वॉशिंगटन में नेशनल गार्ड्स पर हमलाः पूर्व बाइडन सरकार की नीति पर क्यों उठ रहे सवाल

    • Author, जूली गिल्डर
    • पदनाम, बीबीसी वैरिफ़ाई

अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में दो नेशनल गार्ड पर गोलीबारी हुई थी, जिसमें गंभीर रूप से घायल एक नेशनल गार्ड की बाद में मौत हो गई थी. इस घटना के बाद ट्रंप प्रशासन ने बड़े पैमाने पर इमिग्रेशन नीति में बदलाव का एलान किया.

होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (डीएचएस) के अनुसार संदिग्ध अफ़ग़ानिस्तान से है और वह बाइडन प्रशासन के दौरान शुरू किए गए अफ़ग़ान पुनर्वास कार्यक्रम के तहत अमेरिका आया था.

रिपब्लिकन्स ने दावा किया है कि संदिग्ध की ठीक से जांच नहीं हुई थी, हालांकि उन्होंने कोई सबूत नहीं दिया.

डीएचएस ने अफ़ग़ान नागरिकों की सभी इमिग्रेशन रिक्वेस्ट को, "जब तक कि सुरक्षा और जांच प्रक्रिया की आगे समीक्षा नहीं हो जाती", तक के लिए रोक दिया है.

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अफ़ग़ान नागरिकों की जांच को लेकर क्या कहा गया?

डीएचएस ने बताया कि संदिग्ध, 29 वर्षीय रहमानुल्लाह लाकनवाल, ऑपरेशन एलाइज़ वेलकम (ओएडब्ल्यू) नाम की अफ़ग़ान पुनर्वास योजना के तहत अमेरिका आया था.

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के कब्ज़े के बाद "कमज़ोर" अफ़ग़ानों को फिर से बसाने के लिए अगस्त 2021 में बाइडन प्रशासन ने ये योजना शुरू की थी.

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, "वे आए, उनकी कोई जांच नहीं हुई, कोई पड़ताल नहीं हुई".

जब एक रिपोर्टर ने उनसे पूछा कि उन्होंने वॉशिंगटन हमले के लिए बाइडन प्रशासन को क्यों दोषी ठहराया है, तो ट्रंप ने उसे (रिपोर्टर को) 'मूर्ख' कहा.

एफ़बीआई की प्रेस कॉन्फ्रेंस में एजेंसी के निदेशक काश पटेल ने दावा किया कि पिछली सरकार ने "हज़ारों लोगों को बिना किसी बैकग्राउंड चेकिंग या जांच के देश में आने की अनुमति दी".

हमले के दिन जारी प्रेस रिलीज़ में डीएचएस ने कहा कि संदिग्ध "उन हज़ारों अफ़ग़ान नागरिकों में से एक है जिन्हें बाइडन प्रशासन के ऑपरेशन एलाइज़ वेलकम कार्यक्रम के तहत बिना जांच के देश में आने दिया.

इस हफ़्ते एक्स पर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने 2021 में दिए गए अपने बयान की याद दिलाई, जिसमें उन्होंने "बाइडन प्रशासन की नीति की आलोचना की थी कि उसने बिना जांच के अफ़ग़ान शरणार्थियों के लिए बांध के गेट खोल दिए".

उन्होंने इस साल की शुरुआत में सीबीएस को दिए एक इंटरव्यू में भी इसी तरह जांच में नाकामियों की बात की थी. वेंस ने एक अफ़ग़ान नागरिक का मामला उठाया, जिसे तालिबान के कब्ज़े के बाद अमेरिका लाया गया था और बाद में उस पर आतंकवाद से जुड़े आरोप लगे थे.

गोलीबारी का संदिग्ध अमेरिका कैसे पहुंचा?

काबुल के पतन या उस पर तालिबान के कब्ज़े के ठीक बाद, 8 सितंबर 2021 को लाकनवाल ओएडब्ल्यू के तहत अमेरिका पहुंचे.

कई अफ़ग़ानों को तालिबान से गंभीर उत्पीड़न का खतरा था, ख़ासकर उन लोगों को जिन्होंने पश्चिमी देशों की सरकारों के साथ काम किया था.

इस साल प्रकाशित अमेरिकी विदेश विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार, ओएडब्ल्यू और एंड्यूरिंग वेलकम नामक दूसरी योजना के तहत 1,90,000 से अधिक अफ़ग़ानों को अमेरिका में बसाया गया है.

