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भारतीय सरहद के पास म्यांमार के शहर पर विद्रोहियों ने किया कब्ज़े का दावा, क्या बढ़ेगी चिंता
- Author, जोनाथन हेड और ओलिवर स्लो
- पदनाम, साउथ ईस्ट एशिया संवाददाता, बैंकॉक और लंदन से
पश्चिमी म्यांमार में विद्रोहियों का कहना है कि उन्होंने सेना से एक अहम शहर पालेतवा को अपने कब्ज़े में ले लिया है.
ये शहर भारत-म्यांमार के अहम रास्तों में से एक में स्थित है और भारतीय सरहद के क़रीब है.
बीते साल अक्तूबर से सेना के ख़िलाफ़ जातीय विद्रोहियों के हमले बढ़े हैं.
विद्रोहियों के तीन समूहों में से एकअराकान आर्मी यानी एए है. इस समूह का कहना है कि उसने चिन स्टेट के पालेतवा शहर को अपने नियंत्रण में ले लिया है.
इस समूह ने टेलीग्राम चैनल पर बताया कि पूरे शहर में सेना का एक काउंसिल कैंप नहीं बचा है.
म्यांमार की सेना ने अब तक इस मामले में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
म्यांमार में सेना ने फ़रवरी 2021 में लोकतांत्रिक सरकार को हटाकर सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया था. तब से ही म्यांमार में गृह युद्ध चल रहा है जिसकी वजह से लाखों लोग विस्थापित भी हुए हैं.
भारतीय सरहद से पास है पालेतवा
पालेतवा भारत और बांग्लादेश की सरहद के पास है. ऐसे में इस नई हलचल पर भारत की भी नज़र रहेगी.
इस शहर में करोड़ों डॉलर का एक विकास प्रोजेक्ट चल रहा है, जिसको भारत का समर्थन प्राप्त है. इस प्रोजेक्ट के तहत सुदूर क्षेत्रों तक कनेक्टिविटी को बेहतर किया जाना है.
मई 2023 में भारत के बंदरगाह, नौवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल और म्यांमार के उप-प्रधानमंत्री एडमिरल टिन आंग सान ने एक साथ कलादान परियोजना के तहत एक नए सितवे बंदरगाह का उद्घाटन किया था.
सर्बानंद सोनोवाल ने वहां पहुँचने वाले पहले भारतीय मालवाहक जहाज़ का भी स्वागत किया था, जिसने कोलकाता के श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह से अपनी यात्रा शुरू की थी.
कलादान मल्टीमॉडल परियोजना कोलकाता बंदरगाह को समंदर के ज़रिए म्यांमार के सितवे बंदरगाह से जोड़ती है.
इसका फ़ायदा ये था कि सितवे बंदरगाह से पालेतवा नदी के ज़रिए कलादान, पालेतवा को भारत की सीमा तक और म्यांमार को सड़क के रास्ते से लांगतलाई, मिज़ोरम तक जोड़ देती है.
विद्रोहियों की मज़बूत होती पकड़
एए विद्रोहियों का नया समूह है लेकिन इसके पास अच्छी ख़ासी संख्या में हथियार हैं. म्यांमार में कई हथियारबंद जातीय समूह सेना से लड़ रहे हैं.
ये समूह रखाइन, चिन जैसे राज्यों में अपनी पकड़ मज़बूत भी कर रहे हैं.
2021 में सेना के सत्ता संभालने से पहले ही एए के लड़ाकों ने रखाइन में अपनी स्थिति मज़बूत कर ली थी. दो साल पहले इन समूहों का दावा था कि ये राज्य के 60 फ़ीसदी हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं.
2021 में तख़्तापलट के दौरान सीजफायर हुआ था और सेना इन विद्रोहियों से टकराने से बच रही थी ताकि वो अपना ध्यान तख़्तापलट का विरोध करने वालों पर केंद्रित कर सके.
हालांकि बीते साल अक्तूबर में एए ने एलान किया कि वो ब्रदरहुड गठबंधन के तहत सेना के ख़िलाफ़ संघर्ष में शामिल हो रही है.
