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बिहार चुनाव: जब अवैध शराब की भट्टी तक पहुंचा बीबीसी
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
अक्तूबर की एक धुंधली सुबह, बिहार के एक्साइज़ विभाग की एक हथियारबंद टीम एक खोजी कुत्ते के साथ गंगा नदी में स्पीडबोट से एक ऐसी जगह की ओर बढ़ रही है जहां उन्हें शक़ है कि अवैध शराब बनाई जा रही है.
कुछ ही देर बाद जब ये टीम पटना के बाहरी इलाक़े में पहुँचती है तो वहां उन्हें क़रीब दर्जन भर लोहे के ड्रमों का एक सेटअप मिलता है. यह स्थानीय तरीक़े से बनाई गई एक शराब भट्टी है. इसमें गुड़ को खमीर बनाकर देसी शराब तैयार की जाती है.
नदी किनारे की मिट्टी में गड़े ड्रमों से भाप उठ रही है और उनकी सतहें अब भी गर्म हैं. एक्साइज़ अधिकारियों को लगता है कि इस जगह पर थोड़ी देर पहले तक शराब बनाई जा रही थी.
एक अधिकारी कहते हैं, "उन्हें अक़्सर छापे से पहले ही ख़बर मिल जाती है."
इसके बाद एक्साइज़ विभाग के सुरक्षाकर्मी एक-एक करके इस भट्टी में लगे सामान को तोड़ते हैं और ड्रमों में भरे कच्चे माल और तैयार शराब को ज़मीन पर बहा देते हैं. लेकिन वो जानते हैं कि कुछ ही दिन बाद इसी जगह पर ये भट्टी फिर खड़ी हो जाएगी.
बिहार में शराबबंदी के बावजूद देसी शराब की मांग ने एक 'काला बाज़ार' को जन्म दे दिया है, जो प्रशासन के लिए लगातार बनी रहने वाली चुनौती बन गई है.
क्या कारगर रहा शराबबंदी क़ानून?
जनसंख्या के हिसाब से भारत के तीसरे सबसे बड़े राज्य बिहार में नई सरकार चुनने के लिए मतदान चल रहा है और शराबबंदी क़ानून या उसके लागू होने में आई कमियाँ एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं.
यह क़ानून 2016 में पास हुआ था जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यभर की महिलाओं के समूहों की लगातार मांगों के जवाब में यह नीति लागू की थी.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह क़दम नीतीश कुमार की लोकप्रियता बढ़ाने में मददगार रहा, ख़ासकर महिला मतदाताओं के बीच. अगर वे फिर से चुने जाते हैं, तो शराबबंदी जारी रहने की उम्मीद है. हालांकि, ये क़ानून कितना कारगर रहा इस पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं.
क़ानून लागू हुए क़रीब नौ साल हो चुके हैं और इस दौरान अधिकारियों ने क़रीब 11 लाख मामले दर्ज किए हैं जिनमें से क़रीब 6.5 लाख मामलों में सज़ा सुनाई गई है. राज्य सरकार इन आंकड़ों को क़ानून की सफलता का सबूत मानती है.
लेकिन इन मामलों में से 99 फ़ीसदी से ज़्यादा लोगों को शराब पीने या सार्वजनिक जगहों पर हंगामा करने के लिए सज़ा मिली है. सिर्फ़ 1,805 लोगों को अवैध शराब बनाने, बेचने या ले जाने के लिए दोषी ठहराया गया है.
बिहार के चीफ़ इलेक्टोरल ऑफिसर के दफ़्तर के मुताबिक़ छह अक्तूबर को चुनावों की घोषणा के बाद से अब तक राज्य भर से क़रीब 44 करोड़ रुपये की अवैध शराब ज़ब्त की गई है.
चुनावी मौसम में राज्य भर में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. अहम रास्तों पर चेक पोस्ट बनाए गए हैं, और गाड़ियों के साथ-साथ लोगों की 24 घंटे तलाशी ली जा रही है.
क्यों नहीं थम रहा शराब का अवैध कारोबार?
सवाल ये भी उठता रहा है कि आख़िर राज्य की पुलिस क्यों शराब का अवैध कारोबार चलाने वालों पर नकेल नहीं कस पाई.
बीबीसी हिन्दी ने राज्य के कई पुलिस अधिकारियों से इस बारे में बात करने की कोशिश की, लेकिन इस मुद्दे पर रिकॉर्ड पर बोलने को कोई तैयार नहीं हुआ.
लेकिन अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने स्टाफ़ की कमी, तस्करी के नए और चालाक तरीकों, शराब बनाने वालों और अधिकारियों के बीच मिलीभगत की संभावना को क़ानून के सीमित असर के पीछे की वजह बताया.
पटना के पास छापेमारी टीम का हिस्सा रहे एक्साइज़ इंस्पेक्टर सुनील कुमार मानते हैं कि अवैध शराब प्रशासन के लिए लगातार चुनौती बनी हुई है. वे कहते हैं, "हम इन भट्टियों को नष्ट करते हैं, लेकिन कुछ ही दिनों में ये फिर से शुरू हो जाती हैं."
बिहार में शराबबंदी का क़ानून है लेकिन उसकी सीमा से लगे उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में शराब बेचने या पीने पर कोई रोक नहीं है.
बिहार में अवैध शराब की तस्करी अक्सर इन्हीं राज्यों से होती है. साथ ही बिहार की नेपाल के साथ 726 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है, जिससे तस्करी आसान हो जाती है.
नेपाल सीमा पर स्थित मधुबनी के जयनगर के एक चेक पोस्ट पर गाड़ियों की तलाशी ले रहे अर्धसैनिक बल के एक अधिकारी ने बताया, "खुली सीमा तस्करी को आसान बना देती है. चुनाव के दौरान कार्रवाई के तहत हमने जांच तेज कर दी है."
