इंडिगो संकट के लिए ज़िम्मेदार कौन?

    • Author, राघवेंद्र राव और सईदउज़्ज़मां
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में 15 साल पहले हुए एक विमान हादसे में 158 लोगों की मौत हुई थी.

हादसे की जांच रिपोर्ट में कहा गया कि हादसे के लिए ज़िम्मेदार एक झपकी लेता हुआ पायलट था.

तेरह साल तक अदालत में चले एक मुक़दमे के बाद पायलटों की थकान से निपटने के लिए बनाए गए नियम लागू होने के कगार तक पहुंचे.

लेकिन फ़िलहाल एक ऐसी एयरलाइन भी है जिसे 10 फ़रवरी 2026 तक इन नियमों को न मानने की इजाज़त दे दी गई है.

पिछले कुछ दिनों में इंडिगो एयरलाइन की हज़ारों उड़ानें रद्द होने के बाद भारत का एविएशन सेक्टर जहां एक गहरे संकट से जूझता नज़र आ रहा है, वहीं भारत के सबसे बड़े ऑपरेटर इंडिगो की उड़ानों और उनमें सफ़र करने वाले यात्रियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं.

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इंडिगो मामले के लिए कौन ज़िम्मेदार है, यह समझने से पहले नज़र डालते हैं इस विषय की पृष्ठभूमि पर.

पायलटों की थकान का मुद्दा

कहानी शुरू होती है मई 2010 में जब दुबई से मैंगलोर जा रहा एयर इंडिया एक्सप्रेस का एक विमान मैंगलोर हवाई अड्डे पर उतरते वक़्त क्रैश हो गया था. इस हादसे में 158 लोगों की मौत हुई.

मामले की जांच हुई और इस हादसे के लिए एक पायलट को झपकी आ जाने को ज़िम्मेदार ठहराया गया.

जांच रिपोर्ट में कहा गया कि प्लेन को उड़ा रहे एक सर्बियाई पायलट उड़ान की तीन घंटे की अवधि के दौरान ज़्यादातर वक़्त सोए रहने की वजह से भ्रमित (डिसओरिएंटेड) हो गए थे.

संभवतः यह भारत में पहली बार था जब पायलट की थकान और उसकी वजह से यात्रियों की सुरक्षा को होने वाले ख़तरों का मुद्दा एक चर्चा का विषय बना.

इस हादसे के दो साल बाद साल 2012 में यह मुद्दा अदालत पहुंचा जब कई पायलट संगठनों ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि भारत में उड़ानों का शेड्यूल इस तरह बनाया जाता है कि पायलटों को बहुत ज़्यादा काम करना पड़ता है, जिससे उड़ानों की सुरक्षा खतरे में पड़ती है.

इन संगठनों ने मांग की कि पायलटों की थकान से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक़ नियम लागू किए जाएं.

जनवरी 2024 में डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ सिविल एविएशन ने नए ड्यूटी नियम लागू किए ताकि उन्हें वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाया जा सके.

एयरलाइनों को इन्हें दो चरणों में अपनाना था— जुलाई और नवंबर, 2025 में.

साथ ही अदालत में चल रहा मुक़दमा क़रीब 13 साल की क़ानूनी जद्दोजहद के बाद इस साल अप्रैल में ख़त्म हुआ जब दिल्ली हाई कोर्ट ने नए फ़्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशंस नियमों को लागू करने का रास्ता साफ़ कर दिया.

इन नियमों के 15 प्रावधानों की पहली खेप इस साल एक जुलाई तक और बाकी सात प्रावधानों की दूसरी खेप एक नवंबर तक लागू की जानी थी.

इंडिगो संकट की शुरुआत

इंडिगो एयरलाइन का संकट दो दिसंबर को शुरू हुआ जब यात्रियों ने पहली बार दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े हवाई अड्डों पर उड़ानों में देरी और रद्द होने की शिकायत की.

अगले कुछ दिनों में स्थिति तेज़ी से बिगड़ गई और हज़ारों उड़ानें रद्द करनी पड़ीं. इसकी वजह पायलटों की कमी और संचालन में गड़बड़ी थी जो एक नवंबर से लागू किए गए नए फ़्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन नियमों से जुड़ी थी.

फ़्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन नियम तय करते हैं कि पायलटों की ड्यूटी का समय कितना होगा, फ़्लाइट ड्यूटी का समय कितना होगा, उड़ान की समय सीमा क्या होगी और आराम की अवधि क्या होगी.

