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किन्नरों की ज़िंदगी के वो रंग जो अनदेखे हैं
- Author, फ़ियोना मैकडोनल्ड
- पदनाम, बीबीसी कल्चर
हमारे समाज का ताना-बाना मर्द और औरत से मिलकर बना है. लेकिन एक तीसरा जेंडर भी हमारे समाज का हिस्सा है. इसकी पहचान कुछ ऐसी है जिसे सभ्य समाज में अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता. समाज के इस वर्ग को थर्ड जेंडर, किन्नर या हिजड़े के नाम से जाना जाता है.
हिन्दुस्तान ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में इनके दिल की बात और आवाज़ कोई सुनना नहीं चाहता क्योंकि पूरे समाज के लिए इन्हें एक बदनुमा दाग़ समझा जाता है. लोगों के लिए ये सिर्फ़ हंसी के पात्र हैं.
लेकिन, हाल ही में इनकी ज़िंदगी में झांकने की कोशिश की बांग्लादेश की एक फ़ोटोग्राफ़र शाहरिया शर्मीन ने. इनकी ज़िंदगी के जो रंग आज तक किसी ने नहीं देखे थे उन रंगों को शर्मीन ने अपनी तस्वीरों में उतारा. शर्मीन के इस बेहतरीन काम के लिए इस साल उनका नाम मैग्नम फ़ोटोग्राफ़र जूरी अवॉर्ड के लिए चुना गया है.
किन्नरों पर चर्चा तहज़ीब के ख़िलाफ़
शर्मीन के मुताबिक़ उनकी परवरिश एक कट्टरपंथी परिवार में हुई थी. वो बचपन से अपने आसपास किन्नरों को देखती थीं. लेकिन कभी भी परिवार के साथ उनके बारे में बात नहीं कर पाती थीं. इसकी इजाज़त ही नहीं थी. किन्नरों के बारे में चर्चा करना तहज़ीब के ख़िलाफ़ समझा जाता था. उन्हें समाज का हिस्सा ही नहीं माना जाता था.
इसी बात ने शर्मीन को किन्नरों की ज़िंदगी को नज़दीक से समझने की प्रेरणा दी और उन्होंने भारत और बांग्लादेश में रहने वाले किन्नरों की तस्वीरें खींचीं.
जनाने होते हैं किन्नरों के हाव-भाव
शर्मीन के मुताबिक़ ज़्यादातर किन्नर जन्म से मर्द होते हैं, लेकिन उनके हाव-भाव ज़नाने होते हैं. इनका शुमार ना मर्दों में होता है और ना औरतों में. लेकिन ये ख़ुद को दिल से औरत ही समझते हैं. इन्हें कोई ट्रांसजेंडर के नाम से जानता है तो कोई ट्रांससेक्सुअल. लेकिन ज़्यादातर लोग इन्हें किन्नर या हिजड़े के नाम से ही जानते और पुकारते हैं.
जानकारों का कहना है कि शर्मीन की खींची गई तस्वीरों में जो गहराई नज़र आती है उस तक पहुंचना आसान नहीं है. ख़ुद शर्मीन का कहना है कि उनके लिए ये तस्वीरें ख़ींचना आसान नहीं था. इसके लिए उन्होंने बहुत सब्र से काम लिया था.
वो किन्नरों की सोच और ज़िंदगी को समझने के लिए सारा-सारा दिन उनके साथ घूमती थीं. कई बार तो इतने पर भी कोई फ़ोटो नहीं ले पाती थीं. अच्छे फ़ोटोग्राफ़ के लिए उनका भरोसा जीतना ज़रूरी था. जब एक दोस्ताना रिश्ता बना तो उनका वही रूप निकल कर आया जिसमें वो ख़ुद को पूरे आत्मविश्वास के साथ पेश करना चाहती थीं.
अपनी कमाई गुरु को देते हैं किन्नर
तीसरे जेंडर का होने पर जिन्हें उनके अपने ख़ुद से दूर कर देते हैं, उन्हें किन्नर समाज पनाह देता है. इनके समाज के कुछ क़ायदे क़ानून होते हैं जिन पर अमल करना लाज़मी है. ये सभी परिवार की तरह एक गुरु की पनाह में रहते हैं. ये गुरु अपने साथ रहने वाले सभी किन्नरों को पनाह, सुरक्षा और उनकी हर ज़रूरत को पूरा करते हैं. सभी किन्नर जो भी कमा कर लाते हैं अपने गुरु को देते हैं. फिर गुरु हरेक को उसकी कमाई और ज़रूरत के मुताबिक़ पैसा देते हैं. बाक़ी बचे पैसे को सभी के मुस्तक़बिल के लिए रख लिया जाता है.
