकि सिद्धि को अभी भी दवाइयां दी जा रही हैं..

साहू कहते हैं, ''तीन महीने हो गए, हमें दवाइयां नहीं मिली हैं.''

उन्होंने कहा, ''बाहर से ( प्राइवेट) से दवाइयां खरीदने में हर महीने 1500 रुपये ख़र्च हो जाते हैं. हम ये खर्च नहीं उठा सकते. इसलिए कभी-कभी मेरी बेटी बगैर दवाइयों के रह जाती हैं.''

साहू कहते हैं उन्हें सरकार की ओर से टीबी मरीजों के लिए मिलने वाली कैश सहायता के तहत दी जाने वाली रकम भी नियमित तौर पर नहीं मिलती है. सरकार टीबी मरीजों को पूरे इलाज के दौरान हर महीने 1000 रुपये देती है.

साहू अपनी रोती हुई बेटी को चुप कराते हुए कहते हैं, ''मेरी बेटी की तबीयत सुधर नहीं रही है. हम इतने हताश हो चुके हैं कि कभी-कभी ये सोचते हैं कि बेटी को सरकारी दवा केंद्र में ही छोड़ दूं. मुझसे उसकी तकलीफ देखी नहीं जाती.''

सरकार के टीबी निवारण कार्यक्रम की ये दयनीय स्थिति ओडिशा के खोरडा क्षेत्र के जिला टीबी कार्यालय में भी दिखती है. बीबीसी को वहां सिर्फ एक अधिकारी मिले. वो दफ़्तर में तो थे लेकिन आधी नींद में.

जब हमने उनसे साहू की बेटियों के मामले के बारे में पूछा तो उनके मातहत एक कर्मचारी ने कहा कि शायद कम्यूनिकेशन की कमी की वजह से परिवार तक दवा और कैश सपोर्ट स्कीम के तहत मिलने वाली रकम नहीं पहुंच पा रही है.

उन्होंने कहा,'' हमारी जितनी मांग होती है उतनी मात्रा में हमें कभी-कभार ही दवाइयां मिलती हैं. लिहाजा हमें दवाइयों की राशनिंग के लिए मजबूर होना पड़ता है.''

लेकिन ये सिर्फ साहू की बेटियों का ही मामला नहीं है.

इस इलाके में टीबी मरीजों की मदद के लिए प्रोजेक्ट सहयोग चलाने वाली विजयलक्ष्मी राउतरे ने बीबीसी से कहा, ''पिछले कुछ सालों से दवाइयां का स्टॉक ख़त्म करने की बात सामान्य हो गई है.''

वो कहती हैं, ''दवाइयां मुहैया कराना टीबी के इलाज का पहला स्तंभ है. इसलिए हम दवाइयों की ऐसी कमी के साथ टीबी ख़त्म करने की बात कैसे कर सकते हैं.''

अतुल कुमार (अनुरोध पर नाम बदल दिया गया है) दिल्ली में रहते हैं. लेकिन उनकी स्थिति अलग है. वो पेशे से मैकेनिक हैं. उन्हें अपनी बेटी की चिंता खाए जा रही है. उनकी 26 साल की बेटी मल्टीपल ड्रग रेजिस्टेंट टीबी से जूझ रही हैं. उनका डेढ़ साल से अधिक समय से इलाज चल रहा है.

कुमार ने बताया कि उनकी बेटी के लिए मोनोपास के 22 टैबलेट्स लिखे गए थे. ये टैबलेट्स उन्हें हर दिन लेने थे. वो कहते हैं, "लेकिन पिछले 18 महीनों के दौरान मुझे सरकारी दवाखाना से दो महीने के भी मोनोपास नहीं मिले.''

कुमार कहते हैं कि मजबूरी में उन्हें हर सप्ताह इस दवा पर 1400 रुपये खर्च करने पड़ते हैं. ये दवाइयां उन्हें प्राइवेट मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ती है. वो कहते हैं,'' इसकी वजह से मैं कर्ज़ में फंसता जा रहा हूं.''

बीबीसी ने कुमार का मामला दिल्ली राज्य टीबी कार्यालय से साझा किया.

