थाईलैंड में समलैंगिक और मुस्लिम होने की चुनौती कितनी बड़ी है

थाईलैंड ने समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने की ओर क़दम बढ़ाए हैं. इस क़दम को ऐतिहासिक बदलाव के नज़रिए से देखा जा रहा है.

देश भर के एलजीबीटीक्यू प्लस समुदाय के लोगों ने सरकार के इस क़दम का स्वागत करते हुए बीबीसी से कहा है कि अभी लंबा सफ़र तय करना बाक़ी है.

दक्षिण थाईलैंड के याला शहर के समलैंगिकर शख़्स अलिफ़ ने बीबीसी हिंदी को बताया, “मैं विधेयक का समर्थन करता हूं, मेरा भी परिवार हो जाएगा. तब मैं बाहर निकल कर कहीं और रहूंगा.”

आलिफ़ के समलैंगिक होने की जानकारी उनके परिवार के करीबी लोगों को है लेकिन आलिफ़ ने अपने समलैंगिक मित्र से उन्हें अब तक नहीं मिलवाया है.

वे यह भी स्वीकार करते हैं कि अपनी सेक्सुअलिटी को लेकर उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए उन्होंने अपनी वास्तविक पहचान ज़ाहिर नहीं करने का अनुरोध किया है.

25 साल के आलिफ़ थाईलैंड के चार दक्षिणी प्रांत में से एक में रहते हैं, जहां अधिकांश आबादी मुस्लिम है.

थाईलैंड के दक्षिणी हिस्से के कामकाज, एक मुस्लिम नेता के हवाले है. यहां की अधिकांश आबादी मलय मुस्लिम है. यह हिस्सा 20वीं शताब्दी की शुरुआत से थाईलैंड में शामिल हुआ. थाईलैंड में इन दिनों बौद्ध धर्म के मानने वाले लोग ज़्यादा हैं.

आलिफ़ के मुताबिक वह किसी आम मुसलमान की भांति ही व्यवहार करता है, कपड़े पहनता है, बात करता है. लेकिन उसे इस बात की चिंता है कि सेक्सुअलिटी का पता चलने पर समुदाय उसकी उपेक्षा कर सकता है.

यह स्थिति तब है जब थाईलैंड की निचले सदन ने हाल ही में समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने संबंधी विधेयक पारित किया है. अभी इस विधेयक का सीनेट से पारित होना बाक़ी है. इसके अलावा शाही परिवार की अनुमति मिलने के बाद ही यह क़ानून के तौर पर लागू हो सकेगा.

थाई मुसलमानों की दुविधा

हालांकि मोटे तौर पर यही अनुमान है कि 2024 के अंत तक यह क़ानून का रूप ले लेगा. ऐसा होने की सूरत में थाईलैंड, समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने वाला इकलौता दक्षिण पूर्व एशियाई देश होगा.

समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने वाली निचले सदन की समिति में शामिल नैयना सुपापुंग ने बीबीसी को बताया कि भले ही नया क़ानून मुसलमानों को समलैंगिक विवाह करने का अधिकार देगा, लेकिन वह आने वाले दिनों को लेकर एक शंका भी जताती हैं, "कोई मुसलमान शायद ही इस्लामी रिवाज़ों के मुताबिक निकाह नहीं करना चाहेगा."

आलिफ़ को नहीं लगता है कि जिस इलाके में रहते हैं, वहां के लोग समलैंगिक विवाह का स्वागत करेंगे. वे कहते हैं, “मस्जिद में जुमे की नमाज के बाद मैंने लोगों को एलजीबीटीक्यू प्लस के लोगों की तुलना जानवरों से करते हुए सुना है, इस तरह की हेट स्पीच सुनकर मैं हैरान रह गया था.”

