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इंटरनेशनल स्पोर्ट इवेंट की मेज़बानी करना भारत में क्यों बन जाता है 'सिरदर्द'
- Author, हरप्रीत कौर लांबा
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
साल 2010 में भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स की मेज़बानी की. स्टेडियम, बुनियादी ढांचे और खेल से जुड़ी सुविधाओं के लिए देश ने क़रीब 18,532 करोड़ रुपये ख़र्च किए.
यह घरेलू स्तर पर वर्ल्ड क्लास स्पोर्ट्स इवेंट्स की मेज़बानी करने की भविष्य से जुड़ी महत्वाकांक्षा की शुरुआत थी.
आने वाले सालों में भारत ने कई बड़े आयोजन किए. इनमें हॉकी वर्ल्ड कप और कई खेलों के वर्ल्ड चैंपियनशिप इवेंट्स शामिल रहे. और हम 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेज़बानी भी करने जा रहे हैं.
इस दौरान बड़े स्टेडियमों और बुनियादी ढांचा सुधारने से जुड़े कामों में तेज़ी आई. एक ऐसा तंत्र भी बना जिसकी वजह से ज़्यादा एथलीट खेल को पेशे के रूप में अपनाने लगे.
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लेकिन ग्लोबल स्पोर्ट्स नेशन बनने की महत्वाकांक्षा के बीच कई कमज़ोर कड़ियां भी हैं. वर्ल्ड क्लास सुविधाओं से इतर साफ़-सफ़ाई, चालू टॉयलेट जैसी बुनियादी ज़रूरतों का आभाव.
खिलाड़ियों और दर्शकों दोनों को बार-बार बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण निराशा का सामना करना पड़ा है.
हाल ही में हुए इंडिया ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट, जो एक सुपर 750 इवेंट है, उसने इस बात को साफ़तौर पर ज़ाहिर कर दिया कि भारतीय सिस्टम में क्या गड़बड़ है.
शानदार स्टेडियमों, संसाधनों और ग्लोबल इवेंट्स की मेज़बानी करने की इच्छा के बावजूद भारत अच्छी मेज़बानी करने में संघर्ष कर रहा है. तमाम बातों के बीच भारत वर्ल्ड क्लास स्पोर्ट्स डेस्टिनेशन नहीं बन पा रहा है.
हाल की घटनाओं ने खड़े किए गंभीर सवाल
इंडिया ओपन अकेली ऐसी घटना होती तो वो बात समझ आ जाती है. लेकिन बीते कुछ महीनों में ऐसा कई मौकों पर हुआ.
फ़ुटबॉल के दिग्गज लियोनेल मेसी की बहुचर्चित यात्रा दिसंबर 2025 में राष्ट्रीय शर्मिंदगी का कारण बन गई. आयोजक सुपरस्टार के साथ फ़ोटो खिंचवाने की होड़ में जुट गए और भारी रक़म ख़र्च करके आए दर्शकों को बिल्कुल नज़रअंदाज़ कर दिया गया.
ग़ुस्से में प्रशंसकों ने कोलकाता के सॉल्ट लेक स्टेडियम में सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया. आयोजक को जेल जाना पड़ा और भारत ग़लत कारणों से वैश्विक सुर्खियों में छा गया.
कुछ समय पहले बॉक्सिंग नेशनल्स, शेड्यूल पर इसलिए शुरू नहीं हो पाए क्योंकि रिंग समय पर तैयार नहीं था, जबकि टूर्नामेंट की घोषणा हफ्तों पहले ही हो गई थी.
टॉप बॉक्सर्स असमंजस और हताशा में इंतज़ार करते रहे क्योंकि कर्मचारी जल्दबाज़ी में आयोजन स्थल को तैयार कर रहे थे.
इसी तरह अक्तूबर 2025 में जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप के दौरान आवारा कुत्तों के मैदान में घुसने और यहां तक कि कुत्ते के कोच को काटने की घटनाओं ने सुरक्षा संबंधी गंभीर चिंताएं पैदा कर दीं.
कुछ ही दिन पहले इंडिया ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट में और भी शर्मनाक घटनाएं घटीं. इस टूर्नामेंट को 2026 में होने वाली बैडमिंटन वर्ल्ड फे़डरेशन (बीडब्ल्यूएफ़) विश्व चैंपियनशिप की मेज़बानी के लिए भारत की तैयारियों के टेस्ट के तौर पर देखा जा रहा था.
यह टूर्नामेंट कई घटनाओं से प्रभावित रहा. डेनमार्क की मिया ब्लिचफेल्ट ने 'गंदे कोर्ट और ठंड' की शिकायत करते हुए बैडमिंटन वर्ल्ड फ़ेडरेशन (बीडब्ल्यूएफ़) से हस्तक्षेप करने और स्थिति का आकलन करने की अपील की.
जैसे ही बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (बीएआई) और भारतीय खेल प्राधिकरण जो खेल मंत्रालय की ओर से इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम का प्रबंधन करता है, दोनों ने नुक़सान को कंट्रोल करने की कोशिश की, तब तक हालात और बिगड़ गए.
एक दिन बाद भारत के एचएस प्रणॉय और सिंगापुर के लोह कीन यू के बीच खेला जा रहा मेन्स सिंगल्स मैच कोर्ट पर पक्षियों की बीट गिरने से दो बार रुका.
लाइव टेलीकास्ट में लोह को उल्टी करने का इशारा करते देखा गया. बाद में उन्होंने सोशल मीडिया पर कबूतरों और पक्षियों की बीट की तस्वीरें पोस्ट कीं, जिसके बाद यह मुद्दा वैश्विक स्तर पर फैल गया.
