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चाचा के ख़िलाफ़ बग़ावत करने वाले दो भतीजों के बीच पांच बड़े फ़र्क़
नीलेश धोत्रे
बीबीसी संवाददाता
"मेरा विवाद मेरे विट्ठल (भगवान) से नहीं बल्कि उनके आसपास के लोगों से है."
“मैं अपने भगवान, हमारे वरिष्ठों से पांडुरंगा से और अधिक आशीर्वाद देने का अनुरोध कर रहा हूं. विट्ठल को यह हमें दे देना चाहिए.”
ये शब्द पार्टी और अपने चाचा को छोड़ने वाले राज ठाकरे और अजित पवार के हैं.
महाराष्ट्र की राजनीति में चाचा-भतीजे के बीच राजनीतिक उत्तराधिकार को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है.
राज्य की राजनीति में ऐसे कई उदाहरण भरे पड़े हैं जिनमें बालासाहेब ठाकरे-राज ठाकरे, गोपीनाथ मुंडे-धनंजय मुंडे, जयदत्त क्षीरसागर- संदीप क्षीरसागर, एनसीपी नेता और सांसद सुनील तटकरे और उनके भतीजे अवधूत तटकरे और पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख और उनके भतीजे आशीष देशमुख शामिल हैं.
लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में ठाकरे और पवार परिवार की जोड़ी रही है.
अपने चाचा के जीवनकाल में ही इन दोनों भतीजों ने बग़ावत की. राज ठाकरे ने अलग पार्टी बना ली थी तो अजित पवार ने अपने चाचा की ही पार्टी एनसीपी के अंदर उन्हें अध्यक्ष पद से हटाकर ख़ुद के अध्यक्ष होने का अपना दावा ठोक दिया है.
ख़ास बात है कि इन भतीजों की बगावत में कुछ समानताएं तो हैं लेकिन कुछ बुनियादी अंतर भी हैं.
आज हम उन पर ही चर्चा करने जा रहे हैं.
1. विधायकों की संख्या
पार्टी छोड़ते वक्त अजित पवार ने दावा किया कि उनके साथ 40 विधायक हैं. फिलहाल उनके पास करीब 30 विधायकों का समर्थन है. उनके साथ 9 विधायकों ने शपथ ली है और साथ में दो सांसद प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे भी हैं.
इसके अलावा बांद्रा के एमईटी कॉलेज में में उनकी आयोजित सभा में कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ देखी गई है.
लेकिन राज ठाकरे की स्थिति उससे अलग थी. आज भी राज ठाकरे के पास भीड़ और कार्यकर्ताओं की कोई कमी नहीं है. जब उन्होंने शिवसेना छोड़ी थी तब भी हज़ारों कार्यकर्ता उनके साथ थे.
लेकिन जहां तक बात विधायकों और सांसदों की बात है तो उनके पास अजित पवार जैसा समर्थन नहीं था.
जब राज ठाकरे ने नई पार्टी, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई थी तो सिर्फ विधायक बाला नंदगांवकर ही उनके साथ आए थे.
राज ठाकरे के पास विधायकों और सांसदों का समर्थन न के बराबर था.
2. पार्टी पर पकड़
शिवसेना में रहते हुए राज ठाकरे को पार्टी के स्टार प्रचारक के तौर पर जाना जाता था. वे बाला साहेब ठाकरे की तरह मंचों से भाषण देते थे. वे तब शिवसेना की युवा शाखा विद्यार्थी सेना के अध्यक्ष भी थे.
हालांकि चुनाव में टिकट किसे मिलेगी, पार्टी के बड़े फैसले और संगठन पर उनका खास नियंत्रण नहीं था, क्योंकि बाला साहेब ठाकरे ही शिवसेना पर एकछत्र राज कर रहे थे.
यह सही बात है कि विद्यार्थी सेना के ज़रिए राज ठाकरे के पास कई ज़िलों में कार्यकर्ताओं का एक बड़ा नेटवर्क था, लेकिन वे असल शिवसेना में नहीं थे.
इसलिए जब राज ठाकरे ने पार्टी बनाई तो छात्र सेना के कार्यकर्ता उनकी पार्टी में शामिल हुए और शिवसेना के कार्यकर्ता उनसे दूर रहे, लेकिन अजित पवार की कहानी अलग है. शरद पवार के साथ उनकी भी पार्टी और संगठन दोनों पर मज़बूत पकड़ है.
टिकट बंटवारे से लेकर पार्टी के महत्वपूर्ण फैसलों पर उनका नियंत्रण है. यही वजह है कि शरद पवार को छोड़ विधायक, सांसद और कार्यकर्ता उनके पीछे जाते हुए दिख रहे हैं.
3. अलग पार्टी और पार्टी पर दावा
राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ते वक्त पार्टी पर दावा नहीं किया. उन्होंने नवंबर 2005 में शिवसेना छोड़ मार्च 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना नाम से नई पार्टी बनाई थी.
