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भारत-चीन के बीच लद्दाख में एलएसी को लेकर जो समझौता हुआ उसके क्या मायने हैं?
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ गतिरोध वाले दो बिंदुओं-देपसांग और डेमचोक में सैनिकों की वापसी हो गई है और जल्द ही इन टकराव बिंदुओं पर गश्त शुरू कर दी जाएगी.
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ भारत और चीन ने गुरुवार को दिवाली के मौके पर वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कई सीमा बिंदुओं पर मिठाइयों का आदान-प्रदान किया है.
भारत में चीन के राजदूत जू फेइहोंग ने कोलकाता में मर्चेंट्स चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के एक कार्यक्रम में कहा, "चीन और भारत संबंधों की एक नई शुरुआत कर रहे हैं और दोनों के सामने नए विकास के अवसर हैं."
उन्होंने कहा, "चीन, द्विपक्षीय आर्थिक और व्यापार सहयोग को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए भारत के साथ काम करने के लिए तैयार है."
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार एक सवाल के जवाब में चीनी राजदूत ने कहा कि इस समझौते के बाद भविष्य में संबंध मज़बूती से आगे बढ़ेंगे.
साल 2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी.
इस झड़प में 20 भारतीय सैनिकों के साथ कई चीनी सैनिक मारे गए थे. तब से दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था.
सवाल है कि आख़िर इस समझौते के मायने क्या हैं? क्या भारत और चीन के संबंध फिर से पटरी पर लौट गए हैं? क्या अन्य जगहों पर चल रहा सीमा विवाद भी धीरे-धीरे सुलझना शुरू होगा?
ब्रिक्स में भारत-चीन समझौता
कुछ दिन पहले 21 अक्टूबर को भारत और चीन, सैनिकों की वापसी और गश्त शुरू करने को लेकर एक समझौते पर पहुंचे थे.
रूस के कज़ान में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने लिए पीएम मोदी के रवाना होने से पहले भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने इस समझौते की घोषणा की थी.
ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस ऐतिहासिक समझौते का समर्थन करने के लिए बैठक भी की थी.
पांच साल बाद दोनों नेताओं ने आमने-सामने बैठकर बात की थी. इस बैठक को लेकर दिल्ली में मौजूद रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव का कहना था कि शिखर सम्मेलन ने दो प्रमुख शक्तियों के बीच सहयोग को बढ़ाया है.
भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर का कहना था कि ‘इस समझौते से दोनों देशों के बीच सीमा पर साल 2020 से पहले की स्थिति बहाल हो जाएगी.'
इसका मतलब है कि साल 2020 में भारतीय सैनिक जिस हद तक गश्त कर रहे थे, अब फिर से वहीं तक गश्त कर पाएंगे.
समझौते से क्या बदलेगा?
लद्दाख के साथ-साथ सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों पर चीन अपना दावा करता है, लेकिन अभी जो समझौता हुआ है, वह सिर्फ लद्दाख के लिए हुआ है.
रक्षा विशेषज्ञ एयर कमोडोर (डॉ.) अशमिंदर सिंह बहल (सेवानिवृत्त) कहते हैं कि 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद तनाव बहुत बढ़ गया था लेकिन साल 2022 में भारत और चीन ने गलवान और पैंगोंग झील में मामले को सुलझा लिया था.
वे कहते हैं, "देपसांग और डेमचोक भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. देपसांग 900 वर्ग किलोमीटर का प्लेन एरिया है. वहां टैंकों का इस्तेमाल किया जा सकता है, भारत ऐसा कर भी चुका है. उसके पास भारत की दौलत बेग ओल्डी एयर स्ट्रिप है. जहां हम फाइटर जेट से लेकर ट्रांसपोर्ट विमान लैंड कर चुके हैं, ऐसे में वहां शांति बहाल होना एक ऐतिहासिक कदम है."
बहल कहते हैं, "मई 2020 से पहले भारत के सैनिक प्वाइंट 10, 11, 11ए, 12, 13 और वाई जंक्शन तक आराम से जा सकते थे और पेट्रोलिंग कर सकते थे, लेकिन बाद में चीन ने कब्ज़ा कर लिया और वहां पर टेंपरेरी स्ट्रक्चर बना दिए, लेकिन अब समझौते के बाद हम फिर से पेट्रोलिंग कर पाएंगे."
दोनों देशों के बीच हुए एग्रीमेंट को समझाते हुए बहल कहते हैं, “अब देपसांग और डेमचोक में भारत और चीन दोनों की सेना जा सकती है, लेकिन सैनिकों की संख्या सीमित है. ये संख्या 15 से 20 के बीच है. इसके अलावा एक दूसरे को बताकर पेट्रोलिंग की जाएगी जिससे विवाद की स्थिति पैदा नहीं होगी.”
वे कहते हैं, "चीन ने जो टेंपरेरी स्ट्रक्चर बनाए थे उन्हें हटा लिया है, लेकिन बफर जोन कितना बड़ा होगा, इसे लेकर अभी कोई स्पष्टता नहीं है."
