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म्यांमार तख़्तापलट से भारत को नुक़सान होगा या फायदा?
म्यांमार की सेना ने सोमवार सुबह देश की सर्वोच्च नेता आंग सान सू ची समेत उनकी सरकार के बड़े नेताओं को गिरफ़्तार करके तख़्तापलट कर दिया है.
म्यांमार की राजधानी नेपिडॉ और यंगून में सड़कों पर सैनिक तैनात हैं. कई अंतरराष्ट्रीय टीवी चैनलों का प्रसारण प्रभावित हुआ है और माहौल में एक तरह की अनिश्चतता का माहौल है.
इसी बीच अमेरिका, ब्रिटेन और संयुक्त राष्ट्र की ओर से म्यांमार की सेना की निंदा की गई है.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने ट्वीट करके कहा है, "मैं म्यांमार में तख़्तापलट और आंग सान सू ची समेत आम नागरिकों की गिरफ़्तारी की निंदा करता हूं. लोगों के मत का सम्मान किया जाना चाहिए और आम लोगों के नेताओं को रिहा किया जाना चाहिए."
वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने म्यांमार पर नए प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है.
लेकिन जहां एक ओर वैश्विक शक्तियां म्यांमार सेना पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दे रही हैं. वहीं, भारत की ओर से इस घटना पर काफ़ी सधी हुई टिप्पणी की गई है.
भारत सरकार की ओर से इस घटनाक्रम पर बेहद सधे शब्दों में बयान जारी किया है जिसमें सेना की निंदा नहीं की गई है. भारत के विदेश मंत्रालय ने म्यांमार की स्थिति पर 'गहरी चिंता' जताते हुए कहा है कि वो 'स्थिति पर नज़र रख रहा है'.
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि "म्यांमार का घटनाक्रम चिंताजनक है. म्यांमार में लोकतांत्रिक परिवर्तन की प्रक्रिया में भारत ने हमेशा अपना समर्थन दिया है. हमारा मानना है कि क़ानून का शासन और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बरकरार रखना चाहिए. हम स्थिति पर नज़र रख रहे हैं."
सोमवार सुबह तख़्तापलट की ख़बरें आने के बाद से एक सवाल खड़ा हुआ है कि दक्षिण एशिया में हुए इस घटनाक्रम का भारत पर क्या असर पड़ेगा.
बीबीसी संवाददाता सारिका सिंह ने म्यांमार में भारत के राजदूत रहे जी. पार्थसारथी से बात करके इस विषय को समझने की कोशिश की है.
लोकतांत्रिक मूल्यों से ज़्यादा अहम सुरक्षा?
जी. पार्थसारथी मानते हैं कि म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार से लेकर सेना तक सभी भारत से अच्छे रिश्ते रखना चाहते हैं.
वे कहते हैं, "भारत और म्यांमार के बीच 1,640 किलोमीटर की सीमा है. इस सीमा पर ऐसे कई कबाइली समूह हैं जो कि अलगाववादी हैं. ये म्यांमार की सरकार और भारत सरकार के ख़िलाफ़ रहते हैं. इनमें से कुछ गुटों को चीन का समर्थन भी है."
"क्योंकि भौगोलिक स्तर पर यहां एक त्रिकोण बनता है, भारत, म्यांमार और चीन का. अराकन सेना, काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी समेत 26 ऐसे और गुट हैं जो यहां लोगों को परेशान करते हैं. ये अलगाववादी गुटों से मिलते-जुलते गुट हैं. चीन इन गुटों को प्रोत्साहन देता है. ऐसे में वहां चाहें सैनिक सरकार हो या चुनी हुई सरकार हो, उसके साथ हमारे रिश्ते ठीक रहते हैं. हम म्यांमार के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देते हैं."
"चीन चाहता है कि वहां एक सरकार हो जो कि उसके राष्ट्रहितों को देखे, वह चाहता है कि उसे म्यांमार के पास बंगाल की खाड़ी तक हमारी सागरीय सीमा तक आने दिया जाए."
"हम आंग सान सू ची का समर्थन करते हैं. लेकिन इससे पहले हमारे अपने राष्ट्रीय हित हैं जो कि हमारे लिए ज़रूरी हैं. हमारे अंतरराष्ट्रीय हित इसमें है कि इन अलगाववादी समूहों को खुली छूट न दी जाए. क्योंकि इसका हमारी सीमा पर असर पड़ेगा. ऐसे में दिल्ली में कोई भी सरकार हो, वह उनके अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देती है. लेकिन जब कभी निजी तौर पर बातचीत होती है तब हम ज़रूर कहते हैं कि यह उनके ही राष्ट्रीय हित में होगा अगर उनके यहां लोकतांत्रिक सरकार आए."
चीन के तरफ़ झुकाव का ख़तरा
भारत की तरह चीन की ओर से भी इस तख़्तापलट को लेकर आक्रामक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
जी. पार्थसारथी बताते हैं, "चीन चाहता है कि वहां एक ऐसी सरकार हो जो कि उसके राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखे. चीन एक सैन्य सरकार चाहता है. चीन चाहता है कि वह म्यांमार के रास्ते से बंगाल की खाड़ी तक पहुंचे. ऐसे में हमें इन चीजों का ध्यान रखना चाहिए और हम ध्यान रखते भी हैं. हमारे रिश्ते म्यांमार के साथ बहुत अच्छे रहे हैं."
"इतने अच्छे हैं कि हमने उनकी नौसेना को एक पनडुब्बी भी दी है. जब ज़रूरी पड़ती है तब सैन्य सहायता भी दी है. हमारे लिए उनकी एकता सर्वप्रथम है."
पार्थसारथी मानते हैं कि सू ची के प्रति भारत सरकार अपना समर्थन बनाए रखेगी लेकिन म्यांमार के साथ रिश्ते ख़राब करने के बारे में वो नहीं सोचेगी.
वे कहते हैं, "जब मैं राजदूत था तब हमने सैन्य प्रतिनिधियों से बात करके सू ची की रिहाई को लेकर कई बार बात की. लेकिन हम इन बातों को सार्वजनिक नहीं बनाते हैं. हम नहीं चाहते हैं कि किसी भी सरकार के साथ वहां हमारे संबंध बिगड़े हुए रहें. क्योंकि हमारे राष्ट्रीय हित एक दूसरे से मिलते हैं."
अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करने वाली वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर ने द हिंदू में इस मुद्दे पर प्रकाशित एक लेख में बताया है कि अगर भारत की ओर से भी वैसा ही रिएक्शन आता है जैसा कि अमेरिकी सरकार ने दिया है तो इससे म्यांमार सेना के चीन की तरफ झुकने का ख़तरा पैदा हो जाता है.
अपने लेख में वह लिखती हैं कि रणनीतिक चिंताओं से आगे बढ़कर भारत म्यांमार के साथ मिलकर विकास के कार्यों से जुड़ी कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है. इनमें इंडिया म्यांमार थाइलैंड ट्राइलैटरल हाइवे और कालादन मल्टीमॉडल ट्रांज़िट ट्रांसपोर्ट नेटवर्क के साथ-साथ सिट्वे डीप वॉटर पोर्ट पर विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने की कार्ययोजना शामिल है.
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