ओएडब्ल्यू कार्यक्रम के तहत आने वाले अधिकांश अफ़ग़ानों को "पैरोल" नाम की एक प्रक्रिया के तहत दो साल तक अमेरिका में रहने की अनुमति दी गई थी.

पैरोल पर रहने वाले अफ़ग़ानों को कुछ रिपोर्टिंग नियमों का पालन करना होता है (जैसे मेडिकल जांच और ज़रूरी टीकाकरण) और अगर इन नियमों का पालन नहीं किया गया तो उनका अमेरिका में रहने का अधिकार ख़त्म हो सकता है.

जिन लोगों ने अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की मदद के लिए 'उल्लेखनीय जोखिम' उठाए थे, उन्हें स्पेशल इमिग्रेंट वीज़ा (एसआईवी) प्रक्रिया पूरी करने के बाद स्थायी निवासी का दर्जा दिया गया.

चैरिटी संगठन अफ़ग़ानइवाक (AfghanEvac) के अनुसार, लाकनवाल के एसआईवी आवेदन पर विचार हो रहा था और उन्हें मौजूदा ट्रंप प्रशासन के तहत इसी साल शरण दी गई थी.

इस योजना के तहत अफ़ग़ानों की जांच कैसे हुई?

बीबीसी ने लाकनवाल की जांच प्रक्रिया के बारे में अधिक जानकारी के लिए व्हाइट हाउस से संपर्क किया. उन्होंने हमें यह विवरण तो नहीं दिया, लेकिन कहा, "अगर जो बाइडन की खतरनाक नीतियां न होतीं, तो यह जानवर कभी यहां नहीं होता. उन नीतियों ने ही बिना जांचे अनगिनत अपराधियों को हमारे देश में घुसने और अमेरिकी लोगों को नुकसान पहुंचाने की इजाज़त दी."

"डेमोक्रेट्स के लगातार विरोध के बावजूद, ट्रंप प्रशासन हर संभव कदम उठा रहा है ताकि इन राक्षसों को हमारे देश से बाहर निकाला जा सके और बाइडन प्रशासन के फैलाए रायते को साफ़ किया जा सके."

हमने डीएचएस और सीआईएस से भी संपर्क किया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.

हालांकि हमें यह तो नहीं पता कि संदिग्ध की अमेरिका आने से पहले कैसी जांच हुई थी, लेकिन हमें यह पता है कि जिस योजना के तहत वह आया, उसमें जांच कैसे होनी थी.

ओएडब्ल्यू योजना की एक पुरानी सरकारी वेबसाइट, जिसे इस साल की शुरुआत में अपडेट किया गया था, में 'कड़ी' और 'बहु-स्तरीय' जांच प्रक्रिया का उल्लेख है. इसमें अफ़ग़ानों को प्रवेश की अनुमति देने से पहले उनकी बायोमेट्रिक जानकारी (जैसे फ़िंगरप्रिंट और फ़ोटो) लेने की बात है.

इसमें कई सरकारी एजेंसियों की भागीदारी का ज़िक्र है, जिनमें एफ़बीआई और नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर शामिल हैं.

तत्कालीन होमलैंड सिक्योरिटी सचिव, अलेजांद्रो मायोरकस ने 2021 में कहा था कि सरकार ने इस योजना के तहत 'मजबूत स्क्रीनिंग और जांच प्रणाली' स्थापित की है.

अलग-अलग रिपोर्ट

कार्यक्रम की जांच प्रक्रिया के प्रभाव को लेकर अलग-अलग रिपोर्ट आई हैं.

2022 में अमेरिकी सरकार की एक निगरानी संस्था ऑफिस ऑफ इंस्पेक्टर जनरल (ओआईजी) के किए ऑडिट में पाया गया कि "अफ़ग़ान शरणार्थियों की जांच के लिए अमेरिकी सरकार के डेटाबेस से इस्तेमाल की गई कुछ जानकारी (जैसे नाम, जन्मतिथि, पहचान संख्या और यात्रा दस्तावेज़), ग़लत, अधूरी या गायब थी".

ओआईजी ने कहा कि यह समस्या आंशिक रूप से इसलिए थी क्योंकि डीएचएस के पास उन अफ़ग़ान शरणार्थियों की सूची नहीं थी जिनके पास पहचान के पर्याप्त दस्तावेज़ नहीं थे.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अमेरीकी कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (सीबीपी) ने कुछ लोगों को अमेरिका में प्रवेश करने दिया या पैरोल दिया, जबकि उनकी पूरी जांच नहीं हुई थी.

