क़तर की गैस फ़ील्ड पर ईरानी हमले के बाद क्या भारत का ऊर्जा संकट और गहरा हो जाएगा?

रास लाफ़ान

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इमेज कैप्शन, बुधवार को ईरान ने क़तर की सबसे बड़ी गैस फ़ील्ड रास लाफ़ान पर हमला कर दिया
    • Author, संदीप राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

खाड़ी देशों के बड़े गैस भंडार वाले इलाकों में गिर रही मिसाइलों ने पहले से कमजोर वैश्विक एनर्जी सुरक्षा को और ख़तरे में डाल दिया है.

इसकी वजह से गुरुवार को तेल की कीमतों में उछाल आया. एशिया में शुरुआती ट्रेड में ब्रेंट कच्चा तेल 4% के उछाल के साथ 112 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया जबकि अमेरिकी कच्चा तेल 3% के उछाल के साथ 99.27 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया.

दुनिया की सबसे बड़ी नेचुरल गैस फ़ील्ड में से एक ईरान की साउथ पार्स गैस फ़ील्ड पर इसराइली हमले और इसके जवाब में क़तर के रास लाफ़ान की एलएनजी गैस फ़ील्ड पर हमले के बाद क़ीमतों में उछाल दर्ज किया गया.

बुधवार को क़तर एनर्जी ने कहा कि ईरान के मिसाइल हमलों से रास लाफ़ान में भारी नुकसान हुआ है. यह क़तर की मुख्य एलएनजी प्रोसेसिंग साइट है और देश के ऊर्जा नेटवर्क का अहम केंद्र है.

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सऊदी अरब ने कहा कि उसने भी रियाद की ओर दागी गई चार बैलिस्टिक मिसाइलों को रोककर नष्ट कर दिया. साथ ही एक गैस फैसिलिटी पर ड्रोन हमले की कोशिश भी नाकाम की गई.

रास लाफ़ान पर हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा कि अब इसराइल ईरान के साउथ पार्स गैस फ़ील्ड पर हमले नहीं करेगा. साथ ही चेतावनी दी कि अगर ईरान ने दोबारा लाफ़ान पर हमला किया तो अमेरिका उसके ऊर्जा ढांचे को बर्बाद कर देगा.

हालांकि ईरान के सरकारी टेलीविज़न ने दावा किया कि ईरानी मिसाइलों ने रास लाफ़ान स्थित क़तर के एनर्जी कॉम्पलेक्स पर फिर हमला किया है. ये हमले डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी देने से पहले किए गए.

साउथ पार्स गैस फ़ील्ड पर हुए हमलों के जवाब में ईरान ने सऊदी अरब, यूएई और क़तर में कई तेल क्षेत्रों पर हमले से पहले चेतावनी जारी की थी.

ईरान के साथ अमेरिका और इसराइल की जंग के कारण पश्चिम एशिया में हालात बहुत बिगड़ गए हैं और होर्मुज़ स्ट्रेट के चलते पहले ही इस रास्ते गुजरने वाले दुनिया का 20 प्रतिशत तेल व्यापार पहले ही बाधित है.

तमाम एशियाई देशों समेत भारत की उर्जा सुरक्षा होर्मुज़ स्ट्रेट और इन खाड़ी देशों पर बहुत अधिक निर्भर है. रास लाफ़ान पर हुए हमले से भारत के नेचुरल गैस आपूर्ति पर असर पड़ने के आसार हैं.

आइए जानते हैं कि भारत के एनर्जी सेक्टर पर इन हमलों का क्या असर पड़ेगा, लेकिन इससे पहले जान लेते हैं कि दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए ये गैस फ़ील्ड कितने अहम हैं?

वीडियो कैप्शन, भारत में एलपीजी संकट: देश के अलग-अलग हिस्सों में कैसे हालात हैं? ग्राउंड रिपोर्ट

रास लाफ़ान ग़ैस फ़ील्डः क़तर का 'क्राउन ज्वेल'

रास लाफ़ान गैस फ़ील्ड

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इमेज कैप्शन, रास लाफ़ान में क़तर का प्रमुख एलएनजी प्रासेसिंग प्लांट है

क़तर ने लिक्विड नेचुरल गैस (एलएनजी) के स्रोत के रूप में साउथ पार्स के उत्तरी क्षेत्र को विकसित करने में अरबों डॉलर का निवेश किया है.