इसके बाद इन एए ने सेना पर लगातार कई हमले किए थे.
बीते 11 हफ़्तों में इन विद्रोहियों के गठबंधन के सामने म्यांमार की सेना को चीनी सरहद के पास अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा है.
2020 में 42 दिन की लड़ाई
बीते शनिवार को एए ने पालेतवा शहर के आख़िरी सैन्य चौकी मीवा पर भी नियंत्रण पा लिया.
2020 में भी एए ने ऐसी कोशिशें की थीं लेकिन 42 दिनों की लड़ाई के बाद वो इस जगह को हासिल नहीं कर पाया था.
इस शहर पर नियंत्रण हासिल करने से विद्रोहियों के पास अब कलादान का भी नियंत्रण आ गया है. ऐसा होने से इन विद्रोहियों के पास अब भारतीय सरहद तक सड़क और जल यातायात पर भी नियंत्रण है.
इन विद्रोहियों के पास अब एक अपना बेस है, जहाँ से ये रखाइन प्रांत पर हमले की योजना बना सकते हैं.
रखाइन प्रांत के किसी भी और शहर को खोना अब म्यांमार की सेना के लिए बड़ा नुकसान होगा.
ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि सेना इन विद्रोहियों से निपटने के लिए एयर स्ट्राइक, हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल कर सकती है.
सेना की कोशिश होगी कि कायोक्टवा पर एए नियंत्रण ना पा सके, क्योंकि ये उस मुख्य रास्ते पर है जो रखाइन की राजधानी सितवे को पूरे म्यांमार से जोड़ता है.
हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि एए का अगला क़दम क्या होगा. एए की कोशिश होगी कि वो अपनी बढ़त को बनाए रखे और आगे होने वाले नुक़सान को कम कर सके.
विद्रोहियों का अघोषित लक्ष्य ये होगा कि संघीय ढाँचे में किसी तरह की स्वायत्तता या स्वतंत्रता हासिल की जाए. हालाँकि ऐसा लगता है कि विद्रोहियों के नेतृत्व ने ये फ़ैसला किया है कि सैन्य शासन की बजाय नई चुनी हुई सरकार के तहत ऐसा किया जाए.
पालेतवा पर विद्रोहियों के कब्ज़े के बाद सवाल ये है कि म्यांमार की सेना अपने मनोबल को हासिल कर पाएगी और सैनिकों को विपक्ष से लड़ते रहने के लिए मना पाएगी?
भारत के लिए चिंता की बात क्यों है?
विद्रोहियों ने जिस शहर पर कब्ज़ा किया है वो भारत के पास है.
भारत के मिज़ोरम प्रांत और म्यांमार के चिन प्रांत के बीच 510 किलोमीटर लंबी सीमा है.
हालाँकि दोनों तरफ़ के लोग आसानी से इधर-उधर जा सकते हैं. दोनों ही तरफ़ 25 किलोमीटर तक जाने पर पाबंदी नहीं है.
बीते साल नवंबर में भी भारत-म्यांमार सीमा के क़रीब म्यांमार सेना और सैन्य शासन का विरोध कर रहे बलों के बीच तेज़ हुई झड़पों के बीच क़रीब पाँच हज़ार विस्थापित लोग म्यांमार से मिज़ोरम पहुँचे थे.
म्यांमार सेना के 45 जवानों ने भी तब मिज़ोरम पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था.
म्यांमार में सैन्य तख़्तापलट के बाद सेना और विद्रोहियों के बीच हिंसा में फँसे लोग बड़ी तादाद में भारत पहुँचे हैं.
मार्च 2022 तक के आँकड़ों के अनुसार, मिज़ोरम की राजधानी आइज़ॉल और अन्य ज़िलों में म्यांमार से आए क़रीब 31500 शरणार्थी रह रहे थे. ये सभी चिन प्रांत से आए थे.
अब जिस शहर पालेतवापर विद्रोहियों ने कब्ज़ा किया है, वो इसी चिन प्रांत का है.
(टीम बीबीसी हिंदी के इनपुट्स के साथ)
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