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पश्चिम बंगाल में एसआईआर कराना क्यों मुश्किल हो सकता है? और बिहार चुनाव में यह कितना बड़ा मुद्दा है?
बिहार का चुनाव अब कुछ ही दिन दूर है और इसी बीच चुनाव आयोग ने बीते हफ़्ते देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न की घोषणा कर दी.
बिहार में जब यह प्रक्रिया शुरू हुई थी तो मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था.
आयोग का तर्क है कि यह विशेष पुनरीक्षण, वोटर लिस्ट में दोहराए गए नाम और मृत मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया जा रहा है.
लेकिन विपक्ष में कांग्रेस ने बिहार के एसआईआर को लेकर 'वोट चोरी' के आरोप लगाए थे और दावा किया था कि इस दौरान लाखों वैध मतदाताओं के नाम सूची से काट दिए गए.
विपक्ष लगातार यही आरोप लगाता रहा है कि एसआईआर 'वोट चोरी' का एक ज़रिया है, जिसे चुनाव आयोग ने ख़ारिज किया है.
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अब जब यह प्रक्रिया पूरे देश में होने जा रही है, तो कई अहम सवाल सामने हैं, जैसे-
क्या चुनाव आयोग ने बिहार वाले अनुभव से सीख ली है?
क्या लोगों में बड़े पैमाने पर नाम कटने की चिंता फिर बढ़ेगी?
क्या इस प्रक्रिया को लेकर नागरिकता और पहचान पर शक़ फिर से उभरेगा?
विरोध करने वालों की आपत्ति अब क्या है?
आयोग के लिए यह एसआईआर कितनी बड़ी चुनौती होगी?
बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने इन्हीं सब सवालों पर चर्चा की.
इन्हीं मुद्दों पर चर्चा के लिए भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत, द इंडियन एक्सप्रेस की नेशनल ब्यूरो चीफ़ रितिका चोपड़ा और रिपोर्टर्स कलेक्टिव की पत्रकार आयुषी कार शामिल हुईं.
क्या एसआईआर से लोगों में अब भी डर है?
बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले एसआईआर की घोषणा हुई थी. चुनाव आयोग का कहना है कि बिहार में यह एक्सरसाइज़ सफल रही.
लेकिन विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया की वजह से बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं के नाम भी मतदाता सूची से हट गए.
चुनाव आयोग एसआईआर की ज़रूरत पर ज़ोर देता है. आयोग के मुताबिक़ तेज़ शहरीकरण, बड़ी मात्रा में लोगों का पलायन, युवा नागरिकों का मतदान के योग्य होना और अवैध विदेशी नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल होना, ऐसे कारण हैं जिनके चलते मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण ज़रूरी हो जाता है.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत कहते हैं कि बिहार के अनुभव के आधार पर चुनाव आयोग ने इस बार कई बदलाव किए हैं.
उन्होंने इन बदलावों के बारे में बताया, "जैसे एन्यूमरेशन फ़ॉर्म भरते समय अब किसी भी तरह का डॉक्यूमेंट देने की ज़रूरत नहीं है."
ओपी रावत के मुताबिक़ इन बदलावों के बाद लोगों में पहले जैसा डर नहीं होना चाहिए.
लेकिन सवाल यह है कि जिन लोगों तक पूरी जानकारी पहुंच ही नहीं पाती, क्या उनके भीतर भी एसआईआर को लेकर कोई डर नहीं रहेगा?
इस पर ओपी रावत कहते हैं कि इस प्रक्रिया में बूथ लेवल ऑफ़िसर यानी बीएलओ शामिल होता है. वह हर क्षेत्र में मौजूद होता है.
"वह पोलिंग बूथ पर काम करता है और वही घर-घर जाकर सर्वे करता है. इसलिए डिजिटल और प्रिंट मीडिया से भले कुछ लोगों को पूरी जानकारी न मिल पा रही हो, लेकिन बीएलओ उन तक जाकर यह जानकारी दे रहे हैं."
प्रक्रियाओं में क्या अंतर?
इंडियन एक्सप्रेस की नेशनल ब्यूरो चीफ़ रितिका चोपड़ा का मानना है कि एसआईआर को लेकर पहले और अब जारी नोटिफिकेशन में बड़ा अंतर दिखता है.