नए नियमों के तहत पायलटों को दिए जाने वाले साप्ताहिक आराम का समय 36 घंटे से बढ़ाकर 48 घंटे कर दिया गया. साथ ही रात में लैंडिंग की सीमा भी सख़्त कर दी गई जिसके तहत छह की बजाय सिर्फ़ दो नाइट लैंडिंग की इजाज़त दी गई.

ये नियम पायलटों की थकान कम करने के लिए बनाए गए थे लेकिन आरोप है कि इंडिगो ने इन बदलावों की पहले से योजना नहीं बनाई जिसकी वजह से उसके पास नियमों के मुताबिक़ आराम किए हुए स्टाफ़ की कमी हो गई और उसे अपने आधे से ज़्यादा बेड़े को ज़मीन पर खड़ा करना पड़ा.

इसका नतीजा यह हुआ कि भारत में वर्षों में सबसे बड़ी विमानन अव्यवस्था पैदा हो गई.

जहां एयर इंडिया जैसी अन्य बड़ी कंपनियां कहती हैं कि उन्होंने नियम लागू कर दिए हैं, वहीं इंडिगो ने माना है कि, "वह समय पर इन्हें पूरी तरह लागू करने की स्थिति में नहीं थी".

सरकार ने क्या किया?

चार दिसंबर को सिविल एविएशन मंत्री के राम मोहन नायडू ने इंडिगो के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की और मंत्रालय की तरफ से जारी एक प्रेस रिलीज़ के मुताबिक़ उन्होंने "एयरलाइन द्वारा स्थिति संभालने के तरीक़े पर स्पष्ट नाराज़गी जताई".

इसी रिलीज़ में कहा गया कि "बैठक के दौरान इंडिगो ने उड़ान रद्द होने के आंकड़े पेश किए और इस अव्यवस्था का कारण क्रू प्लानिंग में चुनौतियों, संशोधित फ़्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (एफ़डीटीएल) नियमों के लागू होने और मौसम संबंधी बाधाओं को बताया".

रिलीज़ में यह भी कहा गया कि मंत्री ने "ज़ोर देकर कहा कि नए नियामक नियमों के मुताबिक़ सुचारू बदलाव सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त तैयारी का समय उपलब्ध था".

इसके एक दिन बाद पांच दिसंबर को सिविल एविएशन मंत्रालय ने एक और प्रेस रिलीज़ के ज़रिए कहा "डीजीसीए के फ़्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन आदेशों को तुरंत प्रभाव से रोक दिया गया है" और "यह फ़ैसला यात्रियों के हित में लिया गया है, खासकर बुजुर्गों, छात्रों, मरीजों और उन लोगों के लिए जो ज़रूरी कामों के लिए समय पर हवाई यात्रा पर निर्भर रहते हैं".

मंत्रालय ने यह भी कहा कि हवाई सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया गया है.

लेकिन क्या वाकई ऐसा है?

'यह लोगों की जान से खेलने जैसा है'

नए एफ़डीटीएल नियमों के स्थगित किए जाने के बाद एयरलाइन पायलट्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने गहरी चिंता जताते हुए कहा कि यह कदम हाई कोर्ट के उन निर्देशों के ख़िलाफ़ है जिनमें थकान कम करने के मानकों को लागू करने का आदेश दिया गया है और जो विमानन विज्ञान पर आधारित हैं.

संजय लज़ार एक जाने-माने एविएशन एक्सपर्ट हैं.

इंडिगो को नियमों से मिली छूट पर वह कहते हैं, "जिसने नियमों का पालन नहीं किया, आप उसे बता रहे हैं कि मैं आपके लिए नियमों को रोक रहा हूं ताकि आप संभल सकें. अब देखना होगा कि जांच में क्या सामने आता कि यह छूट कैसे दी गई जिससे आप असल में पुराने सिस्टम पर लौट आए हैं."

अपनी बात जारी रखते हुए लज़ार कहते हैं, "नए नियम लागू करने को रोकने का मतलब यह नहीं कि विमान गिरने लगेंगे. नए नियम जारी होने के बाद भी पिछले क़रीब दो साल से पुराने नियमों पर काम चल ही रहा था. लेकिन यह छूट सिर्फ एक कंपनी को दी गई है और यही प्रतिस्पर्द्धा को बिगाड़ता है. यह ठीक नहीं है और दिखाता है कि कुछ सालों से इंडिगो को सिविल एविएशन मंत्रालय में जो ख़ास दर्जा मिला हुआ है, वह जारी है."