जंग से पहले, क़तर अपने रास लाफ़ान प्लांट से एलएनजी का निर्यात करता था. वहां प्लांट में गैस को ठंडा करके लिक्विड में बदला जाता है और टैंकरों में भरकर मुख्य रूप से एशियाई देशों को जाता है.

क़तर दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से की एलएनजी का आपूर्तिकर्ता है और इसमें रास लाफ़ान गैस फ़ील्ड का बहुत बड़ा योगदान है. इसे क़तर का 'क्राउन ज्वेल' भी कहा जाता है.

ईरान के हमले के बाद रास लाफ़ान प्लांट बंद हो गया, जिससे यूरोप में नेचुरल गैस की क़ीमतें बढ़ गईं, हालांकि क़तर की अधिकांश एलएनजी एशिया को ही जाती है.

क़तर 120 अरब क्युबिक मीटर (लगभग 90 मिलियन टन) निर्यात करता है.

ईरान का साउथ पार्सः दुनिया के सबसे बड़े गैस फ़ील्ड में से एक

ईरान का साउथ पार्स गैस फ़ील्ड

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इमेज कैप्शन, ईरान की राजधानी 1400 किलोमीटर दूर फारस की खाड़ी में असालूयेह के साउथ पार्स गैस फ़ील्ड पर इसराइल ने पहले हमला किया था. यह तस्वीर अगस्त 2016 की है.

समाचार एजेंसी एपी के मुताबिक़, दुनिया के सबसे बड़े नेचुरल गैस फ़ील्ड में 51 ट्रिलियन क्यूबिक मीटर नेचुरल गैस भंडार है. इसको ईरान और क़तर दोनों साझा करते हैं.

ईरान की तरफ़ के क्षेत्र को साउथ पार्स फ़ील्ड और क़तर की तरफ़ उत्तरी फ़ील्ड कहा जाता है.

एजेंसी के अनुसार, बिजली बनाने और घरों को गर्म रखने के लिए ईरान नेचुरल गैस पर बहुत अधिक निर्भर है और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी का कहना है कि अमेरिका, चीन और रूस के बाद ईरान दुनिया का चौथा सबसे बड़ा गैस उपभोक्ता देश है. और पार्स गैस फ़ील्ड से वह अपनी ज़रूरत का लगभग 80% गैस इस्तेमाल करता है.

ईरान ने एलएनजी निर्यात का ढांचा बनाने की कोशिश की थी लेकिन परमाणु कार्यक्रम के चलते प्रतिबंधों के कारण बहुत क़ामयाबी नहीं मिल पाई है.

एपी के मुताबिक़, असालूयेह क्षेत्र में साउथ पार्स गैस फ़ील्ड पर जो हमला हुआ है उसे ईरान 20 सालों से विकसित कर रहा था और ये लगभग पूरा होने की कगार पर था.

ईरान क़रीब 9 अरब क्युबिक मीटर (लगभग 6.6 मिलियन टन) नेचुरल गैस निर्यात करता है.

भारत पर असर

प्रशांत वशिष्ट
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भारत अपनी ज़रूरत की एलएनजी का सबसे अधिक हिस्सा क़तर से ख़रीदता है. क़तर और यूएई से आने वाले एलएनजी का कार्गो होर्मुज़ से होकर गुज़रता है. भारत के एलएनजी आयात का लगभग 50-55 प्रतिशत इसी रास्ते से आता है.

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आईसीआरए के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट के प्रशांत वशिष्ट ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से बात करते हुए कहा, "क़तर का रास लाफ़ान नेचुरल गैस की बहुत बड़ी फ़ेसिलिटी है और पूरी दुनिया के एलएनजी व्यापार का 19 से 20 प्रतिशत सप्लाई यहां से होती है."

उन्होंने कहा, "पहले ये कहा जा रहा था कि अगर यह जंग बंद भी हो जाती है तो भी गैस प्रोसेसिंग प्लांट को दोबारा शुरू होने में दो हफ़्ते लगेंगे. शुरू करने की यह मानक प्रक्रिया के तहत होता है. अभी तक रास लफ़ान में कितना नुकसान हुआ है इसका अंदाज़ा नहीं है, लेकिन अगर नुकसान हुआ है तो जंग ख़त्म होने के बाद भी इसके शुरू होने में और समय लग सकता है, शायद कुछ महीने लगें."

