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महाराष्ट्र में बीजेपी की जीत का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर होगा?
महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव में नतीजों और रुझानों से नई सरकार किस गठबंधन की होगी, ये तकरीबन तय हो गया है.
झारखंड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाला जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन सत्ता में वापसी करने जा रहा है, जबकि महाराष्ट्र में बीजेपी के नेतृत्व वाला गठबंधन महायुति भारी बहुमत की ओर अग्रसर है.
मई में हुए लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन महाविकास अघाड़ी ने कुल 48 सीटों में से 30 सीटें जीती थीं और महायुति को 17 सीटों पर ही कामयाबी मिली थी.
महाराष्ट्र में बीजेपी लोकसभा चुनाव में 28 सीटों पर चुनाव लड़ी थी लेकिन नौ सीटों पर ही कामयाबी मिली थी. वहीं कांग्रेस ने 17 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 13 सीटों पर कामयाबी मिली थी.
भविष्य की राजनीति का रास्ता?
लेकिन विधानसभा चुनाव में संकेत बिल्कुल अलग दिख रहे हैं.
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव कांग्रेस और बीजेपी के लिए तो अहम है ही शिव सेना और एनसीपी के लिए भी महत्वपूर्ण है.
शिव सेना और एनसीपी दोनों बँट चुकी हैं. ऐसे में जिसकी जीत होगी, उसकी असली शिव सेना और एनसीपी पर दावेदारी मज़बूत होगी. उद्धव ठाकरे और शरद पवार की चुनौतियां बढ़ेंगी क्योंकि उन्हें ख़ुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए सोचना होगा.
महाराष्ट्र में बीजेपी की जीत से हिन्दुत्व की राजनीति पर बाल ठाकरे के परिवार की दावेदारी कमज़ोर होगी. यानी महाराष्ट्र में हिन्दुत्व की राजनीति पर शिव सेना से वैसी प्रतिद्वंद्विता नहीं मिलेगी.
मुंबई देश की आर्थिक राजधानी मानी जाती है और जिसकी वहाँ सरकार बनेगी, उसका आर्थिक राजधानी पर कंट्रोल होगा. राज्य में कांग्रेस की हार लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा के अलावा यह दूसरी सबसे बड़ी हार होगी.
इसी साल हुए लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी 240 सीटें हासिल कर पाई थी और उसके नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन पाई.
विश्लेषकों ने इस परिणाम को बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक झटके की तरह देखा था क्योंकि इसकी वजह से एनडीए के घटक दलों का महत्व काफ़ी बढ़ गया था.
इससे पहले 2014 और 2019 में बीजेपी ने केंद्र में अपने दम पर सरकार बनाई थी. इस बार बहुमत नहीं मिलने को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कम होती लोकप्रियता से जोड़ा गया था. लेकिन हरियाणा में जीत, जम्मू-कश्मीर में अच्छे प्रदर्शन के बाद महाराष्ट्र में जीत होती है तो ये कहना मुश्किल हो जाएगा कि पीएम मोदी की लोकप्रियता कम हो रही है.
झारखंड में जेएमएम और कांग्रेस की जीत उनके लिए राहत की बात होगी लेकिन महाराष्ट्र की तुलना में झारखंड का राष्ट्रीय राजनीति में दखल बहुत कम है. झारखंड बहुत छोटा राज्य है.
महाराष्ट्र में बीजेपी की जीत से एनडीए के भीतर बीजेपी का दबदबा और बढ़ेगा. ऐसे में सहयोगी पार्टियों का दख़ल एनडीए में कमज़ोर होगा.
अगले साल बिहार में विधानसभा चुनाव है और बीजेपी यहाँ भी नीतीश कुमार के साथ सीटों की साझेदारी में मन मुताबिक़ डील कर सकती है.
नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के भरोसे भले केंद्र में मोदी सरकार चल रही है लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी को मिल रही लगातार जीत से समीकरण बदलेगा. ऐसे में नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू मोदी सरकार से बहुत तोलमोल नहीं कर पाएंगे.
