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इसराइल किन फ़लस्तीनी क़ैदियों को छोड़ रहा है? इसराइली जेलों में कितने बंदी?
- Author, अला दाराघमी
- पदनाम, बीबीसी अरबी सेवा, रामल्लाह
इसराइल और हमास के बीच कैदियों और अग़वा किए गए लोगों की अदला-बदली के साथ-साथ चार दिनों के लिए संघर्ष विराम की सहमति बन गयी है.
बीबीसी को मिली जानकारी के मुताबिक़, ये संघर्ष विराम गुरुवार दस बजे शुरू होगा और कैदियों की अदला-बदली दोपहर में होगी.
इसराइल ने उन 300 फ़लस्तीनियों की सूची प्रकाशित की है जिन्हें रिहा किया जा सकता है.
इनमें से ज़्यादातर की उम्र 17 से 18 के बीच में है. सबसे कम उम्र वाला शख़्स 14 साल और सबसे ज़्यादा उम्र वाला शख़्स 59 साल का बताया जा रहा है. इनमें से 274 लोग पुरुष हैं.
इसराइल में इस तरह की सूची को सार्वजनिक करना एक क़ानूनी औपचारिकता है. इस तरह क़ैदियों को छोड़े जाने से पहले इसराइली नागरिकों को इसराइली सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपील करने के लिए 24 घंटों का वक़्त देना ज़रूरी है.
गुरुवार को शुरु हुए पहले चरण में हमास 50 महिलाओं एवं बच्चों को छोड़ेगा. इसमें हर दिन 12 लोगों को छोड़ा जाएगा. इसके बाद इसराइल 150 फ़लस्तीनी लोगों को छोड़ेगा.
इसके दूसरे चरण में हर बार दस इसराइली नागरिकों को छोड़े जाने पर संघर्ष विराम एक दिन के लिए बढ़ जाएगा.
ऐसे में हमास अगर कुल 50 इसराइली नागरिकों को लौटाता है तो इसराइल 150 फ़लस्तीनियों को छोड़ सकता है.
दुनिया भर के नेताओं ने क़तर की मध्यस्थता से हुए इस समझौते का स्वागत किया है.
हमास को यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और अमेरिका में एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन मानते हैं.
हमास की ओर से सात अक्टूबर को इसराइल पर किए गए हमले में 1,200 से ज़्यादा इसराइली लोगों की मौत हुई है.
इस हमले के साथ ही हमास ने 200 से ज़्यादा लोगों को अगवा किया है. इसके बाद इसराइल ने ग़ज़ा पर बमबारी करना शुरू किया जिसमें 14,000 से ज़्यादा फ़लस्तीनी लोग मारे गए हैं.
कैदियों की अदला-बदली का इतिहास
इसराइल ने इन 300 फ़लस्तीनी क़ैदियों के अपराधों और कथित अपराधों की सूची भी जारी की है जिन्हें रिहा किया जा सकता है.
इन अपराधों में हत्या की कोशिश, बम फेंकना, विस्फोटक या ज्वलनशील पदार्थ बनाने, पत्थर फेंकने, शत्रु संगठन से संबंध, और गंभीर शारीरिक नुकसान आदि हैं.
इससे पहले हुई कैदियों की अदला-बदली से इतर इस लिस्ट में ऐसे लोग नहीं है जो इसराइली लोगों की हत्या करने के मामलों में दोषी ठहराए गए हैं.
इससे पहले इतने बड़े स्तर पर क़ैदियों की अदला-बदली साल 2011 के अक्टूबर में हुई थी जब हमास ने इसराइली सैनिक गिलाद शलित को पांच साल तक कैद में रखने के बाद रिहा किया था. उनके बदले में 1,027 फ़लस्तीनी कैदियों को छोड़ा गया था.
इनमें से कुछ कैदियों को हत्या जैसे मामलों में भी दोषी ठहराया गया था. इनमें याहया सिनवार भी शामिल हैं जो ग़ज़ा पट्टी में हमास के नेता हैं और 7 अक्टूबर के हमले के लिए ज़िम्मेदार ठहराए गए हैं.
कैदियों की बढ़ती संख्या
इसराइल की जेलों में कैद फ़लस्तीनी लोगों की संख्या में तेजी से इज़ाफा होता दिख रहा है.
