मध्य प्रदेश में मतदान बढ़ाने के लिए पसीना बहा रही हैं एक ट्रांसजेंडर

    • Author, शुरैह नियाजी
    • पदनाम, भोपाल से बीबीसी हिंदी के लिए

संजना सिंह राजपूत मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में इस समय मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही है.

उनकी कोशिश है कि विधानसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा लोग अपने घरों से निकलकर अपने मताधिकार का उपयोग करें.

संजना एक ट्रांसजेंडर हैं. वो सरकारी नौकरी पाने वाली प्रदेश की पहली ट्रांसजेंडर हैं. संजना को 2018 में प्रदेश सरकार के सामाजिक न्याय और निशक्त कल्याण विभाग में पदस्थ किया गया था.

इसके साथ ही वो सिविल विधिक सेवा प्राधिकरण में भी पैरा लीगल वालंटियर के तौर पर काम करती हैं. वहीं वो लोक अदालत में खंडपीठ की सदस्य भी हैं. वो खंडपीठ की सदस्या के रूप में जज के साथ बैठकर प्रकरणों की सुनवाई में भी भाग लेती हैं.

मध्य प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के लिए राज्य निर्वाचन आयोग ने उन्हें स्टेट आईकॉन बनाया है ताकि वो लोगों को ज्यादा से ज्यादा मतदान के लिए प्रेरित कर सकें.

मध्य प्रदेश में ट्रांसजेंडर

ट्रांसजेंडर जागरूकता सप्ताह 13 नवंबर से 19 नवंबर तक मनाया जा रहा है.

इस मौके पर हुई बातचीत में उन्होंने बताया, ''हमारे समाज में वोटिंग को लेकर पहले से ही जागरुकता है. उसके बावजूद मैंने उनके बीच पहुंच कर अभियान चलाया. लेकिन मेरी कोशिश है कि आम लोगों के बीच में इसके प्रति जागरुकता पैदा करुं.''

उनके मुताबिक़ प्रदेश में क़रीब 30,000 हज़ार ट्रांसजेंडर हैं, लेकिन इस समाज के वोटरों की बात की जाए तो वो सिर्फ 1,373 वोटर ही हैं.

सबसे ज्यादा वोटर भोपाल मध्य सीट पर हैं. वही प्रदेश में 16 ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां पर एक भी किन्नर वोटर नहीं है.

ट्रांसजेंडर समुदाय की समस्याएं

संजना कहती हैं कि अपने आप को ट्रांसजेंडर साबित करना भी आसान काम नहीं है. यही वजह है कि बहुत से लोग इस लंबी प्रक्रिया से बचने के लिए अपने आप को ट्रांसजेंडर का आईडी ही नहीं बनवा पाते हैं.

वो कहती हैं कि उनकी कोशिश है कि हर वर्ग के बीच वो जाएं और लोगों को बताएं कि मतदान करना कितना जरूरी है.

नाच गाकर अपना जीवन यापन करने वाले समाज से निकल कर संजना ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है. वे अपने समाज के दूसरे लोगों के लिए एक तरह से रोल मॉडल हैं, क्योंकि वो न सिर्फ सरकारी नौकरी में हैं बल्कि समाज सेवा से भी जुड़ी हुई हैं.

इससे पहले भी उन्होंने 'स्वच्छ भारत मिशन' के लिए ख़ूब काम किया है.

हालांकि वो मानती हैं कि समाज में किन्नरों की स्थिती बदल रही है, लेकिन उसके बावजूद भी अभी लोगों में जागरुकता पैदा करने की बहुत जरूरत है.

उन्होंने बताया कि कई बार देखा गया है कि वो कोई काम के लिए लोगों को फोन लगाती हैं तो वो बहुत अच्छे से बात करते हैं और हर तरह की मदद के लिए तैयार रहते हैं. लेकिन जैसे ही उन्हें बताती हैं कि वो ट्रांसजेंडर हैं तो लोगों को रवैया बदल जाता है.