मोदी होंगे और मज़बूत
हरियाणा में पिछले दस सालों से बीजेपी सरकार थी और लगातार तीसरी बार भी जीत मिली. 10 सालों की सत्ता विरोधी लहर और राज्य में चल रहे कई सरकार विरोधी आंदोलनों के बावजूद बीजेपी तीसरी बार सत्ता में आई.
विश्लेषकों का मानना था कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बहुमत नहीं मिलने से विपक्ष मज़बूत होगा लेकिन उसके बाद हुए चुनावों में विपक्ष ऐसा कुछ कर नहीं पाया. अगर विपक्षी पार्टियां हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव जीत जातीं तो केंद्र की मोदी सरकार कमज़ोर होती और एनडीए के भीतर भी बीजेपी का दखल कम होता.
बीजेपी का मज़बूत होना न केवल विपक्षी पार्टियों के लिए निराशाजनक है बल्कि एनडीए के भीतर भी सहयोगी दलों को लिए बहुत अच्छी स्थिति नहीं होगी.
महाराष्ट्र में बीजेपी सबसे अधिक 149 सीटों पर चुनाव लड़ी है.
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने मोदी की लोकप्रियता और नीतियों के अधार पर ही चुनाव लड़ा था. यहाँ बीजेपी की सरकार बनने का मतलब इसे मोदी की ही जीत ही बताया जाएगा. ऐसे में बीजेपी के भीतर मोदी का कद और स्थायी होगा. लोकसभा चुनाव के बाद उनका प्रभाव क्षेत्र कमज़ोर पड़ने की बात कही जा रही थी.
महाराष्ट्र में बीजेपी बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और उसकी कोशिश होगी कि मुख्यमंत्री भी उनका ही हो.
कांग्रेस के लिए यह बहुत निराशाजनक होगा क्योंकि लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतने के बाद पार्टी को जो नई ऊर्जा मिली थी, वहां ठहराव की स्थिति आएगी. पार्टी को भविष्य की रणनीति पर फिर से विचार करना होगा और लोग नेतृत्व पर भी सवाल उठाएंगे.
दूसरी तरफ़, महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी को लगे झटके से एक बार फिर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व और ख़ासकर राहुल गांधी पर सवाल उठ सकते हैं. उनकी नेतृत्व क्षमता को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं.
हालांकि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव सभी पार्टियों ने मिलकर लड़ा है तो किसी एक के सिर ठीकरा फोड़ना भी मुश्किल हो सकता है.
ढाई महीने बाद ही दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. फ़रवरी 2025 में होने जा रहे इस चुनाव में तीन मुख्य पार्टियां मैदान में हैं.
हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच गठबंधन नहीं हो सका था और दिल्ली में भी ये गठबंधन नहीं होने जा रहा है.
महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे का असर दिल्ली विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है. हालांकि दिल्ली में आम आदमी पार्टी मज़बूत है और बाक़ी राज्यों से इसकी तुलना नहीं की जा सकती है.
हिन्दुत्व की राजनीति की जीत?
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान ही ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ नारा ख़ूब उछला जिसकी चर्चा ख़ासी रही.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस नारे को महाराष्ट्र विधानसभा में चुनाव प्रचार के दौरान ख़ूब इस्तेमाल किया था. ऐसा माना गया कि यह नारा हिंदू समुदाय की अलग-अलग जातियों को एक करने के लिए था.
इस नारे को लेकर जब विवाद पैदा हुआ तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान ही ‘एक हैं तो सेफ़ हैं’ नारा लेकर आए. इस नारे को भी हिंदू समुदाय को एकजुट करने के लिहाज़ से देखा गया.
बीजेपी ने महाराष्ट्र चुनाव के दौरान पूरी कोशिश की कि ये चुनाव जाति के आधार पर न बंटे. वहीं झारखंड में चुनाव के दौरान बीजेपी ने कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठाया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित