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राजस्थानः लड़कियों के स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल पर पंचायत के रोक वाले वायरल वीडियो की कहानी – ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, मोहर सिंह मीणा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए जालौर के भीनमाल से
गुजरात राज्य की सीमा से सटे राजस्थान के जालौर ज़िले की भीनमाल तहसील का गजीपुरा गांव.
यहां 21 दिसंबर को पंद्रह गांवों की पंचायत ने निर्णय लेकर महिलाओं और लड़कियों के स्मार्टफ़ोन रखने पर पाबंदी का फ़ैसला सुनाया था.
इस मुद्दे ने सिर्फ़ राजस्थान ही नहीं बल्कि देशभर में महिलाओं की डिजिटल आज़ादी को लेकर एक बहस छेड़ दी है.
हालांकि, ख़बरों और सोशल मीडिया पर बढ़ते दबाव के बीच दो दिन में ही पंचायत की ओर से इस फ़ैसले को वापस ले लिया गया. उसका कहना था कि ये प्रस्ताव महिलाओं की तरफ़ से ही आया था.
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स्मार्टफ़ोन पाबंदी पर सुनाया गया फ़ैसला क्या था?
भीनमाल से क़रीब दस किलोमीटर दूर गजीपुरा गांव के सरकारी स्कूल के सामने से होते हुए रेतीला और संकरा रास्ता पूर्व सरपंच सुजाना राम चौधरी के घर पहुंचता है.
यह वो घर है जहां सुजाना राम की अध्यक्षता में 21 तारीख़ को पंद्रह गांवों की पंचायत की एक बैठक बुलाई गई थी.
इसी बैठक में महिलाओं और लड़कियों के समार्टफ़ोन रखने पर पाबंदी के निर्णय को सुनाते हुए क़रीब 65 साल के हिम्मता राम चौधरी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. इसके बाद इस मामले की देशभर में चर्चाएं तेज़ हुईं.
हिम्मता राम चौधरी ने बैठक का निर्णय पंचों के बीच पढ़ते हुए कहा था, "कारलू के पूर्व सरपंच देवा राम चौधरी ने प्रस्ताव रखा कि बहू-बेटियों के पास कैमरा वाला फ़ोन नहीं रहेगा. मोबाइल फ़ोन बिना कैमरे वाला रख सकती हैं. सर्व सहमति से प्रस्ताव पास किया गया."
"पढ़ाई करने वाली लड़कियां पढ़ाई की ज़रूरत में अगर ज़रूरी लगे तो वह रख सकती हैं. लेकिन, घर आने के बाद मोबाइल अपने घर से बाहर नहीं ला सकती हैं, शादी या किसी भी सार्वजनिक समारोह में लेकर नहीं आ सकती हैं और यहां तक कि पड़ोसी के घर भी नहीं लेकर जा सकती हैं. जिसे समस्त चौदह पट्टी ने सहमति प्रदान की है."
जब यह निर्णय सुनाया जा रहा था उस दौरान वहां महिलाओं की मौजूदगी नहीं थी.
इस निर्णय के बारे में बीबीसी न्यूज़ हिन्दी की टीम हिम्मता राम चौधरी से बात करने उनके घर पहुंची थी. हालांकि वो वहां मौजूद नहीं थे.
उन्होंने बीबीसी से फ़ोन पर हुई बातचीत में कहा, "मेरे भतीजे की किडनी ट्रांसप्लांट होने के कारण मैं घर पर नहीं हूं."
स्मार्टफ़ोन पाबंदी के फ़ैसले पर वो कहते हैं, "जब किसी को अच्छा नहीं लगा तो उसको (फ़ैसला) वापस ले लिया गया है. हालांकि, वह लागू नहीं हुआ था. 26 जनवरी को बैठक के बाद अगर सबकी सहमति होती तब लागू होना था."
उनका कहना है, "यह प्रस्ताव समाज की महिलाओं की ओर से दिया गया था. क्योंकि महिलाएं खेतों में काम करती हैं और बच्चे दिनभर फ़ोन में लगे रहते हैं जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है."
जब हमने उनसे कहा कि आपने तो लड़कियों के सामाजिक कार्यक्रमों में और घर से बाहर भी फ़ोन ले जाने पर भी पाबंदी लगाई थी. तो इस पर उनका कहना था, "पढ़ाई करने वाली लड़कियों के फ़ोन इस्तेमाल करने पर पाबंदी नहीं लगा रहे थे. सार्वजनिक कार्यक्रमों और घर से बाहर लड़कियों के फ़ोन लाने से बाक़ी लड़कियां फ़ोन लेने की ज़िद न करें, इसलिए यह फ़ैसला ले रहे थे."
इस इलाक़े की महिलाओं ने क्या बताया?
गजीपुरा में हुई इस बैठक की चर्चा देशभर में होने के बाद से यहां मीडिया और यूट्यूबर्स का लगातार आना जारी है. चौधरी समाज के लोगों का कहना है कि अब वो इस बारे में बात करते-करते थक गए हैं.
