9/11 हमले की साज़िश रचने वाले ख़ालिद शेख़ मोहम्मद की कहानी

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी

अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियां ख़ालिद शेख़ मोहम्मद का ज़िक्र ‘केएसएम’ के नाम से करती रही हैं, लोग केएसएम को ओसामा या अयमन अल ज़वाहिरी की तरह नहीं जानते हैं.

अफ़गानिस्तान में सोवियत हमले के ख़िलाफ़ लड़ाई में शामिल होने से पहले ख़ालिद ने अमेरिका में चार साल बिताकर नॉर्थ कैरोलाइना एग्रीकल्चरल एंड टेक्निकल यूनिवर्सिटी से डिग्री हासिल की थी.

सन 1987 में सोवियत सैनिकों के ख़िलाफ़ जाजी की लड़ाई उसने ओसामा बिन लादेन के साथ लड़ी थी.

केएसएम के परिवार का चरमपंथी गतिविधियों से पुराना ताल्लुक रहा था.

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को गिराने की नाकाम कोशिश

केएसएम के भांजे रम्ज़ी यूसुफ़ ने 1993 में बमों से वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को गिराने की नाकाम कोशिश की थी. रम्ज़ी का मिशन भले ही नाकाम रहा लेकिन उसने चरमपंथियों की उभरती हुई पीढ़ी पर बहुत असर डाला था.

टॉम मैकमिलन अपनी किताब ‘फ़्लाइट 93 द स्टोरी द आफ़्टरमाथ एंड द लेगेसी ऑफ़ अमेरिकन करेज ऑन 9/11’ में लिखते हैं, “डब्ल्यूटीसी पर 1993 में हुए हमले ने नए चरमपंथियों को ये एहसास कराया था कि अमेरिकी ज़मीन पर हमला करना कोई अनोखी बात नहीं है.”

अफ़ग़ानिस्तान के ट्रेनिंग कैंप के अनुभव और संबंधों की बदौलत यूसुफ़ एक फ़र्ज़ी पासपोर्ट के ज़रिए अमेरिका में घुसने में कामयाब हो गया था.

उसने साथियों की एक टीम बनाई थी और वो बमों से भरी हुई किराए की एक वैन डब्ल्यूटीसी के उत्तरी टावर के गैरेज तक पहुंचाने में कामयाब रहा था.

इस धमाके में छह लोग मारे गए थे और कई सौ लोग ज़ख़्मी हुए थे. भवन को उतना नुक़सान नहीं पहुंचा था जितना यूसुफ़ ने सोचा था लेकिन वो अमेरिका के सबसे बड़े शहर की सड़कों पर दहशत फैलाने में कामयाब हो गया था.

यहाँ से दुनिया में चरमपंथ के एक नए दौर की शुरुआत हुई थी. यूसुफ़ अमेरिका से पाकिस्तान भागने में भी सफल हुआ था.

केएसएम ने निभाई सलाहकार की भूमिका

इस घटना में यूसुफ़ के मामा केएसएम की भूमिका एक सलाहकार की थी. इस अभियान में मदद के लिए एक बार उसने यूसुफ़ को 660 डॉलर ज़रूर भेजे थे.

लॉरेंस राइट ने अपनी किताब ‘द लूमिंग टावर: अल-क़ायदा एंड द रोड टू 9/11’ में लिखा था, “यूसुफ़ अमेरिका की ज़मीन पर हमला करने वाला पहला इस्लामी आतंकवादी था. यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि 9/11 तक ले जाने वाले सफ़र की बुनियाद उसी दिन रख दी गई थी, जिस दिन यूसुफ़ ट्विन टावर्स के गैरेज में बमों से भरी अपनी वैन पार्क कर सुरक्षित बाहर निकल गया था.”

केएसएम का जन्म 14 अप्रैल, 1965 को कुवैत में हुआ था. उसके पिता स्थानीय इमाम थे और पाकिस्तान के रहने वाले थे.

ख़ालिद ने 16 साल की उम्र में इस्लामी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की सदस्यता ले ली थी.

साल 1983 में सेकेंड्री स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद वो अमेरिका पढ़ने चला गया था. जब उसने नॉर्थ कैरोलाइना यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया तो वहाँ अरब छात्रों का एक समूह पहले से ही पढ़ रहा था.

उनके धार्मिक मामलों में रुचि लेने के कारण इस समूह को ‘मुल्लाज़’ कहकर पुकारा जाता था.