उनका कहना है कि 24 जून की नोटिफिकेशन और सोमवार को हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद जारी ऑर्डर को अगर साथ में पढ़कर देखें, तो फ़र्क समझ आता है.
वे कहती हैं कि सबसे बड़ा फ़र्क़ यही है कि पहले फेज़ में लोगों से कोई काग़ज़ नहीं मांगे जाएंगे. चुनाव आयोग कह रहा है कि इस चरण में सिर्फ फ़ॉर्म दिया जाएगा. लोगों को वह फ़ॉर्म भरकर वापस भेजना होगा.
उन्होंने कहा, "फ़ॉर्म भरते समय पूरी कोशिश करें कि आप अपना या अपने परिवार के किसी सदस्य का नाम अपने राज्य की पिछली मतदाता सूची में ढूंढ लें."
चोपड़ा कहती हैं, "अगर आपको अपने परिवार में किसी का नाम मिल जाए, तब आपको कोई कागज हमें देने की ज़रूरत नहीं है."
वे कहती हैं, "यह बात ऑफ़िशियली नहीं कही गई है लेकिन अनऑफ़िशियली चुनाव आयोग के अफ़सरों ने बताया है कि कोशिश यही रहेगी कि 70 से 80 फ़ीसदी मौजूदा मतदाताओं से कोई काग़ज़ न लिया जाए."
"इसके लिए आयोग चाहता है कि लोग ख़ुद ही पुरानी मतदाता सूचियों में अपना नाम ढूंढें, जो अलग-अलग राज्यों में अलग साल में बनाई गई थीं."
एसआईआर प्रक्रिया में डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर
पत्रकार आयुषी कार का मानना है कि एसआईआर को लेकर जो लोगों की चिंताएं थी वह पूरी तरह से दूर नहीं हुई हैं.
उन्होंने कहा, "सबसे बड़ी चिंता यही है, जिस पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी ज़ोर देकर बात कही. वो यह है कि वो इन वोटर लिस्ट में डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर (दोहराए गए नामों को हटाने वाला सॉफ़्टवेयर) लागू नहीं करेंगे."
आयुषी कार ने कहा, "जिस तरह से हम एसआईआर की कवरेज कर रहे थे, हम कोशिश कर रहे थे यह पता लगाने की कि इस पूरी प्रक्रिया की प्रभावशीलता कितनी है यानी क्या इसने वोटर लिस्ट को सच में साफ़ किया या नहीं."
उन्होंने बताया, "हमें ड्राफ्ट लिस्ट और फ़ाइनल लिस्ट, दोनों में सबसे बड़ी गड़बड़ी यही दिखी कि इनमें कई डुप्लीकेट वोटर हैं, यानी एक ही व्यक्ति का नाम कई जगह दर्ज है. वह शुरुआती स्तर पर भी है और बाद में शुद्धिकरण के बाद भी."
आयुषी ने बताया, "हमने जब प्यूरीफाइड लिस्ट को क्रॉस-चेक किया तो हमें चुनाव अधिकारियों से पता चला कि उन्होंने डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया ही नहीं है, जबकि निर्वाचन आयोग के पास पिछले दस साल से ऐसा सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम मौजूद है जो संदिग्ध नामों की पहचान कर सकता है."
"यानी जिनके जनसांख्यिकीय विवरण (नाम, माता-पिता का नाम, पता आदि) आपस में मिलते हैं. ऐसे नामों को सिस्टम में फ़्लैग किया जा सकता है और एक सॉफ्टवेयर के ज़रिए हटाया जा सकता है."
"आपकी ईआरओ हैंडबुक में भी कई बार लिखा गया है कि जब ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित होती है, उस समय इस डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जाना चाहिए."
बिहार चुनाव में एसआईआर का मुद्दा
बिहार विधानसभा चुनाव में अब बहुत कम समय बचा है. चुनाव से पहले राहुल गांधी और तेज़स्वी यादव ने 'वोटर अधिकार यात्रा' निकाली थी.
इस यात्रा के दौरान दोनों नेता लगातार चुनाव आयोग पर सवाल उठाते रहे और 'वोट चोरी' के आरोप लगाते रहे.
हालांकि चुनाव आयोग इन आरोपों को लगातार ख़ारिज करता रहा है.
राजनीति के जानकारों का कहना है कि एक वक़्त ऐसा लगा था कि बिहार विधानसभा चुनाव में एसआईआर एक बड़ा मुद्दा बन सकता है. लेकिन समय बीतने के साथ यह मुद्दा धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला गया.
