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महाराष्ट्र चुनाव: पाँच महीने में ऐसा क्या हुआ जिससे हवा का रुख़ बीजेपी के पक्ष में हो गया
- Author, सुशीला सिंह और मोहम्मद शाहिद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इसी साल लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी को बढ़त मिली थी, उससे लग रहा था कि विधानसभा चुनाव में भी उसे जीत मिल सकती है.
लेकिन हरियाणा ने इस ट्रेंड को पहले ही ग़लत साबित कर दिया था और महाराष्ट्र में भी ऐसा ही होता दिख रहा है.
बीजेपी के नेतृत्व वाला महायुति गठबंधन राज्य में सत्ता में वापसी करता नज़र आ रहा है. इसमें सबसे चौंकाने वाली बात ये भी है कि बीजेपी ने 149 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें से 125 से अधिक सीटों पर वो जीत दर्ज कर चुकी है या आगे चल रही है.
बीजेपी ने ये तब करके दिखाया है जब अब से पांच महीने पहले लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी को राज्य में बड़ा झटका लगा था.
महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं जिसमें कांग्रेस के नेतृत्व वाले महाविकास अघाड़ी ने 30 सीटों पर जीत हासिल की थी. वहीं बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन को 18 सीटें मिली थीं.
बीजेपी ने महाराष्ट्र की कुल 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें से उसने नौ सीटें जीती थीं.
लोकसभा चुनाव से उलट कैसे बीजेपी ये कर पाई?
लोकसभा चुनाव के परिणामों को देखते हुए अनुमान लगाया जा रहा था कि विधानसभा चुनावों में बीजेपी और उसके नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन को भारी नुक़सान झेलना पड़ेगा.
लेकिन हुआ इसका बिलकुल उलटा और बीजेपी राज्य में सबसे बड़ा दल बनकर उभरी है और अब इस बात की चर्चा भी शुरू हो गई है कि मुख्यमंत्री भी उसी का हो सकता है.
बीते पांच महीनों में ऐसा क्या हुआ जो बीजेपी ने अपने प्रदर्शन को एकदम पलटकर रख दिया है. ये सवाल सबके ज़ेहन में कौंध रहा है.
इस सवाल के जवाब में मुंबई स्थित वरिष्ठ पत्रकार समर खडस कहते हैं कि इसकी वजह महायुति सरकार की रणनीति है. उन्होंने बताया कि लाड़ली बहिन योजना, हिंदुत्व और जातियों को एकजुट करने की रणनीति ने बीजेपी को ये कामयाबी दिलाई है.
उन्होंने कहा, “पांच महीनों में बहुत कुछ हुआ. सबसे पहला लाड़ली बहिन योजना लाई गई जिसमें ढाई करोड़ महिलाओं के अकाउंट में चार महीने का पैसा आ गया. इसके साथ ही बंटेंगे तो कटेंगे नारा चलाया गया जिसकी वजह से कुछ हद तक हिंदू वोट एकजुट हुआ.”
“लोकसभा में उस समय जब कांग्रेस जीती थी तब मराठा आरक्षण का मुद्दा चल रहा था तो उस वक़्त मराठा एकजुट हुआ था. साथ ही चुनाव के वक़्त कुछ बीजेपी नेताओं ने संविधान बदलने की बात कही थी. उसका असर यहां बौद्ध और दलित वोटों पर पड़ा. 9-10 फ़ीसदी बौद्ध वोट है जो महाविकास अघाड़ी के साथ चला गया. मराठा-दलित वोट एकजुट होने के साथ-साथ मुसलमानों का मतदान भी बढ़ा था.”
वे बताते हैं, “70-80 फ़ीसदी मुसलमानों ने लोकसभा में मतदान किया था. इस बार मुसलमानों का मतदान प्रतिशत वापस 35-40 प्रतिशत हो गया. संविधान का मसला बीजेपी ने अच्छे तरीक़े से ठंडा किया जिसके बाद दलित वोट वापस उसके साथ जुड़ गया. इसके साथ ही आरक्षण के लिए सब-कैटेगरी बनाई गई जिसके बाद बौद्ध वोटर बीजेपी के साथ आए.”
समर खडस के अनुसार, “बीजेपी ने कई प्रयोग किए. इसके अलावा छह अलग-अलग पार्टियां थीं जिसको लेकर भ्रम की स्थिति थी. बीजेपी का वोट शेयर बहुत बड़ा नहीं होगा लेकिन महाविकास अघाड़ी का वोट शेयर कम हुआ होगा.”
बीबीसी मराठी के संपादक अभिजीत कांबले का कहना है कि इस बार बीजेपी नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन में लोकसभा चुनाव में हुई गलतियों से सबक लिया.