दिसंबर, 1986 में केएसएम को मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री मिल गई थी. 9/11 की जाँच रिपोर्ट के अनुसार, “केएसएम की अमेरिका के प्रति शत्रुता इसराइल के प्रति अमेरिकी विदेश नीति के कारण थी.”

अमेरिका से डिग्री लेने के बाद केएसएम अफ़ग़ानिस्तान की सीमा के पास पाकिस्तानी शहर पेशावर गया, जहाँ उसकी मुलाक़ात अफ़ग़ान सरदार अब्दुल रसफ़ सय्याफ़ से हुई.

सय्याफ़ का उसके जीवन पर ख़ासा असर हुआ. उसने पहले उसे सैनिक प्रशिक्षण के लिए पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान में एक शिविर में भेजा. इस दौरान उसने ओसामा बिन लादेन के उस्ताद कहे जाने वाले अब्दुल्लाह अज़ाम के साथ भी काम किया.

फ़िलीपींस में बनाई ‘बोज़िंका’ योजना

'हंट फोर केएसएम' किताब के मुताबिक़, साल 1994 में मामा-भांजा यानी केएसएम और रम्ज़ी यूसुफ़ दोनों फ़िलीपींस गए. वहाँ उन दोनों ने राष्ट्रपति बिल क्लिन्टन और पोप जॉन पॉल द्वितीय की हत्या करने की तैयारी शुरू की लेकिन बाद में उसे रद्द कर दिया क्योंकि फ़िलीपींस प्रशासन ने अपनी सुरक्षा चौकसी बढ़ा दी थी.

वहाँ उन्होंने एक दूसरी साज़िश पर काम किया जिसे ‘बोज़िंका’ का नाम दिया गया. इसमें प्रशांत क्षेत्र में एक साथ 12 अमेरिकी विमानों में बम रखकर उन्हें नष्ट किया जाना था. केएसएम ने यूसुफ़ को बम बनाने के लिए सामग्री जुटाने में मदद की.

लेकिन 6 जनवरी, 1995 को ये साज़िश फे़ल हो गई क्योंकि जिस फ़्लैट में ये दोनों बम बना रहे थे, उसके रसोईघर में आग लग गई.

ये दोनों वहाँ से भाग खड़े हुए लेकिन फ़िलीपींस की पुलिस को वहाँ से बम बनाने की सामग्री और एक लैपटॉप मिला, जिसमें इस साज़िश से जुड़े हुए सभी लोगों के नाम और पते थे.

लेकिन केएसएम वहाँ से मध्य-पूर्व भागने में कामयाब हो गया जबकि रम्ज़ी यूसुफ़ भागकर पाकिस्तान पहुंच गया. वहाँ एक साथी की मुखबिरी के कारण यूसुफ़ को आईएसआई और एफ़बीआई की टीम ने गिरफ़्तार कर लिया.

उसे उसी दिन न्यूयॉर्क लाया गया और फिर हेलिकॉप्टर पर बैठाकर दूसरी जगह ले जाया गया.

कैथी स्कॉट क्लार्क और एड्रियन लेवाई अपनी किताब ‘द एक्साइल’ में लिखते हैं, “जब हेलिकॉप्टर ट्विन टावर के पास पहुंचा तो एफ़बीआई के एजेंट ने यूसुफ़ की आँखों पर से पट्टी हटाकर टावर्स की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, देखो वो अब भी खड़े हैं. रम्ज़ी ने इस ताने का जवाब देते हुए कहा- 'वो खड़े नहीं रहते अगर मेरे पास और पैसा होता.'”

तोरा-बोरा में ओसामा बिन लादेन से मुलाक़ात

केएसएम का अगला क़दम डब्ल्यूटीसी बॉम्बिंग और ‘बोज़िंका’ साज़िश की ख़ामियों का बारीक़ी से अध्ययन करना था. यहाँ ओसामा बिन लादेन की एंट्री हुई. उसके पास पैसा और शागिर्दों की पूरी फ़ौज थी. दोनों एक-दूसरे को जानते ज़रूर थे लेकिन 1989 के बाद से कभी मिले नहीं थे.

अल-क़ायदा के सैनिक कमांडर मोहम्मद आतेफ़ ने 1996 के अंत में तोरा-बोरा में इन दोनों की मुलाक़ात करवाई.

