हिड़मा: नक्सल आंदोलन का वो आदिवासी चेहरा, जिसने नक्सलियों के लड़ने के तरीक़े को बदल डाला

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- Author, आलोक पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
दक्षिण बस्तर के घने, चुप जंगलों में एक नाम फुसफुसाहट बनकर दौड़ता था- हिड़मा.
माड़वी हिड़मा, किसी के लिए खूंखार माओवादी कमांडर, तो किसी के लिए बस्तर का हीरो.
वही हिड़मा जिनके अब एक मुठभेड़ में मारे जाने का दावा किया गया है, लेकिन उनकी कहानी आने वाले कई सालों तक बस्तर में रहेगी.
साल 1981 में छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के पुवर्ती इलाक़े में जन्मा यह लड़का गांव के दूसरे लड़कों की तरह ही था.
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पुवर्ती वह गांव है, जहां से कम से कम दो दर्जन से अधिक लोग माओवादी संगठन में थे.
गांव की उन्हीं पगडंडियों पर बड़े होते-होते माड़वी हिड़मा उस रास्ते पर निकल पड़े जहाँ लौटकर आने की गुंजाइश बहुत कम होती है.
इसी मिट्टी में पले-बढ़े आदिवासी हिड़मा जंगल, पहाड़, नदी-नालों जितना ही स्थानीय लोगों के जीवन का हिस्सा थे.
किसी भी हिंसा को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता लेकिन यह अजीब बात है कि बस्तर के युवाओं में उनके नाम को लेकर एक अजीब-सी दीवानगी थी.
माड़वी हिड़मा, हिदमाल्लु, संतोष, संगठन के भीतर उनके कई नाम थे.
एक मामूली माओवादी लड़ाका, जल्द ही माओवादी संगठन की केंद्रीय कमेटी का सदस्य बन गया.
बस्तर पुलिस की ओर से जारी जानकारी में बताया गया है कि हिड़मा पर कुल छह राज्यों की ओर से इनाम घोषित किया गया था और इसकी कुल राशि एक करोड़ 80 लाख रुपये थी.

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असल में माओवादी संगठन पर लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि उसमें स्थानीय, ख़ासकर छत्तीसगढ़ से कोई भी माओवादी, शीर्ष नेतृत्व में शामिल नहीं है.
माना जाता है कि इसी आरोप से छुटकारा पाने के लिए 44 साल के हिड़मा को माओवादियों की सेंट्रल कमेटी में जगह दी गई.
हिड़मा के साथ काम कर चुके और बाद में आत्म समर्पण कर चुके माओवादी बताते हैं कि वो कम बोलते थे. उनके बारे में कहा जाता है कि वो चुपचाप रहते थे, लेकिन बेहद चौकन्ने और जिज्ञासु थे.
उन्हें नई चीज़ें सीखने का शौक था. गोंडी और हल्बी बोलने वाले, सातवीं तक की पढ़ाई कर चुके हिड़मा ने बरसों का अभ्यास करके हिंदी सीखी और फिर अंग्रेज़ी भी.
लेकिन इन सबसे परे, स्थानीय होने के कारण, उनके अनुभव और युद्धनीति ने उन्हें किताबों के डिग्रीधारी नेताओं से कहीं आगे खड़ा कर दिया.
हथियार तैयार करने वाली शाखा से उभरे

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कुछ नक्सलियों के मुताबिक़, साल 2000 के आसपास उन्हें संगठन की उस शाखा में भेजा गया, जो माओवादियों के लिए हथियार तैयार करती थी.
वहीं हिड़मा ने पहली बार अपनी असली 'प्रतिभा' दिखानी शुरू की. उन्होंने हथियार बनाने के नए तरीक़े खोजे. वह बंदूकें तैयार करते, उनकी मरम्मत करते, स्थानीय स्तर पर ही ग्रेनेड और लॉन्चर्स का इंतज़ाम करते.
एक साधारण आदिवासी लड़का धीरे-धीरे 'तकनीक पसंद' गुरिल्ला कमांडर में बदल रहा था.
पुलिस के एक अधिकारी के अनुसार, "2001-2002 के दौरान उन्हें दक्षिण बस्तर ज़िला प्लाटून में भेजा गया. इसके बाद वो पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) के हथियारबंद दस्ते में शामिल हो गया."
"शुरुआत में 2001 से 2007 के बीच हिड़मा संगठन में बस एक सामान्य सदस्य की तरह दिखता था."

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लेकिन यही वो दौर था, जब सलवा जुडूम की आंधी बस्तर के गाँवों से गुज़र रही थी. माओवादियों के ख़िलाफ़, सरकार के संरक्षण में शुरू हुए सलवा जुडूम के आंदोलन में अविभाजित दंतेवाड़ा के 644 गांव ख़ाली करवा दिए गए.
माओवादियों ने कई बार अपने साक्षात्कारों में दावा किया कि सलवा जुडूम के ख़िलाफ़ लोगों के भीतर भड़की बदले की भावना ने माओवादी संगठन को बस्तर में फिर से नया जीवन दे दिया.
1990 के दशक के मध्य में जिस आंदोलन की ताक़त घटती दिख रही थी, वही फिर से सिर उठाने लगा.
माना जाता है कि यही वो समय था, जब हिड़मा जैसे नौजवानों को संगठन में तेज़ी से ऊपर बढ़ने के मौके़ मिले.
नक्सलियों के लड़ने के तरीक़े को बदला