यहां एक बात गौर करने वाली है कि 2023 की एक संसदीय रिपोर्ट के मुताबिक, देश में प्रति एक लाख की आबादी पर टीबी के मामले दिल्ली में सबसे ज़्यादा हैं. प्रति लाख पर ये संख्या दिल्ली में 700 से ज़्यादा है. विशेषज्ञ इसके पीछे की वजह घनी आबादी का वैसे घरों में रहना बताते हैं जहां ठीक से हवा तक नहीं आती है. इसके अलावा खाने में पोषक तत्वों की कमी होना भी वजह है.

टीबी की दवाइयां खरीदने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार के केंद्रीय टीबी डिवीज़न की है. राज्य सरकारें वहां से दवाइयां खरीद सकती हैं लेकिन सिर्फ़ कुछ खास शर्तों के साथ.

बीबीसी ने इस तरह के हालात की वजह जानने के लिए सेंट्रल टीबी डिवीज़न और अधिकारियों को फोन किए. ई-मेल भेजे और यहां तक कि डिवीज़न के दफ़्तर का भी दौरा किया. लेकिन अधिकारियों ने ये स्पष्ट नहीं किया कि आख़िर टीबी के मरीजों को ये दिक्कतें क्यों आ रही हैं.

हर स्तर पर खाली पड़े हैं पद

टीबी के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई में भारत जमीनी स्तर पर चिकित्सकों, स्वास्थ्यकर्मियों और कार्यकर्ताओं की कमी का सामना कर रहा है.

साहू के घर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर मौजूद सरकारी अस्पताल में ये साफ दिखता है.

बीबीसी जब इस केंद्र पर पहुंचा तो वहां कोई डॉक्टर नहीं था. बाद में वार्ड में जनरल ड्यूटी पर तैनात एक डॉक्टर पहुंचे.

नाम न बताने की शर्त पर उन्होंने कहा कि अस्पताल में नियमित तौर पर कोई टीबी स्पेशलिस्ट काम नहीं करता है. सप्ताह में सिर्फ एक बार टीबी स्पेशलिस्ट का दौरा होता है.

साल 2023 की एक संसदीय रिपोर्ट में राज्यों में टीबी उन्मूलन कार्यक्रमों का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि इसमें हर स्तर पर कर्मचारियों की कमी है. कर्मचारियों के पद खाली पड़े हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है, 'लैब टेक्निशियनों और सुपरवाइजरों की कमी 30 से 80 फ़ीसदी' तक है.

जटिल बीमारी

टीबी से संक्रमित होने का मतलब ये नहीं है कि आपको ये बीमारी हो गई है. डब्ल्यूएचओ के लिए सलाहकार की भूमिका निभाने वाले महामारी विशेषज्ञ और पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. लैन्सलोट पिंटो ने कहा, ''एक बार जब आप संक्रमित हो जाते हैं, तो आपके अंदर इस बीमारी के बढ़ने की आशंका पांच से दस फीसदी संभावना होती है.''

वो कहते हैं कि कुपोषण, गरीबी, भीड़भाड़ और अन्य बीमारियों जैसी सामाजिक-आर्थिक वजहें भारत जैसे विकासशील देश में लोग ऐसे संक्रमण की जद में आते हैं जो आगे चल कर टीबी में विकसित हो सकता है.

उन्होंने बीमारी की जांच करने के लिए इस्तेमाल होने वाले अत्याधुनिक उपकरणों की कमी का भी ज़िक्र किया.

उन्होंने कहा, "मैं अभी भी देखता हूं कि कुछ मरीज़ बलगम के माइक्रोस्कोपिक टेस्ट के लिए मेरे पास आते हैं. जबकि जांच की गुणवत्ता के हिसाब से देखें तो जेनेटिक टेस्ट की तुलना में इसका स्तर कम है.''

उन्होंने कहा कि दवाओं की उपलब्धता और मरीजों से छह महीने के ट्रीटमेंट शेड्यूल का पालन करवाना भी चुनौती बनी रहती है.

भुवनेश्वर नगर निगम में बतौर सफाई कर्मचारी काम करने वाले बाबू नायक इसका उदाहरण हैं. 50 वर्षीय बाबू नायक को 2023 में टीबी होने का पता चला. अपने गांव में रह कर कुछ महीने दवा खाने के बाद उन्होंने काम पर आना शुरू कर दिया.

नायक ने बताया, "मेरे लिए सरकार की ओर से दवाइयां गांव में ही आती थीं. मेरे लिए संभव नहीं था कि दवाइयां लेने के लिए हर वक़्त भुवनेश्वर से गांव जाऊं. मैंने यह सोचकर अपनी दवाइयां बंद कर दी कि अब मैं पहले से अच्छा हूं. लेकिन मैंने बड़ी गलती की.''