केएसएम ने लादेन को 1993 में ट्विन टावर बॉम्बिंग और फ़िलीपींस अभियान की पूरी जानकारी दी और उसके सामने एक नई पेशकश की.

नई साज़िश इतनी दुस्साहसी थी कि लादेन को ख़ुद उसकी कामयाबी पर शक पैदा हुआ.

टॉम मैकमिलन लिखते हैं, “केएसएम की साज़िश थी कि एक साथ दस अमेरिकी विमानों को हाइजैक किया जाए. उसमें से नौ विमानों को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, पेंटागन और कैपिटल हिल जैसी इमारतों पर क्रैश करा दिया जाए. दसवें विमान को किसी अमेरिकी हवाईअड्डे पर उतारा जाए जहाँ केएसएम एक भाषण देकर अमेरिका की मध्य-पूर्व नीति की निंदा करे.”

ओसामा बिन लादेन ने इस प्लान को सुना ज़रूर लेकिन केएसएम से कोई वादा नहीं किया लेकिन उसने उसको ‘नहीं’ भी नहीं कहा.

इसके दो साल बाद लादेन ने केएसएम को एक बार फिर बुलाया.

लादेन ने केएसएम से कहा कि उसे उसकी हवाई जहाज़ों को इमारतों से टकराने की योजना पसंद तो है लेकिन दस विमानों को हाइजैक कर मशहूर इमारतों से टकराना ख़ासा जटिल और अव्यावहारिक है. इसके लिए जहाज़ों की संख्या कम करनी होगी और निश्चित लक्ष्यों को चुनना होगा.

चार हाइजैकर्स को केएसएम के पास भेजा गया

टेरी मैक्डॉरमेट और जोश मेयर अपनी किताब ‘द हंट फॉर केएसएम’ में लिखते हैं, “बिन लादेन और केएसएम इस बात पर सहमत हुए कि विमानों की संख्या दस से घटा कर चार या पाँच कर दी जाए.”

इस बीच जर्मनी के हैम्बर्ग शहर से चार लोग बिन लादेन के अफ़ग़ान कैंप में शामिल होने आए. वो लोग सालों से जर्मनी में पढ़ाई कर रहे थे.

वो चेचेन्या में जाकर लड़ाई करने के लिए तैयार थे लेकिन उन्हें बताया गया कि चेचेन्या जाने से बेहतर है कि वो पहले अफ़ग़ानिस्तान जाएं.

‘द हंट फॉर केएसएम’ किताब के मुताबिक़, “इन लोगों के पक्ष में ये बात जाती थी कि उन्हें पश्चिम में रहने का अनुभव था. उनको अरबी के अलावा दूसरी भाषाएं भी बोलनी आती थीं. उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और उन पर किसी को कोई शक नहीं हो सकता था. उनको मामूली शारीरिक ट्रेनिंग के बाद अमेरिकी बनने के क्रैश कोर्स के लिए केएसएम के पास कराची भेज दिया गया था.”

9/11 की साज़िश रचने के दौरान केएसएम कराची में था

केएसएम ने इन लोगों को बताया कि उन्हें पायलट बनना होगा. केएसएम की सलाह पर उन्होंने जहाज़ उड़ाना सीखने के लिए अमेरिकी ट्रेनिंग स्कूलों में आवेदन किया. उन्हें अमेरिकी वीज़ा भी मिल गए.

दो साल के अंदर केएसएम ऐसे 19 लोगों को अमेरिका भेजने में कामयाब हो गया.

इस बीच बिन लादेन ने बार-बार केएसएम से हमले को जल्द-से-जल्द अंजाम देने के लिए कहा लेकिन उसने जल्दबाज़ी नहीं दिखाई और 2001 की गर्मियों का इंतज़ार किया.

टेरी मैक्डॉरमेट और जोश मेयर लिखते हैं, “केएसएम ने अपने साथी मोहम्मद अता की इस बात का समर्थन किया कि चौथे विमान को व्हाइट हाउस से न टकराया जाए क्योंकि वो एक छोटी जगह थी और उसे हिट करना अपेक्षाकृत अधिक मुश्किल था. हमले के लिए अमेरिकी संसद कैपिटल हिल को चुना गया और हमले की तारीख़ और आगे बढ़ाई गई ताकि अमेरिकी सांसद छुट्टी के बाद वहाँ वापस लौट आएं.”