नए क़ानून से संबंधित विधेयक को निचली सदन के कुल 415 में से 400 सांसदों ने पारित किया. इस विधेयक के मुताबिक विवाह एक पुरुष और महिला के बजाय दो व्यक्तियों के बीच साझेदारी है. इसके चलते एलजीबीटीक्यू+ जोड़ों को भी विवाह का अधिकार मिल जाएगा. इससे वे वैवाहिक कर में बचत हासिल कर पाएंगे. इसके अलावा विरासत में मिली संपत्ति पर भी उनका अधिकारी होगा. अक्षम पार्टनरों केलिए चिकित्सा के लिए सहमति देने का अधिकार भी समलैंगिक पार्टनर को मिलेगा.

प्रस्तावित क़ानून के तहत विवाहित समलैंगिक जोड़े भी बच्चों को गोद ले सकते हैं. हालाँकि, निचले सदन ने "पिता और माता" के बजाय पैरेंट्स शब्द का उपयोग करने के समिति के सुझाव को नहीं माना है.

थाईलैंड में पहले से ही ऐसे क़ानून हैं जो लिंग पहचान और यौन रुझानों के आधार पर भेदभाव पर प्रतिबंध लगाते हैं और इसलिए, इसे एलजीबीटीक्यू+ समुदाय केलिए एशिया के सबसे मित्रवत देशों में गिना जाता है.

लेकिन समलैंगिक जोड़ों के विवाह को क़ानूनी मान्यता देने में कई साल लग गए हैं. व्यापक जनसमर्थन के बावजूद समलैंगिक विवाह को वैधता देने की पिछली कई कोशिशें कामयाब नहीं हुईं. पिछले साल के अंत में हुए एक सरकारी सर्वेक्षण से पता चला कि सर्वेक्षण में शामिल 96.6% लोग विधेयक के पक्ष में थे.

समानता की शुरुआत पर...

नए क़ानून के लागू होने के बाद एलजीबीटीक्यू प्लस समुदाय के लिए थाईलैंड की स्थिति बेहतरीन देश के तौर मज़बूत होगी.

निचले सदन में समलैंगिक विवाह को लेकर बनी समिति के चेयरमैन दानुफोर्न पुन्नाकांता ने संसद में इस विधेयक को पेश करते हुए कहा, “यह समानता की शुरुआत है. यह हर समस्या का निदान तो नहीं है लेकिन समानता की दिशा में पहला क़दम ज़रूर है. इस क़ानून के ज़रिए हम इन लोगों को यह अधिकार लौटाना चाहते हैं, हम उन्हें कोई नया अधिकार नहीं दे रहे हैं.”

दक्षिणी थाईलैंड के सोंगक्ला शहर में पैदा हुए 27 वर्षीय मुस्लिम समलैंगिक व्यक्ति को यक़ीन नहीं है कि प्रस्तावित क़ानून से इस इलाके में कोई ख़ास फर्क़ पड़ेगा.

यह शख़्स अपनी पहचान ज़ाहिर नहीं करना चाहते इसलिए हमने इनका बदला हुआ नाम वेल रखा है. उन्होंने बीबीसी को बताया कि सेक्सुअलिटी के चलते उन्हें अक्सर ही अपमानित किया जाता है.

वेल के मुताबिक उनका पालन-पोषण उनके चचेरे भाइयों ने किया, जो अक्सर उन्हें मेकअप और लड़कियों के कपड़े पहनाते थे और यह उनके कट्टर मुस्लिम माता-पिता को बिलकुल पसंद नहीं था.

वेल के मुताबिक उनके माता-पिता के दोस्तों का रवैया भी उनके प्रति भयावह था.

जब उनकी उम्र बढ़ रही थी, तब उनके यौन रूझान को लेकर लोग लगातार पूछते रहते थे.

वेल के मुताबिक एलजीबीटीक्यू प्लस समुदाय का होने मात्र से किसी का उत्पीड़न नहीं होना चाहिए. वे प्रस्तावित क़ानून का स्वागत करते हैं लेकिन कहते हैं कि मैं शादी करना नहीं चाहता हूं.

वेल बताते हैं कि उनके माता-पिता, थाईलैंड के तमाम मुस्लिमों की तरह, समलैंगिकता को ग़लत नज़रिए से देखते हैं.

ऐसे में वेल के लिए किसी समलैंगिक के साथ शादी करने के बारे में माता-पिता को समझाना काफी चुनौतीपूर्ण स्थिति होगी.

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