उन्होंने कहा, ''इसे बदलने की जरूरत है. एकदम से बदलाव तो नहीं आएगा. धीरे धीरे ही बदलाव पैदा होगा लेकिन फिर भी लोगों को यह मानना चाहिए कि हम लोग भी इंसान हैं. हम भी चाहते हैं कि लोग हमसे अच्छा व्यवहार करें.''

संजना का मानना है कि ट्रांसजेंडर की जिंदगी बहुत आसान नहीं होती है, उसे तरह-तरह के भेदभाव का सामना जीवन भर करना पड़ता है.

उन्होंने बताया, ''लोगों को यह समझना चाहिए कि हम भी इंसान हैं. हम भी उसी तरह से पैदा हुए हैं जिस तरह से दूसरे लोग पैदा होते हैं. हमारी भी भावनाएं होती हैं. कुछ कमियों की वजह से हमें समाज से अलग कर दिया जाता है, लेकिन हम भी तो इंसान ही हैं. यह समझ पैदा करना जरबरी है.''

वो कहती हैं कि हमारा परिवार हमें अपने से अलग अपनी खुशी से नहीं करता है बल्कि मजबूरी में वो उन्हें समाज से अलग करता है.

हालांकि संजना मानती हैं कि कोई भी राजनीतिक दल हो वो उनके वर्ग के बारे में कम ही सोचता है. उनकी कोशिश है कि उनके वर्ग के लोग ज्यादा से ज्यादा आगे आएं और अपना मुक़ाम बनाएं, जैसा उन्होंने किया है.

वो आगे कहती हैं कि अगर सरकार को हमें बराबरी में लाना है तो हमें हर तरह की शिक्षा और नौकरी के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए, तभी हम आगे बढ़ पाएंगे.

देश की पहली किन्नर विधायक

देश को पहली बार किन्नर विधायक मध्य प्रदेश ने ही दिया था. साल 2000 में सोहागपुर विधानसभा सीट से चुनाव जितकर शबनम मौसी विधायक बनी थीं.

उन्होंने इस सीट से 18,000 वोटों से चुनाव जीता था.

माना जा रहा था कि वो भारतीय राजनीति में नई शुरुआत करने जा रही हैं. वो भीख मांगकर अपना जीवन बसर करती थीं. उनका जीतना राजनीति में एक असाधारण घटना थी.

उनके बाद मध्य प्रदेश के कटनी से कमला जान ने भी महापौर का चुनाव जीता था, लेकिन जल्द ही लोगों को राजनीति में इस समाज से मोहभंग हो गया.

मध्य प्रदेश में ओबीसी में शामिल ट्रांसजेंडर

इस साल अप्रैल में शिवराज सिंह चौहान सरकार ने ट्रांसजेंडरों को ओबीसी वर्ग में शामिल कर लिया था ताकि उन्हें उसमें आरक्षण मिल सकें. सरकार का तर्क था कि इससे इस वर्ग को ओबीसी के तमाम फायदे मिल सकेंगे. लेकिन इसे लेकर न सिर्फ ओबीसी समुदाय बल्कि किन्नर वर्ग ने भी विरोध किया था.

ओबीसी महासभा के पदाधिकारियों ने उस वक़्त विरोध करते हुए कहा था कि अगर सरकार किन्नरों को कुछ देना चाहती है तो वो उनके लिए अलग वर्ग का गठन करे ना की ओबीसी वर्ग में उन्हें आरक्षण दिया जाए.

वही किन्नर भी इस फैसले से खुश नहीं थे. उनका कहना है कि किन्नर समाज में हर जाति के लोग रहते हैं, जिन्हें ब्राह्मण, ठाकुर और मुसलमान भी होते हैं, इन्हें कैसे एक वर्ग में रखा जा सकता है.

भोपाल में किन्नरों के एक ग्रुप की गुरु सुरैया ने कहा कि फैसला पूरी तरह से ग़लत है, क्योंकि हमारे लोगों में हर जाति और धर्म के लोग शामिल हैं.

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