वो कहते हैं, “राज्य में महायुति गठबंधन ने ओबीसी मतदाता को अपने पक्ष में लाने की कोशिश की. वहां प्याज़ बेल्ट माने जाने वाले उत्तरी महाराष्ट्र में किसान प्याज़ निर्यात पर लगे प्रतिबंध को लेकर नाराज़ थे जिसके लिए वो नीतियां लेकर आई. वहीं जो वोट ट्रासफ़र नहीं हुए थे उसे लेकर भी बीजेपी ने काम किया.”
वे आगे बताते हैं कि पिछली बार बीजेपी अपने मतदाताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं को ये समझाने में असफल रही थी कि वो उनके गठबंधन के साथी अजित पवार की पार्टी को वोट दे और समर्थन करे लेकिन हार के बाद बीजेपी इस मुद्दे पर दमखम से लग गई वहीं स्थानीय मुद्दों को लेकर भी काम किया.
‘लाड़ली बहिन योजना’ को बताया जा रहा गेमचेंजर
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में जिस योजना को गेमचेंजर बताया जा रहा वो है- ‘लाड़ली बहिन योजना.’
अभिजीत कांबले कहते हैं कि अगर रूझानों को देखा जाए तो ये कहा जा सकता है कि 'लाड़ली बहिन योजना' योजना एक तरह से गेम चेंजर साबित हुई.
इसके तहत हर महीने महिलाओं को 1500 रुपये देने का प्रावधान किया गया था. इस योजना का फ़ायदा 21 से 60 साल की महिलाएं उठा सकती हैं जिनके परिवार की सलाना आय 2.5 लाख रुपये से कम है. जिस संख्या में महिलाएं लाभ उठा रही थी वो बहुत ज़्यादा थी.
वहीं वरिष्ठ पत्रकार जीतेंद्र दीक्षित बीबीसी संवाददाता सुमेधा पाल से कहते हैं कि ‘ढाई महीने पहले मैं कह सकता था कि महाविकास अघाड़ी की सरकार बन रही है लेकिन इस दौरान महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत कुछ बदला. लाड़ली बहिन योजना और दूसरी सरकारी योजनाओं ने गेमचेंजर का काम किया. इसका असर ग्रामीण इलाकों और शहरी इलाकों की झुग्गी बस्तियों में दिखाई दिया.’
“मराठा आंदोलन, किसानों को राहत देना. सरकार ने इन मुद्दों पर काम किया. इसके अलावा ध्रुवीकरण की राजनीति ने भी बीजेपी के पक्ष में काम किया, जैसे 'बंटेंगे तो कटेंगे' और 'एक हैं तो सेफ हैं' का नारा. आरएसएस ने काफ़ी मेहनत की है. खासतौर पर विदर्भ के इलाकों में महायुति के लिए प्रचार किया. वोटिंग वाले दिन भी मतदाताओं को पोलिंग बूथ तक लाने में अहम भूमिका निभाई.”
उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने कम रैलियां कीं. लोकसभा चुनाव में जहां-जहां पीएम ने रैली की थी, वहां-वहां बीजेपी की हार हुई. इसी वजह से इस बार रणनीति में बदलाव कर रैलियों में कमी की गई.
जीतेंद्र दीक्षित ने कहा कि इस बार चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा गया और स्थानीय नेताओं ने ही अधिकतर रैलियों को संबोधित किया.
राहुल गांधी और महाविकास अघाड़ी की क्या रणनीति पड़ी उलटी?
महाराष्ट्र चुनाव में महाविकास अगाड़ी गठबंधन में कांग्रेस ने 101 सीटों पर चुनाव लड़ा था. ऐसे अनुमान थे कि वो लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को दोहराते हुए विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी.
महाविकास अघाड़ी की रणनीति कहां ग़लत साबित हुई?
इस पर समर खडस कहते हैं, “1500 रुपये की लाड़ली बहिन योजना जब महायुति सरकार लेकर आई तो महाविकास अघाड़ी ने इसकी आलोचना की और कहा कि ये नहीं चल पाएगी. फिर महाविकास अघाड़ी ख़ुद 3000 रुपये की योजना अपने घोषणा पत्र में ले आई.”व
वे बताते हैं,''महाविकास अघाड़ी के दल साथ काम करते नज़र नहीं आए. कांग्रेस को ये ग़लतफ़हमी हो गई कि हमारा आधार ज़्यादा है तो हमें ही अधिक सीट मिलनी चाहिए. इससे कांग्रेस-शिवसेना में तनाव हुआ. उधर राहुल गांधी अदानी, धारावी और महंगाई जैसे ग़ैर मुद्दे पर केंद्रित रहे. महंगाई और बेरोज़गारी के मुद्दों पर चुनाव जीता तो देश में वामपंथियों की सरकार होती क्योंकि उन्होंने ही सबसे ज़्यादा इस पर काम किया है.”