बीएआई ने शुरुआत में आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि टूर्नामेंट काफी हद तक सफल रहा और महासंघ कमियों को दूर करेगा. लेकिन 'सफाई, स्वच्छता और एनिमल कंट्रोल से जुड़े मुद्दों को स्वीकार किया.
डेनमार्क के वर्ल्ड नंबर 3 एंडर्स एंटोनसन ने कहा कि उन्होंने 'दिल्ली की ख़राब हवा' के कारण इंडिया ओपन में भाग न लेने का फै़सला किया था.
वहीं ब्लिचफेल्ड ने कहा कि 'उन्हें भारत में खेलना मुश्किल लगा.'
इसके बाद स्वच्छ, सुरक्षित और पेशेवर तरीके़ से खेल आयोजनों को आयोजित करने की देश की क्षमता पर सवाल उठने लगे.
बैडमिंटन कोच विमल कुमार भारतीय स्टार खिलाड़ी लक्ष्य सेन को कोचिंग देते हैं. टूर्नामेंट के दौरान वो वहां मौजूद थे और उन्होंने साफ़-साफ़ अपनी बात रखी.
उन्होंने कहा, "हम बड़े आयोजन करने में सक्षम हैं, इसमें कोई शक नहीं. लेकिन जब शौचालय और साफ़-सफ़ाई जैसी बुनियादी चीजों की बात आती है, तो हम बेहद पिछड़े हुए हैं. दिल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को ही देख लीजिए रोज़ाना लाखों लोग वहां से गुजरते हैं, फिर भी शौचालय साफ़ हैं. हम अपने स्टेडियमों को उसी तरह क्यों नहीं रख सकते?"
"जहां तक वायु प्रदूषण की बात है, हम सभी जानते हैं कि दिल्ली में कुछ महीनों के दौरान हवा खराब रहती है, इस बारे में तुरंत कुछ खास नहीं किया जा सकता. लेकिन स्वच्छता और साफ़-सफ़ाई की बात करें तो हमें इसमें काफ़ी सुधार करने की ज़रूरत है."
हाल की घटनाओं ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं. करोड़ों रुपये बुनियादी ढांचे पर खर्च होने के बावजूद साफ़ शौचालय और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं मिल पा रही हैं?
स्टेडियम परिसर का रख-रखाव पेशेवर तरीके से क्यों नहीं किया जाता? दर्शकों के आराम को आज भी नज़रअंदाज़ क्यों किया जाता है?
इंडिया ओपन में मौजूद रहे एक दर्शक ने कहा, "हमने मैच का भरपूर आनंद लिया, वे विश्व स्तरीय थे. लेकिन शौचालय और स्वच्छता की स्थिति और बेहतर हो सकती थी."
पूर्व ऑल इंग्लैंड चैंपियन और राष्ट्रीय कोच पुलेला गोपीचंद ने स्वीकार किया, "इस तरह की कमियां देश की छवि के लिए अच्छी नहीं हैं."
एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "मेरी नज़र में 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स, खेलों के इतिहास में सबसे बेहतरीन रहे. चाहे खाने की बात हो, रहने की या फिर मेज़बानी की. अगर हम ओलंपिक और कॉमनवेल्थ जैसे गेम्स का आयोजन करने की क्षमता रखते हैं तो मेरा मानना है कि हम इनका भी सफल आयोजन कर पाएंगे."
"जहां तक बुनियादी सुविधाओं की बात है तो ये लंबे समय से चल रही समस्याएं हैं और इन्हें हल करना बहुत ज़रूरी है. इन मुद्दों का अनसुलझा रहना देश की छवि के लिए अच्छा नहीं है."
किन बातों की है ज़रूरत?
विश्व के सबसे सफल खेल आयोजन करने वाले देशों के बारे में दो बातें साफ़ हैं. ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देश बड़े आयोजनों की लागत नियंत्रण में रखने के लिए अक्सर अस्थायी या मॉड्यूलर बुनियादी ढांचे का विकल्प चुनते हैं.
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वच्छता, सुरक्षा प्रोटोकॉल, दर्शकों की सुविधा जिसमें पानी, शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं, उन्हें ज़रूरी माना जाता है.
एक पूर्व खेल प्रशासक ने कहा, "भारत बुनियादी ढांचे और संसाधनों से समृद्ध है. वर्ल्ड क्लास स्टैंडर्ड हासिल करने के लिए एक पेशेवर व्यवस्था और जवाबदेह इवेंट मैनेजमेंट ईकोसिस्टम ज़रूरी है."
ऐसा नहीं है कि भारत में ग्लोबल इवेंट्स की मेज़बानी करने की क्षमता नहीं है.
भुवनेश्वर में खेले गए 2018 हॉकी वर्ल्ड कप की विदेशी खिलाड़ियों और कोच ने सराहना की.
बैडमिंटन में भी हाल ही में गुवाहटी में खेली गई वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप ने भी ध्यान खींचा.
फिलहाल शीर्ष प्रबंधन की ओर से कोऑर्डिनेटेड और पेशेवर दृष्टिकोण की ज़रूरत है. पहला कदम ईमानदारी से ग़लती स्वीकार करना होना चाहिए. जिसके बाद तुरंत सुधार से जुड़े कदम उठाए जाने चाहिए.
स्वच्छता, सुचारू संचालन और दिन की ज़रूरी चीज़ें लग्ज़री नहीं हैं. ये मूलभूत आवश्यकताएं हैं. अगर भारत वास्तव में कभी-कभार अच्छा मेज़बान होने की बजाए विश्व स्तरीय खेल स्थल बनने की ओर अग्रसर होना चाहता है, तो इन मूलभूत ज़रूरतों की तरफ़ ध्यान दिया जाना चाहिए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.