हालांकि अजित पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) पर अपना दावा ठोकते हुए चाचा शरद पवार को अध्यक्ष पद से हटा दिया है.
4. एक को सत्ता और दूसरे को विपक्ष
अजित पवार, बगावत कर सीधा सत्ता की कुर्सी पर बैठ गए. उन्होंने अपने आठ सहयोगियों के साथ महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
दूसरी ओर, राज ठाकरे ने जबसे शिवसेना छोड़ी है, तब से वे विपक्ष में बने हुए हैं. पिछले 15 सालों से उनकी पार्टी को एक बार भी सत्ता नहीं मिली है.
यहां तक की पिछले दो चुनावों में उनकी पार्टी से एक से अधिक विधायक तक नहीं जीत पाया है.
लेकिन इससे भी ज्यादा राज ठाकरे और अजित पवार की राजनीति में सबसे अहम और बुनियादी अंतर उनकी राजनीति की बुनावट का है.
5. राजनीति की बनावट अलग है
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक राजेंद्र साठे बीबीसी मराठी से बात करते हुए बताते हैं, “राज ठाकरे विरासत में मिले करिश्मे के साथ राजनीति कर रहे थे लेकिन कोई यह नहीं कर सकता है कि अजित पवार उस तह की राजनीति कर रहे थे. उन्होंने राजनीति ज़िला स्तर से की है.”
वे कहते हैं, “राज ठाकरे खुद को केंद्र में रखते हैं, वहीं अजित पवार बराबरी का व्यवहार करते हैं. वे अपने सहयोगियों, साथियों और दूसरे नेताओं का आदर करते हैं.”
साठे कहते हैं कि अजित पवार की पार्टी पर पकड़ के साथ साथ उन्हें महाराष्ट्र का भी ज्ञान है. वे खुद से भी पार्टी को खड़ा कर सकते हैं लेकिन राज ठाकरे के पास इस चीज़ की कमी है.
राजनीतिक पत्रकार सुधीर सूर्यवंशी ने भी दोनों नेताओं की बगावत का विश्लेषण किया है.
वे कहते हैं, “अजित पवार का विद्रोह राज ठाकरे से थोड़ा अलग है. उनके मन में कई सालों से द्वंद चल रहा था. वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का पद चाहते थे. उन्हें पता है कि कि उनकी सरकार आने पर भी शरद पवार उन्हें यह पद नहीं देगी, जिसे लेकर वे चिंतित थे. इसलिए उन्होंने विद्रोह किया, लेकिन राज ठाकरे ऐसे नहीं थे.”
सूर्यवंशी कहते हैं, “राज ठाकरे पार्टी को तोड़ नहीं सके, उल्टे अजित पवार पार्टी के हर काम में सक्रिय रहे. अजित पवार जनता के लिए हमेशा उपलब्ध रहते हैं, यह राज ठाकरे और अजित पवार के बीच एक बड़ा फर्क है."
बगावत में कितनी समानता
अब बात करते हैं कि अजित पवार और राज ठाकरे की बगावत में कितनी समानता है.
दोनों ने बगावत के बाद अपने विट्ठल का ज़िक्र किया, लेकिन हकीकत में देखा गया कि वे अपने भाई या बहन को आगे बढ़ाने का विरोध करते हैं.
राज ठाकरे सीधे तौर पर उद्धव ठाकरे के विरोधी थे और दूसरे मामले में ऐसा लगता है कि अजित पवार का विरोध उनकी बहन और शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले को लेकर है, जिनके हाथ में पार्टी है.
यह नहीं भूलना चाहिए कि सुप्रिया सुले को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष और महाराष्ट्र प्रभारी बनाते वक्त अजित पवार का विद्रोह भड़क उठा था.
बेशक अजित पवार की इस बगावत की पृष्ठभूमि कई साल पुरानी है.
पार्टी में उचित पद नहीं मिलने का दावा
पार्टी छोड़ने के बाद राज ठाकरे ने कई बार कहा कि उनकी बात नहीं सुनी जाती थी और उन्हें शिवसेना में सम्मानजनक पद नहीं मिला.
इसके उलट अजित पवार का पार्टी पर अच्छा नियंत्रण है लेकिन वे आरोप लगाते हैं कि शरद पवार उन्हें वैसा आशीर्वाद नहीं दे रहे थे जैसा उन्हें मिलना चाहिए था.
विट्ठल पर बुरे लोगों से घिरे रहने का आरोप
राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ते समय आरोप लगाया, ''मेरा विवाद मेरे विट्ठल से नहीं बल्कि उनके आसपास के लोगों से है.''
वहीं अजित पवार ने कहा, “वह (शरद पवार) हमारे विट्ठल हैं, लेकिन वे बुरे लोगों से घिरे हुए हैं. भगवान उन्हें ऐसे लोगों से दूर करे और हमें आशीर्वाद दे.”
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