इस्लामिक देशों का यह ग़ुस्सा क्या किसी नतीजे पर पहुँचेगा?

ग़ज़ा में इसराइली हमले पर अमेरिका के रुख़ को लेकर अरब और इस्लामिक देशों की नाराज़गी लगातार बढ़ती जा रही है.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की ओर से अनुच्छेद 99 लागू करने के बाद शुक्रवार को यूएन सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक हुई थी.

अनुच्छेद 99 लागू होने के बाद ग़ज़ा में जारी इसराइली सैन्य कार्रवाई को रोकने के लिए सुरक्षा परिषद को वोटिंग के लिए मजबूर होना पड़ा.

संयुक्त अरब अमीरात ने यूएन सुरक्षा परिषद में युद्धविराम को लेकर प्रस्ताव रखा और इस पर वोटिंग हुई. इस प्रस्ताव पर सुरक्षा परिषद के 13 सदस्यों ने पक्ष में वोट किया लेकिन अमेरिका ने इसे वीटो कर दिया.

अमेरिका सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और उसके पास वीटो का अधिकार है.

इस वोटिंग से ब्रिटेन बाहर रहा था लेकिन अमेरिका वीटो नहीं करता तो उसके बाहर रहने से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

वीटो के पक्ष में तर्क देते हुए संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के उपराजदूत रॉबर्ट आर वुड ने कहा था, ''युद्धविराम के प्रस्ताव में जिस भाषा का इस्तेमाल किया गया था, उसमें सात अक्टूबर को इसराइल के भीतर हमास के हमले की निंदा नहीं की गई थी. ख़ास कर इसराइली नागरिकों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा जैसी रिपोर्ट आई है, उसका भी ज़िक्र नहीं था. प्रस्ताव में इस बात का भी ज़िक्र होना चाहिए था कि इसराइल के पास आत्मरक्षा का अधिकार है.''

इस्लामिक देशों की नाराज़गी

विवादित फ़लस्तीनी क्षेत्र में सैन्य और मानवीय संकट उभरने पर अरब देश और ईरान 1950 के दशक से ही पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ 'तेल को हथियार' के रूप में इस्तेमाल करने पर चर्चा करते रहे हैं.

उन्होंने दो बार तेल की आपूर्ति रोकी भी थी. पहले 1967 में छह दिनों की जंग के दौरान और फिर 1973 में योम किपुर की लड़ाई के दौरान. पहले वाली रोक असरदार नहीं रही थी, मगर दूसरी रोक के काफ़ी गहरे असर देखने को मिले थे.

पश्चिम और अरब देशों ने इन घटनाओं से अपने-अपने सबक लिए. इसलिए, अब कोई भी तेल की आपूर्ति रोकने के बारे में बात नहीं करता और न ही किसी की ऐसा करने की मंशा है.

50 साल पहले इसराइल को लगता था कि कोई उस पर हमला नहीं करेगा और इसी तरह अमेरिका को लगता था कि अरब देश तेल की आपूर्ति नहीं रोकेंगे. मगर ये दोनों बातें हुईं.

क़तर के विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ अरब देशों के विदेश मंत्रियों से समूह ने कहा कि अमेरिका को इसराइल के मामले में व्यापक भूमिका निभानी चाहिए.

वहीं सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फ़ैसल बिन फ़रहान ने शुक्रवार को वॉशिंगटन में कहा था, ''हम जिस प्रभाव का इस्तेमाल कर सकते थे, वो नाकाम हो गया है क्योंकि इसके इस्तेमाल से परहेज़ कर रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने के पर्याप्त मौक़े थे. अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता के लिए ज़रूरी है कि वैश्विक संगठन अपने प्रभाव का इस्तेमाल करें. हम एक ऐसी स्थिति देख रहे हैं, जिसमें युद्धविराम कोई गंदा शब्द बना गया है. सच कहिए तो हम इसे समझने में नाकाम रहे हैं.''

अमेरिका के वीटो को लेकर ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल्बुसइदी ने तो बहुत ही कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया.

ओमानी विदेश मंत्री ने ट्वीट कर कहा, ''सुरक्षा परिषद में वीटो का इस्तेमाल मानवीय मूल्यों का शर्मनाक अपमान है. मुझे अमेरिका को लेकर गहरा अफ़सोस है कि यहूदीवाद के लिए निर्दोष नागरिकों की जान ली जा रही है. आज के दिन के इस वीटो को इतिहास में एक शर्म के रूप में देखा जाएगा.''

ओमान के विदेश मंत्री की इस प्रतिक्रिया पर थिंक टैंक क्विंसी इंस्टिट्यूट के वाइस प्रेसिडेंट तृता पार्सी ने लिखा है, ''संयुक्त राष्ट्र में युद्धविराम पर बाइडन के वीटो पर ओमानी विदेश मंत्री ने बहुत ही सख़्त शब्द का इस्तेमाल किया है. ओमान अमेरिका का क़रीबी साझेदार रहा है. बाइडन इसराइल के लिए अपने अच्छे दोस्तों को भी अलग-थलग कर रहे हैं.''

हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि इसराइल के मामले में इस्लामिक देश चाहे जिनती नाराज़गी दिखा लें लेकिन वो कुछ ख़ास कर नहीं पाएंगे.

हालात 1973 के अरब-इसराइल युद्ध से अलग हैं, जब अरब देशों ने तेल की सप्लाई रोक दी थी.

1973 में अरब-इसराइल युद्ध के बाद से लगे अरब देशों के तेल प्रतिबंध के बाद ही अमेरिका ने तेल सप्लाई के वैकल्पिक स्रोत तलाशने शुरू कर दिए थे.

जहां तक इसराइल का सवाल है तो हमास से इसका युद्ध जारी रहा और इसमें दूसरे अरब देश शामिल हुए तो उसकी स्थिति नाज़ुक हो सकती है. क्योंकि हमले में इसराइल के वो बंदरगाह निशाने पर रहेंगे, जहाँ उसके आयातित तेल टैंकर आते हैं.

वीटो के बाद अमेरिका की आलोचना

सुरक्षा परिषद में अमेरिका के वीटो के कुछ ही देर बाद अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन से अरब देशों के विदेश मंत्रियों ने मुलाकात की.

ब्लिंकन के सहयोगियों ने कहा कि वह ग़ज़ा के भविष्य के बारे में बात करना चाहते हैं लेकिन जॉर्डन के विदेश मंत्री एमान सफ़ादी उनके इस रवैये को ख़ारिज किया.

उन्होंने कहा, "मानवीय युद्धविराम का समर्थन करने में आज जो असफलता मिली है, वह फ़लस्तीनियों की हत्याओं और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के उल्लंघन और युद्ध अपराध करने को बढ़ावा देने जैसा है."

वहीं तुर्की ने भी अमेरिका के वीटो किए जाने पर जमकर निशाना साधा है. राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने वर्ल्ड ह्यूमन राइट्स डे पर एक कार्यक्रम में कहा, "इसराइल, जिसे पश्चिमी देशों का अटूट समर्थन मिल रहा है, वह ग़ज़ा में कत्लेआम कर रहा है. एक निष्पक्ष दुनिया संभव है, लेकिन अमेरिका के साथ नहीं. क्योंकि अमेरिका इसराइल के पाले में खड़ा है."

अर्दोआन ने इस दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार को भी ज़रूरी बताया.

इससे पहले तुर्की के विदेश मंत्री ने कहा कि वीटो के बाद ग़ज़ा के मुद्दे पर अमेरिका अकेला हो गया है. तुर्की के विदेश मंत्री हकन फ़िदान ने मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी और अरब लीग़ के अपने सहयोगियों के साथ हुई बैठक के बाद सरकारी ब्रॉडकास्टर टीआरटी को दिए एक साक्षात्कार में अमेरिका पर निशाना साधा.

उन्होंने कहा, "हमारे दोस्तों ने एक बार फिर ये दिखा दिया है कि इस मुद्दे पर अमेरिका अकेला है. ख़ासतौर पर संयुक्त राष्ट्र में हुई वोटिंग के दौरान."

तुर्की पश्चिमी देशों के सैन्य सहयोग संगठन नेटो का सदस्य है लेकिन अन्य सदस्यों की तरह वह हमास को चरमपंथी गुट नहीं मानता.

ईरान के विदेश मंत्री हुसैन आमिर अब्दुल्लाहियान ने अमेरिका के वीटो के बाद मध्य-पूर्व में हालात विस्फोटक होने के ख़तरे का ज़िक्र किया है. विदेश मंत्री ने यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से फ़ोन पर बातचीत के दौरान कहा, "जब तक अमेरिका यहूदीवाद सरकार (इसराइल) के अपराधों और युद्ध जारी रखने को समर्थन देता रहेगा, तब तक इस क्षेत्र ऐसे विस्फोटक हालात पनपने का ख़तरा है, जिसे नियंत्रित न किया सके."

मलेशिया के मौजूदा और पूर्व दोनों ही प्रधानमंत्रियों ने अमेरिका के वीटो पर आपत्ति जताई है.

मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने कहा, "यह अजीब और मानवीय विवेक से परे है, जब कुछ ऐसे भी पक्ष दिखते हैं जो निर्दोष बच्चों और महिलाओं के साथ-साथ नागरिकों के जनसंहार का समर्थन करती हैं और चुप्पी साधे रहती हैं."

वहीं पूर्व पीएम महातिर मोहम्मद ने एक यूट्यूब चैनल से बातचीत में कहा कि इसराइल के जनसंहार को समर्थन देना कोई ऐसी अभिव्यक्ति नहीं, जिसका उदारतावाद से संबंध हो.

सात अक्तूबर को हमास के हमले के बाद से जारी इसराइली सैन्य कार्रवाई में

रूस की अरब देशों से बढ़ती करीबी

पिछले सप्ताह ही रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के आधिकारिक दौरे पर गए थे.

पुतिन ने इस दौरे के अगले ही दिन ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी से मॉस्को में मुलाक़ात की. पुतिन ने यह मुलाक़ात तब की है, जब इसरायल और हमास के बीच युद्ध के की वजह से अमेरिका अरब देशों के निशाने पर है.

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद व्लादिमीर पुतिन इक्का-दुक्का देशों के दौरे पर ही गए हैं. इसलिए उनकी इस मैराथन मुलाक़ातों को अरब देशों से रूस की बढ़ती क़रीबी के तौर पर देखा गया.

सऊदी अरब और रूस दोनों ही तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक प्लस के सदस्य हैं और इससे जुड़े किसी भी बड़े फ़ैसले में दोनों का प्रभाव दिखता है. दोनों देशों के नेताओं के रिश्ते भी पिछले कुछ सालों में गहरे होते दिखे हैं.

सऊदी अरब पहुंचने के बाद पुतिन ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को न्योता देने के लिए शुक्रिया कहा. उन्होंने बताया कि पहले मोहम्मद बिन सलमान रूस आने वाले थे लेकिन योजनाओं में कुछ बदलाव हुआ. हालांकि, अगली मुलाकात मॉस्को में होगी.

यूक्रेन पर आक्रमण के बाद से पश्चिमी देशों के प्रतिबंध झेल रहे रूस के साथ सऊदी अरब के बढ़ते रिश्तों को इस तरह से भी देखा जा रहा है कि अब अमेरिका के पीछे चलने के बजाय मध्य पूर्व के देश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की तरफ़ आगे बढ़ रहे हैं.

रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बयान में इसकी झलक भी दिखती है. पुतिन ने क्राउन प्रिंस से कहा, "हमारे मैत्रीपूर्ण संबंधों को आगे बढ़ने से कुछ भी रोक नहीं सकता है."

दूसरी तरफ़, सऊदी अरब और अमेरिका के रिश्तों में कुछ सालों के अंदर कई उतार-चढ़ाव आए हैं, इसके बावजूद वह अमेरिकी हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है. हालांकि, इसराइल और हमास के बीच जंग छिड़ने के बाद अमेरिका के साथ सऊदी अरब के सुधरते रिश्तों में ठहराव देखा जा रहा है.

सऊदी अरब के विदेश मंत्री अमेरिका के वीटो के बाद कहा कि ग़ज़ा में युद्ध पर फ़ौरन रोक लगनी चाहिए लेकिन ऐसा लगता है कि दुनिया के कई देशों की सरकारें इसे अपनी प्राथमिकता नहीं मानती हैं.

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