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मार्च 2007 में उरपल मेट्टा इलाके़ में सीआरपीएफ़ पर हुए हमले में 24 जवान मारे गए.
दावा किया जाता रहा है कि इस हमले का नेतृत्व हिड़मा ने किया था.
आमतौर पर आमने-सामने की लड़ाई से बचने वाले माओवादियों ने पहली बार आमने-सामने की लड़ाई शुरू की थी.
पुराने माओवादियों का कहना था कि यही हिड़मा थे, जिनकी टीम ने माओवादियों को लैंडमाइंस की दुनिया से निकालकर बंदूकों से आमने-सामने के युद्ध की तरफ़ धकेला.
2008-2009 के क़रीब उन्हें पहली बटालियन का कमांडर बनाया गया और 2011 में वह दंडकारण्य स्पेशल ज़ोन कमेटी के सदस्य बने, जो माओवादी ढांचे के भीतर एक बेहद अहम ज़िम्मेदारी है.
लेकिन हिड़मा का नाम केवल संगठनात्मक ज़िम्मेदारियों तक सीमित नहीं रहा. उन पर कम से कम 26 बड़े सशस्त्र हमलों का आरोप है, जिस वजह से छत्तीसगढ़ में भारी हिंसा और मौतें हुईं.
अप्रैल 2010 में ताड़मेटला में हुए हमले में पुलिस के 76 जवान मारे गए.
मार्च 2017 में एक और हमले में सीआरपीएफ़ के 12 जवानों की मौत हुई.
छत्तीसगढ़ के कई पुलिस अधिकारियों की मानें तो दोनों हमलों के पीछे हिड़मा का दिमाग़ और योजना थी.
इन घटनाओं ने उसके नाम को सुरक्षा एजेंसियों की फ़ाइलों में 'मोस्ट वॉन्टेड' बना दिया.
'हिंसा और क्रूरता का दूसरा नाम'
पुलिस रिकॉर्ड में हिड़मा का नाम 'हिंसा और क्रूरता' का दूसरा नाम बना रहा.
अकेले छत्तीसगढ़ में हिड़मा पर दो दर्जन से अधिक मामले दर्ज थे.
आरोप है कि सिर्फ एर्राबोर इलाके में ही हिड़मा के इशारे पर किए गए जनसंहारों में सौ से अधिक बेगुनाह नागरिकों और जवानों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया.
आसिरगुड़ा, चिंतागुफा, कासलपाड़, बुरकापाल, मिनपा, टेकलगुड़म और पिडमेल, इन सब जगहों पर अलग-अलग सालों में सुरक्षाबलों और आम लोगों पर हुए हर खून-खराबे, हर निर्मम हमले और हर जनसंहार के पीछे बार-बार हिड़मा का ही नाम सामने आता रहा.
बेहद आक्रामक थे हिड़मा

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एक पुराने माओवादी के अनुसार हिड़मा का लड़ने का तरीक़ा बेहद आक्रामक था, उन्होंने कई ज़मीनी लड़ाइयों में हिस्सा लिया, लेकिन आक्रमण करने के बजाय, वह टीम को दिशा-निर्देश देते रहते थे.
कुछ माओवादी बताते हैं कि "लड़ाई के मैदान में वह कभी अपने लोगों को अकेला छोड़कर पीछे नहीं हटते थे, फिर भी कुछ ऐसी किस्मत साथ रही कि कई लड़ाइयों में शामिल होने के बावजूद उन्हें छोटी-सी चोट तक नहीं लगी."
एक तरफ़ वह सीआरपीएफ़ और पुलिस के लिए 'वॉन्टेड' थे तो दूसरी तरफ़ माओवादियों के बीच का सबसे लोकप्रिय चेहरा थे.
पुलिस के एक अधिकारी मानते हैं, ''अशिक्षा और ग़रीबी के कारण माओवादियों ने नौजवानों को भड़काया और इस भड़काने की प्रक्रिया में हिड़मा को रोल मॉडल की तरह पेश किया गया. इन नौजवानों के सामने हिड़मा को एक ऐसे चेहरे की तरह पेश किया गया, जो सलवा जुडूम, विस्थापन और अत्याचार की कहानियों के बीच बदले और न्याय की भाषा बन गया था."
यह कथित न्याय वास्तव में किसी के हक़ में था या नहीं, इससे असहमति हो सकती है लेकिन हिड़मा की छवि इन जंगलों में बहस से ज़्यादा भावना बन गई थी.
हिड़मा का मारा जाना सुरक्षा एजेंसियों की नज़र से यह एक बड़ी कामयाबी है. लेकिन बस्तर के उन गाँवों की धूलभरी पगडंडियों पर, जहाँ बच्चे कभी उसकी कहानियाँ सुनते बड़े हुए, जहाँ बुज़ुर्गों ने उसे एक दुबले-पतले से लड़के से ख़तरनाक कमांडर बनते देखा, वहाँ यह ख़बर सिर्फ़ एक मौत की नहीं, एक दौर ख़त्म होने की लगती है.
आंकड़ों की भाषा में हिड़मा सिर्फ़ एक 'वॉन्टेड माओवादी कमांडर' थे, लेकिन बस्तर में वह हमेशा एक जटिल किरदार की तरह रहेंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