क़ायदे-क़ानून तोड़ने वाला बख़्शा नहीं जाता
गुरु ही इन किन्नरों का मां-बाप और सरपरस्त होता है. हरेक किन्नर को अपने गुरु की उम्मीदों पर खरा उतरना पड़ता है. जो ऐसा नहीं कर पाते उन्हें ग्रुप से बाहर कर दिया जाता है.
हर गुरु के अपने अलग क़ायदे-क़ानून होते हैं. इन्हें तोड़ने वालों को बख़्शा नहीं जाता. हरेक किन्नर को एक तय रक़म कमाना ज़रूरी होता है. जो ऐसा नहीं कर पाते, उनसे ख़िदमत के दूसरे काम लिए जाते हैं. जो लोग अपना लिंग बदलवाकर अपनी इच्छा से इनके ग्रुप में शामिल होना चाहते हैं, ये उनकी भी मदद करते हैं.
हिक़ारत की नज़र से है देखा जाता
किन्नरों के ग्रुप में शामिल होने का मतलब है, एक नई पहचान को अपनाना. ये नई पहचान बाहरी समाज के लिए किसी अछूत से कम नहीं होती.
दक्षिण एशिया में हिजड़ों की एक तारीख़ रही है. लेकिन हर दौर में इन्हें हिक़ारत की नज़रों से देखा गया है. राजा महाराजाओं के दौर में इन्हें दरबार में नाचने-गाने के लिए रखा जाता था. मुग़लों के दौर में इनका इस्तेमाल कनीज़ों के पहरेदार के तौर पर होता था. लेकिन इज़्ज़त किसी भी दौर में नसीब नहीं हुई.
दुआएं लेते हैं, लेकिन सम्मान नहीं देते
शादी-ब्याह में नाच-गाकर या किसी बच्चे की पैदाइश पर जश्न मनाकर ये अपनी कमाई करते हैं. माना जाता है कि जिस परिवार को किन्नर समाज दुआ देता है, वो खूब फलता-फूलता है. पुराने दौर में लोग इनके नाम का पैसा निकालते थे और इनकी झोली भर देते थे. आमतौर पर धारणा है कि किन्नरों का दिल नहीं दुखाना चाहिए, लेकिन इन्हें सम्मान जैसी चीज़ भी नसीब नहीं होती जोकि किसी भी इंसान का हक़ है.
हालांकि अब इनके कमाने का तरीक़ा भी बदल गया है. अपने ग्रुप से निकाल दिए जाने के बाद ये सड़कों पर, पार्कों, बसों, ट्रेनों, चौराहों, कहीं भी मांगते हुए नज़र आ जाते हैं. लोगों की नज़र में अब इनकी पहचान भिखारी की हो गई है.
दक्षिण एशिया में इनकी अच्छी-ख़ासी आबादी है. लेकिन समाज में इनके लिए जगह नहीं है. बांग्लादेश में तो हाल और भी बुरा है. इसीलिए किन्नर समाज की एक बड़ी तादाद भारत आ गई है.
भारतीय नागरिक का मिला अधिकार
भारत में साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें सरकारी दस्तावेज़ों में बाक़ायदा थर्ड जेंडर के तौर पर एक पहचान दी है. वो सरकारी नौकरियों में जगह पा सकते हैं. स्कूल कॉलेज में जाकर पढ़ाई कर सकते हैं. उन्हें वही अधिकार दिए हैं जो किसी भी भारतीय नागरिक के हैं.
इनकी भी हैं ख़्वाहिशें
शर्मीन कहती हैं कि जब तक वो किन्नरों से नहीं मिली थीं, उनके ज़हन में इस समाज के लिए तरह तरह के पूर्वाग्रह थे. लेकिन जब उन्हें क़रीब से जाना तो पता चला कि उनके भी वही एहसास और ख़्वाहिशें हैं जो किसी भी मर्द या औरत के होते हैं. वो भी चाहते हैं समाज में लोग उन्हें उनके नाम से पहचानें.
शर्मीन कहती हैं जब उनकी मुलाक़ात हिना नाम के किन्नर से हुई तो उसने बड़े तपाक से कहा कि उसे उसके नाम से पुकारा जाए. इसी आत्मविश्वास को शर्मीन ने अपने कैमरे क़ैद किया. वो आत्मविश्वास जो हम सब से कहीं छुपा हुआ है.
तस्वीरें बताती हैं किन्नरों के जज़्बात
शर्मीन मानती हैं कि तस्वीरें किसी के जज़्बात को बताने का एक ज़रिया हैं. लेकिन इन किन्नरों कि ज़िंदगी से वो इतनी मुतासिर हुई हैं कि उन्हें अपना रोल मॉडल मानने लगी हैं. वो अपने दूसरे प्रोजेक्ट भी इसी समाज की ज़िंदगी पर करना चाहती हैं. उन्हें लगता है कि अपने काम के ज़रिए वो इस समाज को दुनिया के नज़दीक ला सकेंगी.
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