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उत्तराखंड: ढोल नहीं बजाने पर दलितों पर जुर्माना? पूरा मामला क्या है
- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
उत्तराखंड का जोशीमठ एक बार फिर चर्चा में है. पिछले साल तक ज़मीन धसने की वजह से सुर्ख़ियों में रहा यह क्षेत्र अब दलित परिवारों के सामाजिक बहिष्कार की वजह से ख़बरों में बना हुआ है.
कहा जा रहा है कि पूजा में ढोल बजाने से मना करने पर एक दलित व्यक्ति पर जुर्माना लगाया गया है.
हालांकि यहां दबदबा रखने वाली जाति के लोगों का कहना है कि शराब पीकर आने और माहौल खराब करने की वजह से जुर्माना लगाया गया था. उनका कहना है कि ऐसा करने वाले उन लोगों पर भी जुर्माना लगाया गया, जो दलित नहीं थे.
दलित परिवारों की ओर से शिकायत के बाद पुलिस ने इस मामले में 28 लोगों के ख़िलाफ़ नामज़द रिपोर्ट दर्ज कर ली है. जोशीमठ और आसपास के दलितों ने एक महापंचायत करके इंसाफ़ के लिए संघर्ष समिति का गठन किया है. उन्होंने एलान किया है कि अभियुक्तों को गिरफ़्तार नहीं किया गया, तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा.
ढोल नहीं बजाने पर जुर्माना?
जोशीमठ से करीब 35 किलोमीटर दूर है सुभाई ग्राम पंचायत. इसमें सुभाई और चांचड़ी दो गांव आते हैं. ग्राम पंचायत में कथित सवर्णों के करीब 150 और दलितों के 10 परिवार रहते हैं.
यह मामला शुरू हुआ था बैसाखी मेले से, जब अप्रैल में सुभाई के पंचायती चौक में पूजा का आयोजन किया गया था. इसमें दलित समुदाय के पुष्कर लाल ढोल बजाने पहुंचे थे लेकिन वो रातभर ढोल नहीं बजा पाए और पूजा अधूरी छोड़कर चले गए.
इस बारे में दलितों और दूसरे पक्ष के अपने-अपने दावे हैं.
पुष्कर लाल का कहना है कि उनकी तबीयत ख़राब हो गई थी और इसलिए वह पूजा में पूरी रात ढोल नहीं बजा पाए.
वहीं दूसरे पक्ष के जगरी (जो उत्तराखंड में देवताओं का आह्वान करने वाली पूजा करवाते हैं) सौरभ सिंह नेगी कहते हैं कि 'पुष्कर लाल शराब पीकर आए थे और गाली-गलौज कर रहे थे इसलिए लोग भड़क गए थे.'
इस मामले में दलितों की ओर से मुख्य शिकायतकर्ता और सुभाई गांव के पूर्व प्रधान रणजीत लाल कहते हैं कि 'पुष्कर लाल की तबीयत ख़राब हो गई थी और वो लोग उन्हें उठाकर ले गए थे.'
उनके शराब पीने की बात का रणजीत खंडन नहीं करते और कहते हैं कि 'किसी ने अगर अपने पैसे से शराब पी है और वह किसी से गाली-गलौज, बदतमीजी नहीं कर रहा तो क्या दिक्कत है?'
इसके अगले दिन सुभाई ग्राम सभा की पंचायत ने पुष्कर लाल पर 5000 रुपये का जुर्माना लगा दिया.
सौरभ कहते हैं कि जुर्माना ढोल नहीं बजाने की वजह से नहीं लगाया गया था, बल्कि शराब पीकर आने और माहौल ख़राब करने की वजह से लगाया गया था.
वह कहते हैं कि यह पहले से ही तय था और सिर्फ़ पुष्कर लाल पर ही नहीं, उनके पक्ष के कई और लोगों पर भी जुर्माना लगाया गया है, जिनमें उनके चाचा भी शामिल हैं. वह कहते हैं कि सवर्ण कही जाने वाली जातियों के लोगों से 60,000 रुपये का जुर्माना वसूला गया था.
रणजीत लाल कहते हैं कि पुष्कर लाल पर सिर्फ़ जुर्माना नहीं लगाया गया था, बल्कि उन्हें तड़ी पार भी कर दिया गया था. लेकिन दलित समाज उनके साथ खड़ा रहा. वो यह भी कहते हैं कि 17 दिन की पूजा को दलित समाज के ढोल बजाने वाले अन्य लोगों ने पूरा किया था.
उत्तराखंड के सामाजिक ढांचे में ढोल-दमाऊ बजाने का काम परंपरागत रूप से दलित समाज के लोग करते हैं. पूजा में इनके ढोल-दमाऊ की थाप पर ही देवता ‘प्रकट’ होते हैं. आमतौर पर इन्हें इस काम के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता है. माना जाता है कि यह इनका काम या सामाजिक दायित्व है.
सामाजिक बहिष्कार और एफ़आईआर
पुष्कर लाल के जुर्माना चुका देने के बाद एक तरह से इस मामले का पटापेक्ष हो गया था, लेकिन इस महीने यह मामला एक बार फिर बढ़ गया.
12 जुलाई से सुभाई गांव के पंचायती चौक में बगड़वाल नृत्य शुरू हुआ. इसमें शंकर लाल ढोल बजाने आए थे. पूजा के दौरान ही ढोल को एक महिला के सामने रख देने को लेकर विवाद शुरू हुआ जो बढ़ गया.
शंकर लाल का कहना है कि उन सभी को जातिसूचक गालियां दी गईं और ढोल बजाने से मना कर दिया गया.
रणजीत लाल कहते हैं कि उस समय दलित समाज के चार पुरुष और दो महिलाएं वहां मौजूद थीं. उन्होंने उन सभी को वहां से चलने के लिए कहा, क्योंकि उन्हें डर था कि मारपीट हो सकती है.
सौरभ इस कहानी का दूसरा वर्ज़न सुनाते हैं. वह कहते हैं कि 13 तारीख को शंकर लाल शराब पीकर आए थे और उन्होंने चौक में बैठकर लोगों को, देवताओं को गालियां दीं. इस पर बड़े-बुजुर्ग भड़क गए और उन्हें वहां से भगा दिया.
रणजीत लाल कहते हैं कि इसके बाद 14 जुलाई को सुभाई ग्राम पंचायत ने सभी दलितों पर पांच-पांच हज़ार रुपये जुर्माना लगा दिया. इसे नहीं देने पर पूर्ण सामाजिक बहिष्कार का फ़ैसला किया गया. इसके लिए उन्हें तीन दिन का समय दिया गया है.
इसके कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हैं.
लेकिन दलित समुदाय के लोगों ने अगले दिन ही पुलिस में शिकायत कर दी.
एसपी चमोली सर्वेश पंवार ने बीबीसी हिंदी को बताया कि ''16 तारीख को पुलिस को दलितों की ओर से सामाजिक बहिष्कार किए जाने की तहरीर मिली थी. तुरंत ही इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कर ली गई. 28 लोगों के ख़िलाफ़ नामजद मुक़दमा दर्ज किया गया है और जांच शुरू कर दी गई है.
वह कहते हैं कि शुरुआती जांच में मामला सही पाया गया है और इस मामले में कानून सम्मत कार्रवाई की जाएगी.
रणजीत सिंह ने एक हलफ़नामा दायर करके तीन और लोगों के नाम एफ़आईआर में जोड़ने का पुलिस से आग्रह किया है जिनमें सौरभ सिंह का नाम भी शामिल है. हालांकि ख़बर लिखे जाने तक इन लोगों के नाम एफ़आईआर में जोड़े नहीं गए थे.
महापंचायत और दूसरे पक्ष का 'डर'
महापंचायत में एक संघर्ष समिति का भी गठन किया गया. कांग्रेस के प्रदेश सचिव और पूर्व में पर्वतीय शिल्पकार सभा के ज़िलाध्यक्ष रहे मोहन बजवाल को इसका अध्यक्ष चुना गया.
बीबीसी से बातचीत करते हुए वह ज़ोर देकर कहते हैं कि यह पूरी तरह गैर राजनीतिक आयोजन था और इसमें सिर्फ़ एससी-एसटी समाज के लोग आए थे.
वह कहते हैं कि महासभा में कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, गोपेश्वर, श्रीनगर, थराली, देवप्रयाग, गैरसैंण सभी जगह से लोग आए थे. वह बताते हैं कि तय किया गया है कि अगर तीन-चार दिन में अभियुक्तों की गिरफ़्तारी नहीं होती है तो संघर्ष तेज़ किया जाएगा, चमोली ज़िला मुख्यालय में विशाल प्रदर्शन किया जाएगा.
उन्होंने ये भी कहा कि एससी-एसटी समाज के लोगों के ख़िलाफ़ शोषण की कोई भी कार्रवाई होती है तो संघर्ष-समिति उसका पुरज़ोर विरोध करेगी.
बजवाल पुलिस और प्रशासन की अभी तक की कार्रवाई पर संतोष जताते हैं और कहते हैं कि पुलिस ठीक काम कर रही है, उम्मीद है कि अभियुक्तों को जल्द ही गिरफ़्तार कर लिया जाएगा.
सौरभ सिंह कहते हैं, "उन लोगों को डर है कि पुलिस एकतरफ़ा कार्रवाई करेगी. वह कहते हैं कि मीडिया में भी उनकी बात को कोई नहीं दिखा रहा, बस एससी-एसटी वालों की ही बात कर रहे हैं."
सौरभ कहते हैं कि "इनका (एससी-एसटी) का कानून बड़ा ख़तरनाक है और लोगों को डर है कि उन्हें इसमें फंसा दिया जाएगा."
वह यह भी कहते हैं कि "बाहर से आए नेताओं ने मामले को बढ़ा दिया, आखिर पंचायत किस गांव में नहीं होती है. मिल-जुलकर मामले को सुलझा लेते लेकिन नेता भड़का रहे हैं."
सौरभ ने बीबीसी हिंदी से यह भी कहा कि "वह दलित पक्ष से समझौते की कोशिश कर रहे हैं, उनकी ग़लती होगी तो वह माफी मांग लेंगे. एक ही गांव में रहना है तो मिलजुल कर रहना चाहिए."
लेकिन दलित पक्ष अभी समझौते के लिए तैयार नहीं है. महापंचायत में अपनी बात रखते हुए शंकर लाल ने कहा कि उन्हें इंसाफ़ चाहिए.
बजवाल कहते हैं कि वह भीम आर्मी के संस्थापक और नगीना सांसद चंद्रशेखर आज़ाद से भी संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं. बजवाल के शब्दों में, “उनका आना अति आवश्यक है.”
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