फ़लस्तीनी मानवाधिकार संस्था अद्दामीर के मुताबिक़, छह नवंबर तक इसराइली नियंत्रण वाली जेलों में कैद फ़लस्तीनी लोगों की संख्या 7,000 पहुंच गयी है. इनमें 80 महिलाएं और 18 साल की उम्र से कम 200 बच्चे शामिल हैं.
इस संस्था के मुताबिक़, सात अक्टूबर के बाद से 3,000 से ज़्यादा फ़लस्तीनियों को गिरफ़्तार किया गया है.
इसराइल ने साल 2021 में अद्दामीर समेत पांच अन्य फ़लस्तीनी सिविल राइट्स समूहों को आतंकी संगठन के रूप में परिभाषित किया है.
संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय राइट्स ग्रुप इस तरह के दर्जे को अस्वीकार नहीं करते हैं.
इसराइली मानवाधिकार संगठन बेतसेलेम के मुताबिक़, सितंबर, 2023 के अंत में इसराइल प्रिज़न सर्विसेज़ ने सुरक्षा कारणों से 146 फ़लस्तीनी नाबालिग़ों को हिरासत या कैद करके रखा हुआ है.
इसके साथ ही इसराइली कारागार सेवा इसराइल में अवैध रूप से होने की वजह से 34 फ़लस्तीनी नाबालिग़ों को हिरासत में रखे हुए है.
फ़लस्तीनी राइट्स संगठन फ़लस्तीन प्रिज़नर्स क्लब के मुताबिक़, हमास के छापे के बाद इसराइली जेलों में छह कैदी मारे जा चुके हैं जिनमें से 5 लोगों को सात अक्टूबर के बाद गिरफ़्तार किया गया था.
ना आरोप - ना सुनवाई
इसराइल में प्रशासनिक हिरासत नामक एक व्यवस्था है जिसके तहत एक शख़्स को उसके ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों की सुनवाई के बिना हिरासत में रखे जा सकता हैं. इस व्यवस्था के शिकार होने वालों में फ़लस्तीनी लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा है.
इसराइल की मानवाधिकार संस्था हामोकेड के मुताबिक एक नंवबर तक इसराइल में 2,070 क़ैदी है. संस्था के मुताबिक हमास के हमले के समय ये आंकड़ा 1,319 था.
जेसिका मोंटेल हामोकेड की कार्यकारी निदेशक हैं और वे इस समझौते का स्वागत करती हैं.
वे कहती हैं, "लोगों को होस्टेज बनाकर रखना अपने आप में अवैध है, एक युद्ध अपराध है. हमास को चाहिए कि वो सभी अग़वा लोगों को बिना शर्त रिहा कर दें. लेकिन इस मकसद की पूर्ति के लिए ये ज़रूरी है कि इसराइल क़ैदियों को रिहा कर दे."
उन्होंने कहा कि समझौते के तहत फ़लस्तीनी प्रशासन द्वारा क़ैद में रखी गई फ़लस्तीनी महिलाओं और बच्चों को भी रिहा किया जाएगा.
जेसिका मोंटेल कहती हैं, "इन लोगों को भी बिना शर्त रिहा किया जा रहा है. इसलिए इसराइली होस्टेज और फ़लस्तीन प्रशासन के क़ैदियों का रिहा किया जाना दोहरी ख़ुशी की बात है."
संयुक्त राष्ट्र की आलोचना
संयुक्त राष्ट्र वर्षों से इसराइली रवैये का आलोचक रहा है. यूएन का कहना है कि फ़लस्तीनियों ने इसराइली कब्ज़े के दौरान अरसे से ‘स्वतंत्रतता के अभाव’ को झेला है.
फ़्रांसेस्का अल्बनीज़ इसराइली कब्ज़े वाले फ़लस्तीन में यूएन की विशेष प्रतिनिधि हैं.
वे कहती हैं, “वर्ष 1967 से बच्चों समेत 800,000 लाख फ़लस्तीनियों को इसराइल सेना अलग-अलग दौर में बंदी बनाया गया है.”
वे कहती हैं कि उन्हें इसराइल ने अधिकृत वेस्ट बैंक में नहीं जाने दिया गया है लेकिन वे जॉर्डन गई हैं और वहां छह महीने तक लोगों के इंटरव्यू किए हैं.
इसराइल ने उनकी रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया है.
संयुक्त राष्ट्र और सेव द चिल्ड्रेन नामक गैर-सरकारी संस्था के मुताबिक हर वर्ष 500 से 700 फ़लस्तीनी बच्चों को इसराइली सेना हिरासत में लेती है.
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