नए नियमों के लिए इंडिगो तैयार क्यों नहीं था?

एक सवाल जो बार-बार उठ रहा है वह यह है कि नए नियमों की बात पिछले साल जनवरी से हो रही थी. तो आख़िर इंडिगो इसके लिए ख़ुद को तैयार क्यों नहीं कर पाया?

संजय लज़ार कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि उनका इन नए नियमों का पालन करने का इरादा था. मैं यह पूरी गंभीरता से कह रहा हूँ क्योंकि उनके पास 22 महीने थे- क़रीब दो साल. जनवरी 2024 में सीएआर (सिविल एविएशन रिक्वायरमेंट) जारी हुआ. यह मामला पहले से ही कोर्ट में था. तो उनके पास भर्ती करने का पूरा समय था. उन्होंने मई-जून 2025 तक भर्ती भी की. लेकिन उन्होंने ज़रूरी नियमों को पूरी तरह मानने का फ़ैसला नहीं किया. उन्होंने सोचा कि वे नए नियमों के दूसरे चरण को आगे बढ़ा सकते हैं. उन्होंने इसे हल्के में लिया. मुझे लगता है कि उन्हें भरोसा था कि नए नियमों का लागू होना टल जाएगा या स्थगित हो जाएगा."

बीबीसी ने इस मामले पर इंडिगो का पक्ष जानने की कोशिश की और उन्हें लिखित सवाल भेजे. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक इंडिगो की तरफ से कोई जवाब नहीं आया था.

इस पूरे संकट के लिए कौन ज़िम्मेदार?

मंगलवार 9 दिसंबर को सिविल एविएशन मंत्री के राम मोहन नायडू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि उनके मंत्रालय ने इंडिगो के कुल रूट्स में कटौती को आवश्यक माना है, जिससे एयरलाइन का संचालन स्थिर होगा और उड़ानों के रद्द होने की घटनाएं कम होंगी.

नायडू ने लिखा कि इंडिगो के कुल रूट्स में 10 फ़ीसदी कटौती का आदेश दिया गया है और इसके बावजूद इंडिगो पहले की तरह सभी गंतव्यों को कवर करता रहेगा.

सिविल एविएशन मिनिस्टर ने यह भी लिखा कि "पिछले हफ़्ते इंडिगो की आंतरिक गड़बड़ियों- क्रू रोस्टर, उड़ान शेड्यूल और अपर्याप्त संचार- की वजह से कई यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा. जांच और आवश्यक कार्रवाई जारी है".

इंडिगो ने पिछले कुछ दिनों में कई बार माफ़ी मांगी और कहा कि उड़ानें रद्द होने की वजह अचानक आई मुश्किलें थीं- जैसे ख़राब मौसम, योजना में गलती और साथ ही नए पायलट आराम नियम लागू करने में हुई गड़बड़ी.

वहीं सरकार के अब तक के रवैये से लग रहा है कि वह इस पूरे संकट के लिए इंडिगो को ही ज़िम्मेदार ठहरा रही है.

तो आख़िर ज़िम्मेदारी है किसकी?

संजय लज़ार के मुताबिक़ कई लोगों की जवाबदेही बनती है.

वह कहते हैं, "सिविल एविएशन मंत्री अगर दोषी न भी हों, लेकिन फिर भी उनकी ज़िम्मेदारी है. वही संयुक्त महानिदेशक जिसने इंडिगो के विस्तारित शेड्यूल को मंजूरी दी थी, अब उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर रहा है और जांच कर रहा है. वही चीफ़ फ़्लाइट ऑपरेशन्स इंस्पेक्टर जिन्होंने इंडिगो के पायलटों की निगरानी नहीं की, अब उनके प्रशिक्षण पर नज़र रख रहे हैं. सरकार ने इन लोगों पर सीवीसी या सीबीआई जांच क्यों नहीं करवाई? मंत्रालय में हर स्तर पर मिलीभगत बहुत गहरी हो गई है. मुझे लगता है ये सभी लोग ज़िम्मेदार हैं."

कैप्टन मोहन रंगनाथन कहते हैं कि इस मामले की पूरी ज़िम्मेदारी सिविल एविएशन मंत्री पर आती है.

वो कहते हैं, "उन्होंने अदालत द्वारा जारी किए गए अनिवार्य सुरक्षा नियमों को नज़रअंदाज़ करते हुए आराम और छुट्टी के प्रावधानों को स्थगित कर दिया. यह अदालत की भी अवमानना है."