अब सवाल यह है कि क्या बिहार विधानसभा चुनाव में एसआईआर वाक़ई कोई मुद्दा बना है?
इस पर रितिका का कहना है कि बिहार में फिलहाल एसआईआर चुनावी मुद्दा नहीं बना है.
उन्होंने कहा, "अगर चुनाव आयोग कह रहा है कि फ़ाइनल मतदाता सूची आने के बाद एक भी व्यक्ति ने आपत्ति नहीं की, तो यह सुनने में थोड़ा अटपटा लगता है."
"हमारे ग्राउंड रिपोर्टर्स बता रहे हैं कि कई वोटर्स जिनके नाम पहले डिलीट हो गए थे, उन्हें बाद में एक नए मतदाता के रूप में वापस दिखाया जा रहा है."
वो कहती हैं कि इस प्रक्रिया के लिए जो तीन महीने का समय दिया गया, वह वास्तव में बहुत कम है.
उन्होंने बताया, "2001-2002 की पुरानी प्रक्रिया में तीन गुना ज़्यादा समय दिया गया था और इस बार चुनौती इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह प्रक्रिया पुराने मॉडल से काफ़ी अलग है."
"मान लीजिए 70-80 फ़ीसदी लोग भी वापस आ जाएं. उसके बावजूद जिन राज्यों में यह लागू होगा, वहां के लगभग 20 फ़ीसदी मतदाताओं को नोटिस जाएगा. यह काग़ज़ी प्रक्रिया इतने बड़े स्केल पर पहली बार होने जा रही है."
रितिका का कहना है, "पहला महीना तो सिर्फ़ फ़ॉर्म लेने में चला जाता है और फिर इतने नोटिस भेजना, उन्हें प्रोसेस करना, और यह सब बिना किसी ऑटोमेटेड सिस्टम के, सिर्फ़ चुनाव आयोग के अफ़सरों को मैन्युअली करना है."
उन्होंने कहा कि जब समय इतना कम दिया जाए तो डेडलाइन का दबाव बहुत बढ़ जाता है. ऐसे में गलतियां हो सकती हैं.
रितिका ने कहा, "चुनाव आयोग कह रहा है कि उसने बिहार की प्रक्रिया से सबक लेकर बदलाव किए हैं, लेकिन हमें लग रहा था कि कम से कम इस बार अपने अफ़सरों को ज़्यादा समय दिया जाएगा. वो नहीं किया गया."
एसआईआर में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल क्यों नहीं?
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का कहना है कि जब वे आयोग में थे, तब टेक्नोलॉजी का व्यापक इस्तेमाल किया जाता था.
उन्होंने कहा, "हम डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर, फ़ोटो रिकग्निशन सॉफ्टवेयर और ऐसे ही कई टूल्स इस्तेमाल करते थे, क्योंकि डुप्लिकेट्स अक्सर एक ही निर्वाचन क्षेत्र या एक ही राज्य तक सीमित नहीं रहते. एक नाम पटना में भी हो सकता है और दिल्ली में भी."
"डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर ईआरओ-नेट के ज़रिए पूरे देश में कहां-कहां नाम दर्ज हैं, यह निकाल देता था और तुरन्त नोटिस भेज दिए जाते थे कि आपका नाम इतनी जगहों पर है. आप बताइए कि आप कहां रह रहे हैं ताकि वहीं का वोट आपका बचाया जाए, बाकी डिलीट कर दिए जाएं."
उन्होंने बताया कि इस तरह की साफ़-सफ़ाई से इलेक्ट्रॉनिक रोल स्पष्ट हुए और 2023 में नेशनवाइड यही एक्सरसाइज होने के कारण रोल में नाम बढ़ने के बजाय घटे.
वो कहते हैं, "अगर मंशा सचमुच सूची साफ़ करने की है तो टेक्नोलॉजी रामबाण है. इसका इस्तेमाल होना चाहिए, ताकि मतदाता की तकलीफ़ कम हो और काम सटीकता से हो."
इस पर पत्रकार आयुषी कार कहती हैं कि पिछले दस साल में बदलाव यह हुआ है कि निर्वाचन आयोग ने राज्यों की चुनावी संस्थाओं को यह डुप्लीकेशन सॉफ़्टवेयर इस्तेमाल करने से रोक दिया है.