इस साज़िश के रचे जाने के दौरान केएसएम कराची में ही रहा और उसने अपने-आप को अल-क़ायदा नेतृत्व से बिल्कुल अलग-थलग रखा. उसने कई ईमेल ख़ातों का इस्तेमाल किया.

मैक्डॉरमेट और मेयर लिखते हैं, “उसका एक ईमेल आईडी था सिल्वर अंडरस्कोर क्रैक @ याहू डॉट कॉम. उसका दूसरा ईमेल था गोल्ड अंडरस्कोर क्रैक@ याहू डॉट कॉम. दोनों अकाउंट के लिए उसका पासवर्ड था-हॉटमेल”.

केएसएम ने 9/11 का हमला इंटरनेट कैफ़े में देखा

केएसएम ने अपने शागिर्दों को ये भी बताया कि दुनिया के अधिकतर देशों के वीज़ा पासपोर्ट पर दिए जाते हैं लेकिन पाकिस्तान का वीज़ा एक अलग काग़ज़ पर मिलता है.

इस वीज़ा को आयरन से अलग करके दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है. वीज़ा पर अंकित तारीख़ों को भी ब्लीच का इस्तेमाल कर हटाया जा सकता है.

उसने ये भी जानकारी दी कि इस्लामाबाद में अल्जीरिया और दूसरे अफ़्रीकी देशों के छात्र अपना पासपोर्ट काले बाज़ार में बेचते हैं. वहाँ से उनको ख़रीदा जा सकता है.

केएसएम एक तरह से 9/11 ऑपरेशन का पूरा इंचार्ज था. उसके ज़रिए पूरी दुनिया में अल-क़ायदा की गतिविधियों के लिए हज़ारों डॉलर बाँटे गए, जिसमें ज़्यादातर पैसे नक़द दिए गए.

टेरी मैक्डॉरमेट और जोश मेयर लिखते हैं, “अगस्त, 2001 को एक संदेशवाहक को कराची भेज कर केएसएम को सूचित किया गया कि अता ने हमले के लिए 11 सितंबर की तारीख़ चुनी है. महीने के अंत में बिन लादेन को ये ख़बर करने केएसएम ख़ुद अफ़ग़ानिस्तान गया. केएसएम ने टावरों पर विमान टकराने के दृश्य को कराची के एक इंटरनेट कैफ़े में देखा.”

ओसामा बिन लादेन से नाराज़

अल-क़ायदा के लड़ाकों के बीच केएसएम शुरू से ही बहुत लोकप्रिय था. वो लोग उसे एक अक्लमंद, दक्ष और संयमित प्रबंधक मानते थे जो एकाग्र होकर अपने लक्ष्य की तरफ़ बढ़ता था.

एक अमेरिकी ख़ुफ़िया अधिकारी ने बाद में स्वीकार भी किया कि केएसएम एक फ़ॉरच्यून 500 कंपनी के सीईओ की तरह काम करता था. उसको दूसरों की प्रतिभा और गुणों का इस्तेमाल करना बख़ूबी आता था. उसको लोगों से संबंध बनाने और काम को पूरा करवाने में महारत हासिल थी.

केएसएम उन लोगों की बहुत क़द्र करता था जो अरबी के अलावा उर्दू भी बोल सकते थे क्योंकि अल-क़ायदा के चोटी के नेता तो अरब थे लेकिन काम को अंजाम देने वाले अधिकतर लोग उर्दू बोलने वाले दक्षिण एशियाई हुआ करते थे.

केएसएम की एक और ख़ासियत थी- अल-क़ायदा में भर्ती हुए हर नए लड़ाके पर निजी ध्यान देना.

योसरी फ़ाउदा और निक यील्डिंग अपनी किताब ‘मास्टरमाइंड्स ऑफ़ टेरर’ में लिखते हैं, “ये केएसएम के बूते की बात थी कि वो अपने अधिकतर लोगों को विश्व के सबसे मंझे हुए काउंटर टैरररिज्म फंदे से बचा पाने में कामयाब रहा. 9/11 से कुछ समय पहले बिन लादेन को अक्सर डींगें मारते सुना गया था कि वो कुछ बड़ा करने वाला है लेकिन केएसएम ने अपने आसपास के लोगों को अपनी चालों के बारे में ज़रा भी भनक नहीं लगने दी, बल्कि उसने अपना ख़ासा वक्त और ताक़त बिन लादेन को चुप कराने की कोशिश में लगाई.”

केएसएम की गिरफ़्तारी

9/11 हमले के 17 महीनों बाद तक ख़ालिद मोहम्मद शेख़ सीआईए की गिरफ़्त में नहीं आया. एक मार्च, 2003 को एक मुख़बिर की निशानदेही पर ख़ालिद मोहम्मद शेख़ को रावलपिंडी के एक मकान से गिरफ़्तार कर लिया गया.

अगले 48 घंटों तक उससे गहन पूछताछ की गई लेकिन उसने एक भी महत्वपूर्ण बात नहीं उगली.

अल-क़ायदा के लड़ाकों को ये ट्रेनिंग दी जाती थी कि वो गिरफ़्तार होने पर पहले 48 घंटे तक हो सके तो चुप रहें ताकि उनके साथियों को अपने अड्डे बदलने की मोहलत मिल जाए.

कैथी स्कॉट क्लार्क और एडरियन लेवाई अपनी किताब ‘द एक्साइल’ में लिखते हैं, “केएसएम को बेड़ियों में बाँधकर, उसकी आँखों में पट्टी बाँधी गई और फिर उसके ऊपर एक चोगा पहनाया गया. फिर उसे अफ़ग़ानिस्तान ले जाया गया."

"बाद में ‘रेंडिशन रिपोर्ट’ के लिए दिए गए बयान में उसने याद किया, “मेरे सारे कपड़े उतार कर मुझे नंगा कर दिया गया.”

डॉक्टरों की जाँच के बाद उसके हाथों को छत से लटक रहे एक रॉड से बाँध दिया गया. उससे सवाल करने वाले तीन लोग थे, एक पुरुष और दो महिलाएँ. चेहरे पर मुखौटा लगाए दस और गार्ड खड़े थे. जब भी वो सहयोग करने में आना-कानी करता वो उस पर घूसों की बौछार कर देते. चार दिन बाद उसे गल्फ़ स्ट्रीम विमान में बैठाकर पोलैंड ले जाया गया.

183 बार किया गया ‘वाटरबोर्ड’

पोलैंड में ख़ालिद के साथ और क्रूर व्यवहार किया गया. उसको मौत के बिल्कुल नज़दीक ले जाकर फिर वापस खींचा गया.

वहाँ मौजूद डॉक्टर जेम्स मिशेल ने कैथी स्कॉट क्लार्क और एडरियन लेवी को बताया, ''जब भी वो सहयोग नहीं करता उसे एक दीवार के सहारे खड़ा कर उसके शरीर, चेहरे और मुँह पर घूँसे बरसाए जाते.''

केएसएम ने बाद में रेडक्रॉस को बताया, ‘'मेरे गले में एक लचीला प्लास्टिक का कॉलर लगा दिया जाता जिसको पकड़कर गार्ड मेरा सिर दीवार से बार बार दे मारते.''

केएसएम की उंगली पर एक यंत्र बाँध दिया जाता जिससे पता चलता रहे कि उसके शरीर के विभिन्न अंग काम कर रहे हैं या नहीं. इसके बाद उसे तब तक पानी में डुबोया जाता जब तक उसकी साँस टूट नहीं जाती. एक ब्रेक के बाद यह प्रक्रिया फिर दोहराई जाती.

उसके मुँह को कम-से-कम 183 बार पानी के अंदर रखा गया. केएसएम ने रेडक्रॉस को दिए इंटरव्यू में याद किया, “सबसे ख़राब दिन तब था जब मुझे आधे घंटे तक लगातार पीटा गया. मेरा सिर दीवार से इतनी ज़ोर से मारा गया कि उससे ख़ून निकलने लगा. इसके बाद मेरे नंगे शरीर पर बर्फ़ जैसा ठंडा पानी डाला गया.”

सीआईए की इन यातनाओं की ख़बर सामने आने पर केएसएम को साल 2006 में ग्वांतानामो बे भेज दिया गया.

इतनी यातनाओं के बाद भी सीआईए केएसएम से बिन लादेन और ज़वाहिरी के ठिकानों का पता नहीं उगलवा पाई.

टेरी मैक्डॉरमेट और जोश मेयर लिखते हैं, “संभवत: ज़वाहिरी के ठिकाने के बारे में केएसएम को आभास था क्योंकि उसकी गिरफ़्तारी से एक दिन पहले उसकी ज़वाहिरी से मुलाकात हुई थी.”

केएसएम अब भी ग्वांतानामो बे जेल में बंद है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)