वह कहते हैं, "इंडिगो की गलती है कि उसने नियमों का उल्लंघन किया और शेड्यूलिंग में गड़बड़ी की. हाल ही में उन्होंने सर्दियों का शेड्यूल दाखिल किया जबकि उन्हें पता था कि उनके पास पर्याप्त क्रू नहीं है. वे पहले से ही क्रू की कमी से जूझ रहे थे और फिर भी सर्दियों के शेड्यूल में उड़ानें बढ़ा दीं. और डीजीसीए ने इस शेड्यूल को मंज़ूरी दे दी. तो इसमें तीनों दोषी हैं, सिर्फ़ एक नहीं. सब बराबर ज़िम्मेदार हैं."

बाक़ी एयरलाइंस पर ऐसा असर क्यों नहीं पड़ा?

बड़ा सवाल यह भी है कि अगर नए एफ़डीटीएल नियमों की वजह से इंडिगो एयरलाइन्स में संकट हुआ तो बाक़ी एयरलाइन्स पर इन नियमों का कोई असर क्यों नहीं दिखा?

इसे समझने से पहले कुछ आंकड़ों पर नज़र डालना ज़रूरी है.

इंडिगो के पास 434 विमानों को उड़ाने के लिए 5,085 पायलट हैं. दूसरी तरफ एयर इंडिया के पास 191 विमानों को उड़ाने के लिए 6,350 पायलट हैं.

तो यह साफ़ है कि एयर इंडिया के पास इंडिगो की तुलना में आधे से भी कम विमान हैं लेकिन उसके पास ज़्यादा पायलट हैं.

बीबीसी ने एयर इंडिया से पूछा कि नए एफ़डीटीएल नियमों का उस पर कोई ख़राब असर क्यों नहीं पड़ा?

एयर इंडिया की ओर से यह समाचार प्रकाशित किए जाने तक इसका आधिकारिक जवाब नहीं मिला है.

हालांकि कंपनी के एक वरिष्ठ कर्मचारी ने नाम ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया कि कई चुनौतियों के बावजूद एयर इंडिया ने अपने रोस्टरिंग सॉफ़्टवेयर सिस्टम को नए एफ़डीटीएल मानकों के मुताबिक एक नवंबर से ढाई महीने पहले ही पुनः कॉन्फ़िगर कर लिया था.

इस कर्मचारी ने कहा, "एयर इंडिया ने अक्टूबर के मध्य में ही नए एफ़डीटीएल मानकों के मुताबिक़ पायलट रोस्टर जारी कर दिए थे- यानी एक नवंबर की समय सीमा से लगभग 15 दिन पहले. पिछले तीन सालों में हज़ारों पायलटों की सक्रिय भर्ती करके आवश्यक पायलट बफ़र भी पहले से तैयार कर लिया गया था."

संजय लज़ार के मुताबिक़ दूसरी एयरलाइन्स प्रभावित इसलिए नहीं हुईं क्योंकि वे पायलटों की भर्ती कर रही थीं.

वह कहते हैं, "ख़बरें आ रही थीं कि अकासा में पायलटों ने शिकायत की कि उन्हें उड़ानें कम मिल रही हैं क्योंकि अकासा ने समय से पहले ही पर्याप्त भर्ती कर ली थी. दूसरी वजह यह है कि एयर इंडिया एक फुल सर्विस कैरियर है और वह इंडिगो की तुलना में कहीं अधिक मज़बूत संरचना पर काम करती है, जबकि इंडिगो बहुत कम लागत वाले मॉडल पर काम करती है."

अपनी बात जारी रखते हुए वह कहते हैं, "मिसाल के लिए अगर इंडिगो प्रति विमान पांच या छह पायलट के सेट के साथ काम करती है तो एयर इंडिया क़रीब साढ़े सात के सेट के साथ काम करती है. अब 400 विमानों पर यह अंतर लगभग एक हज़ार पायलटों का हो जाता है. यानी अगर दोनों एयरलाइंस के पास समान संख्या में एयरबस 320 विमान हों, तो यही तुलना होगी. इसलिए एयर इंडिया और अन्य कंपनियों के पास अतिरिक्त पायलट हैं क्योंकि उन्होंने समय पर भर्ती की. इंडिगो ने लागत घटाने और कर्मचारियों से ज़्यादा काम लेने की कोशिश की, जो एक हद तक ठीक है. लेकिन इसकी भी सीमा है."

कैप्टन रंगनाथन कहते हैं, "उनके (अन्य एयरलाइन्स) पास पर्याप्त क्रू है और शेड्यूलिंग नियमों के अनुसार है. लेकिन इंडिगो ने ऐसा नहीं किया. सरकार कहती है कि हम सख़्त कार्रवाई करेंगे. मेरा कहना है कि हालिया संकट से प्रभावित लोग घरेलू यात्री थे, अंतरराष्ट्रीय नहीं. इंडिगो की कोई अंतरराष्ट्रीय उड़ान प्रभावित नहीं हुई. अगर आप एयरलाइन को सज़ा देना चाहते हैं, तो प्राथमिकता घरेलू यात्रियों को मिलनी चाहिए. इंडिगो की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का परमिट 6 महीने के लिए रद्द करें और पायलट और विमान घरेलू उड़ानों के लिए लगाएं और यहां की समस्या को सुलझाएं. लेकिन सरकार ऐसा नहीं करेगी क्योंकि उसमें इंडिगो के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं है."

आगे की राह

पिछले 15 सालों में कई भारतीय एयरलाइंस जैसे जेट एयरवेज़, किंगफ़िशर और गोएयर कर्ज़ और बढ़ते ईंधन खर्च की वजह से बंद हो गईं.

इनके बंद होने के बाद इंडिगो ने तेज़ी से अपनी पकड़ बनाई. इंडिगो ने छोटे शहरों और नए रूट्स पर उड़ानें शुरू कीं और बदलते हालात ने इंडिगो को इतना बड़ा मौका दिया कि उसने ऐसा मार्केट शेयर हासिल किया जो कई दशकों से किसी भारतीय एयरलाइन के पास नहीं था.

लेकिन हालिया संकट ने इंडिगो की आगे की राह पर सवाल खड़ा कर दिया है.

जानी-मानी रेटिंग्स एजेंसी मूडी'ज़ ने कहा है कि हाल की उड़ान रुकावटों ने दिखाया कि इंडिगो की योजना, निगरानी और संसाधन प्रबंधन में बड़ी कमी रही जबकि यह बात एक साल से पता थी कि नए नियम लागू होने हैं.

मूडी'ज़ के मुताबिक़ इंडिगो का कम ख़र्च वाला संचालन सामान्य समय में तो ठीक था लेकिन नियमों में बदलाव के लिए ज़रूरी मज़बूती नहीं थी और इसी वजह से पूरे सिस्टम को फिर से सेट करना पड़ा और 5 दिसंबर को करीब 1,600 उड़ानें रद्द करनी पड़ीं.

इंडिगो ने 9 दिसंबर को कहा कि उसके नेटवर्क में कई दिनों के लगातार सुधार के बाद अब उसकी उड़ान सेवाएं फिर से शुरू हो गई हैं.

एयरलाइन ने कहा कि उसकी वेबसाइट पर दिख रही सभी उड़ानें तय समय पर चलेंगी, हालांकि नेटवर्क को थोड़ा बदला गया है.

नौ दिसंबर को इंडिगो ने कहा कि वह 1,800 से ज़्यादा उड़ानें चला रहा है जो उसके नेटवर्क के सभी 138 स्टेशनों को जोड़ती हैं और 10 दिसंबर तक एयरलाइन की 1,900 उड़ानें चलाने की योजना है.

भारत में आज एविएशन मार्केट का क़रीब 65 फ़ीसदी हिस्सा इंडिगो के पास है.

तो आने वाले समय में ये हालत न बनें उसके लिए क्या किया जाना चाहिए?

संजय लज़ार का कहना है कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि इंडिगो जैसा संकट दोबारा न हो, एक ऐसा बाज़ार बनाया जाना चाहिए जहां सिर्फ़ एक कंपनी का दबदबा न हो.

वह कहते हैं, "भारत में इंडिगो 50 फ़ीसदी रूट्स पर अकेली ऑपरेटर है. जब तक आप उनकी कुल हिस्सेदारी 50 फ़ीसदी से कम नहीं करते, आप सामान्य हालात बहाल नहीं कर सकते. इन अधिकारियों पर कार्रवाई या जांच होनी चाहिए. अगर इंडिगो, डीजीसीए और सिविल एविएशन मंत्रालय का फॉरेंसिक ऑडिट किया जाए तो पता चलेगा कि कौन दोषी है. बहुत सारे दस्तावेज़ और सबूत मौजूद हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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