You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
क्या डायरी लिखने से मानसिक सेहत बेहतर हो सकती है?
दो साल पहले 35 साल के युवा समीर कुलकर्णी नौकरी के सिलसिले में महाराष्ट्र के एक छोटे से इलाके से बैंगलोर आए थे.
नौकरी से तालमेल बिठाने की कोशिश और घर परिवार से दूर अकेले रहने का तनाव का उन पर हावी होता गया.
अकेलेपन और कामकाजी व्यस्तताओं के बीच मानसिक तौर पर वे अवसाद की गिरफ्त में आते गए. आस पड़ोस में एकदम अनजाने लोगों की वजह से भी वे खुद को व्यक्त नहीं कर पा रहे थे.
अपने उन दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया, "ऐसी स्थिति हो गई थी कि मैं मानसिक तौर पर उत्साहित महसूस नहीं करता था. हमेशा कहीं खोया खोया रहने लगा था. किसी काम में ध्यान नहीं लगता था. चिड़िचिड़ापन भी आ गया था. स्थिति विकट होती उससे पहले ही मेरी एक काउंसलर दोस्त ने कहा कि तुम अपने विचारों को लिखा करो."
समीर याद करते हैं कि ये इतना आसान भी नहीं था, कामकाजी दुनिया में फोन और टैबलेट पर लिखने की आदत हो चुकी थी, लेकिन यहां हाथों से डायरी लिखने की चुनौती थी.
उन्होंने कोशिश की और महज छह महीने के अंदर ही उनकी मानसिक स्थिति बेहतर होती गई.
आम तौर पर घर परिवार में भी यह कहा जाता रहा है कि डायरी लिखने से आप अपने मन के उन विचारों को भी अभिव्यक्त कर पाते हैं जो आम तौर पर कहीं अभिव्यक्त नहीं हो पाते.
अब इसकी वैज्ञानिक ढंग से भी पुष्टि होने लगी है. कोविड संकट के दौरान ब्रिटेन के चीफ़ साइंटिफिक एडवाइजर सर पैट्रिक वालेंस डायरी लिखा करते थे.
उन्होंने अब कहा कि वे अपनी उस डायरी को प्रकाशित तो नहीं कराना चाहते हैं लेकिन उस दौर की चुनौतियों का सामना करने में उन्हें डायरी लिखने से काफ़ी मदद मिली थी.
'हमारे प्रतिरोध तंत्र के लिए फ़ायदेमंद'
लंदन की मनोचिकित्सक और ग्रीफ वर्क्स की लेखिका जूलिया सैमुअल मानती हैं कि डायरी लिखने से मानसिक चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलती है.
उन्होंने 'बीबीसी रेडियो फ़ोर' के चर्चित 'टुडे प्रोग्राम' में हिस्सा लेते हुए कहा, "जो हम महसूस करते हैं, उसे लिखने पर हमारे भाव उसी तरह ज़ाहिार होते हैं जैसे कि बात करते वक्त होते हैं. वास्तव में बातचीत करने वाली थेरेपियों की तरह ही डायरी लिखने की थेरेपी भी कारगर होती हैं."
उन्होंने यह भी बताया, "डायरी लिखने से तनाव और अवसाद के पलों को बेहतर बनाया जा सकता है, यह मनोभावों पर नियंत्रण में मदद करता है. इतना ही नहीं यह मूड स्विंग वाले दौर में भी मददगार होता है और प्रतिरोधी क्षमता को भी बेहतर बनाता है."
जूलिया सैमुअल के मुताबिक, लिखी गई डायरी को कोई पढ़ रहा है या नहीं पढ़ रहा है, ये बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि भावों की अभिव्यक्ति और लिखने से चित्त का शांत होना अहम है.
हाथों से लिखना ज़्यादा कारगर तरीक़ा
लखनऊ की मनोवैज्ञानिक डॉ. नेहा आनंद बीते 18 सालों से आम लोगों की मानसिक उलझनों में थेरेपी दे रही हैं.
वह बताती हैं कि मानसिक समस्याओं के निदान में राइटिंग की अहम भूमिका होती है.
उन्होंने बताया, "जब आप लिखते हैं तो एक साथ कई चीज़ें चल रही होती हैं, दिमाग़ पहले सोचता है, फिर उसका क्रम बिठाता है. हाथों से लिखना होता है, तब एक न्यूरो पाथ भी बनता है. कहने का मतलब ये है कि ज़्यादा सेंसेज काम कर रहे होते हैं."
लेकिन एक अहम सवाल यह भी उभरता है कि क्या आज की डिज़िटल युग में हाथों से लिखना क्यों महत्वपूर्ण है.
इस पर नेहा आनंद कहती हैं, "कंप्यूटर या मोबाइल पर लिखने का भी अभ्यास करना होता है लेकिन उसकी तुलना में हाथों से लिखना थेरेपी के लिहाज़ से ज़्यादा मददगार होता है."
उन्होंने यह भी बताया, "एक आम इंसान के दिमाग़ में एक दिन के अंदर क़रीब डेढ़ लाख विचार आते हैं, ये विचार आते हैं और ग़ायब हो जाते हैं. पूरे दिन भर में महज नौ ऐसे विचार होते हैं, जो ज़्यादा देर तक दिमाग़ में टिकते हैं.
"इसलिए भी इन विचारों के बारे में लिखना ज़रूरी है ताकि आपको यह पता चल पाए कि कौन से विचार आपके लिए उपयोगी हो सकते हैं और कौन से अनुपयोगी. इसे थेरेपी में हमलोग थॉट लॉग भी कहते हैं."
वहीं मुंबई की साइकोलॉजिस्ट तेजस्वनी कुलकर्णी का मानना है कि डायरी लिखने या जर्नल लिखने से कई तरह के मनोभावों के असर को कम करने में मदद मिलती है.
उन्होंने बताया, "मन के अंदर जो भी भाव आते हैं, निगेटिव भाव हैं, स्ट्रेस है, किसी बात पर गुस्से के भाव है, भविष्य की आशंकाएं हैं या अतीत की किसी बात का रिग्रेट हो, दिन भर के इन भावों को हम लिखते हैं तो इससे तनाव कम करने में मदद मिलती है. इसके अलावा इस दौरान आदमी खुद से बेहतर कनेक्टेड महसूस करता है और यह मानसिक स्थिति के लिए बेहतर होता है."
निजता का सवाल
तेजस्वनी कुलकर्णी यह भी सुझाव देती हैं कि डायरी लिखने के लिए किसी को बहुत अच्छा लेखक होने की ज़रूरत नहीं है.
उन्होंने बताया, "डायरी लिखने के लिए लेखक होना ज़रूरी नहीं है. आपकी जैसी भी भाषा हो आप लिख सकते हैं. मानसिक सेहत को बेहतर करने के लिए ही नहीं बल्कि खुद के डेवलपमेंट के लक्ष्य को हासिल करने के लिए डायरी लिखना बेहतर होता है."
डायरी लिखने के दौरान एक चिंता ये भी होती है कि किसी के हाथों में आ जाने से सारे भेद खुल सकते हैं, इस सोच के चलते भी नियमित तौर पर डायरी लिखने से लोग बचते हैं.
इस पहलू पर नेहा आनंद कहती हैं, "ये हिचक तो होती है लेकिन एक दो सत्र के बाद लोगों की हिचक दूर हो जाती है. आजकल बाज़ार में ताले वाली डायरियां तक उपलब्ध हैं. लोग उसका भी इस्तेमाल करते हैं."
नेहा आनंद के मुताबिक यह डर ज़्यादातर उन महिलाओं में देखा जाता है जो अपने पति से सारी जानकारी शेयर नहीं करना चाहती हैं, ऐसी महिलाओं को वे डायरी को लॉकर में संभाल कर रखने को कहती हैं.
उनके मुताबिक, "आपकी डायरी केवल डायरी नहीं है, वो मनोभावों की अभिव्यक्ति है, इसलिए भी उसे संभाल कर रखना चाहिए."
हालांकि ब्रिटिश डॉक्टर एडम काय इस समस्या के दूसरे पहलू की ओर इशारा करते हैं.
वे कहते हैं, "जब लोगों को यह पता होता है कि ये डायरी दूसरे लोग भी पढ़ सकते हैं, तो वे कहीं ज़्यादा प्रभावी ढंग से अपनी बात रखते हैं. डायरी के छपने की उम्मीद से भी सुख मिलता है."
एडम काय ने 2016 में अपनी डायरी किताब के तौर पर 'दिस इज़ गोइंग टू हर्ट' नाम से प्रकाशित करायी और बाद में इसी पुस्तक पर इसी नाम से अवार्ड विनिंग सीरियल भी बना.
हालांकि काय ने अपनी कामकाजी व्यस्तताओं की चुनौतियों के बारे में डायरी लिखनी शुरू की थी, लेकिन बाद में उसे दूसरे लोगों ने भी खूब पसंद किया.
कई डायरी तो बाद में चर्चित किताबों के तौर पर याद की गई हैं, इसमें एना फ्रैंक की डायरी, एलन क्लार्क, टॉनी बेन, एलन रिकमैन और कैप्टन स्कॉट की डायरियां शामिल हैं.
डायरी लेखन- एक सामाजिक योगदान
हिंदी साहित्य में भी श्रीराम शर्मा, उपेंद्रनाथ अश्क, अज्ञेय, गजानन माधव मुक्तिबोध, हरिवंश राय बच्चन, रामधारी सिंह दिनकर, रघुवीर सहाय, जयप्रकाश नारायण, मोहन राकेश, कमलेश्वर, शमशेर बहादूर सिंह और श्रीकांत वर्मा जैसे लेखकों की डायरियां प्रकाशित हो चुकी हैं और इनमें से कई चर्चित भी हुई हैं.
'ऑवर हिस्ट्री ऑफ़ द ट्वेंटीथ सेंचुरी: एज टोल्ड इन डायरीज़, जर्नल्स एंड लेटर्स' के लेखक ट्रेविस एलबरा ने बीबीसी न्यूज़ से कहा है कि डायरी लेखन एक तरह से सामाजिक योगदान है.
उनके अनुसार, यह व्यक्ति ही नहीं बल्कि समाज के लिए अभी भी फ़ायेदमंद है और भविष्य में भी फ़ायदेमंद होगा.
ब्रिटेन के विल्फ्रिड लॉरियर यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर कैथरीन कार्टर ने बीबीसी न्यूज़ को बताया है कि डायरी लिखने वाले जब उसे अपडेट नहीं रख पाते हैं, तो उनमें एक तरह के गिल्ट का भाव पनपता है.
नेहा आनंद इस पहलू के बारे में कहती हैं, "डायरी लिखने की शुरुआत करने के बाद अमूमन यह रूटीन में शामिल हो जाता है, क्योंकि लिखी हुई बातें कहीं गहरे तक पहुंच कर रजिस्टर्ड होती है, आप सुनी या कही गई बातों को भूल सकते हैं, लेकिन जो हाथों से लिखा हो वह लंबे समय तक याद रहता है."
मूल कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)