पूर्व सरपंच सुजाना राम की अध्यक्षता में उनके घर हुई इस बैठक पर बात करने के लिए सुजाना राम के घर पहुंचे तो वह भी घर पर मौजूद नहीं थे. फ़ोन पर उन्होंने बीबीसी से कहा कि वह उदयपुर गए हुए हैं.
सुजाना राम के भाई करमी राम चौधरी कहते हैं, "इस प्रस्ताव को वापस लेने के लिए हम पर किसी तरह का दबाव नहीं था."
सुजाना राम के परिवार की महिला दरिया देवी 10वीं कक्षा तक पढ़ी हुई हैं. उनके दो बच्चे हैं.
वह कहती हैं, "महिलाओं का ही कहना था कि छोटा फ़ोन रहे तो ठीक रहेगा. इसलिए मीटिंग में सभी ने कहा था कि सब को ठीक लगेगा तो 26 जनवरी को फ़ैसला लेंगे. बाक़ी यह प्रस्ताव वापस ले लेंगे. सोशल मीडिया पर बात बहुत बढ़ गई थी इसलिए वापस लिया है."
दरिया देवी व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम यूज़ करती हैं.
वह कहती हैं, "मीडिया वाले बहुत आते हैं और हम भी उनको जवाब देते हुए परेशान हो गए हैं. छोटी सी बात थी और इतनी बड़ी बात बन गई है. मेरे पास स्मार्टफ़ोन है, लेकिन हमें कभी किसी ने नहीं कहा कि फ़ोन यूज नहीं करना है."
गजीपुरा गांव से करीब सात किलोमीटर दूर कारलू गांव है. यहां पूर्व सरपंच देवाराम चौधरी का घर है. घर में परिवार की महिलाओं ने बताया कि देवाराम चौधरी बाहर गए हैं.
उनके परिवार की अंजा देवी बताती हैं, "बच्चे हर समय फ़ोन का इस्तेमाल करते हैं, खाना नहीं खाते और हमारा कहना भी नहीं सुनते हैं. इसलिए हमने प्रस्ताव रखा था कि फोन बंद हो जाए."
इस पूरे विवाद में अब कई लोग लड़कियों के स्मार्टफ़ोन चलाने पर पाबंदी के बारे में बात करने से कतराते हैं.
हनुमानगढ़ के सरकारी कॉलेज में समाजशास्त्री डॉ. अर्चना गोदारा कहती हैं कि इस इलाक़े में शिक्षा के अभाव और अपने वातावरण से बाहर नहीं निकल पाने के कारण ग्रामीण इलाक़ों में महिलाएं खुद के लिए आवाज़ उठाने से अमूमन परहेज़ ही करती हैं.
वह कहती हैं, "समाज में ऐसी मानसिकता है कि फ़ोन इस्तेमाल करने से युवा ग़लत राह पर जा रहे हैं. हालांकि, इस मानसिकता के कारण लड़कियों को फ़ोन इस्तेमाल से वंचित करना किसी भी तरह से उचित नहीं है."
ग़लत तरह से प्रचार करने के आरोप
इस मामले के चर्चा में आने के बाद प्रशासन की तरफ़ से अभी तक कोई बयान नहीं आया है. हालांकि, सोशल मीडिया पर इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हुई बातचीत को लेकर यहां के लोग अवगत हैं.
बैठक में गांव के ही नाथा सिंह भी शामिल थे. हम उनके घर पहुंचे तो वह भी घर पर मौजूद नहीं मिले.
उनके भाई अजबा राम चौधरी कहते हैं कि मां की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए नाथा सिंह दवाई लेने गए हैं.
अजबा राम कहते हैं कि छोटी सी बात को बहुत बड़ा पेश कर दिया गया. उन्होंने कहा, " मेरी भतीजी जोधपुर में आरपीएससी की तैयारी कर रही है, मैं ख़ुद उसको ऐपल का फ़ोन दिला कर आया हूं. हम क्यों पढ़ाई कर रही लड़कियों का फ़ोन बंद करवाएंगे, जबकि अधिकतर काम फ़ोन से ही होते हैं."
इस पूरे मामले को देशभर में महिलाओं की डिजिटल आज़ादी पर पाबंदी की तरह भी देखा जा रहा है.
यहीं के एक बुज़ुर्ग नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "सर्फ़ महिलाओं के ही फ़ोन इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाना कहां तक उचित है. फ़ोन ही बंद करने हैं तो सभी के कीजिए नहीं तो किसी का नहीं."
वहीं, गजीपुरा और करलू गांव के बीच दूसरे समुदाय के समूह में बैठे बुजुर्गों में से एक का कहना था, "अगर इस फ़ैसले से फोन बंद हो जाते तो हम भी इसी तरह अपने समाज में फ़ोन पर प्रतिबंध लगाने पर विचार ज़रूर करते."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.