वहीं वरिष्ठ पत्रकार जीतेंद्र दीक्षित कहते हैं कि बाग़ियों की तरफ से महाविकास अघाड़ी को अधिक नुकसान पहुंचा है. इसके अलावा बड़ा कारण ये है कि जो लोकसभा में शरद पवार के प्रति सहानुभूति थी, वो कम हुई है.
हिंदुत्व का कार्ड कैसा चला?
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ नारा बहुत छाया रहा. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘एक हैं तो सेफ़ हैं’ नारा दिया. इन नारों को हिंदुत्व और हिंदू समुदाय की विभिन्न जातियों को एकजुट किए जाने से जोड़कर देखा गया.
क्या इन नारों ने महाराष्ट्र में बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे को मज़बूती से आगे बढ़ाया और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी भूमिका है? समर खडस कहते हैं कि यह हिंदुत्व या पीएम मोदी की जीत नहीं बल्कि रणनीति की जीत है.
वो कहते हैं, “चुनाव रणनीति के तहत लड़ा जाता है, अब चाहे जो भी कहे. हिंदुत्व की राजनीति का सवाल जहां तक है, पूरे भारत में बीजेपी ही हिंदुत्व की राजनीति कर रही है. आरएसएस और बीजेपी के पास ही उसी के अधिकार हैं. लेकिन इसका काउंटर नैरेटिव कांग्रेस ने कभी दिया नहीं.”
“इस रणनीति की काट महाविकास अघाड़ी के पास नहीं थी. राहुल गांधी जेएनयू के प्रोफ़ेसर के रूप में अच्छे लगते हैं लेकिन उनके पास रणनीति नहीं है. वो ओबीसी जनगणना की बात करते हैं जबकि देश के प्रधानमंत्री समेत कई मुख्य पदों पर ओबीसी हैं.”
समर खडस कहते हैं, “महाविकास अघाड़ी को सांप्रदायिकता के मुद्दे पर खुलकर बोलना चाहिए था. वो हमेशा डरकर रहते हैं कि हिंदू वोट टूट जाएगा. हिंदू वोट तो आज तक नहीं टूटा है. अदानी का मुद्दा देश में क्यों चलेगा. कांग्रेस के शासनकाल में ख़ुद टाटा और अंबानी जैसे कई बिज़नेसमैन तैयार हुए. अब पीएम मोदी के समय में अदानी तैयार हुए. ये कौन सा लॉजिक है. सोशल थ्योरी व्यक्ति सापेक्ष नहीं होनी चाहिए.
ठाकरे परिवार का क्या भविष्य होगा?
ढाई साल पहले शिवसेना को तोड़कर एकनाथ शिंदे ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई. वहीं उद्धव ठाकरे ने अपनी नई पार्टी का गठन किया. विधानसभा चुनाव से उम्मीद थी कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना राज्य में वापसी करेगी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.
अब उद्धव ठाकरे के भविष्य को लेकर भी अनुमान लगाए जा रहे हैं.
इस पर समर खडस कहते हैं कि ‘आप कैसे लड़ते हो राजनीति में भविष्य उस पर निर्भर करता है. जगनमोहन रेड्डी का क्या भविष्य था? आंध्र प्रदेश में पैदल यात्रा करके उन्होंने वापसी की और 5 साल राज किया. फिर चंद्रबाबू नायडू ने सब तहस-नहस कर दिया. तो भविष्य के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.’
वहीं बीते कुछ समय से राज्य में मनोज जरांगे पाटिल का नाम चर्चा में रहा है जो मराठा आरक्षण की मांग कर रहे हैं. उनका इस चुनाव में क्या योगदान रहा इस पर समर खड़स कहते हैं, “यह एक सीमित आंदोलन था और उन्होंने मराठा समुदाय को एकजुट किया लेकिन मराठा समुदाय पूरे राज्य में 35 फीसदी है. जब गांव में मराठा एकजुट होता है तो छोटी-छोटी जातियां भी एकजुट होती हैं. इसके बीच में दलित और मुसलमान भी होते हैं और वो इन जातियों के साथ जिसके भी पक्ष में जाएंगे उनको सीटें मिलेंगी.”
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के रुझानों में महायुति गठबंधन बहुमत के आंकड़े को पार कर चुका है. अब सारी रस्साकशी होगी कि कौन मुख्यमंत्री होगा?
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित