कुंभ भगदड़ में मारी गईं मीना पांडे की कहानी एक चश्मदीद की ज़ुबानी

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- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बीबीसी की गहन पड़ताल में पता चला है कि प्रयागराज के कुंभ में भगदड़ की घटनाओं में कम-से-कम 82 लोगों की मौत हुई थी.
इन मृतकों में एक नाम उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर की रहने वालीं मीना पांडे का भी है.
29 जनवरी यानी मौनी अमावस्या के दिन कुंभ मेले में जानलेवा भगदड़ की चार घटनाएं हुई थीं.
इन्हीं में से एक भगदड़ में मीना पांडे की मौत हो गई थी. मीना पांडे की मौत को उत्तर प्रदेश सरकार ने कुंभ भगदड़ में हुई मौत नहीं माना है.
ना ही परिवार को उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ़ से अभी तक कोई आर्थिक सहायता मिली है.
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मीना पांडे के बड़े बेटे सनी का कहना है कि मां की मौत 29 जनवरी की सुबह आठ बजे कुंभ सेक्टर-18 में मुक्ति मार्ग चौराहे पर हुई भगदड़ में हुई.
परिवार के पास घटनास्थल की वह फ़ोटो भी मौजूद है, जहां अन्य शवों के साथ मीना पांडे का शव भी रखा हुआ है.
सनी कहते हैं, "सरकार मानने को ही तैयार नहीं है कि मां की मौत भगदड़ में हुई. हमारा ना तो कोई काग़ज़ बन पा रहा है और ना ही कोई मदद मिल रही है."
चश्मदीद ने क्या बताया

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सुल्तानपुर में उनके पड़ोस में रहने वाली अर्चना सिंह भगदड़ के वक्त मीना पांडे के साथ मौजूद थीं.
वो बताती हैं, "28 की शाम को क़रीब सात बजे हम सब लोग प्रयागराज पहुंच गए थे. 29 की सुबह क़रीब दो बजे हमने गंगा स्नान किया. हमारे साथ एक बूढ़ी औरत थी. वो थक गई थी, तो हमने एक आश्रम में थोड़ा आराम करने का सोचा."
अर्चना कहती हैं, "कुछ घंटे आराम करने के बाद हम लोग आश्रम से निकल गए और थोड़ी दूर जाने के बाद हम भीड़ में फंस गए. उसी समय मीना गिर गईं. जब वो गिरीं तो दो चार आदमी उनके ऊपर गिर गए."
वो बताती हैं, "कोई किसी को नहीं देख रहा था. जो गिरा वो गिरा. लोग कुचलकर आगे निकल रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे सब कुछ जानबूझकर हो रहा हो. मैंने एक खंभा पकड़ लिया और सोचा कि उन्हें (मीना को) निकाल लूंगी…"
अर्चना कहती हैं, "हमने उनकी तरफ देखकर कहा कि भाभी थोड़ा दम लगाओ, हम आपको खींच लेंगे. उस समय हम भी रोने लगे थे. हमें देखकर वो रोने लगीं. तभी एक व्यक्ति आया और उनके सिर पर पैर रखकर चला गया. उनकी नाक से तुरंत खून बहने लगा."

मोबाइल पर घटनास्थल और मीना पांडे के शव की तस्वीर दिखाते हुए अर्चना रोने लगती हैं और कहती हैं, "मुझे वो बहुत याद आती हैं. हम कभी-कभी खुद से रोने लगते हैं. एक दिन सपने में वो आई थीं, कह रही थीं कि हमारे साथ चलो."
अर्चना कहती हैं, "वहां आठ लाशें पड़ी थीं. कोई पुलिस नहीं थी. सुबह आठ बजे से दोपहर तीन बजे तक हम लाश को लेकर बैठे रहे. मैंने सोचा कि अगर मैं भी यहां से चली जाऊंगी तो हमें लाश भी नहीं मिलेगी."
वो कहती हैं, "हर तरफ कंबल, बैग और जूते चप्पल पड़े थे. वहां जिसकी लाश पड़ी थी, बस उसी के घर वाले बैठे थे. तीन चार लाशें तो ऐसी थीं कि उन्हें कोई पहचानने वाला नहीं था. तीन चार लाशों के साथ उनके घर वाले बैठे थे. भीड़ खत्म होने के बाद हमने उनकी छाती को दबाया, लेकिन वो मर चुकी थीं."

उस दिन को याद कर अर्चना कहती हैं, "लोगों के कपड़े निकल गए थे. हमारी साड़ी भी खुल गई थी. महिलाओं ने अपने बैग से साड़ी निकालकर फेंकी तो महिलाओं ने उसे पहना. मीना के भी कपड़े खुल गए थे."
अर्चना कहती हैं, "वो सीन देखने लायक नहीं था. वहां कैमरा ज़रूर लगा होगा, उसे देखिए. वहां कुछ प्रेस (मीडिया) वाले भी आए थे. सारी बात दबा दी. कहां गए योगी-मोदी. कहीं सुनवाई नहीं हुई."
वो कहती हैं, "पूरा दिन धूप में लाश पड़ी थी. दोपहर दो बजे लाश बदबू मारने लगी थी. 29 तारीख़ (जनवरी) को बहुत धूप थी…ऊपर हेलीकॉप्टर भी उड़ रहा था. सब उसकी तरफ हाथ हिलाकर मदद के लिए चिल्ला रहे थे, लेकिन वो भी घूमकर चला गया."
परिवार जिस बोलेरो कार से प्रयागराज गया था, उसी कार से मीना पांडे के शव को घर ले आया.
कुंभ भगदड़: बीबीसी पड़ताल

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11 राज्यों के 50 से अधिक ज़िलों में की गई इस पड़ताल में बीबीसी ने 100 से अधिक ऐसे परिवारों से मुलाक़ात की जिनका कहना था कि उनके अपनों की मौत कुंभ भगदड़ में हुई है.
बीबीसी के पास इस बात के पुख़्ता सबूत हैं कि कम-से-कम 82 लोग कुंभ भगदड़ में मारे गए, जो परिवार अपनी बात साबित करने के लिए पुख़्ता सबूत नहीं दे सके, उन्हें बीबीसी ने 82 मृतकों की सूची में शामिल नहीं किया है.
बीबीसी ने ज़िला स्तर से लेकर उच्च स्तर तक प्रशासन और पुलिस के कई अधिकारियों से कई बार संपर्क करने की कोशिश की ताकि उनका पक्ष इस रिपोर्ट में शामिल किया जा सके. फ़ोन, व्हाट्सऐप और ईमेल के ज़रिए किए गए अनेक प्रयासों के बाद भी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी.
कुंभ भगदड़ में हुई 82 मौतों को बीबीसी ने मौटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा है.
पहली कैटेगरी उन मृतकों की है, जिनके परिजनों को 25-25 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया गया.
दूसरी कैटेगरी उन मृतकों की है जिनके परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये कैश दिए गए.
वहीं तीसरी कैटेगरी में ऐसे मृतकों को रखा गया है जिनके परिजनों को कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