उनका अनुमान है कि कुछ समय के लिए यह फ़ेसिलिटी आंशिक रूप से चल सकती है लेकिन पूरी क्षमता पर आने में वक़्त लग सकता है.

वो कहते हैं, "क्योंकि यहां एलएनजी के परिवहन के लिए 14 ट्रेनें हैं और अगर वो क्षतिग्रस्त हुई हैं तो उनमें से कुछ को वापस आने में समय लगेगा और इसका असर वैश्विक एनर्जी सिक्युरिटी पर पड़ेगा. पीपीएसई, सीएमई और अन्य ट्रेड संस्थाओं के आंकड़े देखें तो अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच भारत ने 22.2 मिलियन टन एलएनजी का आयात किया और इसमें सिर्फ़ क़तर से ही 10 मिलिटन टन एलएनजी का आयात था. जबकि यूएई से 2.4 मिलियन टन आयात था."

यानी भारत का 55% एलएनजी इन्हीं दोनों देशों से आता है. तो एलएनजी के मामले में भारत पर भी प्रभाव पड़ेगा.

भारत के पास एलएनजी का कितना रिज़र्व

भारत एलएनजी

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इमेज कैप्शन, भारत दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी आयातक देशों में है

इसी हफ़्ते की शुरुआत में प्रकाशित बीबीसी संवाददाता सौतिक बिस्वास की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी ख़रीदारों में भी शामिल है.

भारत की पीएनजी (पाइप्ट नेचुरल गैस) सप्लाई का लगभग आधा हिस्सा घरेलू गैस से आता है, जो ऑनशोर और ऑफशोर क्षेत्रों से निकाली जाती है, बाकी ज़रूरत एलएनजी आयात से पूरी होती है.

इस रिपोर्ट में केप्लर इनसाइट के एलएनजी और नेचुरल गैस के एनॉलिस्ट गो कातायामा के हवाले से कहा गया है, "क़तर में संघर्ष बढ़ने से पहले लोड किए गए कार्गो अब भी एशिया पहुंच रहे हैं. आपूर्ति अभी पूरी तरह बाधित नहीं हुई है."

केप्लर के शिपिंग डेटा के अनुसार, 10 से 26 फ़रवरी के बीच लोड किए गए 13 एलएनजी कार्गो इस समय भारत की ओर आ रहे हैं और मार्च तक डिलीवरी जारी रहेगी.

लेकिन क़तर के बड़े रास लाफ़ान गैस कॉम्प्लेक्स से निर्यात 2 मार्च से रुका हुआ है. कातायामा के अनुसार, इसका मतलब है कि ये जहाज सुरक्षित रास्ता बहाल होने तक आख़िरी खेपों में से हो सकते हैं.

कच्चे तेल के उलट, भारत एलएनजी का स्ट्रेटेजिक भंडार नहीं रखता है.

प्रशांत वशिष्ट कहते हैं कि जिस तरह यूरोप, अमेरिका, बाकी पश्चिमी देश, चीन और जापान की तरह एलएनजी का स्ट्रेटेजिक रिज़र्व होता है, भारत में ऐसा नहीं है,

उन्होंने बताया, "हमारे पास जो रिज़र्व हैं वो पहले के एलएनजी टर्मिनल में हैं. ये सिर्फ़ ऑपरेशनल रिज़र्व हैं. इनमें इतनी गैस नहीं है कि 50-60 दिन का रिज़र्व हो."

वो कहते हैं, "एलएनजी का मार्केट तेल से भी अधिक केंद्रित है और कुछ ही देशों के पास इसके भंडार हैं. अगर हम ऑस्ट्रेलिया, रूस, क़तर और अमेरिका का हिस्सा देखें तो 72% एलएनजी इन्हीं देशों से आती है."

उनके अनुसार, "एलएनजी के लिए क़तर के अलावा ये देश भी विकल्प हो सकते हैं लेकिन चूंकि भारतीय बाज़ार दाम के मामले में संवेदनशील है और हम बहुत महंगी एलएनजी नहीं ले सकते इसलिए क़तर से आयात बंद होने का भारत पर असर पड़ेगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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