उन्होंने कहा, "पहले केंद्र सरकार की तरफ़ से ही डुप्लीकेट वोटर्स की सूची राज्यों को भेजी जाती थी, लेकिन इस एसआईआर में सॉफ़्टवेयर का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं हुआ."
वो बताती हैं, "हमारी रिपोर्ट के बाद जब योगेंद्र यादव समेत कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग से सवाल पूछे, तो आयोग ने साफ़ कहा कि इस वोटर लिस्ट में डुप्लीकेशन सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा."
आयुषी का कहना है कि सामान्य प्रक्रिया तो लगभग वही है, कुछ नियमों में सिर्फ़ हल्का संशोधन किया गया है.
"उदाहरण के लिए बिहार में पिछली बार रिविज़न में यह छूट थी कि एन्यूमरेशन फ़ॉर्म जमा करने के बाद दस्तावेज़ बाद में जमा हो सकते थे, अब उसे हटाकर कुछ नियमों को संशोधित किया गया है."
वो कहती हैं, "जहां तक डुप्लीकेट नाम या एक ही घर में कई अलग पते जैसी बातों का सवाल है, यह अभी भी साफ़ नहीं है कि आयोग इन गड़बड़ियों को पूरी तरह सत्यापित कर पाएगा या नहीं."
कुछ राज्यों में एसआईआर को अलग ढंग से देखा जाएगा?
जानकारों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के लिए एसआईआर कराना ज़्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
उनकी दलील है कि यहां की सरकार और आयोग के बीच पहले भी कई मौक़ों पर टकराव वाली स्थिति देखी गई है.
इसी राजनीतिक और प्रशासनिक टकराव की पृष्ठभूमि को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में यह प्रक्रिया उतनी सहज नहीं होगी जितनी दूसरे राज्यों में होगी.
रितिका चोपड़ा कहती हैं कि वे हर राज्य के बारे में यह नहीं बता सकतीं, 'लेकिन पश्चिम बंगाल में एसआईआर की प्रक्रिया अलग हो सकती है. चुनाव आयोग के लिए यह काफ़ी बड़ी चुनौती होगी'.
उन्होंने बताया, "चुनाव आयोग के पास एसआईआर कराने की शक्तियां तो हैं, लेकिन इसे ठीक तरह से कराने के लिए उन्हें राज्य सरकार की व्यवस्था और सहायता की पूरी ज़रूरत होती है. अगर राज्य सरकार आयोग की मदद नहीं करती तो यह प्रक्रिया कराना वाकई बहुत मुश्किल हो सकता है."
वे कहती हैं, "पश्चिम बंगाल में चुनाव कराना हर बार आसान नहीं होता. वहां की राजनीतिक हिंसा का इतिहास रहा है. इसलिए उस राज्य में पैरा-मिलिटरी और पुलिस फोर्स ज्यादा तैनात की जाती है. इस चुनौती के चलते एसआईआर जैसी प्रक्रियाएं वहां इतनी सहजता से नहीं हो पाएंगी."
रितिका ने कहा, "पश्चिम बंगाल की स्थिति को देखकर बिहार शायद आसान दिखेगा. चुनाव आयोग को पश्चिम बंगाल के लिए इस प्रक्रिया की अलग प्लानिंग करनी पड़ेगी."
इस पर पत्रकार आयुषी कार कहती हैं कि कई चिंताएं पहले ही सामने रखी जा चुकी हैं. उनमें से एक यह भी है कि क्या एसआईआर प्रक्रिया सच में सभी भूमिकाओं को बेहतर तरीके से निभा पाने में सक्षम होगी.
उन्होंने कहा, "पहले की तरह अब भी यही मांग है कि इसकी समय सीमा बढ़ाई जाए. तीन महीने इस प्रक्रिया के लिए पर्याप्त नहीं हैं. लोगों के पास इतना समय होना चाहिए कि वो आसानी से अपना फ़ॉर्म जमा कर सकें."
वो बताती हैं कि एक महत्वपूर्ण मुद्दा जिस पर चर्चा नहीं हुई, वह है प्रवासन. "क्या लोगों के पास इतना समय होगा कि वो राज्य लौट कर यह प्रक्रिया पूरी कर सकें? समयसीमा इतनी कम है कि कई जगह बीएलओ ख़ुद ही फ़ॉर्म भरने की स्थिति में हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.