बीबीसी ने बिहार के एक्साइज़ मंत्री रत्नेश सदा से राज्य में अवैध शराब के कारोबार को ख़त्म करने की कोशिशों पर बात की.
उन्होंने कहा, "क़ानून में हत्या के लिए उम्रकैद या फांसी की सज़ा का प्रावधान है. लेकिन क्या इससे लोग हत्या करना बंद कर देते हैं? नहीं, ऐसा नहीं होता."
सदा ने कहा, "शराबबंदी क़ानून 2016 से लागू है, लेकिन इसे प्रभावी बनाने के लिए समाज को भी ज़िम्मेदारी लेनी होगी. जब तक समुदाय खुद आगे आकर ऐसे मुद्दों को हल करने की कोशिश नहीं करेगा, तब तक सिर्फ़ क़ानून से काम नहीं चलेगा."
जब उनसे पूछा गया कि शराबबंदी क़ानून के तहत ज़्यादातर सज़ा पाने वाले लोग शराब पीने वाले क्यों हैं, न कि अवैध कारोबार करने वाले, तो मंत्री ने कहा कि तस्करों के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई की गई है.
उन्होंने कहा, "अवैध शराब के कारोबार में शामिल सौ से ज़्यादा लोगों की संपत्तियाँ ज़ब्त की गई हैं. जहाँ तक शराब पीने वालों की बात है, पहली बार पकड़े जाने पर उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है, और उनका आधार जैसे पहचान विवरण दर्ज किया जाता है. दूसरी बार पकड़े जाने पर थोड़ा जुर्माना लगाया जाता है. तीसरी बार पकड़े जाने पर उन्हें तीन से छह महीने की जेल की सज़ा दी जाती है. हालांकि, ऐसे मामले बहुत कम होते हैं."
शराबबंदी और चुनाव
बिहार में विपक्षी पार्टियाँ इन मुद्दों को उठाकर यह इशारा कर रही हैं कि अगर वे सत्ता में आईं तो इस क़ानून की समीक्षा करेंगी या उसमें बदलाव करेंगी.
चुनाव रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी पहली बार चुनाव लड़ रही है. किशोर का दावा है कि शराबबंदी के कारण राज्य को हर साल 20,000 करोड़ रुपये का राजस्व नुक़सान होता है.
अपने चुनाव प्रचार में उन्होंने इस कानून को 'फ़र्ज़ी' बताया है और इल्ज़ाम लगाया है कि बिहार में शराब की होम डिलीवरी तक उपलब्ध है.
वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने ताड़ी को कानून के दायरे से बाहर रखने का वादा किया है. उन्होंने ताड़ी को 'प्राकृतिक उत्पाद' बताया है।
बिहार के कुछ ग्रामीण इलाक़ों में कुछ लोग तेजस्वी यादव की बातों से सहमत हैं.
मुज़फ़्फ़रपुर में रहने वाले अशोक कहते हैं, "हम उसी को वोट देंगे जो ताड़ी को क़ानूनी बना देगा."
वे शिकायत करते हैं, "हम दिनभर मेहनत करते हैं और फिर पुलिस आकर ताड़ी पीने वालों को पकड़ लेती है."
समाज सुधर या नाकाम नीति?
लेकिन राज्य में ऐसे भी इलाक़े हैं जहाँ शराब की वजह से बिखरी ज़िंदगियों के निशान आज भी बाकी हैं.
छपरा में लाल मुन्नी देवी के पति दिनेश शराब पीने के साथ-साथ अवैध शराब बेचने का काम भी करते थे. साल 2022 में उनकी मौत ज़हरीली शराब पीने की वजह से हुई.
लाल मुन्नी देवी कहती हैं, "शराब ने बहुत नुक़सान किया है. मैंने अपने पति को खो दिया, और अब बस यही चाहती हूँ कि किसी और को ऐसा दुख न झेलना पड़े,"
छपरा में ही रहने वाली नीतू देवी के मुताबिक़ उनके पति की मौत भी शराब पीने की वजह से ही हुई. उस बात को याद कर वो अपने आंसू रोक नहीं पातीं.
वो कहती हैं, "शराब की वजह से कितने लोगों की ज़िंदगी बर्बाद हो गई. सरकार जब शराब की फैक्टरी बंद करवा देगी तो नहीं आएगी न? फ़ैक्ट्रियां चल रही हैं तभी तो शराब मिल रही है और लोग पी रहे हैं. इसकी वजह से हर इंसान की ज़िंदगी बर्बाद हो रही है, जैसे मेरी हो गई."
पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ के मानवशास्त्री राजीव कमल कुमार ने बिहार सरकार द्वारा शराबबंदी पर कमीशन की गई एक स्टडी पर काम किया है. वे दोनों पक्षों की बात को स्वीकार करते हैं.
वे कहते हैं, "कई महिलाएं और बुजुर्ग कहते हैं कि शराबबंदी से घर की आर्थिक स्थिति, बच्चों की पढ़ाई और पोषण में सुधार हुआ है. लेकिन अवैध कारोबार और शराब से जुड़े हादसे भी हक़ीक़त हैं."
बिहार में शराबबंदी को लागू हुए नौ साल हो गए हैं. लेकिन यह अब भी एक उलझा हुआ मुद्दा बना हुआ है. कुछ लोग इसे समाज सुधार मानते हैं जबकि कुछ इसे नाकाम नीति कहते हैं.
क्या यह क़ानून कामयाब रहा यह सिर्फ़ मुश्किलों का एक नया रास्ता बना? इस सवाल का कोई आसान जवाब नज़र नहीं आता.
(विभास झा की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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