दो साल बाद ओआईजी के एक और ऑडिट में पैरोल पाने वाले कुछ अफ़ग़ानों के बारे में संभावित नकारात्मक जानकारी (जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा) की पहचान करने को लेकर सरकार की क्षमता में कमियों का पता चला.

रिपोर्ट में कहा गया, "कुल मिलाकर हमने पाया कि एफ़बीआई के जिम्मेदारों ने किसी भी संभावित राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम को प्रभावी ढंग से पहचाना और उसका समाधान किया."

'भविष्य का अनुमान मुश्किल'

ओएडब्ल्यू के ऑडिट की समीक्षा करने के अलावा बीबीसी वैरिफ़ाई ने कई विशेषज्ञों से भी राय ली.

कैटो इंस्टीट्यूट के इमिग्रेशन विश्लेषक एलेक्स नूरास्टेह ने कहा कि यह कार्यक्रम "ओआईजी की रिपोर्ट के अनुसार यह पारंपरिक रूप से की जाने वाली गहन शरणार्थी जांच प्रक्रिया की तुलना में अधिक असंगत था".

"निकासी की अफ़रातफ़री के कारण कुछ जानकारी खो गई और कुछ जांच तब तक नहीं हुईं जब तक शरणार्थी अफ़ग़ानिस्तान से बाहर नहीं आ गए."

नेशनल इमिग्रेशन फ़ोरम की अध्यक्ष और सीईओ जेनी मरे ने बीबीसी वैरिफ़ाई को बताया कि वह उन अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मौजूद थीं जहां शुरुआत में अफ़ग़ान शरणार्थियों को इस प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा था.

उन्होंने कहा, "शरणार्थियों को सैन्य ठिकानों पर कई हफ्तों या महीनों तक रोका गया, जब तक कि वे अमेरिका में प्रवेश के लिए तैयार नहीं हो गए. इस दौरान सुरक्षा जांच और मेडिकल स्क्रीनिंग व्यापक रूप से की गई."

मरे ने यह भी कहा, "सबसे अच्छी जांच भी भविष्य का अनुमान नहीं लगा सकती. हो सकता है कि उसका (लाकनवाल का) रिकॉर्ड साफ़ रहा हो, वह मानवीय सुरक्षा के लिए सही उम्मीदवार रहा हो, और फिर कुछ बदल गया हो."

वह कहती हैं कि निकाले जाने के चार साल बाद, हज़ारों अफ़ग़ान सुरक्षित रूप से अमेरिका में बस चुके हैं और यह पहला बड़ा हादसा है.

वह जोड़ती हैं, "एक व्यक्ति ने भयानक अपराध किया, का मतलब यह नहीं है कि बाकी अफ़ग़ान अब ख़तरा हैं."

सीआईए का सहयोगी था संदिग्ध हमलावर

सीआईए के निदेशक जॉन रेटक्लिफ ने बीबीसी के अमेरिकी साझेदार सीबीएस न्यूज़ को बताया कि संदिग्ध ने अफ़ग़ानिस्तान में सीआईए के साथ काम किया था.

बीबीसी की अफ़ग़ान सेवा ने लाकनवाल की पूर्व सैन्य यूनिट कंधार स्ट्राइक फ़ोर्स (केएसएफ़) के एक सैनिक से बात की.

सैनिक ने बताया कि यूनिट में शामिल होने के लिए जांच होती थी, जो लगभग तीन से चार हफ़्ते चलती थी. इसमें एक वरिष्ठ केएसएफ़ अधिकारी की सिफ़ारिश और मोबाइल डिवाइस की "कॉल हिस्ट्री चेक" करना शामिल था.

अगर उम्मीदवार इस चरण को पार कर लेता, तो उसे अमेरिकी सुरक्षा जांच के लिए भेजा जा सकता था, जिसमें आवेदक से बायोमेट्रिक डेटा लिया जाता था.

अफ़ग़ान सेवा ने सैनिक की बात की पुष्टि के लिए यूनिट के एक कमांडर से बात की. उन्होंने सैनिक की पहचान तो सुनिश्चित की ही, यह भी जोड़ा कि जांच प्रक्रिया में आपराधिक रिकॉर्ड की जांच भी शामिल थी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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