बीबीसी से बात करते हुए अक्सर नायक की सांसें उखड़ जाती थीं. टेस्ट से पता चला कि उन्हें फिर से टीबी हो गई है.

चार दशकों से अधिक समय से टीबी उन्मूलन के लिए काम कर चुके डॉक्टर नरेंद्र गुप्ता ने कहा कि सरकार को इस बीमारी के ख़िलाफ़ अपनी कोशिशों के विकेंद्रीकरण करने पर ध्यान देना चाहिए.

उन्होंंने कहा, ''स्वास्थ्य राज्य का विषय है. ज्यादा से ज्यादा जिम्मेदारी राज्य और फिर इसके नीचे जिलों और गांवों की होनी चाहिए. अक्सर आंकड़ों का विश्लेषण केंद्र में होता है और राज्यों को कहा जाता है कि वो नीतियों को लागू करें.

उम्मीद की किरणें

डॉ. पिंटो कहते हैं कि अमेरिका का डब्ल्यूएचओ से निकलने से इसकी प्राथमिकताओं लेकर अनिश्चितताएं पैदा होंगीं. इससे टीबी और दूसरी बीमारियों को खत्म करने की भारत की कोशिशों पर भी असर पड़ेगा.

उन्होंने कहा,'' एड्स, ट्यूबरक्लोसिस और मलेरिया से लड़ने के लिए भारत को जो ग्लोबल फंड मिलते हैं उनसे भारत के टीबी कार्यक्रम को फ़ायदा पहुंचा है.

भारत के 2023-25 के टीबी और एचआईवी प्रोग्राम के लिए 50 करोड़ डॉलर दिए गए थे. डब्ल्यूएचओ और ग्लोबल फंड मिल कर पूरी दुनिया की सरकारों के लिए तकनीकी सहायता और सपोर्ट मुहैया कराते हैं. अमेरिका इस फंड के लिए सबसे ज्यादा योगदान देता है.अमेरिका इससे निकलने के बाद एकतरफा फैसला ले सकता है.

हालांकि टीबी से छुटकारा मिलने में अभी लंबा समय लग सकता है लेकिन इस दिशा में सकारात्मक पहलकदमियां हो चुकी हैं. दिसंबर में भारत सरकार ने सरकार ने सक्रिय तौर पर टीबी के मामलों का पता करने, मौतों को कम करने और नए संक्रमण को रोकने के लिए सौ दिनों का अभियान शुरू किया था.

ओडिशा में टीबी उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़े एक अधिकारी ने बताया, "पहले हम इस बात का इंतज़ार करते थे कि मरीज खुद आकर बीमारी का लक्षण बताए. लेकिन अब खुद सक्रिय होकर बीमारी की आशंका वाले समूहों की पहचान कर मरीजों को खोजते हैं.

डब्ल्यूएचओ ने अपनी ग्लोबल रिपोर्ट 2024 में कहा गया है हाल के कुछ वर्षों में लोगों में टीबी से बीमार पड़ने वाले लोगों की रफ़्तार धीमी हुई है. दुनिया भर में टीबी से मरने वाले लोगों की संख्या में भी लगातार गिरावट देखी जा रही है.

विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी उन्मूलन के लिए भारत कुछ देशों के अपनाए मॉडल से सीख सकता है.

पड़ोसी देश म्यांमार भारत के लिए एक मिसाल हो सकता है. डब्ल्यूएचओ ने 2023 में म्यांमार को दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र में एकमात्र देश घोषित किया था, जिसने 2015 की बेसलाइन से टीबी के मामलों को 20 फीसदी घटाने के अपने लक्ष्य को हासिल कर लिया है.

2023 में, एक संसदीय रिपोर्ट में सरकारों को चेतावनी दी गई थी वो 'गैर-सरकारी संगठनों की ओर अपनी जिम्मेदारी धकेल कर लापरवाही भरा रवैया न अपनाए.

इसमें कहा गया गया था कि वो लगातार निगरानी रखे. वो अपनी जिम्मेदारियों को सुनिश्चित करने के लिए पूरी तत्परता के साथ मॉनिटरिंग मैकेनिज़म लागू करना सुनिश्चित करे.''

अतिरिक्त रिपोर्टिंग- सुब्रत कुमार पति

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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