सरबजीत सिंह की हत्या के अभियुक्त पर जानलेवा हमले का क्या है मामला

    • Author, मोहम्मद ज़ुबैर ख़ान
    • पदनाम, पत्रकार, बीबीसी उर्दू के लिए

अप्रैल 2013 में पाकिस्तान के लाहौर की एक जेल में भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह की हत्या कर दी गई थी.

सरबजीत सिंह पाकिस्तान में कथित जासूसी और बम धमाके के आरोप में सज़ा काट रहे थे, जब जेल के अंदर दो कैदियों ने सरबजीत पर जानलेवा हमला किया था. बाद में सरबजीत सिंह की अस्पताल में मौत हो गई थी.

सरबजीत सिंह पर हमला करने वाले दो कैदियों के नाम थे- आमिर सरफ़राज़ उर्फ़ तांबा और मुदस्सिर मुनीर.

रविवार को लाहौर में आमिर सरफ़राज़ पर जानलेवा हमला हुआ. आमिर सरफ़राज़ को ज़ख़्मी हालत में अस्पताल में भर्ती करवाया गया है.

पाकिस्तान में इस हमले का आरोप भारत पर लगाया जा रहा है.

पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नक़वी ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा किया है कि आमिर सरफ़राज़ पर हमले के मामले में मिले सबूत भारत के शामिल होने की ओर इशारा करते हैं.

मोहसिन नक़वी ने कहा, ''अतीत में भारत हत्या के कुछ मामलों में सीधे तौर पर शामिल रहा है. हमें शक है कि इस हमले में भारत शामिल था.''

मोहसिन बोले, ''फ़िलहाल जांच की जा रही है और अब तक मिले सबूत उसी ओर इशारा कर रहे हैं लेकिन मैं जांच रिपोर्ट आने से पहले कुछ नहीं कह सकता.''

भारत सरहद पार ऐसी हत्याओं के आरोपों को अतीत में ख़ारिज करता रहा है.

आमिर सरफ़राज़ के भाई ने इस मामले में एफ़आईआर दर्ज करवाई है.

1990 से पाकिस्तान की कैद में थे सरबजीत सिंह

सरबजीत सिंह साल 1990 में पाकिस्तान में जासूसी और बम धमाके करने के आरोप में गिरफ़्तार किए गए थे. 1990 से 2012 तक सरबजीत सिंह को रिहा करवाने की कई कोशिशें हुईं. मगर ये कोशिशें सफल नहीं हो सकीं.

सरबजीत सिंह को मौत की सज़ा सुनाई गई थी.

अप्रैल 2013 में लाहौर की कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह पर ईंट और धारदार हथियार से हमला किया गया था.

इस हमले में सरबजीत सिंह को गंभीर चोटें आईं और वे कोमा में चले गए. उनका लाहौर के जिन्ना अस्पताल में इलाज चल रहा था और इस दौरान ही उनकी मौत हो गई.

सरबजीत सिंह की हत्या का आरोप दो क़ैदियों आमिर सरफ़राज़ और उनके साथी मुदस्सिर मुनीर पर लगाया गया था. लाहौर की स्थानीय अदालत ने इन दोनों अभियुक्तों को साल 2018 में गवाही के अभाव में बरी कर दिया था.

सरबजीत की हत्या की घटना ने भारत और पाकिस्तान के संबंधों में तनाव काफ़ी बढ़ा दिया था.

आमिर सरफ़राज़ के भाई जुनैद सरफ़राज़ की ओर से दर्ज एफ़आईआर के मुताबिक़, जब हमला हुआ तब आमिर घर पर ही थे.

जुनैद सरफ़राज़ ने कहा, ''मैं नीचे वाले हिस्से में था और बाहर से ऊपर वाले हिस्से का दरवाज़ा खुला हुआ था. दो अज्ञात मोटर साइकिल सवार आए. एक ने हेलमेट पहन रखा था और दूसरे ने मास्क लगा रखा था. दोनों ऊपर वाले हिस्से में गए और आमिर सरफ़राज़ पर तीन गोलियां चलाईं.''

मुक़दमा दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारी सज्जाद हुसैन ने बीबीसी को फ़ोन पर बताया कि वह घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे इसलिए उन्हें आमिर सरफ़राज़ की स्थिति के बारे में जानकारी नहीं है.

थाना इस्लामपुरा के एक अन्य अधिकारी ने बीबीसी से कहा कि उन्हें इस बारे में और जानकारी नहीं है.

भारत पर पहले भी लगे हैं आरोप

यह पहली बार नहीं है, जब पाकिस्तान में किसी वारदात का आरोप भारत पर लगाया जा रहा है.

पिछले दो सालों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं जिनमें पाकिस्तान में चरमपंथियों की रहस्यमय ढंग से हत्या की गई.

मारे गए लोग जिन संगठनों से संबंध रखते थे, वो इन हत्याओं का आरोप भारत पर लगाते रहे हैं.

ब्रिटेन के समाचार पत्र द गार्डियन ने हाल की अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है कि भारत 'विदेशी धरती पर रहने वाले देश विरोधी तत्वों' को ख़त्म करने की एक व्यापक रणनीति पर चल रहा है.

'द गार्डियन' के अनुसार इस सिलसिले में भारत ने साल 2020 से अब तक पाकिस्तान में कई कार्रवाई की हैं.

इस रिपोर्ट के बारे में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से जब एक इंटरव्यू के दौरान पूछा गया तो उन्होंने इस बात की पुष्टि या इसका खंडन नहीं किया.

राजनाथ सिंह ने ये ज़रूर कहा, ''अगर किसी पड़ोसी देश से कोई आतंकवादी भारत को परेशान करने या यहां आतंकवादी कार्रवाई करने की कोशिश करता है तो उसे उचित जवाब दिया जाएगा.''

आमिर सरफ़राज़ उर्फ़ तांबा कौन हैं?

आमिर सरफ़राज़ का नाम उस समय पाकिस्तान के मीडिया में आया था, जब सरबजीत सिंह की हत्या हुई थी.

पाकिस्तान की सरकारी एजेंसियों का दावा था कि उन्होंने सरबजीत सिंह को साल 1990 में उस समय गिरफ़्तार किया था, जब वह लाहौर और दूसरे इलाक़ों में बम धमाके करने के बाद वाघा बॉर्डर के रास्ते भारत भागने की कोशिश कर रहे थे.

पाकिस्तानी अधिकारियों के मुताबिक़, पूछताछ के दौरान सरबजीत सिंह ने धमाके की साज़िश में शामिल होने की बात क़बूल की थी, जिसके बाद आतंकवाद निरोधी अदालत ने उन्हें 1991 में मौत की सज़ा सुनाई थी.

सरबजीत का कहना था कि वे भारतीय पंजाब के तरन तारन के निवासी हैं और पेशे से किसान हैं. उनका कहना था कि वे गलती से सीमा पार कर पाकिस्तान पहुंच गए थे.

सरबजीत सिंह को मौत की सज़ा सुनाने के अदालती फ़ैसले को पहले लाहौर हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरक़रार रखा था.

सरबजीत के घर वालों ने उनकी माफ़ी के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के पास आवेदन दिया था, जिसे उन्होंने रद्द कर दिया था. इसके बाद उन्हें मई 2008 में फांसी दी जानी थी लेकिन तीन मई को पाकिस्तान सरकार ने उस फांसी को अस्थाई तौर पर रोक दिया था.

पत्रकार माजिद निज़ामी के अनुसार, ''उस समय आमिर सरफ़राज़ और मुदस्सिर मुनीर को हत्या और डकैती के मुक़दमों में स्थानीय अदालत की ओर से मौत की सज़ा सुनाई गई थी. वो दोनों जेल में अपनी सज़ा काट रहे थे और उनका मामला ऊपरी अदालतों में चल रहा था.''

माजिद निज़ामी बोले, ''सरबजीत सिंह की हत्या के बारे में उस समय के अधिकारियों ने बताया था कि दो क़ैदियों ने खाना खाते हुए सरबजीत सिंह को ब्लेड और ईंटों से वार कर घायल कर दिया था. इस हमले के बाद सरबजीत को अस्पताल पहुंचाया गया लेकिन उन्होंने वहां दम तोड़ दिया था. ''

माजिद निज़ामी ने कहा कि इसके बाद आमिर सरफ़राज़ और मुदस्सिर मुनीर पर मुक़दमा चला, मगर इस केस में उनको इस आधार पर बरी कर दिया गया कि कोई गवाह मौजूद नहीं और जिस हथियार से हत्या की गई, वह भी नहीं मिल सका.

भारतीय जेल में पाकिस्तान के सनाउल्लाह की हत्या

माजिद निज़ामी के अनुसार, ''इस दौरान भारतीय जेल में भी एक ऐसी ही घटना हुई थी जिसमें एक पाकिस्तानी नागरिक सनाउल्लाह की जेल में हत्या कर दी गई थी और बाद में इस हत्या के मुलज़िम को बरी कर दिया गया था.''

सनाउल्लाह को पाकिस्तान के सियालकोट का बताया जाता रहा है.

माजिद निज़ामी कहते हैं, ''इस दौरान आमिर सरफ़राज़ पर दूसरी हत्या, डकैती और ड्रग्स के मुक़दमे चलते रहे. उनकी ओर से मौत की सज़ा के ख़िलाफ़ ऊपरी अदालत में अपील की गई और फ़ैसला उनके पक्ष में हुआ. वह कुछ समय पहले रिहा होकर जेल से बाहर आ गए थे.''

उनका कहना था कि जेल से रिहाई के बाद आमिर सरफ़राज़ को क्षेत्र में ज़्यादा मज़बूत और प्रभावी समझा जाने लगा.

बीबीसी को पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, रिहाई के बाद उन पर चार अलग-अलग मुक़दमे लाहौर के चार थानों में दर्ज हुए. यह मुक़दमे हत्या के प्रयास, धमकियों, पुलिस को धमकी और हिंसा के थे.

जेल से रिहा होने के बाद आमिर सरफ़राज़

एक पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि रिहाई के बाद आमिर सरफ़राज़ को संभालना मुश्किल था. उस पर जो मुक़दमे दर्ज हुए थे, वह उनमें गिरफ़्तारी के बाद ज़मानत ले लेता.

पत्रकार फ़ैज़ुल्लाह के अनुसार, आमिर सरफ़राज़ पर होने वाला हमला इससे पहले हुए उन हमलों से अलग था, जिनमें ग़ैर क़ानूनी करार दिए संगठनों के सदस्य मारे गए थे.

उन्होंने कहा कि उन हमलों में देखा गया कि वह हत्या सुरक्षित ढंग से किए गए यानी ज़्यादातर हत्या मस्जिदों में नमाज़ पढ़ते हुए किए गए थे या घर के बाहर सुरक्षित ढंग से.

उनका कहना था कि आमिर सरफ़राज़ पर घर में घुसकर जानलेवा हमला किया गया, जो बड़ी वारदात है.

वो बोले, ''इस वारदात का तरीक़ा गैंगवार में होने वाली वारदातों से मिलता है, जिसमें मुलज़िम कोई परवाह किए बिना वारदात करते हैं. ऐसे मामलों में उस जगह पर हमला किया जाता है, जहां पर वह ख़ुद को बहुत सुरक्षित समझ रहा होता है.''

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