'भारत-पाकिस्तान टकराव बड़ा व्यापार है, सब माल इसके नाम पर बेच दो': ब्लॉग

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    • Author, मोहम्मद हनीफ़
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक

भारत-पाकिस्तान का मैच होगा तो तनाव तो होगा ही और अगर मैच वर्ल्ड कप में हो तो टेंशन अधिक होगी.

जब मैच भारत में हो तो ऐसा लगता है कि महायुद्ध शुरू हो गया है.

भले ही क्रिकेट के जानकार हमें समझाते रहे हों कि पाकिस्तान विश्व कप में भारत से कभी भी नहीं जीता है. पर फिर भी शौकीनों को रात को नींद नहीं आती .

जो मैच हुआ उसे देखने के लिए डेढ़ अरब लोग टीवी के सामने बैठे थे और स्टेडियम में भी सवा लाख लोग मौजूद थे.

इन सवा लाख लोगों में सिर्फ ढाई या तीन ही पाकिस्तानी होंगे, वो भी ऐसे लोग होंगे जिनकी लॉटरी निकल आई और अंत में उन्हें भारत का वीज़ा मिल गया.

पाकिस्तान-भारत का एक मैच स्टेडियम के बाहर भी होता है. ये मैच टॉस से पहले ही शुरू हो जाता है और पाकिस्तान के हारने पर भी ख़त्म नहीं होता है.

यह मैच होता है लतीफ़ों का, परेशान करने का, एक दूसरे को चिढ़ाने का, किसी पुरानी जीत की स्मृति का, किसी अविस्मरणीय हार का.

भारत-पाकिस्तान के नागरिकों के मिलने पर इतने सारे प्रतिबंध हैं, मुझे संदेह है कि बहुत से लोग यह देखने के लिए मैच देखते हैं कि जब 11 पाकिस्तानी और 11 भारतीय मिलेंगे तो क्या तमाशा होगा.

किसने किससे हाथ मिलाया, किसने गले लगाया, किसने थपथपाया, कौन हंसा और किसने घूरकर देखा.

पाकिस्तान के गेंदबाज शाहिद अफरीदी ने भारतीय गेंदबाज जसप्रीत बुमराह के पिता बनने पर एक छोटा सा तोहफा दिया.

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क्रिकेट खेल के साथ व्यापार भी

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क्रिकेट खेल के साथ-साथ एक व्यापार भी है और जाहिर सी बात है कि भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता सबसे बड़ा व्यवसाय है. जो भी माल बेचना है इसके नाम पर बेच दो.

भारत में एक पूरे पेज का विज्ञापन छपा, जिसमें कहा गया था कि 'पाकिस्तानियों आपने हारना ही है लेकिन आप जितनी बुरी तरह से हारोगे हम आप को उतनी बड़ी छूट देंगे.'

हर मैच से पहले कुछ अंदाज़े लगाए जाते हैं और लगने भी चाहिए. पाकिस्तान लंबे समय से 'मौका-मौका' के विज्ञापन देख रहा है और आंनद भी ले रहा है, लेकिन पाकिस्तानियों को हारने पर मिलने वाली छूट कि बात कुछ लोगों को ज्यादा अच्छी नहीं लगी है.

कुछ ने कहा, "इस बैड टेस्ट पर मेहमानों के साथ ऐसा नहीं किया जाना चाहिए." किस्से पर हंसी तो आती है, लेकिन किस्से के भीतर का किस्सा जो कि न ही डिस्काउंट देने वालों को समझ आया और न ही उस पर आपत्ति जताने वाले को.

वो ये था कि किस मेहमान पर कौन सा बैड टेस्ट, भारत सरकार ने तो किसी भी पाकिस्तानी को वीज़ा नहीं दिया है. न ही कोई कारण बताया और न ही कोई समझ आई.

दो-चार सौ-हजार पाकिस्तानी झंडों के साथ अगर नरेंद्र मोदी स्टेडियम में पहुंच जाते तो उन्होंने कौन सी पाकिस्तान की ओर से शतक (सैकड़ा) लगा देने थे, या फिर कैच पकड़ लेना था.

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'भ्रम ये कि वर्ल्ड कप भी हमारा है'

जीतने वालों को भी अधिक मज़ा आता कि वे हारने वालों को सामने बिठा कर शोर मचाते, वाहवाही करते, पर यहां मामला डिस्काउंट पर फंस गया.

बात यहीं तक नहीं रुकी और विज्ञापन देने वालों ने कहा कि 'हमने विज्ञापन दिया ही नहीं है. हम इतने बड़े देशभक्त हैं कि किसी पाकिस्तानी को अपनी संपत्ति में घुसने ही न दें.'

जैसा कि लाहौर के भाई कहते हैं, 'गुड हो गया’.

पहले भारत के बारे में कहा जाता था कि यह इतना बड़ा देश है, यहां कई मज़हब हैं, लेकिन सबसे बड़ा धर्म क्रिकेट है. अब धर्म भी कोई धर्म नहीं.

मैच में नारे सुनकर तो यही लगता है कि द्रोह ही सबसे बड़ा धर्म है. भारतीय टीम भी मजबूत है और भारतीय क्रिकेट बोर्ड सबसे मजबूत है.

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'दूसरी टीमें भी खेलने आई हैं, डिस्काउंट लेने नहीं'

लेकिन जिस तरह से विश्व कप चल रहा है, उससे मुझे बचपन के क्रिकेट की याद आ जाती है.

आपने भी गली-मोहल्ले में क्रिकेट खेला होगा, एक थोड़ा सा सुंदर, थोड़ा सा अमीर लड़का होता है.

बैट-बॉल और विकेट वह लेकर आता है. कहता है कि पहले मैं बारी लूंगा, अगर वह आउट हो जाता है तो मानता ही नहीं और जब बारी देने की बारी आती है तो वह बैट-बॉल और विकेट लेकर घर चला जाता है और कहता है कि अब खेल कर दिखाओ.

बैट-बॉल भी भारत का, स्टेडियम भी भारत का, इसके साथ भ्रम भी कि वर्ल्ड कप भी हमारा है.

लेकिन दूसरी टीमें भी खेलने आई हैं, डिस्काउंट लेने नहीं आईं हैं.

अफगानिस्तान ने क्रिकेट के माँ-बाप इंग्लैंड को हरा दिया है. बाकी मैच देखें, आनंद लें. बाकी धर्म भी यहीं और भ्रम भी यहीं.

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