बहल कहते हैं कि सैनिकों की वापसी पहला कदम है, इसके बाद सीमा से सैनिकों को हटाना यानी डिमिलिटराइजेशन और डिएस्कलेशन होना अभी बाकी है. ऐसे होने पर भारत अपने सैनिकों को आराम दे पाएगा और उनकी ट्रेनिंग अच्छे से हो पाएगी, क्योंकि हर समय सैनिकों को अलर्ट मोड में नहीं रखा जा सकता है.
ऐसी ही बात रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल एसपी सिन्हा (सेवानिवृत्त) भी करते हैं. वे कहते हैं कि यह पहली बार है जब चीन अपने कदम पीछे खींच रहा है.
वे कहते हैं, "बावजूद इसके चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है. चीन सलामी स्लाइसिंग टेक्निक का इस्तेमाल करता है. वह दो कदम आगे बढ़ाकर एक कदम पीछे खींच लेता है, और ऐसा करते हुए वह लगातार आगे बढ़ता रहता है."
सिन्हा कहते हैं, "ये चीन की विस्तारवादी नीति है, जो माओत्से तुंग के समय से चल रही है. इसलिए चीन पर भरोसा करना आसान नहीं है."
समझौते के मायने?
पूर्वी लद्दाख में देपसांग और डेमचोक में हुए समझौते के पीछे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अहम भूमिका मानी जा रही है.
रक्षा विशेषज्ञ बहल कहते हैं, "ब्रिक्स में मुख्य रूप से तीन ही बड़े देश हैं- भारत, चीन और रूस. राष्ट्रपति पुतिन को पता है कि अगर भारत और चीन की दोस्ती नहीं होगी तो ब्रिक्स का कोई वजूद नहीं रहेगा. दोनों देशों की दोस्ती करवाकर वे एक ऐसा विकल्प सामने लाना चाहते हैं जो अमेरिका को चुनौती दे पाए."
वे कहते हैं, "भारत, चीन और रूस के साथ आने पर एक ऐसा वर्ल्ड ऑर्डर बनता है, जो अमेरिका को मुश्किल में डाल सकता है. यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस की बड़े पैमाने पर संपत्तियां फ्रीज़ हुई हैं और वह चाहता है कि डॉलर की जगह ब्रिक्स की अलग से करेंसी हो और उसी में व्यापार हो."
वहीं रक्षा विशेषज्ञ एसपी सिन्हा का मानना है कि चीन को भी पता है कि वह हर जगह अपना फ्रंट नहीं खोल सकता है.
वे कहते हैं, "चीन के लिए एक साथ ताइवान और भारत के साथ फ्रंट खोलकर रखना मुश्किल है. अगर उसके भारत के साथ सीमा पर संबंध अच्छे होते हैं तो वह अमेरिका का अच्छे से मुकाबला कर सकता है."
सवाल है कि क्या लद्दाख में हुए समझौते का असर अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में भी पड़ेगा.
बहल कहते हैं, "अरुणाचल पर चीन अपना दावा करता है. उसे वह साउथ तिब्बत कहता है, लेकिन वहां चीन आगे बढ़कर नहीं आया है. उनकी तरफ से वह विवादित है. यह समझौता अभी सिर्फ लद्दाख के लिए हुआ है, लेकिन यहां हुई शांति बहाली का असर आने वाले भविष्य में पूर्वी भारत में भी दिख सकता है."
सालों पुराना सीमा विवाद
भारत चीन के साथ 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है. ये सीमा लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश से होकर गुज़रती है.
ये सरहद तीन सेक्टरों में बंटी हुई है - पश्चिमी सेक्टर यानी लद्दाख, मिडिल सेक्टर यानी हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड और पूर्वी सेक्टर यानी सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश.
दोनों देशों के बीच अब तक पूरी तरह से सीमांकन नहीं हुआ है क्योंकि कई इलाक़ों के बारे में दोनों के बीच मतभेद हैं.
भारत पश्चिमी सेक्टर में अक्साई चिन पर अपना दावा करता है, लेकिन ये इलाक़ा फ़िलहाल चीन के नियंत्रण में है. भारत के साथ 1962 के युद्ध के दौरान चीन ने इस पूरे इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया था.
वहीं, पूर्वी सेक्टर में चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता है. चीन कहता है कि ये दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा है. तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के बीच की मैकमोहन रेखा को भी चीन नहीं मानता है.
चीन का कहना है कि 1914 में जब ब्रिटिश भारत और तिब्बत के प्रतिनिधियों ने ये समझौता किया था, तब वो वहां मौजूद नहीं था. चीन का कहना है कि तिब्बत चीन का अंग रहा है इसलिए वो (तिब्बत) ख़ुद कोई फ़ैसला नहीं ले सकता.
दरअसल 1914 में तिब्बत एक स्वतंत्र लेकिन कमज़ोर मुल्क था लेकिन चीन ने तिब्बत को कभी स्वतंत्र मुल्क नहीं माना. 1950 में चीन ने तिब्बत को पूरी तरह से अपने क़ब्ज़े में ले लिया.
कुल मिलाकर चीन अरुणाचल प्रदेश में मैकमोहन लाइन को नहीं मानता और अक्साई चिन पर भारत के दावे को भी ख़ारिज करता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित